गुरुवार, 31 अक्तूबर 2013

गाय मुक्त शहर उचित या अनुचित... ????

गाय मुक्त शहर उचित या अनुचित... 

आजकल लगभग सभी शहरोँ मेँ Cattle free city का नारा दिया जा रहा हैँ। 


क्याँ अब गाय के लिये हमारे शहरोँ मेँ कोई जगह नहीँ? 

आजकल कालोनीयोँ मेँ बड़े बड़े दरवारजे लगाकर या लोहे के ग्रिल लगाकर गाय को कालोनी मेँ आने से 


रोका जाता हैँ। 

बड़ी बड़ी कालोनीयोँ मेँ बकायदा चौकिदार तैनात रहते हैँ अगर गाय गलती से कालोनी मेँ आ भी जाये तो ये 


चौकिदार निर्दयता के साथ ड़ंड़े से गायोँ कि पिटाई करते हैँ। 



ऐसी कालोनीयोँ मेँ रहने वालो का मत होता हैँ के गाय कालोनी मेँ आकर कालोनी को गंदा करती हैँ.. 


उनके घरोँ के सामने गोबर करती हैँ। 


जिससे बदबू आती हैँ और बीमारी फैलती हैँ। 

अब ऐसे लोगो को कौन समझाये कि गंदगी गाय नहीँ हम इंसान फैलाते हैँ। 



बड़ा दुःख होता हैँ ऐसे लोगो की गंदी मानसिकता पर जो गाय को पूजते तो हैँ लेकिन सिर्फ लोक दिखावे या 

न्युज पेपर मेँ फोटो छपवाने के लिये। 



बात आगे भी जारी रहेँगी धन्यवाद...

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गोवत्स द्वादशी की हार्दिक शुभकामनाये

HAPPY GOVATSA DWADASHI इस दिन प्रिय
गौमाता का पूजन तथा गौसेवा कि जाती हैँ।
गोवत्स द्वादशी व्रत कार्तिक माह की कृष्ण पक्ष
की द्वादशी को मनाया जाता है.इस दिन गायों तथा उनके
बछडो की सेवा की जाती है.
सुबह नित्यकर्म से निवृतहोकर गाय तथा बछडे का पूजन
किया जाता है.
यदि घर के आसपास भी गाय और बछडा नहीं मिले तब
गीली मिट्टी से गाय तथा बछडे को बनाए और
उनकी पूजा कि जाती है.
इस व्रत में गाय के दूध से बनी खाद्य वस्तुओं का उपयोग
वर्जित होता है.
गौ भगवान श्रीकृष्ण को प्रिय हैं. गौ पृथ्वी का प्रतीक है,
गौमाता में सभी देवताओं के तत्त्व निहित होते हैं. इसीलिए
कहा जाता है कि, गौ में समस्त देवी-देवता वास करते हैं.
इनसे प्राप्त होने वाले पदार्थों जैसे दूध, घी, में सभी देवताओं के
तत्त्व संग्रहित रहते हैं जिन्हें पूजन व हवन इत्यादि में उपयोग
किया जाता है.
पंचगव्य मिश्रण पूजाविधिमें शुद्धिकरण हेतु महत्त्वपूर्ण
माना गया है. इस दिन ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए पृथ्वी पर
शयन करना चाहिए.
शुद्ध मन से प्रभु विष्णु व भगवान शिव की पूजा करनी चाहिए.
इस व्रत के प्रभाव से साधक को सभी सुखों की प्राप्ती होती है.
गोवत्स द्वादशी पूजन....
(Govatsa Dwadashi Pujan)
गोवत्स द्वादशी के दिन प्रात:काल पवित्र नदी या सरोवर
अथवा घर पर ही विधिपूर्वक स्नान आदि से निवृतहोकर स्वच्छ
वस्त्र धारण किए जाते हैं. व्रत का संकल्प किया जाता है.
इस दिन व्रत में एक समय ही भोजन किया जाने का विधान
होता है. इस दिन गाय को बछडे सहित स्नान कराते हैं.
फिर उन दोनों को नया वस्त्र ओढाया जाता है. दोनों के गले में
फूलों की माला पहनाते हैं.
दोनों के माथे पर चंदन का तिलक करते हैं. तांबे के पात्र में सुगंध,
अक्षत, तिल, जल तथा फूलों को मिलाकर दिए गए मंत्र
का उच्चारण करते हुए गौ का प्रक्षालन करना चाहिए.
मंत्र है -
क्षीरोदार्णवसम्भूते सुरासुरनमस्कृते!
सर्वदेवमये मातर्गृहाणार्घ्य नमो नम:!!
इस विधि को करने के बाद गाय को उड़द से बने भोज्य पदार्थ
खिलाने चाहिए और प्रार्थना करनी चाहिए. पूजन करने के बाद
गोवत्स की कथा सुनी जाती है.
सारा दिन व्रत रखकर रात्रि में अपने इष्टदेव
तथा गौमाता की आरती की जाती है. उसके बाद भोजन ग्रहण
किया जाता है.
गोवत्स द्वादशी महत्व...
(Significance of Govatsa Dwadashi)
गोवत्स द्वादशी के विषय में कई पौराणिक आख्यान मौजूद है एक
कथा अनुसार राजा उत्तानपाद ने पृथ्वी पर इस व्रत को आरंभ
किया उनकी पत्नी सुनीति ने इस व्रत को किया और उन्हें इस
व्रत के प्रभव से बालक ध्रुव की प्राप्ति हुई.
अत: निसंतान दम्पतियों को इस व्रत को अवश्य करना चाहिए.
संतान सुख की कामना रखने वालों के लिए यह व्रत शुभ फल
दायक होता है. गोवत्स द्वादशी के दिन किए जाने वाले कर्मों में
सात्त्विक गुणों का होना अनिवार्य है.
इस दिन गाय माता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु
गौका पूजन किया जाता है. गौ पूजन करने वाले भक्त श्री विष्णु
का आशिर्वाद प्राप्त होता है.
आप सभी गौभक्त मित्रोँ को गोवत्स द्वादशी कि बहुत बहुत
शुभकामनाऐँ...
.जय गौमाता जय गोपाल राधे राधे.""
""
आपका
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया

शुक्रवार, 25 अक्तूबर 2013

gorakshak ko hi vote de


गौधन

सोना-चांदी और रत्न-मणि सब धन है केवल नाम का ! 
यदि हैं कोई धन जगत में, गौधन है बस काम का !! 

गाय धरती का दुर्लभ वरदान व पृथ्वी पर देवी है: संसार का सर्वश्रेठ धन बस गौधन ही है. 
गाय विश्व की माता व भारत की आत्मा है.
गौ परम पूजनीय और परम स्तुति-योग्य माता है. गाय मनुष्य की धाय (पालक) है.
गौ भूमंडल पर मातृशक्ति का प्रत्यक्षरूप है; जो सम्पूर्ण प्राणियों की माता कहलाती है; क्योंकि यह सबको सुख देने वाली हैं.

प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में चार माताएं होती है; जिनकी की पूजा होती है:
१. जननी-माता,
२.गौमाता ,
३.भूमाता व
४. जगत- माता परमेश्वरी.

जो स्थान पदार्थों में वासुन्धरा का है;

मानवता में जननी का है; सरिताओं में भागीरथी-गंगा का है;

देवों में भगवान विष्णु का है;
देवियों में दुर्गा का है; नक्षत्रों में भगवान बृहस्पति का है,
ऋषियों में अगस्त्य - ऋषि का है;
वही स्थान गऊ-माता का है...
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गुरुवार, 24 अक्तूबर 2013

गाय की गुहार---


भटक रही गली-गली, पोलीथिन खाती-खाती 
नदी नाले दूध के जो, पोथियों में बह गए 
कट रही गाय आज, कमलों में झुण्ड-झुण्ड
गऊ प्रेम क्षेम सब,अंक मूँद सो गए
कैसे बने कोड अब, तीन सो दो दफा जैसा
नेता सरे संसद के, गूंगे बहरे हो गए
कृष्ण तू तो गोप था, गोपाल था, गोविन्द रहा
आज तेरे वंश के ही कंस जैसे हो गए
दूध, दही, घृत देय, जगत को पोसती है
मानव संवारती है, रूप धरे मैया का
गांव को ये अम्ब, स्वावलंब, उपहार देती
बैल पतवार होता, खेत रुपी नैया का
गोधन संपन्न कहा जाता, वही देश धन्य-धन्य
करें संम्मान आप, धेनु के चैरया का
देवता तैतीस कोटि,रोम में रमे ही रहे
कैसा प्यार पाया मेरे, कुंवर कन्हैया का
धोरी, लाल, घूमरी, सवत्स, कपिला के संग
कैसा प्यार पाया, मेरे कन्हैया बलभैया का
वही भूमि वही गाय, प्राण भय डकराय
आर्तनाद करे जैसे हाय-हाय, दैया का
संविधान मांही आप, धारा एक जोड़ दीजे
ख़ूनी जैसा हस्र होवे, गाय के कटैया का
छोड़ काम दोड़ पड़े , गाय की गुहार पर
भैया प्राण बचे तभी, गोविन्द की गैया का

वंदे गौमातरं... जय माता दी!!!


अगर इस अमूल्य कार्तिक मॉस में भगवान् को प्रसन्न करना चाहते है तो प्रतिदिन गाय माता को रोटी या चारे का भोग धराये और आरती गाये।


भगवान श्रीकृष्ण को गाय इतनी प्यारी थी

जन-जन के आराध्य भगवान श्रीकृष्ण को गाय इतनी प्यारी थी कि उन्होने अपनी वाल्यावस्था गौमाता के मातृत्व एवं सान्निध्य मेँ व्यतीत की थी। 

नन्दबाबा के यहाँ हजारोँ गाये थी इन्हेँ चराने एवं पालन के लिये सैँकड़ो सेवक मौजूद रहते थे मगर कृष्ण जी अपने ग्वाल वालो के साथ नंगे पैर वनोँ मेँ गायोँ को चराने खुद जाते थे। 

बिना गाय और ग्वाल के तो श्रीकृष्ण की बाल लीलाओँ का कोई अर्थ नहीँ था। 

गाय का सात्विक दूध, दही और माखन तो भगवान ने भी चुरा-चुराकर खाया और जग मेँ माखन चोर कहलाये।

विद्वान कहते हैँ कि श्रीकृष्ण ने 'गोवर्धन पर्वत' उठाकर गौवंश बढ़ाने

(गो + वर्धन = गौ वंश मेँ वृद्धि) का सन्देश भी दिया था।

भारतीय धर्मग्रन्थोँ मेँ पृथ्वी तथा गाय को जन्म देने वाली माता के समान आदरणीय कहा गया है गाय भारतीय संस्कृति का प्राण है।
यह गंगा, गायत्री, भगवान की तरह पूज्य है।

शास्त्रोँ मेँ इसे समस्त प्राणीयोँ की माता कहा गया है।
इसी कारण आर्य संस्कृति शैव, वैष्णव, शाक्त, गाणपत्य, जैन, बौद्ध, सिक्ख आदि सभी धर्म-संप्रदाय गौमाता के प्रति आदर भाव रखते है।

प्राचीन धर्म-ग्रन्थोँ मेँ बताया गया है कि गौमाता के अंगोँ मेँ देवताओँ का निवास होता है।

पद्मपुराण के अनुसार गौमाता के सिर मेँ ब्रह्मा, ललाट मेँ वृषभध्वज, मध्य मेँ विविध देवगण और रोम-रोम मेँ महर्षियोँ का वास है।

गौमाता की पूंछ मेँ शेषनाग, खुरोँ मेँ अप्सराओँ, मूत्र मेँ गंगाजी तथा नेत्रोँ मेँ सूर्य- चंद्रमा का निवास होता है।

गाय के मुख मेँ चारोँ वेदोँ, कानो मेँ अश्विनी कुमारोँ, दातोँ मेँ गरुण, जिह्वा मेँ सरस्वती तथा अपान मेँ सारे तीर्थोँ का निवास होता है।

भविष्य पुराण, स्कन्द पुराण, ब्रह्मांड पुराण और महाभारत मेँ भी गौमाता के अंग-प्रत्यंग मेँ देवी- देवताओँ की स्थिति का वर्णन है।

भारतीय परंपरा है कि मृत्यु के पहले और बाद मेँ तथा प्रायः सभी धार्मिक अनुष्ठानोँ मेँ गौदान किया जाता है, जिससे जीव वैतरणी पार हो जाता है तथा अभीष्ट मनोरथ प्राप्त करता है।

आज भी गौदान की परंपरा प्रचलित है।
जो लोग गौमाता की सेवा करते है, पवित्र संकल्प के साथ गौदान करते है उन्हेँ वैतरणी जनित कष्ट नहीँ भोगने पड़ते।

जय श्री राम। 


जय श्री कृष्ण।
वन्दे गौ मातरम्।

बुधवार, 23 अक्तूबर 2013

आध्यात्मिक उन्नति का आधार है- गऊ सेवा

वेदों में गाय का महत्व अतुलनीय व श्रेष्ठतम है। गाय रुद्रों की माता, वसओं की पुत्री, अदिति पुत्रों की बहन तथा अमृत का खजाना है। अथर्ववेद के 21वें सूक्त को गौ सूक्त कहा जाता है। इस सूक्त के ऋषि ब्रह्मा तथा देवता गऊ है। गायें हमारी भौतिक व आध्यात्मिक उन्नति के प्रधान साधन है। मनुष्य को धन–बल–अन्न व यश पाने के लिए गऊ सूक्त का रोज़ पाठ करना चाहिए। आरोग्य व पराक्रम पाने के गाय के दूध, मक्खन व घी का सेवन करने से पूर्व इस सूक्त का पाठ मात्र करने से सर्वारिष्ट शांत होते है।
माता रुद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यनाममृत्सय नाभिः।
प्र न वोचं चिकितुषे जनाय मा गामनागामदितिं वधिष्ठा ।।
अतः प्रत्येक विचारवान को चाहिए कि निरअपराध माँ जैसी गाय का वध ना करें।
आ गावों अग्नमुन्नत भद्रमक्रन्तसीदन्तु गोष्ठे रणयन्त्वस्मे ।
प्रजावतीःपुरुरुपा इह स्युरिन्द्राय पूर्वीरुषसो दुहानाः।।
गौऊओं ने हमारे यहां आकर हमारा कल्याण किया है। वे हमारी गौ शाला में सुख से बैठे और उसे अपने सुन्दर शब्दों से गूंजा दे। ये विविध रंगो की गौऊएं अनेक प्रकार के बछड़े –बछड़ियाँ जनें और इन्द्र (परमात्मा) के भजन के लिए उषा काल से पहले दूध देने वाली हो।
न त नशन्ति न दभाति तस्करों नासामामित्रों व्यथिरा दधर्षति।
देवांश्च याभिर्यजते ददाति च ज्योगित्ताभिः स च ते गोपतिः सह ।।
वे गोएं ना तो नष्ट हों, न उन्हें चोर चुरा ले जायें और न शत्रु ही कष्ट पहुँचाये।
जिन गौओं की सहायता से उनका स्वामी देवताओं का भजन करने तथा दान देने में समर्थ होता है, उनके साथ वह चिरकाल तक संयुक्त रहे।
गावो भगो गावः इन्द्रो म इच्छाद्रावः सोमस्य प्रथमस्य भक्षः।
इमा या गावः स जनास इन्द्र इच्छामि हृदे मनसा चिदिन्द्रम ।।
गौएं हमारा मुख्य धन हो, इन्द्र हमें गोधन प्रदान करें तथा यज्ञों की प्रधान वस्तु सोमरस के साथ मिलकर गायों का दूध ही उनका नैवेध बने। जिसके पास ये गायें है, वह तो एक प्रकार से इन्द्र ही है। मैं अपने श्रद्धायुक्त मन से गव्य पदार्थों के इन्द्र (भगवान) का भजन करना चाहता हूँ।
यूयं गावो मेदयथा कृशं चिदश्रीरं चित्कृणुता सुप्रतिकम।
भद्रं गृहं कृणुथ भद्रवाचो वो वय उच्यते सभासु ।।
गौओं। तुम कृश शरीर वाले व्यक्ति को हष्ट-पुष्ट कर देती हो एवं तेजोहीन को देखने में सुन्दर बना देती हो। इतना ही नहीं तुम अपने मंगलमय शब्दों से हमारे घरों को मंगलमय बना देती हो। इसी से सभाओं में तुम्हारे ही महान यश का गान होता है।
प्रजावतीः सूयवसे रुशान्तिःशुद्धा अपःसुप्रपाणे पिबन्तिः।
मां व स्तेन ईशत माघशंसः परि वो रुद्रस्ये हेतिवर्णक्तु।।
गोओं तुम बहुत से बच्चे जनों, चरने के लिए तुम्हें सुंदर चारा प्राप्त हो तथा सुंदर जलाशयों में तुम जल पीती रहो। तुम चोरों तथा हिंसक जीवों के चंगुल में न फंसो और रूद्र का शस्त्र तुम्हारी सब ओर से रक्षा करें। 

कृष्ण की कृपा प्राप्त करने का सुगम उपाय है गऊ सेवा

समुद्र मंथन से प्राप्त अमृत पान से ब्रह्माजी के मुख से जो फेन निकला, उससे गाय उत्पन्न हुई। कामधेनु समुद्र मंथन से मिला देव-मनुष्यों को वरदान है। गो-दुग्ध से ही श्रीर-सागर बना। गौ के शरीर में समस्त देवताओं का वास है।
ऋग्वेद में गाय को अधंया यजुर्वेद में अनुपमेय, अथर्ववेद में संपत्तियों का घर कहा गया है। गौ के मुख में 6 दर्शन व षडंग तथा चारों पैरों में वेद रहते हैं। श्री कृष्ण गो-सेवा से जितने शीघ्र प्रसन्न होते हैं। उतने अन्य किसी उपाय से नहीं।
भगवान राम ने पूर्वज महाराज दिलीप भी नन्दिनी की पूजा करते थे। उन्हीं की कृपा से उनका वंश उन्नति को प्राप्त हुआ। महर्षि वशिष्ट के आश्रम में भी कामधेनु उनकी समस्त आवश्यकताओं को पूर्ण करती थीं। विश्वामित्र इसी कामधेनु को प्राप्त करने के लिये वशिष्ठ पर नारायणस्त्र, ब्रह्मास्त्र व पाशुपतास्त्र का संधान किया था परंतु कामधेनु के आशीष से सभी अस्त्र-शस्त्र निर्मूल सिद्ध हुए थे।
भगवान शिव का वाहन नंदी दक्षिणी भारत के ओंगलें नामक नस्ल का सांड था। जैन आदि तीर्थ कर भगवान ऋषभदेव का चिन्ह बैल था। तुलसीदास जी के अनुसार धर्म-अर्थ, काम व मोक्ष चारों फल गाय के चार थन रूप हैं। हिन्दू शास्त्रों में व जैन आगमों में कामधेनु को स्वर्ग की गाय कहा है। गाय को ‘अवध्या’ माना है।
भगवान महावीर के अनुसार ‘गौ रक्षा’ बिना मानव रक्षा संभव नहीं है। पैगाम्बर हजरत मोहम्मद ने कहा है की ‘गाय का दूध रसायन, घी अमृत व मांस बीमारी है। तथा गाय दौलत की रानी है। ईसा मसीह ने कहा है कि एक बैल को मारना एक मनुष्य को मारने के समान है।
स्वामी दयानंद सरस्वती ‘गौ करुणानिधि’ में कहते हैं कि ‘एक गाय अपने जीवन काल में 4,10,440 लाख मनुष्यों हेतु एक समय का भोजन जुटाती है। जबकि उसके मांस से 80 मांसाहारी केवल एक समय अपना पेट भर सकते हैं।
लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने कहा था कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद कलम की नोक से गोहत्या पूर्ण बंद कर दी जाएगी। प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था भारत में गोपालन सनातन धर्म है।
पूज्य देवराहा बाबा के अनुसार जब तक गौमाता का खून इस भूमि पर गिरता रहेगा, कोई भी धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं होगा। कोई भी धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठान पूर्ण नहीं होगा। स्व. जयप्रकाश नारायण ने कहा था, हमारे लिये गोहत्या बंदी अनिवार्य है। गाय के वैज्ञानिक महत्व को प्रतिपादित करने वाले अनेक शोध निष्कर्ष विज्ञान की कसौटी पर खरे उतरे हैं। रूसी वैज्ञानिक शिरोविच के अनुसार गाय के दूध में रेडिया विकिरण से रक्षा करने की सर्वाधिक शक्ति होती है एवं जिन घरों में गाय के गोबर से लिपाई पुताई होती है, वे घर रेडियों विकिरण से सुरक्षित रहते हैं। गाय का दूध ह्दय रोग से बचाता है। गाय का दूध स्फर्तिदायक, आलस्यहीनता व स्मरण शक्ति बढ़ाता है। गाय व उसकी संतान के रंभने से मनुष्य की अनेक मानसिक विकृतियां व रोग स्वत: ही दूर होते हैं। मद्रास के डॉ. किंग के अनुसंधान के अनुसार गाय के गोबर में हैजे की कीटाणुओं को नष्ट करने की शक्ति होती है। टी.वी. रोगियों को गाय के बाड़े या गौशाला में रखने से, गोबर व गोमूत्र की गंध से क्षय रोग (टीवी) के कीटाणु मर जाते हैं।
एक तोला गाय के घी से यज्ञ करने पर एक टन आक्सीजन (प्राणवायु) बनती है। रूस में प्रकाशित शोध जानकारी के अनुसार कत्लखानों से भूंकप की संभावनाएं बढ़ती हैं। शारीरिक रूप से गाय की रीड़ में सूर्य केतु नाड़ी होती हैं जो सूर्य के प्रकाश में जाग्रत होकर पीले रंग का केरोटिन तत्व छोड़ती है। यह तत्व मिला दूध सर्व रोग नाशक, सर्व विष नाशक होता है।
गाय के घी को चावल से साथ मिलाकर जलाने से अत्यंत महत्वपूर्ण गैस जैसे इथीलीन आक्साइड गैस जीवाणु रोधक होने के कारण आप्रेशन थियेटर से लेकर जीवन रक्षक औषधि बनाने के काम आती है।
वैज्ञानिक प्रोपलीन आक्साइड गैस कृत्रिम वर्षा का आधार मानते हैं। इसलिये यज्ञ करना पाखंड नहीं अपितु पूर्ण वैज्ञानिक होते हैं। भारतीय गौवंश के मूत्र व गोबर से तैयार लगभग 32 औषधियों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र व राजस्थान आदि सरकारों से मान्यता प्राप्त हैं।
गाय के गोमूत्र में तांबा होता है। जो मनुष्य के शरीर में पहुंचकर स्वर्ण में परिवर्तन हो जाता है। व स्वर्ण में सर्व रोगनाशक शक्ति होती है। गोमूत्र में अनेक रसायन होते हैं। जैसे नाइट्रोजन कार्बोलिक एसिड, दूध देती गाय के मूत्र में लैक्टोज सल्फर, अमोनिया गैस, कापर, पौटेशियम, यूरिया, साल्ट तथा अन्य कई क्षार व आरोग्यकारी अमल होते हैं।
गाय के गोबर में 16 प्रकार के उपयोगी खनिज पाये जातें हैं। गोमूत्र में आक, नीम व तुलसी आदि उबालकर, कई गुना पानी में मिलाकर बढ़िया कीट नियंत्रण बनते हैं। गोबर की खाद प्राकृतिक है इससे धरती की उर्वरा शक्ति बनी रहती है। जबकि रसायनिक खाद व कीटनाशकों से धरती बंजर हो जाती है।
ब्रह्मा की सृष्टि के सर्वाधिक महत्वपूर्ण प्राणी ‘गो वंश का रक्षणा’ हमें भारतीय संविधान के मूलभूत सिद्धांतों में इसे शामिल करना चाहिए। गो वंश के रक्षण, पालन व संवर्धन का कार्य सभी को करना चाहिए।

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गाय पुराने समाज के लिये पशु नहीं था...

 वह हमारी धरती पर खड़ी जीवित देवशक्ति थी...
बल्कि समस्त देवताओं की आभा लिये उन्हीं अव्यक्त
सत्ताओं की प्रतिनिधि थी। उस गाय को काटने-
मारने के कारण ही यह भारत राष्ट्र इतनी मेधा-
प्रतिभा और संसाधनों, श्री-समृद्धि के स्रोतों के
बावजूद यदि गरिब तो यह उसी गो-माता का शाप
है.हमारा सहस्त्रों वर्षो का चिन्तन, हमारे योगी,
तापस, विद्यायें सब लुप्त हो गये... और जो कबाड़ शेष
बचा है वही समाज के सब मंचों पर खड़ा होकर राश्ट्र
का प्रतिनिधि बन बैठा है। प्रतिभा अपमानित है,
जुगाड़ और जातियों के बैल राष्ट्र को विचार के
सभी स्तरों पर हांक रहे हैं, गाय को काटने वालों ने
भारतीय समाज की आत्मा को ही बीच से काट
डाला है गाय के कटने पर हमारा ‘शीश’ कट कर गिर
पड़ा है. हम जीवित हिन्दू उस गाय के बिना कबन्ध हैं,
इस कबन्ध के लिये ही मारा-मारी में जुटे हैं अपराध,
भ्रष्टाचार और राजनीति का दलिद्दर चेहरा ऐसे
ही कबन्ध रूपी समाज में चल सकता था... वरना आज
यदि उस गो-माता के सींग का भय होता...
तो आपकी गृहलक्ष्मी आपको बताती कि भ्रष्टाचार
और दलिद्दर विचारों के साथ आप आंगन में कैसे प्रवेश
कर सकते हैं ।
जब कोई हमारी माँ को इस बर्बरता से काट से सकते है
तो हम उनका सर क्यो कलम नहीं कर सकते
जो हमारी जनंनी को हमसे छिनने की कोशिश कर
रहा है। आखिर कब तक हम यूँ ही देखते रहेंगे , कब तक ?
कहीं ऐसा ना हो कि बहुत देर हो चुकी हो, अब समय आ
गया है उठ खड़े होने का। और इस लड़ाई में सबसे आगे
हिन्दुओं को होना चाहिए, क्योंकी ये खिलवाड़ हमारे
अस्मत के साथ हो रही है। हमे किसी और का इन्तजार
नहीं करना चाहिए। यूरोप में मांस की अत्यधिक मांग
होने के कारण, अंग्रेज विचारक चील-कौवों की तरह
गाय के चारों ओर मंडराने लगे। गो-धन को समाप्त
करने के लिये उन्होंने अंग्रेजी स्कूलों से शिक्षा प्राप्त
नीति निर्धारकों, इन फाइल-माफियाओं
को फैक्ट्री दर्शन के पाठ पढ़ाये... अनाज
की कमी का भय दिखाकर रासायनिक-खाद
की फैक्ट्रियां लगीं, दूध की कमी का रोना रोकर दूध
के डिब्बे फैक्ट्रियों में तैयार होने लगे, घी, मक्खन
सभी कुछ डिब्बा बन्द... ताकि गो-मांस को निर्बाध
निर्यात किया जा सके शहरों में रहने वाले मध्यमवर्ग
ने इन उत्पादों की चमक के कारण गाय के शरीर से आंखें
फेरलीं । वह गोबर, गोमूत्र को भूलता चला गया और
देश में गाय सहित हजारों पशुओं को काटने वाले
कत्लगाह खुलने पर ऋषियों के पुत्र एक शब्द नहीं बोले.
वे इन दूध के डिब्बों से एक चम्मच पाउडर निकाल कर
चाय की चुस्कियां भर कर अंग्रेजी अखबार पढ़ते रहे ।
यूरोप से आयातित मांसल सभ्यता के अचार पर चटकारें
मारते रहे , और गो-माता हमारे जीवन से अदश्य
हो गयी क्योंकि गोबर की जगह
यूरिया की बोरियों ने ले ली, बैल
की घन्टियों की जगह कृशि जीवन को आक्रान्त करने
वाले ट्रैक्टर आ गये तर्क है कि अनाज
की कमी पूरी हो गयी ।. यदि हम यूरिया के कारण
आत्म निर्भर हैं तो हमारा किसान
आत्महत्या क्यों कर रहा है? गेहूँ आयात
क्यों किया जा रहा है...? आप के बन्दर
मुखी बुद्धिजीवी जब मंहगें होटलों में बैठकर ये
जो ‘जैविक-जैविक’ का जप करते रहे हैं, क्या उनके
गालों पर झापड़ रसीद की जाय...? यूरोप-
अमेरिका कब तक हमें मूर्ख बनायेगा...?
हमारी ही गायों को उबाल कर खाने वाले ये दैत्य, हमें
ही प्रकृति से जुड़ने की शिक्षायें देते हैं, खेती-जंगल-जल
से पवित्र सम्बन्ध रखने वाले भारतीय समाज की ऐसी-
तैसी करके भाई लोग पर्यावरण पर उस समाज
को शिक्षायें देते हैं। जिनके जीवन में ‘गाय’ की पूछ
पकड़े बिना मुक्ति की कामना नहीं, पेड़ जिनके
धार्मिक-चिह्न है, नदियाँ जिनकी मां हैं, जहाँ घाटों,
नदियों, गायों के व्यक्तियों की तरह नाम हैं,
ताकि उनके न रहने पर, समाज में
उनकी स्मृति बनी रहे, उस वृद्ध और घाघ समाज
को सेमिनारों में पाठ पढाये जा रहे हैं... वो भी हमारे
ही खर्चे पर... हद है। गो-माता जब से पशु
बनी तभी से हम भारतीयों का समाज भी कबन्ध
हो गया है गाय, इस भौतिक जगत और अव्यक्त सत्ता के
बीच खड़ा जीवित माध्यम है, उस विराट के समझने
का प्रवेषद्वार है जो लोग, जो सभ्यतायें, जो धर्म,
गाय को मार-काट कर खा-पका रहे हैं, वे प्रभु और
अपने बीच के माध्यम को जड़ बना रहे हैं। वे जीवित
धर्म का ध्वंश कर रहे हैं, अब चाहे वे धर्म के नाम पर
जितनी बड़ी अट्टालिकायें गुंबद बना लें, वे
परमात्मा की कृपा से तब तक वंचित रहेंगें, जब तक वे
गाय को अध्यात्मिक दृश्टि से नहीं देखेगें वैसे
विटामिन, प्रोटीन और पौश्टिकता से भरे तो कई
डिब्बे, और कैप्सूल बाजार में उपलब्ध हैं।
यदि ऋषियों ने भौतिक-रासायनिक गुणों के कारण
गाय को पूजनीय माना होता, तो हिन्दू आज इन दूध के
डिब्बों, कैप्सूलों की भी पूजा कर रहा होता विज्ञान
वही नहीं है जो अमेरिका में है, विज्ञान का नब्बे
प्रतिशत तो अभी अव्यक्त है, अविश्कृत होना है, हमने
अन्तर्यात्रायें कर के उसकी झलक सभ्य संसार
को दिखाई थी, असभ्यों ने वो समस्त पोथी-पुस्तक
ही जला दिये... गाय बची है... उस माता की पूंछ
ही वह आखिरी आशा है जिसे पकड़ कर हम
पुनः महाविराट सत्ता का अनावरण कर सकते हैं


प्रश्नोत्तर


गाय एवं गाय के विज्ञान से जुड़े अक्सर पूछे जाने वालेकुछ प्रश्नोत्तर यहाँ दिये गए है| अगर आपके मन में इनप्रश्नों के अलावा भी कोई प्रश्न आए तो आप इस पेजपर कमेंट के रूप में हम से पूछ सकते है| आपके द्वारा पूछेगए अच्छे प्रश्नों को हम यहाँ जोड़ कर सभी के लिएउसका उत्तर उपलब्ध करवाएँगे|प्रश्न 1.) गाय क्या है?उत्तर 1.) गाय ब्रह्मांड के संचालक सूर्य नारायणकी सीधी प्रतिनिधि है| इसका अवतरण पृथ्वी परइसलिए हुआ है ताकि पृथ्वी की प्रकृति का संतुलनबना रहे| पृथ्वी पर जितनी भी योनियाँ हैसबका पालन-पोषण होता रहे| इसे विस्तृत में समझने केलिए ऋगवेद के 28वें अध्याय को पढ़ा जा सकता है|प्रश्न 2.) गौमाता और विदेशी काऊ में अंतर कैसेपहचाने?उत्तर 2.) गौमाता एवं विदेशी काऊ में अंतरपहचानना बहुत ही सरल है| सबसे पहला अंतर होता हैगौमाता का कंधा (अर्थात गौमाता की पीठ पर ऊपरकी और उठा हुआ कुबड़ जिसमें सूर्यकेतु नाड़ी होती है),विदेशी काऊ में यह नहीं होता है एवं उसकी पीठ सपाटहोती है| दूसरा अंतर होता है गौमाता के गले के नीचेकी त्वचा जो बहुत ही झूलती हुई होती हैजबकि विदेशी काऊ के गले के नीचे की त्वचा झूलती हुईना होकर सामान्य एवं कसीली होती है| तीसरा अंतरहोता है गौमाता के सिंग जो कि सामान्य से लेकरकाफी बड़े आकार के होते है जबकि विदेशी काऊ के सिंगहोते ही नहीं है या फिर बहुत छोटे होते है|चौथा अंतर होता है गौमाता कि त्वचा का अर्थातगौमाता कि त्वचा फैली हुई, ढीली एवं अतिसंवेदनशीलहोती है जबकि विदेशी काऊ की त्वचा काफी संकुचितएवं कम संवेदनशील होती है| पांचवा अंतर होता हैगौमाता केप्रश्न 3.) अगर थोड़ा सा भी दही नहीं हो तब दूध सेदही कैसे बनाएँ?उत्तर 3.) हल्के गुन-गुने दूध में नींबू निचोड़ करदही जमाया जा सकता है| इमली डाल करभी दही जमाया जाता है| गुड़ की सहायता सेभी दही जमाया जाता है| शुद्ध चाँदी के सिक्केको गुन-गुने दूध में डालकरभी दही जमाया जा सकता है|प्रश्न 4.) किस समय पर दूध से दही बनानेकी प्रक्रिया शुरू करें?उत्तर 4.) रात्री में दूध को दही बनने के लिएरखना सर्वश्रेष्ठ होता है ताकि दही एवं उससेबना मट्ठा, तक्र एवं छाछ सुबह सही समय पर मिलसके|प्रश्न 5.) गौमूत्र किस समय पर लें?उत्तर 5.) गौमूत्र लेने का श्रेष्ठ समय प्रातःकालका होता है और इसे पेट साफ करने के बाद खाली पेटलेना चाहिए| गौमूत्र सेवन के 1 घंटे पश्चात ही भोजनकरना चाहिए|प्रश्न 6.) गौमूत्र किस समय नहीं लें?उत्तर 6.) मांसाहारी व्यक्ति को गौमूत्रनहीं लेना चाहिए| गौमूत्र लेने के 15 दिन पहलेमांसाहार का त्याग कर देना चाहिए| पित्तप्रकृति वाले व्यक्ति को सीधे गौमूत्रनहीं लेना चाहिए, गौमूत्र को पानी में मिलाकरलेना चाहिए| पीलिया के रोगी को गौमूत्रनहीं लेना चाहिए| देर रात्रि में गौमूत्रनहीं लेना चाहिए| ग्रीष्म ऋतु में गौमूत्र कम मात्र मेंलेना चाहिए|प्रश्न 7.) क्या गौमूत्र पानी के साथ लें?उत्तर 7.) अगर शरीर में पित्त बढ़ा हुआ है तो गौमूत्रपानी के साथ लें अथवा बिना पानी के लें|प्रश्न 8.)अन्य पदार्थों के साथ मिलकर गौमूत्रकी क्या विशेषता है? (जैसे की गुड़ और गौमूत्रआदि संयोग)उत्तर 8.) गौमूत्र किसी भी प्रकृतिक औषधी के साथमिलकर उसके गुण-धर्म को बीस गुणा बढ़ा देता है|गौमूत्र का कई खाद्य पदार्थों के साथ अच्छा संबंध हैजैसे गौमूत्र के साथ गुड़, गौमूत्र शहद के साथ आदि|प्रश्न 9.) गाय का गौमूत्र किस-किस तिथि एवंस्थिति में वर्जित है? (जैसे अमावस्या आदि)उत्तर 9.) अमावस्या एवं एकादशी तिथि तथा सूर्य एवंचन्द्र ग्रहण वाले दिन गौमूत्र का सेवन एवंएकत्रीकरण दोनों वर्जित है|प्रश्न 10.) वैज्ञानिक दृष्टि से गायकी परिक्रमा करने पर मानव शरीर एवं मस्तिष्क परक्या प्रभाव एवं लाभ है?उत्तर 10.) सृष्टि के निर्माण में जो 32 मूल तत्व घटक केरूप में है वे सारे के सारे गाय के शरीर में विध्यमान है|अतः गाय की परिक्रमा करना अर्थातपूरी पृथ्वी की परिक्रमा करना है| गाय जो श्वासछोड़ती है वह वायु एंटी-वाइरस है| गायद्वारा छोड़ी गयी श्वास से सभी अदृश्य एवंहानिकारक बैक्टेरिया मर जाते है| गाय के शरीर सेसतत एक दैवीय ऊर्जा निकलती रहती है जो मनुष्यशरीर के लिए बहुत लाभकारी है| यही कारण हैकि गाय की परिक्रमा करने को अति शुभमाना गया है|


शनिवार, 19 अक्तूबर 2013

"गौ"

मानवमात्र के लिए उपकारी होने से विभिन्न
मतों सम्प्रदायों और धार्मिक आस्थाओं के
प्रबुद्ध चिंतकों दार्शनिकों ने एक स्वर में
"गौ"
कि महिमा को उसकी उपयोगिता को उसके
दिव्य अनुदानों और प्रभावों को स्वीकारा है
तथा अपने-अपने धर्म सम्प्रदायों में प्रचार
प्रसार किया है। ऐसी स्थिति में
गौ का प्रश्न राष्ट्रिय एकता को सुदृढ़
आधार प्रदान करता है और मानव जीवन
मूल्यों का परिमार्जक होने से राष्ट्रिय
चेतना को भी जागृत करता है। इतिहास
प्रसिद्ध तथ्य है कि भारतीय
स्वतंत्रता आन्दोलन
का क्रांतिकारी सूत्रपाद गो चर्बी से
बनी कर्तूसों के विरोध से हुआ। मुग़ल काल में
भी गोहत्या वाम गो तोरास्कार के कारण
मुग़ल शासकों को विरोध
का सामना करना पड़ा। उन्हें
अपनी राजसत्ता कि स्थिरता के लिए
गौ को सम्मान देना पड़ा। आज के समय में
भी "गौ क्रांति-समग्र क्रांति" का सूत्र जब
जन मानस में जागेगा तब राष्ट्र कि सोई हुई
चेतना जागृत होगी, आर्थिक सामाजिक एवं
राजनैतिक परिदृश्य बदलेगा और
शांति,अहिंसा,समरसता,आर्थिक उदारीकरण
का वास्तविक स्वरुप राष्ट्र में परिदृश्य होने
लगेगा।


गुरुवार, 17 अक्तूबर 2013

मुझे कहता है -'माँ'और'माई'.!! ले जाएगा मुझे कोई कसाई..!!!

शेयर करें हिंदू भाइयों..!!

मुझे कहता है -'माँ'और'माई'.!! 
ले जाएगा मुझे कोई कसाई..!!!

ग्वाला दूध दुह चुका था
और अब थन को,
बूंद- बूंद निचोड़ रहा था.
उधर खूंटे से बंधा बछड़ा भूख से बिलबिला रहा था.!!

इसे देखकर ममता ममताई
गाय कुछ कसमसाई.
उसकी ममता उभर आयी.
उसने अपना एक पैर उठाया,
ग्वाले ने पीठ पर डंडा चलाया.!!

भूखे बछड़े की आँखों में
तब गर्म खून उतर आया.
फिर संवेदनशील
गाय ने ही उसे समझाया,!!

बेटा! अब दूध की आस छोड़,
तू चारे से अपनी भूख मिटा.
यह मानव तो बहुत भूखा है..
दूध और अन्न की कौन कहे कभी-कभी,
बालू- सीमेंट- सरिया- पुल
और सड़क भी पचा जाता है.!!

फिर भी इसकी भूख नहीं मिटती, पेट नहीं भरता.
मुझे तो बुढापे तक सहनी है इसकी पिटाई.
जब हो जाउंगी अशक्त, ले जाएगा मुझे कोई कसाई.
फिर भी भूल जाती सबकुछ ,
जब यह पुचकारता है मुझे कहता है -'माँ'और'माई'.!!

'माँ'और'माई'.'माँ'और'माई'.'माँ'और'माई'...!!!




jai gaumata jai gopal photos









हम गौ सेवा कैसे करें..?



कई लोगों के मन में यह सवाल रहता है , इसकेलिए यह जानना जरुरी है की हम गौ सेवा निम्न प्रकार से कर सकते है :- 1.) अपने या अपने परिवारजनों के जन्मदिन पर, पूर्वजों की स्मृति में , स्वजनों की पुण्यतिथि पर गौशाला दर्शन करके गौ सेवा करें । 2.) गौ माता पर हो रहे अत्याचारों को रोकने में अपना सहयोग प्रदान करें । 3.) ऐसी वास्तु इस्तेमाल करने से बचें जिसको बनाने हेतु गौ को कष्ट व पीढ़ा पहुंचाई गयी हो । 4.) निजी स्वार्थ पूर्ति हेतु कुछ लोग गौ हत्या करते हैं ऐसा होने से रोकें । 5.) रोज अपनी कमाई का कुछ अंश गौ माता के लिए निकालें व इसे गौ माता के लिए ही खर्च करें, जैसे हरा चारा , आदि खरीद के गौ को दे सकते हैं. 6.) अपने घर में छोटे बच्चों को भी ये सिख दें कि वो अपनी पॉकेट मनी (जेब खर्च ) में से कुछ पैसा बचा के गौ माता के लिए निकालें , उन्हें भी गौ माता का महत्व समझाएं । 7.) घर में गौ ग्रास जरुर निकालें । 8.) हरी सब्जी जैसे पालक , मैथी, सरसों , बथुआ , चौलाई, मटर , हरा चना, इत्यादि का उपयोग करने के उपरांत जो हरा चारा निकलता है उसे कूड़ा दान में न डालते हुए गौ माता को खिलाएं । 9.) गौएँ बेचीं ही इसीलिए जाती है क्यूंकि वे बूढी होने के बाद दूध देना बंद कर देती हैं, और किसान या गौपालक को उसे खिलाना पिलाना तथा पालना बोझ सा लगता है, उन्हें उन गौओं को बेचने की जगह किसी गौशाला में छोड़ने के सलाह दे जिससे गौ बाख सके। और इसलिए किसी गौशाला में जाकर गौ के खाने का प्रबंध कर दें और अन्य लोगों को भी इसकी सलाह देकर उन्हें भी इस कार्य से जोड़ें ताकि पैसों के खातिर कोई भी गौ को कसाई को न बेचे। ऐसा करके देखें, ऐसा करने से न केवल गौ माता की सेवा तथा रक्षा होगी बल्कि आत्म सुख तथा शांति भी प्राप्त होगा । धन्यवाद ....

बुधवार, 16 अक्तूबर 2013

जय गौ माता जय गोपाल का नारा ही नहीं देना है अपितु उसे सार्थक भी करना है

''प्रिय गौ माता प्रिय गोपाल''

प्रिय मित्रो ,आज केवल हमें जय गौ माता जय गोपाल का नारा ही नहीं देना है अपितु उसे सार्थक भी करना है और वो सार्थक केवल हमारे प्रयासों से ही संभव है, सरकार के ऊपर निर्भर रहना बेकार है ,हम हर तरह से गौ माता की सेवा करने में है सक्षम है।बहुत से मित्रो का ये सवाल होता है की हम किस प्रकार से गौ माता की सेवा करे,हम अनेक प्रकार् से गौ माता की सेवा कर सकते है। जैसे-

1. हमें कम से कम एक गौ माता का पालन अवश्ये करना चाइये,अगर घर में जगह नहीं हो तो गौशाला में रखे,और अगर गौशाला में भी नहीं रख सकते तो कृपया अपने दिलो में गौ माता को जरूर बिठाये।
2. हमारे घर से कम से कम दो रोटी तो गौ माता के लिए निकलनी ही चाइये।
3. गौ माता के दिखते ही प्रणाम जरुर करे,क्योंकि गौमाता सर्वदेवमयी है,ऐसा करने से हमारे समस्त पापो का नाश होगा,और गौ माता के प्रति आदर का भाव आयेगा।
4. गौ माता को कच्चा धान और घास खिलानी चाइये,गौ माता को कभी भी पुरी,पकोड़ी,ब्रेड पक्का हुआ धान नहीं खिलाना चाइये।
5. गौमाता के सामने अगर पॉलिथीन दिखे तो उससे तुरंत एक तरफ कर दे,क्योंकि पॉलिथीन गौ माता के लिए कसाएयो से भी जयादा खतरनाक है।
6. प्रतिदिन अगर हो सके तो गौ माता के लिए कम से कम एक रुपया तो गौ दान पात्र में अवश्ये डाले,और पास वाली गौशाला में दान करे।
7. गौ माता का घरेलु सामान प्रयोग में लाकर हम गौमाता की सेवा कर सकते है जैसे- घी,गोबर से बनी धुप,साबुन,दंतमंजन,गौमूत्र,गौ माता के दूध से निर्मित शूद्ध मिठाइय आदि।
8. अगर हम लेखक है तो गौ माता के लिए लिखे ,चित्रकार है तो गौमाता के चित्र बनाकर लोगो को प्रेरित करे,मीडिया जगत से है तो लोगो के समक्ष गौमाता की स्तिति का वर्णन करे, संगीतकार है तो गौ माता के लिए भजन गाकर लोगो को प्रेरित करे,आप अपने प्रोफेशन के द्वारा भी गौ माता के लिए बहुत कुछ कर सकते है
9. हमारे द्वारा कोई भी ऐसी वस्तु का उपभोग न हो जिससे हमे गौ माता की हत्या का अपराध लगे जैसे- leather,प्रोडक्ट्स ऑफ़ नेस्ले,कैडबरी,मग्गी कंपनी,चांदी की बरक आदि।
10. कम से कम पुरे दिन में 3 बार तो गौमाता का दर्शन जरुर करे और श्री सुरभये नमः मन्त्र का जप अवश्ये करे।

अगर हमारे देश के सभी भक्त ये सुनिश्चित करले की :-

''प्रिये गौ माता प्रिये गोपाल''

हमारे घर में जो दीपक जलेगा वो केवल गौ के घी का ही जलेगा और हवन में भी हम गौ के घी का प्रयोग करेंगे । 

हम जो धुप जलाएंगे वो केवल गोबर से बनी हुई ही जलाएंगे अन्यथा हम नहीं जलाएंगे।

हम नित्ये गो मूत्र का पान करेंगे।

हम दूध पियेंगे तो केवल गौ माता का ही, वर्ना पियेंगे ही नहीं।

कोई भी पूजा से पहले हम पंच्गव्ये का पान करेंगे।

अगर हमें कोई भी रोग होगा तो हम उसका इलाज गौ माता की शरण में ही जाकर करवाएंगे यानि (पंच्गव्ये चिकत्सा से)

अगर हम सबने केवल इतना भी संकल्प कर लिया तो गौ संवर्धन, गौ रक्षा स्वत: हो जाएगी, बस जरुरी है तो केवल आपका योगदान। हमारी सरकार गौ माता, देश के लिए क्या कर रही है ये इतना जरुरी नहीं है, जितना की ये जरुरी है की हम देश,समाज और गौ माता के लिए अपना क्या योगदान दे रहे है।

''प्रिय गौ माता प्रिय गोपाल''

आप अपने जनम-दिवस पर किसी गौशाला में दान करे

''प्रिये गौ माता प्रिये गोपाल''

प्रिये मित्रो,आज हम अपने जन्म-दिवस,एनिवर्सरी आदि, पर ना जाने कितने रूपए उडा देते है, केवल थोड़ी देर के सुख मात्र के लिए।
हम हजारो रुपये खर्च करने में एक बार भी नहीं सोचते,परन्तु अगर किसी गरीब को,या फिर किसी गौशाला में दान करने के लिए एक रूपया भी देना पड़ जाए तो ना जाने हम अपने मन में कितनी बार सोचते है की दे ये ना दे।
अगर आप अपने जनम-दिवस पर किसी गौशाला में दान करे या किसी गरीब को पेट भर भोजन करा दे, तो आपको शायद उतना आनंद अपने उन हजारो रूपए की बनायीं गयी पार्टी में भी ना आये। और अगर आपको मेरी बात का यकीं ना हो तो आप अपने आने वाले जनम-दिवस पर ही कर के देख लेना।
मेरा आप सभी से केवल इतना निवेदन है की कृपया करके अपने रुपये की कीमत समझिये और इन्हें अपने ऊपर व्यर्थ में खर्च न कर के कही अच्छी जगह लगाये।
आज हम अपना जनम-दिवस mcdonald, KFC,पिज़्ज़ा हट और भी ना जाने अनय विदेशी रेस्तरा में मना कर अपने आप को गर्व हान्तित महसूस करते है।
छोड़ो यारो, आज लोग अपनी माँ- बाप की नहीं सुनते तो आप लोग मेरी क्या सुनोगे, वैसे ये बात उस्सी के समज आएगी जिसके दिल होगा, आज हामारे पास बड़ा घर हो गया, बड़ी गाडी हो गयी, सब कुछ बढता ही जा रहा है पर ना जाने क्यों लोगो का दिल छोटा होता जा रहा है, भाइयो अगर कुछ बढाना ही है तो अपना दिल का साइज़ badao क्योंकि दिल बड़ा होगा तो सब आपके है,
वरना सब आपके होकर भी आपका कोई नहीं होगा।
अगर कुछ गलत कहा हो तो कृपया शमा करना। अगर सही लगे तो कृपया इससे जीवन में जरुर उतारे और आनंद की,प्रेम की अनुभूति करे।

''प्रिये गौ माता प्रिये गोपाल '

देवी अहिल्याबाई द्वारा गौ माता को न्याय प्रेरक प्रसंग -



दोस्तों, एक बार की बात है इन्दौर नगर के किसी मार्ग के किनारे एक गाय अपने बछड़े के साथ खड़ी थी, तभी देवी अहिल्याबाई के पुत्र मालोजीराव अपने रथ पर सवार होकर गुजरे । मालोजीराव बचपन से ही बेहद शरारती व चंचल प्रवृत्ति के थे । राह चलते लोगों को परेशान करने में उन्हें विशेष आंनद आता था । गाय का बछड़ा अकस्मात उछलकर उनके रथ के सामने आ गया । गाय भी उसके पीछे दौड़ी पर तब तक मालोजी का रथ बछड़े के ऊपर से निकल चुका था । रथ अपने पहिये से बछड़े को कुचलता हुआ आगे निकल गया था ।

गाय बहुत देर तक अपने पुत्र की मृत्यु पर शोक मनाती रही । तत्पष्चात उठकर देवी अहिल्याबाई के दरबार के बाहर टंगे उस घण्टे के पा जा पहुँची, जिसे अहिल्याबाई ने प्राचीन राजपरम्परा के अनुसार त्वरित न्याय हेतु विशेष रूप से लगवाया था, अर्थात्‌ जिसे भी न्याय की जरूरत होती,वह जाकर उस घन्टें को बजा देता था, जिसके बाद तुरन्त दरबार लगता था और तुरन्त न्याय मिलता।

घण्टे की आवाज सुनकर देवी अहिल्याबाई ने ऊपर से एक विचित्र दृश्य देखा कि एक गाय न्याय का घन्टा बजा रही है । देवी ने तुरन्त प्रहरी को आदेश दिया कि गाय के मालिक को दरबार में हाजिर किया जाये। कुछ देर बाद गाय का मालिक हाथ जोड़ कर दरबार में खड़ा था। देवी अहिल्याबाई ने उससे कहा कि '' आज तुम्हारी गाय ने स्वंय आकर न्याय की गुहार की है । जरूर तुम गौ माता को समय पर चारा पानी नही देते होगे। ''

उस व्यक्ति ने हाथ जोड़कर कहा कि माते श्री ऐसी कोई बात नही है । गौ माता अन्याय की शिकार तो हुई है ,परन्तु उसका कारण मैं नही कोई ओर है, उनका नाम बताने में मुझे अपने प्राण का भय है ।''

देवी अहिल्या ने कहा कि अपराधी जो कोई भी है उसका नाम निडर होकर बताओं , तुम्हें हम अभय -दान देते हैं। '' तब उस व्यक्ति ने पूरी वस्तुस्थित कह सुनायी। अपने पुत्र को अपराधी जानकर देवी अहिल्याबाई तनिक भी विचलीत नही हुई और फिर गौ माता स्वयं उनके दरबार में न्याय की गुहार लगाने आयी थी। उन्होंने तुरन्त मालोजी की पत्नी मेनावाई को दरबार में बुलाया यदि कोई व्यक्ति किसी माता के पुत्र की हत्या कर दे ,तो उसे क्या दण्ड मिलना चाहिए ?

मालो जी की पत्नी ने कहा कि - जिस प्रकार से हत्या हुई, उसी प्रकार उसे भी प्राण-दण्ड मिलना चाहिए। देवी अहिल्या ने तुरन्त मालोजी राव का प्राण- दण्ड सुनाते हुए उन्हें उसी स्थान पर हाथ -पैर बाँधकर उसी अवस्था में मार्ग पर डाल दिया गया। रथ के सारथी को देवी ने आदेश दिया ,पर सारथी ने हाथ जोड़कर कहा '' मातेश्री ,मालोजी राजकुल के एकमात्र कुल दीपक है। आप चाहें तो मुझे प्राण -दण्ड दे दे,किन्तु मैं उनके प्राण नहीं ले सकता ।''

तब देवी अहिल्याबाई स्वंय रथ पर सवार हुई और मालोजी की ओर रथ को तेजी से दौड़ाया, तभी अचानक एक अप्रत्याशित घटना हुई। रथ निकट आते ही फरियादी गौ माता रथ के निकट आ कर खड़ी हो गयी । गौ माता को हटाकर देवी ने फिर एक बार रथ दौड़ाया , लेकिन फिर से गौ माता रथ के सामने आ खड़ी हो गयी। सारा जन समुदाय गौ माता और उनके ममत्व की जय जयकार कर उठा। देवी अहिल्या की आँखो से भी अश्रुधारा बह निकली। गौ माता ने स्वंय का पुत्र खोकर भी उसके हत्यारे के प्राण ममता के वशीभूत होकर बचाये। जिस स्थान पर गौ माता आड़ी खड़ी हुई थी, वही स्थान आज इन्दौर में ( राजबाड़ा के पास) ''आड़ा बाजार'' के नाम से जाना जाता है।

गौमाता में हैं समस्त तीर्थ गौमाता का सर्वोपरि महत्व



गाय, गोपाल, गीता, गायत्री तथा गंगा धर्मप्राण भारत के प्राण हैं, आधा हैं। इनमें मैं गौमाता को सर्वोपरि महत्व है। पूजनीय गौमाता हमारी ऐसी माँ है जिसकी बराबरी न कोई देवी-देवता कर सकता है और न कोई तीर्थ। गौमाता के दर्शन मात्र से ऐसा पुण्य प्राप्त होता है जो बड़े-बड़े यज्ञ दान आदि कर्मों से भी नहीं प्राप्त हो सकता।

जिस गौमाता को स्वयं भगवान कृष्ण नंगे पाँव जंगल-जंगल चराते फिरे हों और जिन्होंने अपना नाम ही गोपाल रख लिया हो, उसकी रक्षा के लिए उन्होंने गोकुल में अवतार लिया। शास्त्रों में कहा है सब योनियों में मनुष्य योनी श्रेष्ठ है। यह इसलिए कहा है कि वह गौमाता की निर्मल छाया में अपने जीवन को धन्य कर सकते हैं। गौमाता के रोम-रोम में देवी-देवताओं का एवं समस्त तीर्थों का वास है।

गोमाता को एक ग्रास खिला दीजिए तो वह सभी देवी-देवताओं को पहुँच जाएगा। इसीलिए धर्मग्रंथ बताते हैं समस्त देवी-देवताओं एवं पितरों को एक साथ प्रसन्न करना हो तो गोभक्ति-गोसेवा से बढ़कर कोई अनुष्ठान नहीं है।

भविष्य पुराण में लिखा है गोमाता कि पृष्ठदेश में ब्रह्म का वास है, गले में विष्णु का, मुख में रुद्र का, मध्य में समस्त देवताओं और रोमकूपों में महर्षिगण, पूँछ में अन्नत नाग, खूरों में समस्त पर्वत, गौमूत्र में गंगादि नदियाँ, गौमय में लक्ष्मी और नेत्रों में सूर्य-चन्द्र हैं।

भगवान भी जब अवतार लेते हैं तो कहते हैं- 'विप्र धेनु सुर संत हित लीन्ह मनुज अवतार।'

जिस प्रकार माता-पिता, भाई बंधु, मित्र गण होते हैं उसी प्रकार गोमाता भी हमारी परम हितैषी होती है। जो हमें स्नेहपूर्वक अमृतमय दूध और औषधियाँ प्रदान करती हैं।