गुरुवार, 13 जुलाई 2017

गोसेवा - भगवत्सेवा

गोसेवा - भगवत्सेवा


जिन क्षेत्रों में अधिक गोसमुदाय होता है, वहाँ रोग कम पनपते हैं। जिस स्थान पर गाय, बैल, बछड़ा आदि मूत्र का विसर्जन करते हैं, उस स्थान पर दीमक नहीं लगती। गाय के गोबर की खाद सभी खादों से अधिक उपजाउ और भूमि के लिये रसवर्धक होती है। बरसात के दिनों में फसलरहित खेतों में गायों के अधिक घूमने-चरने से उन खेतों में रबी की फसल अधिक पैदा होती है और वह फसल रोगरहित होती है। गोमूत्र से जो औषधि बनती है, वह उदर रोगों की अचूक दवा होती है। खाली पेट थोड़ा-सा गोमूत्र पीने से बीमारियाँ नहीं होती हैं। गोमूत्र में आँवला, नींबू, आम की गुठली तथा बबूल की पत्ती इत्यादि के गुण होते हैं। नींबू रस पेट में जाकर पेट की गंदगी को चुनकर पेट को साफ करता है, वैसे ही गोमूत्र से मुँह, गला एवं पेट शुद्ध होता है।
जिस भूमि पर गायें नहीं चरतीं, वहाँ पर स्वाभाविक ही घास का पैदा होना कम हो जाता है। भूमि पर उगी हुई घास गाय के चरने से जल्दी बढ़ती एवं घनी होती है। बीजयुक्त पकी घास खाकर भूमि पर विचरण करके चरते हुए गायों के गोबर के द्वारा एक भूमि से दूसरी भूमि (स्थान) पर घास के बीजों का स्थानांतरण होता रहता है। आज के समय में वनों के अधिक नष्ट होने का कारण भी गोवंश और गोपालकों की कमी ही है, क्योंकि गोपालकों की संख्या अधिक होती तो गायों की संख्या भी अधिक होती और अधिक गायों को चराने के लिये गोपालक वनों को जाते, जिससे वनों की सुरक्षा वे स्वयं करते तो वनों की बहुत वृद्धि होती, किंतु अब ऐसा न होने से वन असुरक्षित हो गये हैं।
गोसेवा से जितना लौकिक लाभ है, उतना ही अलौकिक लाभ भी है। जो गोसेवा निष्कामभाव से की जाती है अर्थात् पूरी उदारता से की जाती है, उसका सीधा सम्बन्ध भगवान की सेवा से ही होता है। इसलिये गायों की सेवा परम लाभ का साधन है। गाय स्वयं पवित्र है, इसलिये उसका दूध भी परम पवित्र है। गाय अपवित्र वस्तु को भी पवित्र बना देती है, क्योंकि उसके शरीर में पवित्रता के अलावा और कुछ है ही नहीं।



चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?

चिकित्सा में पंचगव्य क्यों महत्वपूर्ण है?


गाय के दूध, घृत, दधी, गोमूत्र और गोबर के रस को मिलाकर पंचगव्य तैयार होता है। पंचगव्य के प्रत्येक घटक द्रव्य महत्वपूर्ण गुणों से संपन्न हैं
इनमें गाय के दूध के समान पौष्टिक और संतुलित आहार कोई नहीं है। इसे अमृत माना जाता है। यह विपाक में मधुर, शीतल, वातपित्त शामक, रक्तविकार नाशक और सेवन हेतु सर्वथा उपयुक्त है। गाय का दही भी समान रूप से जीवनीय गुणों से भरपूर है। गाय के दही से बना छाछ पचने में आसान और पित्त का नाश करने वाला होता है।
गाय का घी विशेष रूप से नेत्रों के लिए उपयोगी और बुद्धि-बल दायक होता है। इसका सेवन कांतिवर्धक माना जाता है।
गोमूत्र प्लीहा रोगों के निवारण में परम उपयोगी है। रासायनिक दृष्टि से देखने पर इसमें पोटेशियम, मैग्रेशियम, कैलशियम, यूरिया, अमोनिया, क्लोराइड, क्रियेटिनिन जल एवं फास्फेट आदि द्रव्य पाये जाते हैं। गोमूत्र कफ नाशक, शूल गुला, उदर रोग, नेत्र रोग, मूत्राशय के रोग, कष्ठ, कास, श्वास रोग नाशक, शोथ, यकृत रोगों में राम-बाण का काम करता है। चिकित्सा में इसका अन्त: बाह्य एवं वस्ति प्रयोग के रूप में उपयोग किया जाता है। यह अनेक पुराने एवं असाध्य रोगों में परम उपयोगी है।
गोबर का उपयोग वैदिक काल से आज तक पवित्रीकरण हेतु भारतीय संस्कृति में किया जाता रहा है। यह दुर्गंधनाशक, पोषक, शोधक, बल वर्धक गुणों से युक्त है। विभिन्न वनस्पतियां, जो गाय चरती है उनके गुणों के प्रभावित गोमय पवित्र और रोग-शोक नाशक है। अपनी इन्हीं औषधीय गुणों की खान के कारण पंचगव्य चिकित्सा में उपयोगी साबित हो रहा है।



श्रीकृष्ण ने हमें गाय का स्वरूप बताया

श्रीकृष्ण ने हमें गाय का स्वरूप बताया

भगवान श्रीकृष्ण ने गाय तथा उसके बच्चों को अत्यन्त पवित्र भूमि पर खड़ा किया और सदा के लिए यह विधान कर दिया कि गाय से प्रेम करना, उस पर श्रद्धा रखना तथा उसकी पूजा करना अनिवार्य है क्योंकि गाय एक देवता है, जो पशु के रूप में पृथ्वी पर विचरती है। ऐसा करके भगवान श्रीकृष्ण ने गाय के ऊपर से पशुत्व का पर्दा हटा दिया, जिससे मनुष्य की माँ के रूप में गौ का रहस्यमय स्वरूप अपने दिव्य प्रकाश से प्रस्फुटित हो गया। जिन नेत्रों से गाय का वह वास्तविक रूप देखा जा सकता था, मनुष्य के उन नेत्रों पर अंधकार का जाल पड़ा हुआ था। श्रीकृष्ण ने इसी जाले को काटकर अलग कर दिया, तभी मनुष्य को गाय के प्रकाशमान रूप के दर्शन हुए। वास्तव में, श्रीकृष्ण ने गाय के उस आध्यात्मिक स्वरूप को प्रत्यक्ष कराने का कार्य किया।
मथुरा के निकट वृन्दावन के वनप्रदेश में प्रतिवर्ष इन्द्र के सम्मानार्थ बड़ी धूमधाम से उत्सव मनाया जाता था। श्रीकृष्ण ने इस प्राचीन धार्मिक प्रथा के विरूद्ध अपनी आवाज ऊँची की। उन्होंने अपने पिता नन्द जी को, जो उस ग्रामीण प्रदेश के अधिपति तथा वृन्दावन के प्रधान व्यक्ति थे, अनुमति दी कि इन्द्र की नहीं, बल्कि गायों की पूजा की जाए, जो वन-पर्वतों की देवी हैं। इन्द्र इस व्यवहार से बड़े क्रोधित हुए और उनमें प्रतिशोध की भावना जाग्रत हुई। उन्होंने मेघों को आज्ञा दी कि वृन्दावन के ऊपर भयंकर काली घटा बनकर छा जाओ, कड़को, गरजों, बिजली चमकाओ, प्रचण्ड पवन द्वारा पानी की तीक्ष्ण बौछार फेंको तथा भीषण उत्पात मचाकर श्रीकृष्ण के वृन्दावन को मनुष्य तथा पशुओं सहित नष्ट कर दो। इन्द्र के क्रोध से भगवान श्रीकृष्ण ने सम्पूर्ण वृन्दावन व वनप्रदेश की रक्षा की। लोगों ने देखा कि श्रीकृष्ण ने अपने एक हाथ से गोवर्धन पर्वत को उठाकर एक विशाल अभेद्य छाता बना लिया और उसके द्वारा पूरे सप्ताह भर उस भयानक तूफान को लोगों के निकट नहीं आने दिया।
वास्तव में, श्रीकृष्ण के विषय में इन्द्र बड़ी भूल में थे। अंत में, इन्द्र के ज्ञान नेत्र खुल गए। उन्होंने अपने स्वामी तथा सारी सृष्टि के स्वामी श्रीकृष्ण को पहचान लिया। इन्द्र अपनी सारी शक्तियों के साथ उनकी शरण में आ गए। भगवान श्रीकृष्ण का ‘गोविन्द’ नाम उस दिन नए अर्थ में प्रसिद्ध हुआ। अब से श्रीकृष्ण गाय को इन्द्र से भी अधिक सम्मान के योग्य समझेंगे।

जब इन्द्र का अहंकार नष्ट हुआ और उन्होंने श्रीकृष्ण के प्रभाव को जाना और भगवान के शरणागत हुए, तब उस समय कामधेनु गाय ने श्रीकृष्ण का अभिषेक किया, इसी कारण से यह दिन कार्तिक शुक्ल अष्टमी धूमधाम से ‘गोपाष्टमी’ पर्व के रूप में सम्पूर्ण भारतवर्ष में मनाया जाता है।


गौ की उपयोगिता

गौ की उपयोगिता

प्राचीन भारतीय गुरूकुल शिक्षा-व्यवस्था में गुरू की सेवा के साथ-साथ गाय की सेवा भी आवश्यक थी। मुगल सम्राट बाबर ने तो राज्य को स्थायी रखने का मुख्य साधन गोवंश की रक्षा जानते हुए अपने पुत्र हुमायूँ को गोरक्षा की विशेष आज्ञा भी दी थी। गोसेवा के महात्म्य की चर्चा करते हुए कहा गया है- ‘जो पुण्य तीर्थों के स्नान में है, जो पुण्य ब्राह्मणों को भोजन कराने में है, जो पुण्य व्रतोपवास तथा तपस्या द्वारा प्राप्त होता है, जो पुण्य श्रेष्ठ दान देने में है और जो पुण्य देवताओं की अर्चना में है, वह पुण्य तो केवल गाय की सेवा से ही तुरन्त प्राप्त हो जाता है।’
गाय के महात्म्य की चर्चा करते हुए कहा गया है कि ‘जिस गाय की पीठ में ब्रह्मा, गले में विष्णु, मुख में रुद्र, मध्य में समस्त देवगण, रोमकूपों में महर्षिगण, पूँछ में नाग, खुराग्रों में आठों कुलपर्वत, मूत्र में गंगा आदि नदियाँ, दोनों नेत्रों में सूर्य और चन्द्रमा तथा स्तनों में वेद निवास करते हैं, वह गाय मुझे वर देने वाली हो।’
जीवनीशक्ति गोदुग्ध की महिमा में बताया गया है कि यदि पृथ्वी तल पर गाय का दूध न होता तो ईश्वर की संतानों का पालन-पोषण एवं वृद्धि नहीं हो पाती। दैवयोग से किसी का जीवन रह भी जाता तो वह रूखा, वीर्यहीन, शक्तिहीन, अतिकृश और कुरूप होता।
महाभारत के अनुशासन पर्व में महर्षि च्यवन ने राजा नहुष से कहा- हे राजन्! मैं इस संसार में गौओं के समान कोई दूसरा धन नहीं देखता हूँ। पौराणिक मत है कि जगत में सर्वप्रथम वेद, अग्नि, गाय तथा ब्राह्मण की रचना हुई। वेदोक्ति है कि गाय सम्पूर्ण ब्राह्मण का स्वरूप है।


गौ - सुख, शांति व समृद्धि का प्रतीक

गौ - सुख, शांति व समृद्धि का प्रतीक

वास्तुशास्त्रीय दृष्टि से भवन-निर्माण से पूर्व सवत्साधेनु अर्थात् बछड़े के साथ गाय को लाकर उस भूमि पर बाँधना भूमि-दोषों का अपमार्जन करने वाला तथा पुण्यकारी होता है। गाय जब बच्चे को दुलारती है तो उसके मुख से निकला फेन उस भूमि को पवित्र बनाता है।
महाभारत के अनुसार, जहाँ गाय निर्भयतापूर्वक बैठकर साँस लेती है, वहाँ के सारे पापों को हर लेती है। संतान लाभ के लिये गौ-सेवा से उत्तम कोई उपाय नहीं है। गाय के रँभाने की आवाज कान में पड़ना मंगलकारी होता है। पुराणों में तो गो-रज को पापविनाशक बताया गया है। गाय की महिमा व्यक्त करते हुए महाकवि घाघ कहते हैं- ‘गाय के समान धन नहीं है और गेहूँ के समान अन्न नहीं है।’ वे आगे कहते हैं- ‘जिस किसान के पास गाय नहीं है, वह वास्तव में दरिद्र है।’
यह सत्य है कि गाय का दूध पीने से बल और बुद्धि वृद्धि को प्राप्त होते हैं। गाय का दूध छोटे बच्चों के विकास में सहायक होता है। गाय के दूध में कैल्शियम, फास्फोरस, सोडियम, पोटैशियम, मैगनीशियम, आयोडीन, क्लोरीन, लोहा, ताँबा, मैंगनीज, सल्फर, विटामिन ए, विटामिन डी और बी-काॅम्प्लेक्स सहजता से प्राप्त होते हैं। गोमूत्र का सेवन रोग-प्रतिरोधक का कार्य करता है। गोमूत्र फ्लू, गठिया, कुष्ठ के लिये भी उपचारक है। दूध से दही, मट्ठा बनाकर दस्तजनित बीमारियों से बचा जा सकता है।

बायोगैस बनाने के लिए गाय के गोबर का उपयोग कर प्राकृतिक सम्पदा को सुरक्षित रखा जा सकता है। गोबर से बने उपले जलने पर वातावरण के अनुपयुक्त कीटाणुओं का नाश करते हैं, वातावरण को शुद्ध रखते हैं। गोबर विषरोधी होता है। एटाॅमिक रिएक्टर में विकिरण से बचाव के लिये आज भी गाय का गोबर ही कारगर है। अनिष्ट की आशंका को सबसे पहले आँकने की क्षमता गाय में ही होती है। प्राकृतिक आपदा के आगमन से पूर्व गायों के व्यवहार में परिवर्तन हो जाता है, परंतु हम उसे आज समझ नहीं पाते हैं और उसकी उपेक्षा कर देते हैं। वस्तुतः जीवन में सुख, शांति, समृद्धि लाने वाली का नाम ही गाय है।


गौओं के दान की प्रथा

गौओं के दान की प्रथा

गायों के दान की प्रथा वैदिक समय से चली आ रही है। वैदिक काल में गाय का दान करने वाले को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। दान का अवसर पाकर धनिक लोगों को आनन्द होता था। ‘मैं गाय का दान करूँगा’- इस प्रकार बोलना ही शिष्ट पुरुषों की परिपाटी थी। ‘मैं गाय का दान नहीं करूँगा’- इस प्रकार कोई नहीं बोलता था। गाय का दान करने वाले को रोकना बड़ा भारी पाप समझा जाता था।
राजा तथा देवता गौ का दान करते थे। घर पर आए हुए अतिथि को गौ का दूध पीने के लिए अवश्य दिया जाता था। यज्ञ आदि के अवसरों पर ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में गौएँ दी जाती थीं। रोगी के उपयोग हेतु, जिससे उसका उपचार हो सके, गाय दान में दी जाती थी, ताकि वह गाय का दूध पीकर रोगमुक्त हो सके।
वैदिक काल में आशीर्वाद के रूप में भी ‘तुझे उत्तम गौ प्राप्त हो’, यह कहने की परम्परा थी। दान में उत्तम, दुधारू व तघ गौ के ही देने की विधान है। दाता को चाहिए कि वह तरूण गाय को बछड़े सहित दान दे। धनवान पुरुष का मापदण्ड उसके पास होने वाली गायों की संख्या थी। गायों की संख्या के अनुसार, गाय-पालकों को उपाधि दी जाती थी। वैदिक काल में गोधन को श्रेष्ठ धन माना गया था।
वैदिक काल में किसी भी प्रकार से गाय को कष्ट पहुँचाना, महापाप समझा जाता था। गायों की रक्षा के अनेक उदाहरण शास्त्रों में हैं। गाय का मान माँ से भी ऊँचा माना जाता था। सभी पुरुष गायों का आशीर्वाद प्राप्त करने की होड़ में लगे रहते थे। वास्तव में, गाय उनके जीवन का अभिन्न अंग होती थी। गाय के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जाती थी। वैदिक काल में गाय जीवन का आधार थी।





साँड का गोधन वृद्धि में महत्व

साँड का गोधन वृद्धि में महत्व

हिन्दुस्थान की वर्तमान दयनीय स्थिति में तभी सुधार हो सकता है, जब गोधन का अपव्यय रोका जाए। गोधन का विकास साँड के विकास पर निर्भर है। गाय की अपेक्षा साँड का महत्व सौ गुणा है- ऐसा गोविज्ञान-विशारद एक स्वर से कह रहे हैं।
धर्मग्रंथों में साँड का दान सौ गाय के दान के समान श्रेष्ठ और उद्धार करने वाला बतलाया गया है। आज प्रश्न केवल गाय की रक्षा का ही नहीं, बल्कि गाय के उद्धार व सेवा का है। गली-गली भटकने वाले, भूखे और निर्बल साँडों से काम लेने के कारण ही आज गायों का ह्रास हो रहा है और बैल निर्बल पैदा हो रहे हैं। बलवान, वीर्यवान और बढि़या साँड बढ़ें, तभी हिन्दुस्थान का विकास हो सकता है। अमेरिका, जापान आदि उन्नत देशों में लाखों की कीमत के साँड पशु सृष्टि में युग परिवर्तन कर रहे हैं।
बढि़या साँड पर किया गया खर्च और मेहनत कई गुणा होकर बाहर आती है। वास्तव में, किसी भी कृषि प्रधान देश में साँड ही सच्चा धन है। इसलिए हमारे देश में गोधन की बढ़ोतरी के लिए गाँव-गाँव नन्दी का दान करने की सुन्दर प्रथा चली आ रही है।
कहने को तो हमारे देश में साँडों की कोई कमी नहीं है, किंतु उनमें ऐसे साँड बहुत थोड़े हैं, जिन्हें हम वास्तविक साँड कह सकें। उनमें से अधिकांश नपुंसक व भटकू हैं। एक सर्वोत्तम साँड 50 गायों का यूथपति हो सकता है, तो उसको न्यायोचित खान-पान भी मिलना चाहिए, परन्तु उसे मुश्किल से एक सामान्य जीव जितना खाना भी नहीं मिलता।
इस समय युगधर्म पुकार रहा है कि गाय का दान ना करके बढि़या-से-बढि़या साँड का दान करना चाहिए, जिससे उत्तम गोधन प्राप्त हो सके। जिससे गायों में अधिक दूध देने की शक्ति, स्नेह और लावण्य उत्पन्न होगा। संक्षेप में, साँड का विकास- राष्ट्र का विकास है।

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी (3)

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी

गो-रक्षा हिन्दू धर्म का एक प्रधान कार्य है। प्रायः प्रत्येक हिन्दू गौ को माता कहकर पुकारता है और माता के समान ही उसका आदर करता है। जिस प्रकार कोई भी पुत्र अपनी माता के प्रति किए गए अत्याचार को सहन नहीं करेगा, उसी प्रकार एक आस्तिक और सच्चा हिन्दू गोमाता के प्रति निर्दयता के व्यवहार को नहीं सहेगा। आज हिन्दू आपसी फूट एवं कलह के कारण छिन्न-भिन्न हो रहे हैं तथा अपनी जीवनी-शक्ति खो बैठे हैं। मूक पशुओं की भांति दूसरों के द्वारा हाँके जा रहे हैं। सबसे ज्यादा दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आज हम सभी बातों पर पाश्चात्य दृष्टिकोण से ही विचार करने लगे हैं। यही कारण है कि हमारी इस पवित्र भूमि पर प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों की संख्या में गाय व बैल काटे जा रहे हैं और हम इसके विरोध में आवाज भी नहीं उठाते। रात-दिन गौ काटी जा रही हैं, सब कुछ चुपचाप देखना, यह नपुंसकता नहीं तो और क्या है?
गौ के लिए हमारी आदर बुद्धि केवल कहने भर के लिए रह गई है। दूसरे देशों में क्षेत्रफल के हिसाब से गौओं की संख्या भारत की अपेक्षा कहीं अधिक है और प्रति मनुष्य दूध की खपत भी अधिक है। वहाँ की गौएँ हमारी गौओं की अपेक्षा दूध भी अधिक देती हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि हम अपने को गो-पूजक और गोरक्षक कहते हैं, वस्तुतः आज हम गोरक्षा में बहुत पिछड़े हुए हैं। गो-जाति के प्रति हमारे इस अनादर एवं उपेक्षा का परिणाम भी प्रत्यक्ष ही है। अन्य देशों की अपेक्षा हम भारतीयों की आयु बहुत ही कम है और हमारे यहाँ के बच्चे बहुत अधिक संख्या में मरते हैं। वास्तव में, दूध और दूध से बने हुए पदार्थों की कमी ही हमारी शोचनीय अवस्था का मुख्य कारण है।
हमारे शास्त्र कहते हैं कि गाय से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष- चारों पुरूषार्थों की सिद्धि होती है। दूसरे शब्दों में, धार्मिक, आर्थिक, सांसारिक और आध्यात्मिक - सभी दृष्टियों से गाय हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी है। अतः गाय की रक्षा करें, गाय के दुग्ध व इससे बने पदार्थों का सेवन करें। इससे हर व्यक्ति स्वस्थ होगा और देश का स्वास्थ्य अच्छा होगा और देश वास्तव में सही उन्नति करेगा।



गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी (2)

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी

वेदों में गाय को माता एवं पूजनीय कहा गया है। यह आदर उन विशेषताओं पर आधारित है जो भगवान ने एकमात्र इस जीव को प्रदान की हैं। गायों से भगवत् प्राप्ति होती है।
गव्य पदार्थों को ही धार्मिक अनुष्ठानों और आयुर्वेदिक उपचारों में स्वीकृत किया गया है। हमारा कोई धार्मिक कृत्य गोपूजन, गोदान और पंच-गव्य के बिना सम्पन्न नहीं हो सकता। गव्य पदार्थों- दुग्ध, दही, घी, मूत्र, गोबर- में रोगों के कीटाणुओं को दूर करने की अद्भुत शक्ति है। गाय का पंच गव्य एक महान औषधि है।
गाय का दूध अनेक असाध्य रोगों की अचूक औषधि है। गाय का दूध दुर्बलता और मोटापे को दूर करता है। गोदुग्ध बलिष्ठ बनाता है और टी.बी. बीमारी के कीटाणुओं को दूर करने की शक्ति रखता है। इसका ‘सेरीब्रोसाइड्स’ तत्व बौद्धिक क्षमता बढ़ाता है।
शिशु को अपनी माता के दूध न मिलने पर, गोदुग्ध ही उसका सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। जले-कटे घाव, फोड़े-फुंसी, दाद-खाज के लिए गाय का घी चुपड़ना एक घरेलू उपचार माना जाता रहा है। यज्ञादि में गौ-घृत का प्रयोग उत्तम माना गया है। इससे प्रदूषण नष्ट करने में सहायता मिलती है।
आयुर्वेद का कथन है, ‘रात्रि को शयन से पूर्व गोदुग्ध, प्रातः काल उठकर जल और भोजन के बाद छाछ (मट्ठा) पीने से जीवन में डाॅक्टर की आवश्यकता नहीं पड़ती।

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी (1)

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी


निर्विवादित रूप से गाय को हिन्दू धर्म में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। गोमाता मातृशक्ति की साक्षात् प्रतिमा है। विश्व मानव के स्वास्थ्य और धन की उन्नति तथा सम्पन्नता के लिए गोपालन व गोधन की सुरक्षा ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हमारे शास्त्रों, पुराणों व उपनिषदों ने गो की अपार महिमा गाई है। वेदव्यास जी के अनुसार गायों से सात्त्विक वातावरण का निर्माण होता है। गायों की प्रत्येक वस्तु पावन है और वह संसार के समस्त पदार्थों को पावन कर देती है। गाय का गोबर तथा गोमूत्र शरीर से मल, प्रकुपित दोष तथा दूषित पदार्थों को निकालकर शरीर को शुद्ध व स्वस्थ बना देते हैं। गाय के दूध, घी और गोबर से लेकर मूत्र तक में औषधीय गुण होते हैं।
‘विष्णुधर्मोत्तर पुराण’ के अनुसार गाय के गोबर से लीपा गया स्थान सभी प्रकार से पवित्र हो जाता है। गोबर पृथ्वी का सबसे बड़ा पोषक, दुर्गंधनाशक, कीटनाशक, जीवाणुनाशक व रोगनाशक है। गाय के गोबर में रेडियोएक्टिवत को कम करने का सामथ्र्य होता है। भोपाल गैस त्रासदी के समय भी एक परिवार सुरक्षित बच गया था जो दुर्घटना स्थल से बेहद करीब था। बाद में पता चला कि इस परिवार ने एक दिन पहले ही अपने घर को गाय के गोबर से लीपा था। गो दुग्ध और घी अमृत के तुल्य हैं। गाय एकमात्र पशु है जो सांस लेते समय 5% आॅक्सीजन अपने पास रखती है और 95% प्रकृति को लौटा देती है।


गौ - आस्था का प्रतीक

गौ - आस्था का प्रतीक

गोवंश का सम्बन्ध किसी भी धर्म से जोड़ना गलत है। गाय सबकी है और सबके लिए है। इस्लाम में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि मुसलमानों को गोमाँस खाना जरूरी है। कुरान-मशीद में कहा गया है कि गौ का दूध अमृत है, जबकि गौ का माँस बेशुमार बीमारियों का जन्मदाता है। मुसलमानों के अनेक धार्मिक संस्थानों द्वारा भी अनेक बार देश के मुसलमानों को यह निर्देश दिया जा चुका है कि वह ईद के अवसर पर गोवंश की कुर्बानी न दें। दुर्भाग्य यह है कि जिन राज्यों में गोवंश की हत्या निषेध है, वहाँ भी कानून में अनेक त्रुटियों का लाभ उठाकर माँस के व्यापारी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं, सर्वत्र भ्रष्टाचार व्याप्त है।
1995 में महाराष्ट्र सरकार ने दोनों सदनों से सर्वसम्मति से पूर्ण गोहत्या निषेध कानून को पारित कर राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया था, दुर्भाग्यवश यह बिल 19 वर्ष तक यूँ ही लटका रहा। वर्तमान देवेन्द्र फडनवीस सरकार ने इस शुभ कार्य को आगे बढ़ाया और राष्ट्रपति जी ने भी मोहर लगाने में देर नहीं की। भारत के राष्ट्रपति और महाराष्ट्र की सरकार इसके लिए बधाई के पात्र हैं।
एक बात समझ नहीं आती, जब देश का बहुसंख्यक गाय के प्रति इतनी आस्था रखता है तो क्यों नहीं शेष भारतवासी भी गाय को सम्मान दें। ऐसा करने से आपसी भाईचारे और धार्मिक सौहार्द में भी वृद्धि होगी।


गोरक्षा अत्यन्त आवश्यक है

गोरक्षा अत्यन्त आवश्यक है

समस्त ग्रामीण बंधु तथा शहरों में रहने वाले वे व्यक्ति जो अपने घर पर गो-पालन की व्यवस्था कर सकते हैं, उन्हें अवश्य गो-पालन करना चाहिये, ताकि पौष्टिक आहार के साथ गोबर, गोमूत्र के रूप में खाद, कीटनाशक औषधि एवं ऊर्जा प्राप्त हो सके तथा गौ के सहज वात्सल्य एवं गो-सेवा के पुण्य से जीवन सार्थक हो सके। अन्य व्यक्तियों को भी निकटवर्ती गोशालाओं में जाकर समय-समय पर गो-सेवा करनी चाहिये। सभी को गो-वंश की तस्करी रोकने तथा गो-वध रोकने का पूर्ण प्रयास करना चाहिये।
गोवंश की स्वदेशी प्रजातियों का संरक्षण एवं विकास आज के सामाजिक तथा आर्थिक परिदृश्य में एक ऐसी अपरिहार्यता है, जिससे इनकी उपादेयता के प्रसार के साथ किसानों की उन्नति एवं स्वरोजगार के नये अवसर सृजित होंगे। विश्व मानव के स्वास्थ्य और धन की उन्नति तथा सम्पन्नता के लिये गोपालन व गोधन की सुरक्षा ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
परमपूज्य ब्रह्मर्षि श्रीदेवरहा बाबा के अमृत वचन- ‘गाय के पृष्ठभाग में ब्रह्माजी का, गले में विष्णु भगवान का, मुख में शिवजी का और रोम-रोम में ऋषि-महर्षि, देवताओं का वास है तथा आठ ऐश्वर्यों को लेकर लक्ष्मी माता गाय के गोबर में बसती हैं। गाय की बहुत बड़ी महिमा है। जहाँ गाय के चरण पड़ते हैं, वहाँ देवताओं का वास रहता है। भारत की गरीबी दूर करने के लिये, भारत को समृद्धिशाली बनाने के लिये गोरक्षा अत्यन्त आवश्यक है। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, अंग्रेज- कोई भी हों, यानि सबको गोरक्षा में तत्पर हो जाना चाहिये।’



गाय पूरे विश्व की माता है

गाय पूरे विश्व की माता है

    हमारी संस्कृति में गाय है, हमारे धर्म में गाय है। गाय का और मनुष्य के प्राणों का बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। गाय मानवीय प्रकृति से जितनी मिल-जुल जाती है, उतना और कोई पशु नहीं मिल पाता।
    गाय जितनी प्रसन्न होती है, उतने ही उसके दूध में विटामिन्स उत्पन्न होते हैं और गाय जितनी ही दुःखी होती है, उतना ही दूध कमजोर होता है।
    गाय हमारी ही नहीं, सम्पूर्ण मानव समाज की माँ है और सारे विश्व की माँ है। गाय की रक्षा होती है तभी प्रकृति भी अनुकूल होती है, भूमि भी अनुकूल होती है। गाय की सेवा होने से भूमि की सेवा होती है और भूमि स्वयं रत्न देने लगती है।
    जैसे-जैसे आप गोसेवा करते जायेंगे, वैसे-वैसे आपको यह मालूम होता जायेगा कि गाय आपकी सेवा कर रही है। आपको यह लगेगा कि आप गाय की सेवा कर रहे हैं तो गाय हर तरह से स्वास्थ्य की दृष्टि से, बौद्धिक दृष्टि से, धार्मिक दृष्टि से आपकी सेवा कर रही है।


गौएँ प्राणियों का आधार तथा कल्याण की निधि है ।

गौएँ प्राणियों का आधार तथा कल्याण की निधि है ।
 भूत और भविष्य गौओं के ही हाथ में है । 

वे ही सदा रहने वाली पुष्टिका कारण तथा लक्ष्मी की जड़ हैं । गौओं की सेवा में जो कुछ दिया जाता हैउसका फल अक्षय होता है । अन्न गौओं से उत्पन्न होता है,देवताओं को उत्तम हविष्य (घृत) गौएँ देती हैं तथा स्वाहाकार (देवयज्ञ) और वषटकार (इन्द्रयाग) भी सदा गौओं पर ही अवलंबित है । गौएँ ही यज्ञ का फल देने वाली हैं । उन्हीं में यज्ञों की प्रतिष्ठा है । ऋषियों को प्रात:काल और सांयकाल में होम के समय गौएँ ही हवन के योग्य घृत आदि पदार्थ देती है । जो लोग दूध देने वाली गौ का दान करते हैंवे अपने समस्त संकटों और पाप से पार हो जाते हैं ।

जिनके पास दस गायें हो वह एक गौ का दान करे,जो सौ गायें रखता होवह दस गौ का दान करे और जिसके पास हज़ार गौएँ मौजूद होवह सौ गाये दान करे तो इन सबको बराबर ही फल मिलता है ।
 
जो सौ गौओं का स्वामी होकर भी अग्निहोत्र नहीं करताया हज़ार गौएँ रखकर भी यज्ञ नहीं करता तथा जो धनी होकर भी कंजूसी नहीं छोड़ता-ये तीनो मनुष्य अर्घ्य (सम्मान) पाने के अधिकारी नहीं हैं ।
 
प्रात:काल और सांयकाल में प्रतिदिन गौओं को प्रणाम करना चाहिये । इससे मनुष्य के शरीर और बल की पुष्टि होती है । गोमूत्र और गोबर देखर कभी घृणा न करे । गौओं के गुणों का कीर्तन करे । कभी उसका अपमान न करे । यदि बुरे स्वप्न दिखायी दे तो गोमाता का नाम ले । प्रतिदिन शरीर में गोबर लगा के स्नान करे । सूखे हुए गोबर पर बैठे । उस पर थूक न फेकें । मल-मूत्र न त्यागे । गौओं के तिरस्कार से बचता रहे । अग्नि में गाय के घृत का हवन करेउसीसे स्वस्तिवाचन करावे । गो-घृत का दान और स्वयं भी उसका भक्षण करे तो गौओं की वृद्धि होती हैं । (महा० अनु० ७८ ।५-२१) 



 


भारत में गौ महिमा की वास्तविकता

भारत में गौ महिमा की वास्तविकता

गौ के विषय में हमारा सारा वैदिक साहित्य श्रद्घा और सम्मान से भरा पड़ा है। कई बार तो इस सम्मान व श्रद्घा के भाव को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कुछ अति हो गयी है पर एक विवेकशील व्यक्ति को अपनी आंखें और अपना मस्तिष्क खोलकर ही कुछ पढऩा या समझना चाहिए। किसी व्यक्ति, संस्था, प्राणी, वस्तु या स्थान आदि के विषय में लेखक किस भाव से क्या और क्यों लिख रहा है? पाठक को यह भी ध्यान रखना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि हम यंत्रवत या अंधश्रद्घा के वशीभूत होकर न कुछ पढ़ें और न कुछ समझें। यदि इस भाव से हम कुछ पढ़ेंगे या समझेंगे तो गौमाता को सही संदर्भों और सही अर्थों में समझ सकेंगे।

गौमाता को सही संदर्भों और सही अर्थों में समझने के लिए उसके गुणों और उसकी उपयोगिता को सर्वप्रथम समझना अपेक्षित है। जितना ही हम गाय के गुणों और उसकी उपयोगिता को समझते जाएंगे उतना ही हम यह समझते जाएंगे कि आर्य ग्रंथों में गौ की इतनी अधिक महिमा क्यों वर्णित की गयी है? गौ की महिमा को समझकर ही उसे अवध्या कहा गया है। इस आलेख में हम गौ की महिमा को स्थापित किये गये कुछ ऐसे ही विशेषणों पर चर्चा करना चाहेंगे।

अनाद्या अवध्या गौमाता


ऋग्वेद में गाय को ‘मा गामनागामदितिं वधिष्ट’ कहा गया है। इसका अभिप्राय है कि गाय अदिति अर्थात अविनाशी अमृतत्व का अंश है। मनुष्य को स्वस्थ, हृष्ट पुष्ट और नीरोग रखना, ईश्वरीय प्रेरणा का कार्य है। जिसके लिए ईश्वर ने अनेकों वनस्पतियों व औषधियों की रचना की है, परंतु यदि कोई व्यक्ति अज्ञान से, आलस्य या प्रमाद से उन वनस्पतियों को या औषधियों को अपने प्रयोग में ना ला सके, तो वह गौमाता का पालन-पोषण कर उसके पंचगव्य से भी अपना  काम चला सकता है। जिससे वह निरोग रहेगा। ईश्वर का यह अमृतमयी स्वरूप या तो वनस्पतियों या औषधियों में समाया है या फिर गाय माता में समाया है। इसलिए वह ईश्वर के अमृतत्व का प्रतीक होने से अवध्या है, अदिति है। अमृतत्व स्वयं अमृत होकर औरों को भी अमृत होने का मार्ग दिखाता है। इसकी रक्षा से मनुष्य ही नही सभी प्राणियों की रक्षा की जानी संभव है। क्योंकि मनुष्य गाय के पंचगव्य के प्रयोग से अहिंसक बनता है और उसका विवेक जागृत होता है। जिससे वह गाय के प्रति ही नही अपितु समस्त प्राणियों के प्रति भी अहिंसा भाव से भरा रहता है। गाय अवध्या है, इसीलिए उसे अनागा कहा गया है। अघ्न्या का भी यही अर्थ है कि गौमाता अवध्या है। अन्यत्र कहा गया है-

यत्वगस्थितम् पापं देहे तिष्ठति मामके।
प्राशनात् पंचगव्यस्य दहत्वग्नि रिवेन्धनम्।।

अर्थात जो मेरे शरीर की हड्डियों में पाप प्रविष्ट हो गया है, वह सब पंचगव्य के पान करने से उसी प्रकार नष्ट हो जाए जैसे अग्नि सूखी लकडिय़ों को जलाकर भस्म कर देती है।
गायों को तृण खिलाने से पुण्य मिलता है


हमारे देश में लोग धार्मिक रहें और किसी भी स्थिति में उनका नैतिक पतन ना होने पाये, इसके लिए मनुष्य के लिए वर्जित कर्मों को करने से उसे पाप का लगना तथा न करने से पुण्य का मिलना होना बताया जाता है। पाप-पुण्य पर विचार करने से मनुष्य अपने कार्यों पर ध्यान देता है और अपनी भूमिका को भी संतुलित बनाये रखता है।

गाय की सेवा करने को भी लोगों ने पुण्य के साथ जोड़ा है। पुराने समय में कई लोग गांवों में जंगल से किसी न किसी वनस्पति के तृण लाकर गाय को खिलाया करते थे, यह परंपरा अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। वास्तव में यह परंपरा बड़ी ही उपयोगी और परहितकारी थी। घर के खूंटे पर बंधी गाय को जंगल से विभिन्न स्थानों की घास लाकर खिलायी जाती थी, वह भी इसी परंपरा के कारण थी कि गाय को तृण लाकर खिलाने चाहिए, उससे पुण्य मिलता है। इस परंपरा से गाय को विभिन्न वनस्पतियां खाने को मिलती थीं जिनका अंश औषधीय तत्वों के साथ गाय के दूध में जाता था। इन औषधीय तत्वों से गाय का दूध अमृत और नीरोगता प्रदान करने वाला बनता था। इसलिए परंपरा थी कि जंगल से जो कोई भी गांव की ओर आए वह गाय के लिए किसी न किसी जंगली वनस्पति के तृण अपने हाथ में लाये और लाकर किसी के भी घर में बंधी गाय को उन्हें खिला दे।




यह परंपरा भारत के गांव देहात में पिछले 30-35 वर्ष से लुप्त सी होने लगी है। इस परंपरा के चलते गाय के लिए महिलाएं जंगल से घास लाती थीं, जिसे एक स्थान से न लेकर झोली बनाकर विभिन्न स्थानों से लिया जाता था। जिससे एक नही, अपितु कई प्रकार की वनस्पतियां घास के साथ आ जाती थीं। जिसे गाय खाती थी तो उसके दूध में उस वनस्पति का औषधीय गुण आ जाता था। जो कि सभी के लिए उपयोगी होता था। उससे न जाने किस व्यक्ति का भला हो जाता था। इस प्रकार गाय की सेवा से मनुष्य की सेवा अपने आप ही हो जाती थी। यही कारण था कि लोग गाय को तृण खिलाना पुण्य मानते थे। देखिए तो सही कि भारत की गाय को तृण खिलाने की यह परंपरा कितनी दिव्य थी कि व्यक्ति के घर में कोई गाय नही है तो वह पड़ोसी की गाय के लिए ही जंगल से तृण ला रहा है, जबकि उसे पता है कि उस गाय का दूध उसे तो पीना नही है, पर उसे यह पता है कि न जाने  इस गाय का दूध पीने से किसका भला हो जाएगा? इसी को कहते हैं-‘नेकी कर दरिया में डाल।’ तब हमारा संपूर्ण समाज ही ऐसा था कि वह नेकी कर दरिया डालने में विश्वास करता था। लोकोपकार करने का हमारे पूर्वजों का कितना उत्तम और पवित्र ढंग था यह।
गौग्रास की परंपरा


गौग्रास खिलाने से भी बताया जाता है कि व्यक्ति को पुण्य लाभ मिलता है। महाभारत में आया है कि जो व्यक्ति एक वर्ष तक स्वयं भोजन करने से पूर्व प्रतिदिन दूसरे की गाय को मुट्ठी भर घास (इसी से अंग्रेजी का ग्रास शब्द बन गया है।) ग्रास केवल गाय के लिए ही प्रयोग होता है। यह किसी अन्य पशु के लिए प्रयोग नही किया जाता। कुछ लोग अपने घर से गाय के आटे को गूंथकर ले आते हैं और उसके लड्डू से बनाकर गाय को देते हैं। गौ का यौगिक अर्थ गतिशील है। कहा गया है कि-गच्छति इति गौ-अर्थात जो चलती है, गतिशील है-वह गौ है। संपूर्ण संसार गति कर रहा है। इसलिए वह गौ रूप है। हमारे विद्वानों की यह निराली प्रवृत्ति रही है कि वह जिस गुण को जिस वस्तु में देखते हैं उस जैसे गुण से विभूषित किसी अन्य वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ , प्राणि या विभूति से उसकी तुरंत तुलना कर देते हैं। इससे जहां उनके ज्ञान-गाम्भीर्य का पता चलता है, वहीं ऐसा करने से उनके लेखन में दिव्यता आ जाती है और पाठकों को किसी वस्तु या पदार्थादि का किसी अन्य वस्तु या पदार्थादि से तुलना करने का ढंग आ जाता है।

गाय और संसार की परस्पर तुलना करने से भी ऐसा ही हुआ है। इससे संसार की गतिशीलता को गौ की भांति नमनीय, वंदनीय बनाया गया है। इसका अभिप्राय है कि हम निष्क्रिय ना रहें, जीवन में निरंतर प्रवाहमान और गतिशील रहें। जैसे गाय चौबीस घंटे क्रियाशील रहती है और संसार भी क्षण-क्षण, पल-पल गतिशील है-वैसे ही हम भी गतिशील रहें। इस प्रकार संसार को गौ का प्रतिबिम्ब बताकर विद्वानों ने हमारा ही उपकार किया है। हमसे कहा है कि इस संसार में आकर तुम निष्क्रिय मत हो जाना। ‘चरेवैति-चरेवैति’ इसी से उदभूत होकर हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। हमारा आचरण (चरैवेति का ‘चर’ ध्यान देने योग्य है) और चाल चलन, खान-पान (चर=चरना अर्थात भोजन करना) सब ऐसे हों जो हमें ‘चलते रहो-चलते रहो’ का संकेत करते रहें। ऐसा करने से गाय, विश्व और व्यक्ति सभी एक दूसरे के पूरक बनकर उन्नति की ओर बढ़ते चले जाएंगे।


बुधवार, 12 जुलाई 2017

गौपालन में सावधानियाँ

गौपालन में सावधानियाँ

गौपालन में लगे हुए उद्यमियों को निम्न बिंदूओं का ध्यान रखना आवश्यक है, अन्यथा लाभ में निरंतर कमी आती जाएगी|
क. प्रजनन
(अ) अपनी आय को अधिक दूध वाले सांड के बीज से फलावें ताकि आने वाली संतान अपनी माँ से अधिक दूध देने वाली हो| एक गाय सामान्यत: अपनी जिन्दगी में 8 से 10 बयात दूध देती हैं आने वाले दस वर्षों तक उस गाय से अधिक दूध प्राप्त होता रहेगा अन्यथा आपकी इस लापरवाही से बढ़े हुए दूध से तो आप वंचित रहेंगे ही बल्कि आने वाली पीढ़ी भी कम दूध उत्पादन वाली होगी| अत: दुधारू गायों के बछड़ों को ही सांड बनाएँ|
(आ) गाय के बच्चा देने से 60 से 90 दिन में गाय पुन: गर्भित हो जाना चाहिए| इससे गाय से अधिक दूध, एवं आधिक बच्चे मिलते हैं तथा सूखे दिन भी कम होते है|
(इ) गाय के फलने के 60 से 90 दिन बाद किसी जानकार पशु चिकित्सा से गर्भ परिक्षण करवा लेना चाहिए| इससे वर्ष भर का दूध उत्पादन कार्यक्रम तय करने में सुविधा होती है|
(ई) गर्भावस्था के अंतिम दो माह में दूध नहीं दूहना चाहिए तथा गाय को विशेष आहार देना चाहिए| इससे गाय को बच्चा जनते वक्त आसानी होती है तथा अगले बयात में गाय पूर्ण क्षमता से दूध देती है|
ख. आहार
(अ) दूध उत्पादन बढ़ाने तथा उसकी उत्पादन लागत कम करने के लिए गाय की सन्तुलित आहार देना चाहिए| संतुलित आहार में गाय की आवश्यकता के अनुसार समस्त पोषक तत्व होते हैं, वह सुस्वाद, आसानी से पचने वाला तथा सस्ता होता है|
(आ) दूध उत्पादन से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए, पशु को बारह मास पेट भर हरा चारा खिलाएं| इससे दाने का खर्च भी घटेगा तथा गाय का नियमित प्रजनन भी होगा|
(इ) गाय को आवश्यक खनिज लवण नियमित देंवे|
(ई) गाय को आवश्यक चारा- दाना- पानी नियत समय के अनुसार देवे| समय के हेर-फेर से भी उत्पादन प्रभावित होता है|
ग. रोग नियंत्रण
(अ) संक्रामक रोगों से बचने के लिए नियमित टिके लगवाएं|
(आ) बाह्य परिजीवियों पर नियंत्रण रखे| संकर पशुओं में तो यह अत्यंत आवश्यक है|
(इ) आन्तरिक परजीवियों पर नियंत्रण रखने के लिए हर मौसम परिवर्तन पर आन्तरिक परजिविनाशक दवाएँ दें|
(ई) संकर गौ पशु, यदि चारा कम खा रहा है या उसने कम दूध दिया तो उस पर ध्यान देवें| संकर गाय देशी गाय की आदतों के विपरीत बीमारी में भी चारा खाती तथा जुगाली भी करती है|

(उ) थनैला रोग पर नियंत्रण रखने के लिए पशु कोठा साफ और हवादार होना चाहिए| उसमें कीचड़, गंदगी न हो तथा बदबू नहीं आना चाहिए| पशु के बैठने का स्थान समतल होना चाहिए तथा वहाँ गड्ढे, पत्थर आदि नुकीले पदार्थ नहीं होना चाहिए| थनैला रोग की चिकित्सा में लापरवाही नहीं बरतें|


गौधन की अवनति के कारण

गौधन की अवनति के कारण

1. भैंस का ढूढ़ गाढ़ा व अधिक चिकनाई वाला होने से दूध व्यवसाय में भैंस के दूध को गाय के दूध पर वरीयता दी जाने लगी|
2. आवागमन के साधन बढ़ने से बैलों की उपयोगिता इस क्षेत्र में सीमित रह गई है|
3. ट्रेक्टरों के बढ़ते उपयोग से बैलों की उपयोगिता कृषि कार्यों में शनैः – शनै: घटती जा रही है|
4. रासायनिक खादों एवं कीटनाशक से गोबर, गोमूत्र के उपयोग में कमी आई है| इन सबका प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है| गाँव अब गौ आधारित स्वावलंबी नहीं रहे| उन्हें अपने समस्त कार्यों एवं कृषि आदानों के लिए शहर की ओर देखने पड़ रहा है|
गाँव में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए तथा कृषकों की आय में वृद्धि के लिए हमें पुन: गौ आधारित स्वावलंबी कृषि की ओर वापस जाना होगा| बदले हुए हालात में आज कम से कम गाय के दूध का उत्पादन बढ़ाकर तथा गोबर व गौमूत्र की प्रयोग से रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर होने वाले खर्च व गौमूत्र के प्रयोग से रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर होने वाले खर्च को बचाकर ग्राम लक्ष्मी का पुन: आह्वान किया जा सकता है|
विभिन्न देशों की गायों के दूध उत्पादन के आंकड़ों को देखकर ऐसा लगा कि विकसित राष्ट्रों के गायों का प्रति व्यात दूध उत्पादन विकासशील देशों की गायों के प्रति बयात दूध उत्पादन से कई गुना अधिक है| उदाहरण के लिए इजरायल में 9000 लीटर, अमेरिका में 7000 लीटर, हॉलैंड एवं जर्मनी में 6000 लीटर, जापान में 3000 लिटर दूध एक गाय एक व्यात में देती है जबकि भारत की एक गाय का औसत दूध उत्पदान विकास का पैमाना है| पंजाब, गुजरात, की गायें अधिक दुधारू हैं, ये प्रदेश भी विकसित हैं| म. प्र. में मालवा, निमाड़, मुरैना का गौधन दुधारू है अत: इन क्षेत्रों का किसान भी सम्पन्न है| इससे स्पष्ट है कि एक ब्यात में गाय का दूध जितना अधिक होगा, उतना ही सम्पन्न किसान, प्रदेश और राष्ट्र होगा| कृषि क्षेत्र में अब यह स्थिति आ गई है कि उत्पादन अब लगभग स्थिर हो गया है| उतनी ही उपज प्राप्त करने के लिए अब आदानों पर अधिक व्यय करना पड़ता है| परिवार के आकार बढ़ने से अब जोत के आकार भी छोटे होते जा रहे हैं| ऐसी स्थिति में अब गौपालन ही एक ऐसा व्यवसाय बचा है जिसमें उत्पादन बढ़ाने की अपार संभावना है| अनुभव यह बतलाता है कि एक संकर गाय, औसत देखभाल में एक ब्यात्त में 1500 से 1800 लिटर दूध देती हैं जिसका मूल्य साधारण तथा एक एकड़ दो फसली क्षेत्र से प्राप्त उत्पादन के बराबर होता है|  अत: किसान की आर्थिक हालत पता करने का यह भी एक पैमाना हो सकता है कि जिस किसा के पास जितनी दुधारू संकर गायें हैं, उसकी आमदनी उतनी ही एकड़ों में प्राप्त हो फसली क्षेत्र से प्राप्त आमदनी से होगी| गाय बढ़ाने के लिए गौपालन सर्वोत्तम साधन है|
जहाँ तक भैंस से प्रतियोगिता का प्रश्न है, विश्व में सबसे अच्छी भैंस केवल भारत में ही है| उनका एक ब्यात का दूध उत्पादन 1200 से 1500 लिटर रही है| भैंस के दूध को बढ़ाने की क्षमता सीमित है, उसमें सूखे के दिन अधिक होते हैं तथा उसका प्रजनन मौसमी होता है, उसके रख्राव का खर्च भी अधिक होता है, इसलिए भैंस एक अच्छी दुधारू गाय की तुलना में लम्बे समय तक नहीं टिक पायगी| अत: दूर दृष्टि से सोच कर गाय पालना ही लाभप्रद होगा|

गाय (परिचय)

प्राचीन भारत के विचारकों ने गाय के महत्व को पहचाना था| उन्होंने पाया कि गाय की दूध स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है,बैलों से खेती, आवागमन के साधन, एवं माल वाहन, गोमूत्र से खाद, कीटनाशक एवं औषिधिय उपयोग तथा भूमि की उत्पादकता बढ़ाने हेतु गोबर खाद ही उत्तम है|
जो आधारित कृषि की ग्राम स्वालंबन के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है| उन्होंने गौ की महिमा मंडित करते हुए गाय को माता का स्थान दिया| गाय को धर्म में इस तरह गूंथ दिया की भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम क्षेत्र में अनेक धार्मिक मत-मतोतरों के होते हुए भी गाय को सभी ने पूज्यनीय माना|
भगवान श्रीकृष्ण भी गाय की सेवा करके गोपाल, गोविन्द आदि नामों से पुकारे गये| जब तक गौ आधारित स्वावलंबी खेती होती रही तब तक भारत विकसित धनवान राष्ट्र रहा, यहाँ की सम्पदा के लालच में दिया देशों को लोग भारत पर आक्रमण करते रहे|

गो सेवा का धार्मिक महत्व क्यों!

गो सेवा का धार्मिक महत्व क्यों!

हिंदू धर्म में गाय को देवता और माता के समान मानकर उसकी सेवा शुश्रूषा करना मनुष्य का मुख्य धर्म माना गया है, क्योंकि उसके शरी में सभी देवता निवास करते हैँ। कोई भी धार्मिककृत्य ऎसा नहीं है, जिसमें गौ की आवश्यकता न हो। फिर चाहे वह यज्ञ हो, षोडश संस्कार हों या कोई अन्य आयोजन हो। महर्षि वसिष्ठ का कामधेनु के लिए प्राणों की बाजी लगाना, महर्षि च्यवन का अपने शरीर के बदले नहुष का चक्रवर्ती राज्य ठुकरा कर एक गाय का मूल्य निश्चित करना, जैसे प्रसंग यही दर्शाते हैं कि गाय से बढकर उपकार करने वाली अन्य कोई वस्तु संसार में नहीं है। यह माता के समान मानव जाति का उपकार करने वाली, दीर्घायु और निरोगता प्रदान करने वाली है। इसीलिए शास्त्र में कहा गया है-गावो विश्वस्य मातर:। अर्थात गाय विश्व की माता ही है। अग्निपुराण में कहा गया है कि गायें परम पवित्र और मांगलिक हैं। गाय का गोबर और मूत्र दरिद्रता दूर करता हैं। उन्हें खुजलाना, नहलाना, पानी पिलाना, पुण्यदायक है। गाय और उसकी बछिया के पीठ पर सहलाने से मधुमेह आदि में भी लाभ मिलता है। गोमूत्र, गोबर, गो दुग्ध, गो दधि, गोघृत, कुशौदक-इनका मिश्रण पंचगव्य सभी अशुभ अनिष्टों को दूर करता है। गो ग्रास देने वाला सदगति प्राप्त करता है। गोदान करने से समस्त कुल का उद्धार होता है। गो के श्वास से भूमि पवित्र होती है। गाय के स्पर्श से पाप नष्ट होते हैं। पंचगव्य पीने से पतित का भी उद्धार होता है। पारस्कर गृह्यसूत्र (113127) में कहा गया है-पारस्कर गृह्यसूत्र (113127) में कहा गया है- माता रूद्राणां दुहिता वसूनाम्। स्वसाआदित्यानाम्अमृतस्य नाभि:।। -अथर्ववेद अर्थात गाय रूद्रों की माता है, वसुओं की पुत्री है, सूर्य की बहन है और घृतरूप अमृत का केंद्र है।मार्कण्डेयपुराण में कहा गया है कि विश्व का कल्याण गाय पर आधारित है। गाय की पीठ-ऋग्वेद, धड-यजुर्वेद, मुख-सामदेव, ग्रीवा-इष्टापूर्ति व सत्कर्म, रोम साधु तथा सूक्त हैं। गोबर और गोमूत्र में शांति और पुष्टि है। जहां गाय रहती है, वहां पुण्य क्षीण नहीं होते। वह जीवन को धारण कराती है। स्वाहा, स्वधा, वषट् और हंतकार-गाय के ये चार धन हैं। इस गाय से सबकी तृप्ति होती है। विष्णुस्मृति में कहा गया है कि गौओं के निवास से भूमि पवित्र होती है। गोएं पवित्र व मंगलमय हैं। उनसे समस्त लोक का कल्याण है। गायों से यज्ञ सफल होते हैं। उनकी सेवा से पाप नष्ट होते हैं। गौओं के बाडे में तीर्थो का निवास है। उनकी रज से बुद्धि और संपदा बढती है। उन्हें प्रणाम करने से पुण्य मिलता है। स्कंदपुराण में कहा गया है कि गौओं के गोबर से घर आंगन और देव मंदिर भी पवित्र हो जाते है। अथर्ववेद में कहा गया है कि गौओं के दूध से निर्बल मनुष्य बलवान और हष्ट-पुष्ट होता है तथा फीका और निस्तेज मनुष्य तेजस्वी बनता है।
गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि गायों में कामधेनु मैं ही हूं। महाभारत, आश्वमेधिक पर्व में कहा गया है कि दान में दी हुई गौ अपने विभिन्न गुणों के कारण कामधेनु बन कर परलोक में दाता के पास पहुंचती है। वह अपने कर्मो से बंधकर घोर अंधकारपूर्ण नरक में गिरते हुए मनुष्य का उसी प्रकार उद्धार कर देती है, जैसे वायु के सहारे से चलती हुई नाव मनुष्य को महासागर में डूबने से बचाती है। जैसे मंत्र के साथ दी हुई औषधि प्रयोग करते ही मनुष्य के रोगों का नाश कर देती है, उसी प्रकार सुपात्र को दी हुई कपिला गौ मनुष्य के सब पापों का तत्काल नष्ट कर डालती है।
गोदान क्यों!

महाभारत, कूर्मपुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि अनेक ग्रंथों में कहा गया है कि गोदान करने वाले मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर सुखपूर्वक जीवन जीते हैं और मृत्यु के बाद स्वर्ग जाते हैं।ब्र्हामण को गाय देने के पीछे मान्यता यही है कि जब प्राणी मरकर स्वर्ग जाता है, तब उसकी राह में वैतरणी नदी पडती है। दान में दी हुई गाय की पूंछ पकडकर प्राणी वैतरणी को पारकर स्वर्ग पहुंच जाता है।