मंगलवार, 25 अगस्त 2015

ए2 गौ दूग्ध - a2 Desi cow's milk

ए2 गौ दूग्ध - a2 Desi cow's milk


गाय के दूध में स्वर्ण तत्व होता है जो शरीर के लिए काफी शक्तिदायक और आसानी से पचने वाला होता है। गाय की गर्दन के पास एक कूबड़ होती है जो ऊपर की ओर उठी और शिवलिंग के आकार जैसी होती है। गाय की इसी कूबड़ के कारण उसका दूध फायदेमंद होता है। वास्तव में इस कूबड़ में एक सूर्यकेतु नाड़ी होती है। यह सूर्य की किरणों से निकलने वाली ऊर्जा को सोखती रहती है, जिससे गाय के शरीर में स्वर्ण उत्पन्न होता रहता है। जो सीधे गाय के दूध और मूत्र में मिलता है।इसलिए गाय का दूध भी हल्का पीला रंग लिए होता है। यह स्वर्ण शरीर को मजबूत करता है, आंतों की रक्षा करता है और दिमाग भी तेज करता है। इसलिए गाय का दूध सबसे ज्यादा अच्छा माना गया है।

भारत वर्ष में यह विषय डेरी उद्योग के गले आसानी से नही उतर रहा, हमारा समस्त डेरी उद्योग तो हर प्रकार के दूध को एक जैसा ही समझता आया है. उन के लिए देसी गाय के ए2 दूध और विदेशी ए1 दूध देने वाली गाय के दूध में कोई अंतर नही होता था. गाय और भैंस के दूध में भी कोई अंतर नहीं माना जाता. सारा ध्यान अधिक मात्रा में दूध और वसा देने वाले पशु पर ही होता है. किस दूध मे क्या स्वास्थ्य नाशक तत्व हैं, इस विषय पर डेरी उद्योग कभी सचेत नहीं रहा है. सरकार की स्वास्थ्य सम्बंदि नीतियां भी इस विषय पर केंद्रित नहीं हैं.

भारत में किए गए NBAGR (राष्ट्रीय पशु आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो) द्वारा एक प्रारंभिक अध्ययन के अनुसार यह अनुमान है कि भारत वर्ष में ए1 दूध देने वाली गौओं की सन्ख्या 15% से अधिक नहीं है. भरत्वर्ष में देसी गायों के संसर्ग की संकर नस्ल ज्यादातर डेयरी क्षेत्र के साथ ही हैं .

आज सम्पूर्ण विश्व में यह चेतना आ गई है कि बाल्यावस्था मे बच्चों को केवल ए2 दूध ही देना चाहिये. विश्व बाज़ार में न्युज़ीलेंड, ओस्ट्रेलिया, कोरिआ, जापान और अब अमेरिका मे प्रमाणित ए2 दूध के दाम साधारण ए1 डेरी दूध के दाम से कही अधिक हैं .ए2 से देने वाली गाय विश्व में सब से अधिक भारतवर्ष में पाई जाती हैं. यदि हमारी देसी गोपालन की नीतियों को समाज और शासन का प्रोत्साहन मिलता है तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित बालाहार का निर्यात भारतवर्ष से किया जा सकता है. यह एक बडे आर्थिक महत्व का विषय है.

छोटे ग़रीब किसनों की कम दूध देने वाली देसी गाय के दूध का विश्व में जो आर्थिक महत्व हो सकता है उस की ओर हम ने कई बार भारत सरकार का ध्यान दिलाने के प्रयास किये हैं. परन्तु दुख इस बात का है कि गाय की कोई भी बात कहो तो उस मे सम्प्रदायिकता दिखाई देती है, चाहे कितना भी देश के लिए आर्थिक और समाजिक स्वास्थ्य के महत्व का विषय हो.


गो वंश की पहचान और पंचगव्य चिकित्सा के कुछ प्रयोग

विदेशी विषाक्त गोवंश

गो वंश की पहचान और पंचगव्य चिकित्सा के कुछ प्रयोग

विदेशी विषाक्त गोवंश

स्वदेशी और विदेशी गोवंश को लेकर कुछ विचारणीय पक्ष हैं. अनेक शोधों से सिद्ध हो चुका है कि अधिकांश विदेशी गोवंश विषाक्त प्रोटीन ”बीटा कैसीन ए१” वाला है जो हानिकारक ओपीएट ’बीसीएम७ ’ का निर्माण पाचन के समय करता है और अनेक ह्रदय रोगों के इलावा मधुमेह, ऑटिज्म व बहुत से मानसिक रोगों का कारण है. होलीस्टीन , फ्रीजियन, रेडडैनिश आदि सभी गौएँ इसी घातक प्रोटीन वाली हैं. दावा किया जाता है कि जर्सी की ७०% ए१ तथा ३०% ए२ प्रोटीन वाली हैं. कौनसी गौएँ किस प्रोटीन वाली हैं, , यह जानने के लिए कोई तंत्र या व्यवस्था बने होने की जानकारी हमारे पास नहीं है. पर इतना तो प्रत्यक्ष है कि आज भी घातक प्रोटीन वाली होलीस्टीन, फ्रीजियन और उनकी ही संकर नस्ल ’एचऍफ़’ को हम बढ़ावा दे रहे हैं. दूध बढाने के भ्रम में ऐसा करके अनजाने में रोगों को बढ़ावा देने की भूल को समझने और रोकने की ज़रूरत है. यदि जर्सी की कोई नस्ल सही है तो उसका विरोध करने का कोई कारण नहीं है पर इसकी जांच की कोई व्यवस्था तो की जानी चाहिए. ऐसे में लगता है कि पशुपालन की नीतियों का एक बार नए सिरे से मूल्यांकन करें और नए शोध व सूचनाओं के प्रकाश में नीतियों का निर्धारण करें. न्यूज़ीलैंड की ’ए२ कारपोरेशन ने इसप्रकार का यन्त्र बनाया है जिससे गौओं की जांच काके जाँच करके जाना जा सकता है की उसमें कौनसा प्रोटीन कितना है.भारत में भी इस प्रकार के यंत्रों के विकास की आवश्यकता है. ज़रूरी हो तो इसे आयात किया जा सकता है.

हमारे कुछ उपयोगी चकित्सा प्रयोग

हमनें अपने रोगियों पर स्वदेशी गोवंश के गोबर तथा गोमूत्र से कुछ उपयोगी प्रयोग किये हैं जो भावी शोध और खोज में उपयोगी सिद्ध हो सकते है. …

– माईग्रेन व सरदर्द के असाध्य व पुराने रोगियों पर गोघृत का प्रयोग करके देखागया कि वे सभी एक मास से भी कम समय में स्वस्थ हो गए. उनके नाक. नाभि और पैरों के तलवों में प्रातः और सोते समय गो-घृत लगवाया गया. सभी को बिना अपवाद लाभ हो गया. अब उनमें से कई तो दूसरों की चिकित्सा सफलता से कर लेते हैं. हमारा सूत्र यह है कि पैरों के तलवों का हमारे स्नायुकोषों, मस्तिष्क पर सीधा व गहरा प्रभाव होता है. अल्प मात्रा में लगा घी भी स्नायु कोशों का प्रभावी स्नेहन करता है. नाक में लगे घी का भी यही प्रभाव है. ख़ास और शोध के योग्य बात यही है कि पैरों पर मालिश से स्नायुकोषों पर इतना प्रभाव कैसे होता है और वह भी गो-घृत से. एलुमिनियम के पात्रों का प्रयोग दही बिलोने, घी पकाने के लिए हम वर्जित कर देते हैं. हम सब जानते हैं कि एल्जीमर्ज़ डिजीज का प्रमुख कारण ये है. लाल रक्त कानों के इलावा यह हमारे ह्रदय, पाचन व अन्य अंगों के कोशों को भी नष्ट करता है. यदि फ्लोराईड का केवल १० लाखवां अंश इसके साथ मिल जाये तो अल्युमिनियम द्वारा विनाष बहुत तेज़ गति से होने लगता है. संभवतः सभी टूथपेस्टों में फ्लोराईड मिला हुआ है. अतः मंजन का प्रयोग ही उचित है और या फिर हो सके तो दातुन .

– अनेक उच्च रक्तचाप के रोगियों पर हमने गोबर का प्रयोग किया और सफल रहा. देसी गो के गोबर के उपले बना और सुखा कर उन पर रोगी को पाओं रख कर बैठने को कहा गया. आधे घंटे में असर नज़र आने लगता है. कुछ दिन या कुछ सप्ताह के प्रयोग से अधिकाँश रोगी ठीक हो जाते है. सूत्र यही है कि गोबर विष पदार्थों को अवशोषित करके रक्तचाप को सामान्य करने में सहायक सिद्ध होता है. दूसरा सूत्र यह है कि रक्तचाप का एक बड़ा कारण वे विष पदार्थ और रसायन हैं जिन्हें हम आहार में खाने को बाध्य हैं(रासायनिक खेती की अनुचित नीतियों के कारण ). पैरों के माध्यम से शरीर के विषों को निष्कासित करने का सूत्र तो उल्लेखनीय है ही.

– गोबर के उपलों को कांच के पात्र में गंगाजल व अल्कोहल ( ५०-५० %) में डूबा कर २ मास तक अँधेरे में रखा गया. उपले टूटे या बिखरे नहीं. अब इस तरल को छान कर प्रयोग किया गया. केवल २-३ मी.ली तरल को २५-३० मी.ली. पानी में डाल कर पीनें से अम्ल-पित्त, छाती की जलन कुछ की देर में ठीक हुई. अनेक पित्त रोगियों पर इसका प्रयोग किया गया. दुर्बल पाचन को सुधारने व विषाक्त प्रभावों को समाप्त करनें में यह बहुत प्रभावी है. एक और ख़ास बात यह हुई कि इस तरल में से अनेक प्रकार के फूलों की सुगंध आती है.

– ब्रह्म सुतली / प्रसरनी / हर्पीज़ जोस्टर से मैं कष्ट पा रहा था. अभी शुरुआत ही हुई थी. मैंने पुराना और कांच की बोतल में रखा गो मूत्र इस पर लगा दिया. पुराना अनुभव यह था कि गर्म चीज़ों से यह रोग बढ़ता है. गोमूत्र उष्ण प्रकृती का है. आश्चर्य की बात यह हुई कि मैं कुछ ही मिनेट में मैं ठीक हो गया. दुबारा प्रयोग दोहराना नहीं पडा. पर ज़रूरत है कि इस प्रयोग को अभी और परखा जाए.

– मॉल द्वार में गो घृत का स्नेहन करने से अनेक मानसिक रोगों का अतिरिक्त सुखी खांसी, आँखों के रोग ( ई फ्लू आदि) में अद्भुत लाभ होता है. अनेकों रोगियों पर हमने आज़माया है. शुद्ध का विषय है की आखिर मॉल द्वार का प्रभाव इतनी तेज़ी से आँखों, गले, छाती, फेफड़ों, स्नायु कोशों पर कैसे होता है ?

– अपने मोबाईल पर गोबर की आधा सेंटीमीटर की टिकिया चिपकाने से उसका रेडियेशन प्रभाव बहुत घट गया. अब हमनें 5000 रु. खर्च करके मोबाईल पर चिपकाने वाली डिबिया सी बना दी है जिसमें गोबर का पिसा चूर्ण और अति अल्प मात्रा में सोने का वर्क डालते हैं. सोने के प्रभाव से इसकी आयु बढ़ जाती है. स्वर्ण डाले बिना भी ये काम करता है. बस इतना ही है कि बार-बार इसे बदलना पडेगा. डिबिया की ‘डाई’ बनाने पर एक बार ही खर्च होना है.बिना डिबिया के भी चिपका कर लाभ लिया जा सकता है.

कुछ करने योग्य प्रयोगों का सुझाव. –

यंत्रों के अभाव में स्वदेशी-विदेशी गोवंश के प्रभावों का तुलनात्मक अध्ययन कठिन है. यदि वैज्ञानिक सहयोग उपलब्ध न हो तो कैसे पता चले कि कौनसा गोवंश किस प्रभाव का है ? चिकित्सक और वैज्ञानिक सहयोग करना भी चाहे और उसके पास यंत्र व प्रयोगशाला की सुविधा उपलब्ध न हो ? और हो भी तो सरकारी नीति ही अनुकूल न हो तो ? सरकार का तंत्र और सोच बदलने में समय लगता ही है और वह भी तब जब दिशा विपरीत हो.

यदि हम गोवंश की पहचान के बारे में अनुभव व परम्परा ज्ञान से जानते भी हैं तो उसे सिद्ध या स्थापित कैसे करें? अथवा अपने स्वयं के विश्वास और अपने ज्ञान को सही साबित करने के लिए क्या उपाय है ?

इसके बारे में कुछ सुझाव है. हम अपने अनुभव और समझ से इसमें और भी बहुत कुछ जोड़ सकते हैं.

– रक्तचाप जांचने वाला एक यंत्र लें. इसका प्रयोग जानने वाले किसीे फीर्मासिस्ट, कैमिस्ट या चिकित्सक का सहयोग लें. ५-७ मित्रों को साथ ले लें. सबके रक्तचाप की जांच कवाकर लिख लें. अब २-३ स्वदेशी और २-३ गौएँ विदेशी संकर नस्ल की अलग-अलग समूह में ज़रा दूरी पर बांधें. पहले स्वदेशी गोवंश के पास जाकर सब लोग उन्हें प्यार से उनकी पसंद का आहार खिलाएं और सींगों से पूंछ की और हाथ फेरते रहें. १०-१२ मिनेट बाद फिरसे रक्तचाप की जांच करें और लिख लें. अब विदेशी गोवंश के पास जाकर यही क्रिया दोहराए. लौट कर फिरसे सबका रक्तचाप देखें. यदि रक्तचाप बढ़ जाए तो समझ लें कि विदेशी गोवंश विषाक्त प्रभाव वाला है. स्वदेशी पर हाथ फेरने से रक्तचाप सामान्य होने लगे तो समझे कि वह लाभदायक गुणों वाला है, अनुवांशिक रूप से विदेशी गोवंश से अलग है.

ऐसा करते समय गोवंश का सही विवरण भी लिखें जिससे आप विषय को आगे ठीक से वर्णित कर सकें.

– दूसरे प्रयोग में तीन पौधे एक ही प्रकार के चुनें. अब दोनों प्रकार के गोवंश का मूत्र अलग-अलग किसी पात्र में एकत्रित करें. एक लीटर गोमूत्र में १० ली. पानी मिलाये और उस पर लेबल लगा कर रख दें कि वह किस गो का है. अब एक पौधे में प्रातः सायं देसी गो वाला और दुसरे में विदेशी गो वाला तथा तीसरे में सादा पानी डालते रहें. यदि विदेशी गो मूत्र से पौधा मरे या कमज़ोर हो तो वह विषाक्त है. तीनों पौधों का १० दिन का विवरण लिख कर रखें. कैमरा मिले तो फोटो भी उतारें. अनुमान यह है कि विदेशी गौओं का दूध, गोबर, गोमूत्र, स्पर्श विषाक्त होने के कारण पौधों, पर्यावरण व मनुष्यों पर इसके दुष्प्रभाव होते हैं.

– तीसरे प्रयोग में ३ पात्र ५-५ किलो के लें. एक में स्वदेशी गो का १ कि. गोबर, १ ली गो मूत्र डालें. अब इसमें १५० ग्राम गुड और १५० ग्राम उर्द साबुत का आटा डालें. गुड पशुओं वाला डालें. दाल का आटा न हो तो दाल को रात को भिगो कर प्रातः पीस लें.

इसी प्रकार दूसरे पात्र में विदेशी गो का गोबर, गोमूत्र डाल कर बाकी सामान डाल दे.

तीसरे पात्र में केवल विदेशी गो का गोबर और मूत्र ही डालें, गुड व आटा न डालें.


इन पात्रों को बोरी के टुकडे से ढक कर रखें. प्रतिदिन दिन में एक-दो बार इन्हें अलग-अलग डंडे से हिलाते रहें. ४-५ दिन तक क्रिया जारी रखें.

तीनो पात्रों पर १-२-३ अंक लगा दें.


अब चार पौधें एक जैसे चुनें और उन्हें भी १-२-३-४ न. दे दें. अब रोज़ सायं काल १ न. की खाद १ न. में, २ न. की खाद २ न. में तथा ३ न. की ३ न. के गमले /पौधे में डालते रहें. ४ न. में केवल सादा पानी डालें.

* यह खाद डालने से पहले उसे हिला लिया करें और उसमें १० गुना पानी मिला कर प्रयोग करें. अर्थात मानों आपने १०० ग्राम यह तरल खाद एक पात्र से निकाली तो उसमें १० गुणा यानी १ ली. पानी मिला कर खूब हिला लें, तब पौधे में डालें. रोज़ सायंकाल यह क्रिया दोहरायें. अनुमान यह है कि यदि विदेशी नस्ल विषाक्त है तो उसके गोबर और गोमूत्र से बनी खाद से २ व ३ न. के पौधे रोगी, कमज़ोर बनेंगे. इस प्रकार वैज्ञानिकों के सहयोग के बिना भी किसान गो वंश के बारे में सही जानकारी प्राप्त कर सकेंगे.


वैग्यानिको के सहयोग से करणीय
– दो सामान आकर के कमरों में वायु प्रदुषण की जांच की जाय. एक में स्वदेशी और एक में विदेशी गो को आधे घंटे ( या अधिक ) तक बाँध कर रखे. अब पुनः कमरे की वायु का नमूना लेकर जांच करके तुलना से निष्कर्षों प्राप्त किये जाएँ. संभावना है कि विदेशी गो के कमरे में विषाक्तता बढ़ेगी और स्वदेशी में घटेगी. मीथेन प्रदुषण के झूठ- सच की भी इससे जांच की जा सकती है. जांच यंत्रों और माईक्रोबाईलोजिस्ट के सहयोग के बिना यह प्रयोग संभव नहीं.

अंत में इतना निवेदन है की स्वदेशी गो वंश के गुणों को समझ कर इसकी रक्षा के उपाय प्रत्येक को अपने-अपने स्तर पर करते जाना चाहिए.

अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा प्रकाशित हुई पुस्तक

अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा प्रकाशित हुई पुस्तक

अमेरिका के कृषि विभाग द्वारा प्रकाशित हुई पुस्तक ”
THE COW IS A WONDERFUL LABORATORY ” के
अनुसार प्रकृति ने समस्त जीव-जंतुओं और
सभी दुग्धधारी जीवों में केवल गाय ही है जिसे ईश्वर
ने 180 फुट (2160 इंच ) लम्बी आंत दी है
जो की एनी पशुओ में ऐसा नहीं है जिसके कारण गाय
जो भी खाती-पीती है वह अंतिम छोर तक जाता है |
लाभ :- जिस प्रकार दूध से मक्खन निकालने
वाली मशीन में
जितनी अधिक गरारियां लगायी जाती है उससे
उतना ही वसा रहित मक्खन निकलता है , इसीलिये गाय
का दूध सर्वोत्तम है |
गो वात्सल्य :- गौ माता बच्चा जनने के 18 घंटे तक
अपने बच्चे के साथ रहती है और उसे चाटती है इसीलिए
वह लाखो बच्चों में भी वह अपने वच्चे को पहचान
लेती है जवकि भैंस और जरसी अपने बच्चे
को नहीं पहचान पायेगी | गाय जब तक अपने बच्चे
को अपना दूध नहीं पिलाएगी तब तक दूध नहीं देती है ,
जबकि भैस , जर्सी होलिस्टयन के आगे चारा डालो और
दूध दुह लो |
बच्चो में क्रूरता इसीलिए बढ़ रही है
क्योकि जिसका दूध पी रहे है उसके अन्दर ममता नहीं है
|
खीस :- बच्चा देने के गाय के स्तन से जो दूध
निकलता है उसे खीस, चाका, पेवस, कीला कहते है , इसे
तुरंत गर्म करने पर फट जाता है | बच्चा देने के 15
दिनों तक इसके दूध में प्रोटीन की अपेक्षा खनिज
तत्वों की मात्रा अधिक होती है , लेक्टोज ,
वसा ( फैट ) एवं पानी की मात्रा कम होती है |
खीस वाले दूध में एल्व्युमिन दो गुनी , ग्लोव्लुलिन
12-15 गुनी तथा एल्युमीनियम की मात्रा 6
गुनी अधिक पायी जाती है |
लाभ:- खीज में भरपूर खनिज है यदि काली गौ का दूध
( खीझ) एक हफ्ते पिला देने से
वर्षो पुरानी टीबी ख़त्म हो जाती है |
सींग :- गाय की सींगो का आकर
सामान्यतः पिरामिड जैसा होता है ,
जो कि शक्तिशाली एंटीना की तरह आकाशीय
उर्जा ( कोस्मिक एनर्जी ) को संग्रह करने का कार्य
सींग करते है |
गाय का ककुद्द ( ढिल्ला ) :- गाय के कुकुद्द में
सुर्य्केतु नाड़ी होती है जो सूर्य से अल्ट्रावायलेट
किरणों को रोकती है , 40 मन दूध में लगभग 10 ग्राम
सोना पाया जाता है जिससे शरीर की प्रतिरोधक
क्षमता बढती है इसलिए गाय का घी हलके पीले रंग
का होता है |
गाय का दूध :- गाय के दूध के अन्दर जल 87 % वसा 4
%, प्रोटीन 4% , शर्करा 5 % , तथा अन्य तत्व 1 से 2
% प्रतिशत पाया जाता है |
गाय के दूध में 8 प्रकार के प्रोटीन , 11 प्रकार के
विटामिन्स , गाय के दूध में ‘ कैरोटिन ‘ नामक प्रदार्थ
भैस से दस गुना अधिक होता है |
भैस का दूध गर्म करने पर उसके पोषक ज्यादातर ख़त्म
हो जाते है परन्तु गाय के दूध के पोषक तत्व गर्म करने
पर भी सुरक्षित रहता है |
गाय का गोमूत्र :- गाय के मूत्र में आयुर्वेद
का खजाना है , इसके अन्दर ‘ कार्बोलिक एसिड ‘
होता है जो कीटाणु नासक है , गौ मूत्र चाहे जितने
दिनों तक रखे ख़राब नहीं होता है इसमें कैसर को रोकने
वाली ‘ करक्यूमिन ‘ पायी जाती है |
गौ मूत्र में नाइट्रोजन ,फास्फेट, यूरिक एसिड ,
पोटेशियम , सोडियम , लैक्टोज , सल्फर, अमोनिया,
लवण रहित विटामिन ए वी सी डी ई , इन्जैम आदि तत्व
पाए जाते है |
देसी गाय के गोबर-मूत्र-मिश्रण से ‘ प्रोपिलीन
ऑक्साइड ” उत्पन्न होती है जो बारिस लाने में
सहायक होती है | इसी के मिश्रण से ‘ इथिलीन
ऑक्साइड ‘ गैस निकलती है जो ऑपरेशन थियटर में काम
आता है |
गौ मूत्र में मुख्यतः 16 खनिज तत्व पाये जाते है
जो शरीर की प्रतिरोधक क्षमता बढाता है |
गाय का शरीर :- गाय के शरीर से पवित्र गुग्गल
जैसी सुगंध आती है जो वातावरण को शुद्ध और पवित्र
करती है |
जननी जनकार दूध पिलाती ,
केवल साल छमाही
गोमाता पय-सुधा पिलाती ,
रक्षा करती जीवन भर |
जय गौ माता..

पंचगव्य एक अत्यधिक प्रभावी जैविक खाद

पंचगव्य एक अत्यधिक प्रभावी जैविक खाद


पंचगव्य एक अत्यधिक प्रभावी जैविक खाद है
जो पौधों की वृद्धि एवं विकास में
सहायता करता है और
उनकी प्रतिरक्षा क्षमता को बढ़ाता है |
पंचगव्य का निर्माण सूर्य नाड़ी वाली गाय
अथवा देसी गाय के पांच उत्पादों दूध, दही, घी,
गौमूत्र व गोबर से होता है क्योंकि देशी गाय के
उत्पादों में पौधों के लिए आवश्यक सभी पोषक
तत्व पर्याप्त व सन्तुलित मात्रा में पाये जाते हैं
| पंचगव्य की 3 प्रतिशत मात्रा को पानी के
साथ मिलाकर प्रयोग किया जाता | पंचगव्य के
उचित लाभ के लिए 15 दिन में एक बार प्रयोग
करना चाहिए | एक एकड़ फसल के लिए 1.8
लीटर पंचगव्य पर्याप्त होता है |
पंचगव्य बनाने की विधि
आवश्यक सामिग्री
पंचगव्य निम्नलिखित सामिग्री से
बनाया जाता है-
1. 5 किलोग्राम देशी गाय का ताजा गोबर
2. 3 लीटर देशी गाय का ताजा गौमूत्र
3. 2 लीटर देशी गाय का ताजा कच्चा दूध
4. 2 लीटर देशी गाय का दही
5. 500 ग्राम देशी गाय का घी
6. 3 लीटर गन्ने का रस या 500 ग्राम गुड़ व
3 लीटर पानी का घोल
7. 3 लीटर नारियल पानी
8. 12 पके हुए केले
बनाने की विधि
1. सबसे पहले 5 किलोग्राम गाय के ताजा गोबर
और 500 ग्राम गाय के घी को एक मिट्टी के
मटके या प्लास्टिक की टंकी में डालकर
अच्छी तरह मिश्रण कर लें |
2. इस मिश्रण को 3 दिन के लिए छाँव में
रखना है और प्रतिदिन सुबह और शाम के समय
अच्छी तरह लकड़ी से घोलना है |
3. 3 दिन बाद इस मिश्रण में 3 लीटर
ताजा गौमूत्र, 2 लीटर गाय का दूध, 2 लीटर
गाय का दही, 3 लीटर गन्ने का रस या 500
ग्राम गुड़ व 3 लीटर पानी का घोल, 3 लीटर
नारियल पानी तथा 12 पके हुए केले को डालकर
अच्छी तरह मिश्रण कर लें |
4. इस मिश्रण को 15 दिनों के लिए छाँव में
रखना है और प्रतिदिन सुबह और शाम के समय
अच्छी तरह लकड़ी से घोलना है |
5. इस प्रकार 18 दिनों के बाद पंचगव्य
उपयोग के लिए बनकर तैयार हो जायेगा |
पंचगव्य की प्रयोग विधि
पंचगव्य का प्रयोग आप गेहूँ, मक्का, बाजरा,
धान, मूंग, उर्द, कपास, सरसों,मिर्च, टमाटर,
बैंगन, प्याज, मूली, गाजर, आलू, हल्दी, अदरक,
लहसुन, हरी सब्जियाँ, फूल पौधे, औषधीय पौधे
आदि तथा अन्य सभी प्रकार के फल पेड़ों एवं
फसलों में महीने में दो बार कर सकते हैं |
पंचगव्य को निम्नलिखित 5 प्रकार से प्रयोग
किया जा सकता है-
1. बीज उपचार द्वारा
2. जड़ उपचार द्वारा
3. फल पेड़-पौधों और फसल पर छिड़काव करके
4. सिंचाई के पानी के साथ प्रवाहित करके
5. बीज भंडारण के लिए
1. बीज उपचार द्वारा
पंचगव्य के 3% घोल में बीज को 10-15 मिनट
के लिए डुबोकर रखें | इसके बाद 30 मिनट तक
छाया में सुखाकर बुवाई करें | 300 मि.ली.
पंचगव्य 60 किलो बीज का उपचार करने के
लिए पर्याप्त होता है |
2. जड़ उपचार द्वारा
पंचगव्य के 3% घोल में पौधों के जड़ भाग
को 10-15 मिनट के लिए डुबोकर रखें | इसके
बाद 30 मिनट तक छाया में सुखाकर बुवाई करें
| 300 मि.ली. पंचगव्य एक एकड़ खेत
की रोपाई करने के लिए पर्याप्त होता है |
3. फल पेड़, पौधों और फसल पर छिड़काव करके
पंचगव्य के 3% घोल को फल पेड़-पौधों और
फसल पर छिड़काव करके प्रयोग
किया जा सकता है | 3 लीटर पंचगव्य एक
एकड़ फसल के लिए पर्याप्त होता है |
4. सिंचाई के पानी के साथ प्रवाहित करके
पंचगव्य के 3% घोल को सिंचाई के पानी के
साथ प्रवाहित करके प्रयोग किया जा सकता है
| 3 लीटर पंचगव्य एक एकड़ खेत के लिए
पर्याप्त होता है |
5. बीज भंडारण के लिए
बीज को भंडारण करने से पहले पंचगव्य के 3%
घोल में 10-15 मिनट के लिए डुबो कर रखें
उसके बाद सुखाकर भंडारण करें | ऐसा करने से
बीज को लगभग 360 दिनों तक सुरक्षित
रखा जा सकता है |
पंचगव्य का प्रभाव
पत्ती
पंचगव्य का छिड़काव करने से पौधों के पत्ते
आकार में हमेशा बड़े एवं अधिक विकसित होते हैं
तथा यह प्रकाश संश्लेषण की प्रक्रिया को तेज
करता है जिससे पौधे की जैविक क्षमता बढ़
जाती है एवं उपापचय क्रियायें तेज हो जाती हैं
|
तना
तना अधिक विकसित और मजबूत होता है जिससे
परिपक्वता के समय पौधे पर जब फल लगते हैं
तब पौधा फलों का वजन सहने में अधिकतम
सक्षम होता है तथा शाखाएं भी अधिक विकसित
तथा मजबूत होती हैं |
जड़ें
जड़ें अधिक विकसित तथा घनी होती हैं
तथा इसके अलावा वे एक लंबे समय के लिए
ताजा एवं स्वस्थ रहती हैं | जड़ें मृदा में
गहरी परतों में फैलकर वृद्धि करती हैं
तथा आवश्यक पोषक तत्वों एवं
पानी को अधिकतम मात्रा में अवशोषित कर
लेती हैं जिससे पौधा स्वस्थ बना रहता है
तथा पौधों में तेज हवा, अधिक वर्षा व सूखे
की स्थति को सहने की एवं रोगों के प्रति लड़ने
की क्षमता बढ़ जाती है |
उपज
पंचगव्य के प्रयोग से फसल की एक
अच्छी उपज मिलती है | यह रासायनिक
खेती को जैविक खेती में परिवर्तित करने में बहुत
प्रभावकारी है तथा वातावरण की प्रतिकूल
परिस्थितियों (कम या उच्च नमी ) में भी एक
समान फसल की पैदावार देने में
सहायता करता है| यह न केवल फसल की उपज
को बढ़ाता है बल्कि अनाज, फल, फूल व
सब्जियों का उत्पादन एक बेहतर रंग, स्वाद,
पौष्टिकता तथा विषाक्त अवशेषों के
बिना करता है जिससे फसल की बाजार में अधिक
कीमत मिलती है | यह बहुत सस्ता एवं अधिक
प्रभावकारी है जिससे कृषि में कम लागत पर
अधिक लाभ मिलता है |
शुष्क वातावरण अवधि
इसके प्रयोग से पत्तियों एवं तने पर एक
पतली तेलीय परत का गठन हो जाता है जिससे
पानी का वाष्पीकरण कम होता है तथा जड़ें
मृदा में गहरी परतों में फैलकर वृद्धि करती हैं और
आवश्यक पोषक तत्वों एवं पानी को अधिकतम
मात्रा में अवशोषित कर लेती हैं जिससे पौधे
शुष्क वातावरण अवधि को सहने में सक्षम
हो जाते हैं तथा पौधे के लिए 30% तक सिंचाई
के पानी की आवश्यकता कम हो जाती है |