मंगलवार, 12 नवंबर 2019

पशुओं के प्रति क्रूरता और क्रूरता निवारण अधिनियम

आज संसार में पशुओं का उत्पीडन जिस बुरी तरह से किया जा रहा है उसे देखकर किसी भी भावनाशील का ह्रदय दया से भरकर कराह उठता है। पशुओं पर होने वाला अत्याचार मनुता पर एक कलंक है। समस्त प्राणी-जगत में सबसे श्रेष्ट कहे जाने वाले मनुष्य का पशुओं के साथ क्रूरता करना कहाँ तक जायज़ है। साधारण-सी बात है कि संसार में रहने वाले सारे प्राणियों को उस एक ही परमिपता परमेश्वर ने जन्म दिया है। इस नाते वे सब आपस मैं भाई-बहन ही है, बुद्धि, विवेक तथा अधिकारों की दृष्टि से मनुष्य उन सबमे में बड़ा है और समस्त अन्य प्राणी उसके छोटे भाई-बहन है । बड़े तथा बुद्धिमान होने के कारण मनुष्य का धर्म है कि वह अपने छोटे जीव-जन्तुओ पर दया करे, उन्हें कष्ट से बचाए, पाले और रक्षा करे। किन्तु खेद है, कि बड़े भाई का कर्त्तव्य निभाने के बजाय मनुष्य उनसे क्रूरता का व्यवहार करता है। समता, दया एवं करुना के आधार पर ‘वसुधैव कुटुकम्’ का महान् सिद्धांत सनातन धर्मं समेत सभी धर्मो की आधारिशला है। यदि धर्म से दया तथा करूणा का निकाल दिया जाये तो वह एक महान् धर्म न रहकर न जाने कौन-सा रूप धारण कर ले। संसार के सारे धर्मो में जीवो पर दया करने का निर्देश दिया गया है। जब तक मनुष्य जीवो के लिए दया, और सनानुभुति नहीं रखेगा, भौतिक विकास तो हो संभव है लेकिन वास्तविक सुख-शांति नहीं मिल सकती । मनुष्य पशु पर कितना और किस – किस प्रकार से अत्याचार और उत्पीड़न करता है, इसको आये दिन सामान्य जीवन मैं देखा जा सकता है। और भी दुःख एवं खेद की बात है कि मनुष्य का यह अत्याचार उन्ही जीव-जन्तुओ पर चल रहा है जो उसके लिये उपयोगी, सेवक तथा सुख-दुःख के साथी तथा बच्चो की तरह ही भोले, निरीह और आज्ञाकारी है ।

गाय, बैल, भेंस, भेंसा, घोड़ा, गधा, बकरी आदि मनुष्य के युग-युग के साथी और बहुत ही उपयोगी साधन है । किन्तु मनुष्य उन पर कितना अत्याचार करता है, यह किसी से छिपा नहीं है। गाय पालते है , उससे दूध लेते है और बूढ़ी अथवा दूध न देने की स्थिति में या तो मारकर घर से निकाल देते है अथवा कसाई के हाथ कटने को बेच देते है। इतना ही नहीं, उसके जरा भी गलती करने पर अथवा कोई अप्रिय अभिव्यक्ति करने पर उस पर यह सोचे बिना डंडे बरसाने लगते है कि आखिर यह है तो एक पशु ही, गलती कर सकती है। अपने खेत पर आ जाने पर तो लोग दूसरों के जानवरों को इस बुरी तरह मारते है कि बेचारे कभी-कभी तो चीखकर गिर तक पड़ते है । बैल-भसों पर तो मनुष्य का अत्याचार देखकर यही लगता है कि यह बेचारे पशु अपने पूर्व जन्म के पापों का दंड पा रहे है और इनका वाहक मनुष्य न होकर मनुष्य रूप में यमराज है जो कि असहनीय यंत्रणा दे रहा है। गर्मी की दोपहरी में गाड़ी-ठेले पर तीस-तीस मन बोझ ढोने अथवा हल में चलने वाले अधिकाँश बैल-भैसों के कंधे घायल रहते है, वे जुआ अथवा हल की रगड़ से कट जाते है किन्तु उनका क्रूर स्वामी उसकी कोई परवाह न कर उन्ही घायल बैल-भैसों कों पर जुआ रख देते है, जिससे उस पीड़ित पशु के कंधो में स्थाई घाव हो जाता है जो फिर आजीवन अच्छा नहीं होता

भारतीय संविधान के अनुच्छे 51(A) के मुताबिक हर जीवित प्राणी के प्रति सहानुभूति रखना भारत के हर नागरिक का मूल कर्तव्य है।  पशुओं के प्रति क्रूरता रोकथाम अधिनियम (Prevention of Cruelty to Animals Act) भारतीय संसद द्वारा १९६० में पारित एक अधिनियम है जिसका उद्देश्य पशुओं को दी जाने वाली अनावश्यक पीड़ा और कष्ट को रोकना है। पशुओं के साथ निर्दयता का अर्थ है मानव के अतिरिक्त अन्य पशुओं को नुकसान पहुँचाना या कष्ट देना। कुछ लोग इस परिभाषा को और अधिक व्यापक कर देते हैं और उनका मत है कि किसी विशिष्त लाभ के लिये पशुओं का नुकसान (जैसे वध करना) पशुओं के साथ निर्दयता के अन्तर्गत आता है।

धारा 11 – (1) यदि कोई व्यक्ति

  • किसी पशु को अनावश्यक पीड़ा या यातना पहुंचाने हेतु मारता है, लात लगाता है, अधिक सवारी करता या अधिक हांकता है, अधिक बोझा लादता है, दुःखी, क्लेशित करता है या अन्यथा ऐसा व्यवहार करता या करवाता है या स्वामी होने के नाते ऐसा करने की अनुमति देता है।
  • उम्र या किसी रोग या शारीरिक अशक्तता, घाव, सड़न या अन्य कारण से ऐसे कार्य में लेने में अशक्त पशु को नियोजित करना, श्रम करवाना या अन्य प्रयोजन करवाना या पशु के स्वामी होने के नाते ऐसे किसी पशु को कार्य में लेने की अनुमति देता है ।
  • किसी पशु को जानबूझ कर और अनुचित प्रकार से कोई हानिप्रद मादक द्रव्य या हानिप्रद पदार्थ देता है या किसी पशु को जानबूझकर और अनुचित प्रकार से मादक द्रव्य या हानिप्रद पदार्थ देने का प्रयत्न करता या कारित करता है।
  • किसी पशु को अनावश्यक पीड़ा या यातना हो इस तरीके या स्थिति में ले जाता है या वाहन में या वाहन पर या अन्यथा परिवहन करता है।
  • किसी पशु को ऐसे पिंजरे या अन्य पात्र में रखेगा या परिरुध्र करेगा, जिसकी ऊंचाई, लम्बाई और चौड़ाई इतनी पर्याप्त न हो पशु को उसम हिल -डुल सकने का उचित स्थान न हो सके । किसी पशु को अनुचित रूप से छोटी या अनुचित रूप से भारी किसी जंजीर या रस्सी में किसी अनुचित अवधि तक के लिए बांधकर रखना ।
  • स्वामी होते हुए, किसी ऐसे कुत्ते को, जो अभ्यासत: जंजीर में बंधा रहता है या बंद रखा जाता है, उचित रूप से व्यायाम करने या करवाने की उपेक्षा करना।
  • किसी पशु का स्वामी होते हुए उस पशु को पर्याप्त भोजन, पानी और शरण दे पाने में असफल होता है ।
  • बिना औचित्यपूर्ण कारण के किसी पशु को ऐसी परिस्थितियों में छोड़ देता है कि उसे भूख-प्यास के कारण पीड़ा होने की संभावना हो ।
  • किसी पशु को, उसका स्वामी जानबूझ कर किसी गलीकूचे में आवारा घूमने की छूट देता है जबकि वह पशु छूत या संक्रामक रोग से पीड़ित हो या बिना औचित्यपूर्ण कारण के, रोगी या अशक्त पशु, जिसका वह स्वामी है, को गलीकूचे में मर जाने देता है ।
  • किसी ऐसे पशु को बिक्री के लिए प्रस्तुत  करेगा, या बिना किसी उचित  कारण के अपने कब्जे म रखेगा, जो अंगिवच्छेद, भुखमरी, प्यास, अतिभरण या अन्य दुव्यर्वहार के कारण पीड़ाग्रस्त हो ।
  • किसी पशु का अंगिवच् छेद करेगा या किसी पशु को (जिसके अन्तगर्त आवारा कुत्ते भी है) हृदय में स्टिकनीन अन्तःक्षेपण की पधति का उपयोग करके या किसी अनावश्यक क्रूर ढंग से मार डालना ।
  • केवल मनोरंजन करने के उदेश्य से
  • (i) किसी पशु को ऐसी रीति से परिरुध्य करेगा या कराएगा (जिसके अन्तगर्त किसी पशु का किसी अन्य घर् या अन्य पशु वन में चारे के रूप म बांधा जाना भी है) कि वह किसी अन्य पशु का शिकार बन जाए ; अथवा
  • (ii) किसी पशु को किसी अन्य पशु के साथ लड़ने के लिए या उसे सताने के लिए उद्दीप करना।
  • पशु की लड़ाई के लिए या किसी पशु को सताने के प्रयोजनार्थ किसी स्थान को सुव्यविस्थत करेगा, बनाए रखेगा उसका उपयोग करेगा, या उसके प्रबंध के लिए कोई कार्य करेगा या किसी स्थान को इस प्रकार उपयोग में लाने देगा या तदर्थ प्रस्ताव करेगा, या ऐसे किसी प्रयोजन के लिए रखे गए या उपयोग में लाए गए किसी स्थान में किसी अन्य व्यक्ति के प्रवेश के लिए धन प्राप्त करेगा ।
  • गोली चलाने या निशानेबाजी के किसी मैच या प्रतितयोगता को, जहां पशु को बंधुआ हालत से इसीलिए छोड़ दिया जाता है कि उन पर गोली चलाई जाए या उन्हें निशाना बनाया जाए, बढ़ावा देना या उसमें भाग लेगा ।

उपरोक्त परिस्थितियो में यदि उसका प्रथम अपराध हो तो दस रुपये का न्यूनतम एवं पचास रुपये तक के अर्थदण्ड और दूसरे या अगले अपराध की स्थिति में, जो पूर्व के अपराध के तीन वर्षों में ही हुआ हो तो पच्चीस रुपये का न्यूनतम और एक सौ रुपये तक के अर्थदण्ड या तीन माह के कारावास या दोनों से दंडित किया जायेगा।

(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों  के लिए किसी स्वामी के बारे में यह तब समझा जाएगा कि उसने अपराध किया है जब वह ऐसे अपराध के निवारण के लिए समुचित देख-रेख और पयर्वेक्षण करने में असफल रहा हो : परन्तु जहां स्वामी केवल इसी कारण क्रूरता होने देने के लिए दोषी सिद्ध किया जाता है कि वह ऐसी देख-रेख और पयर्वेक्षण करने में असफल रहा है वहां वह जुमार्ने के विकल्प के बिना कारावास का दायी नहीं होगा।

(3) इस धारा के प्रावधान निम्नवर्णित कृत्यों पर लागू नहीं होंगे : (ए) निर्धारित प्रक्रिया से पशुओं के सींग काटना, बन्ध्याकरण करना, चिन्हीकरण तथा नकेल डालना।

(बी) आवारा कुत्तों को निर्धारित रीति से निर्धारित स्थानों (प्राणहांर कछो) में नष्ट किया जाना।

(सी) मनुष्यों के भोजन के लिए किसी पशु के विनष्टीकरण अथवा विनष्टीकरण के लिए तैयारी के दौरान कोई ऐसा कृत्य करना अथवा न करना, यदि विनष्टीकरण के लिए तैयारी से उस पशु को अनावश्यक पीड़ा व कष्ट न होता हो।

(दी) तत्समय प्रवत किसी विधि के प्राधिकार के अधीन किसी पशु का उन्मूलन करना या उसे नष्ट करना ।

(इ) कोई विषय, जो अध्याय 4 में वर्णित है ।

धारा 12 – फूका या डूम देव प्रक्रिया करने पर दंड यदि कोई व्यक्ति किसी गाय या अन्य दुधारू पशु पर ऐसी शल्य-क्रिया करे जिसे ‘फूका‘ या ‘डूम देव‘ कहा जाता है या अन्य प्रक्रिया जिसमें किसी भी पदार्थ का इंजेक्शन लगाए जिसका उद्देश्य अधिक दूध दुहना हो परन्तु जो पशु के स्वास्थ्य के लिए घातक हो या कोई व्यक्ति ऐसी प्रक्रिया अपने कब्जे या नियंत्रण के पशु पर करने की अनुमति देता हो तो उसे ऐसे अर्थदण्ड से दंडित किया जाएगा जो एक हजार रुपए तक हो या ऐसे कारावास से जो दो वर्षों तक हो सकेगा या दोनों से दंडित किया जा सकेगा और जिस पशुओं पर ऐसी प्रक्रिया की जाए वह सरकार के हित में जप्त कर लिया जायेगा।

धारा 28 – धर्म द्वारा निर्धारित ढंग से कत्ल संबंधी छूट किसी समुदाय के धर्म द्वारा वांछित रीति से किसी पशुओं का कत्ल इस अधिनियम के तहत अपराध नहीं माना जाएगा।

धारा 29 – न्यायालय द्वारा दोष सिद्ध व्यक्ति को पशु के स्वामित्य से वंचित करना।

(1) यदि किसी पशु का स्वामी इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध के लिए दोषी पाया जाए, तो उसे उस दोष सिद्धि पर, यदि न्यायालय उचित समझे तो, अन्य सजा के अतिरिक्त, जिस पशु के संबंध में अपराधकिया गया उसके लिए, एक आदेश पारित कर सकता है कि वह पशु सरकार के पक्ष में जप्त माना जाएगा और साथ ही उस पशु के व्ययन ;क्पेचवेंसद्ध के लिए परिस्थितियों के अनुसार जैसा उपयुक्त समझे, आदेश दे सकेगा।

(2) उपधारा (1) के अंतर्गत कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि साक्ष्य द्वारा यह नहीं दिखे कि इस अधिनियम में पूर्व में दोष सिद्धि हुई थी या स्वामी के चरित्र के बारे में या अन्यथा पशु के साथ व्यवहार के बारे में, कि यदि पशु उसके स्वामी के साथ रखा गया तो यह संभावना है कि उसे आगे भी क्रूरता का सामना करना पड़ेगा।

(3) उपधारा (1) में किए प्रावधान को आंच पहुंचाए बिना, न्यायालय यह भी आदेश दे सकेगा कि इस अधिनियम के अंतर्गत किसी अपराध के लिए दोष सिद्ध व्यक्ति या स्थायी रूप से या आदेश में तय की गई अवधि के लिए किसी भी प्रकार के किसी पशु को धारित करने से वंचित रहेगा या न्यायालय जैसा उचित समझे, आदेश में निर्दिष्ट किसी प्रजाति या प्रकार का कोई पशु धारित नहीं करेगा।

(4) उपधारा (3) में कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा, जब तक कि निम्नांकित स्थिति न हो :- (क) उपधारा (3) के अंतर्गत तब तक कोई आदेश न दिया जाए जब तक कि पिछली किसी दोष सिद्धि के साक्ष्य से यह ज्ञात न हो जाए कि उस व्यक्ति का चरित्र कैसा था, उस पशु के साथ उसका व्यवहार कैसा था जिसके लिए उसे दोषी पाया गया है और यदि यह पशु इस व्यक्ति की अभिरक्षा में रहता तो उसके प्रति क्रूरता किए जाने की संभावना थी।

(ख) जिस शिकायत के आधार पर उसे दोषी पाया गया था, उसमें यह कहा गया है कि अभियुक्त की दोष सिद्धि के बारे में शिकायत की यह मंशा थी और उसमें पूर्वोक्तानुसार कोई आदेश पारित करने का अनुरोध किया गया था।

(ग) जिस अपराध के लिए उसे दोषी पाया गया था ऐसे किसी क्षेत्र में किया गया था जिसमें तत्समय प्रभावी कानून के अनुसार उस पशु को रखने के लिए कोई लाइसेन्स आवश्यक था, जिस पशु के लिए उसे दोषी पाया गया था।

5. तत्समय प्रभावी किसी कानून में इसके विपरीत किसी प्रावधान के होने के बावजूद ऐसा कोई व्यक्ति जिसके विषय में उपधारा (3) के अंतर्गत कोई आदेश दिया गया है उसे कोई अधिकार नहीं है कि वह उस आदेश के विपरीत किसी पशु को अभिरक्षा में रखे और यदि वह किसी आदेश के प्रावधानों का उल्लंघन करता है तो उसे एक सौ रुपये तक के जुर्माने या तीन वर्ष तक की अवधि के कारावास या एक साथ दोनों दण्ड दिए जाएंगे।

धारा 30 – कुछ प्रकरणों में दोष संबंधी उपधारणा यदि किसी व्यक्ति पर धारा 11 की उपधारा (1)(एल) के प्रावधान का उल्लंघन कर बकरी, गाय उसकी संतति के कत्ल के अपराधों का आरोप हो और जिस समय आरोपित अपराध किया गया, यह सिद्ध हो कि उस समय में उसे आधिपत्य में इस धारा में संदर्भित पशु का चमड़ा पाया जाए तो, जब तक विपरीत सिद्ध न हो, यह उपधारणा की जाएगी कि वह पशु क्रूर तरीके से कत्ल किया गया।

धारा 31 – अपराधों की प्रसंज्ञेयता दंड प्रक्रिया संहिता 1898 में विपरीत कथन के रहते हुए भी, धारा 11 की उपधारा (1)(एल) या (एन) या (ओ) या धारा 12 के अंतर्गत दंडनीय अपराध, उस संहिता में प्रसंज्ञेय अपराध माने जायेंगे।

धारा 32 – तलाशी और जप्ती की शक्तियां

(1) यदि उप-निरीक्षक से अन्यून कोई पुलिस अधिकारी या इस हेतु राज्य सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को यह विश्वास होने का कारण हो कि धारा 30 में संदर्भित पशु के संदर्भ में, धारा 11 की उपधारा (1)(एल) के संबंध में कोई अपराध हुआ है या किसी व्यक्ति के आधिपत्य में, ऐसे पशु का चमड़ा, उससे जुड़े हुए सिर के चमड़े के किसी भाग सहित पाया जाए तो वह उस स्थान में प्रवेश कर, तलाशी कर सकेगा या ऐसे स्थान जहां पर ऐसा चमड़ा पाया जा सकता है उसमें प्रवेश और तलाशी कर सकेगा और ऐसे अपराध की कारिति में उपयोग उद्देश्य से किसी वस्तु, पदार्थ या चमड़े को जप्त कर सकेगा।

(2) यदि उप-निरीक्षक से अन्यून कोई पुलिस अधिकारी या अन्य व्यक्ति को विश्वास करने के कारण हो कि उसके क्षेत्राधिकार में किसी पशु पर धारा 12 में संदर्भित ‘फूका‘ या ‘डूम देव‘ या अन्य किसी प्रकार की शल्य-क्रिया अभी-अभी हुई या होने की संभावना है तो वह ऐसे किसी भी स्थान में, जहां ऐसे पशु के होने की संभावना हो, प्रवेश कर सकता है, पशु को जप्त कर सकता है और जिस क्षेत्र में पशु जप्त किया गया उसके प्रभारी पशुचिकित्सक अधिकारी के समक्ष परीक्षण के लिए प्रस्तुत कर सकता है।

धारा 33 – तलाशी वारंट (1) यदि प्रथम या द्वितीय श्रेणी प्रेसीडेंसी दंडाधिकारी या पुलिस आयुक्त या जिला-पुलिस-अधीक्षक को लिखित सूचना मिलने पर और जैसी वह उचित समझे जांच के बाद यह विश्वास करने का कारण हो कि इस अधिनियम के अंतर्गत किसी स्थान पर कोई अपराध होने जा रहा है, या हो रहा है या हो चुका है, तब या तो वह स्वयं प्रवेश कर सकता है और तलाशी कर सकता है या उसके द्वारा जारी वारंट से, उप-निरीक्षक से अन्यून किसी पुलिस अधिकारी को प्रवेश और तलाशी हेतु अधिकृत कर सकता है। (2) इस अधिनियम के अंतर्गत तलाशियों के लिए, दंड प्रक्रिया संहिता 1898 के प्रावधान, जहां तक लागू करना संभव हों, लागू होंगे।

धारा 35 – पशुओं का उपचार और देखभाल (1) राज्य सरकार, सामान्य या विशेष आदेश से जिन पशुओं के संबंध में अपराध हुए हों, उनके उपचार और देखरेख के लिए उपचार-गृह स्थापित कर सकती है और दंडाधिकारी के समक्ष प्रस्तुति लंबित रहते उन उपचार गृहों में पशुओं को रखे रहने के लिए अधिकृत कर सकती है।

धारा 36 – अभियोजनों की परिसीमा अपराध घटित होने के तीन माह समाप्त होने के बाद उसका अभियोजन दर्ज नहीं किया जाएगा।

यातनाग्रस्त पशु को नष्ट करना

  • जहां कि किसी पशु का स्वामी धारा 11 के अधीन किसी अपराध के लिए दोषी  किया जाता है वहां, यदि न्यायालय का समाधान हो गया है कि पशु को जीवित रखना क्रूरता होगी तो, न्यायालय के लिए यह वैध होगा कि वह यह निर्देश दे कि उस पशु को नष्ट कर दिया जाए और उस प्रयोजन के लिए उसे किसी उपयुक्त व्यक्ति को सौप दिया जाए, तथा जिस व्यक्ति को वह पशु इस प्रकार सौंपा जाए वह, उसे अनावश्यक यातना दिए बिना, अपनी उपिस्थित में यथासंभव शीघ नष्ट कर देगा या करवा देगा तथा न्यायालय यह आदेश दे सकेगा कि उस पशु को नष्ट करने में जो भी उचित व्यय हुआ है वह उसके स्वामी से वैसे ही वसूल कर लिया जाए मानो वह जुमार्ना हो : परन्तु यदि स्वामी उसके लिए अपनी अनुमित नहीं देता है तो इस धारा के अधीन कोई भी आदेश, उस छेत्र के भारसाधक पशु चिकित्सा अधिकारी के साछ के बिना, नही दिया जाएगा ।
  •  जब किसी मजिस्टेट, पुलिस आयुक्त या जिला पुलिस अधीक्षक के पास यह विश्वास करने का कारण हो कि किसी पशु के संबंध में धारा 11 के अधीन कोई अपराध किया गया है तो वह उस पशु के तुरन्त नष्ट किए जाने का निर्देश दे सकेगा यदि उसे जीवित रखना उसकी राय में क्रूरता हो ।
  •  कांस्टेबल की पंक्ति से ऊपर का कोई पुलिस अधिकारी या राज्य सरकार द्वारा इस निमित प्राधिकृत कोई व्यक्ति , जो किसी पशु को इतना रुग्ण या इतने गंभीर रूप से छतिग्रस्त या ऐसी शारीरिक स्थति में पाता है कि उसकी राय म उसे क्रूरता के बिना हटाया नहीं जा सकता है तो वह, यदि स्वामी अनुपिस्थत है या उस पशु को नष्ट करने के लिए अपनी सहमित देने से इंकार करता है तो, तुरन्त उस छेत्र के भारसाधक पशु चिकित्सा अधिकारी को, जिसमे वह पशु पाया गया हो, आहूत कर सकेगा और यदि भारसाधक पशु चिकित्सा अधिकारी यह प्रमाणित करता है कि वह पशु घातक रूप से छतिग्रस्त है या इतने गंभीर रूप से छतिग्रस्त है या ऐसी शारीरिक स्थिति में है कि उसे जीवित रखना क्रूरतापूर्ण होगा तो, यथास्थिति , वह पुलिस अधिकारी या प्राधिकृत कोई व्यक्ति, मजिस्टेट के आदेश प्राप्त  करने के पश्चात्, उस छतिग्रस्त पशु को ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, नष्ट कर सकेगा या नष्ट करा सकेगा ।
  • पशुओं को नष्ट करने के संबंध में मजिस्टेट के किसी आदेश के खिलाफ कोई भी अपील नहीं होगी ।

भारत में गाय को कभी भी पशु नहीं माना

यह एक निर्विवाद सत्य है की भारत में गाय को कभी भी पशु नहीं माना गया है, अपितु इन्हें ब्रम्हाण्ड की जननी और मनुष्यों की माता माना जाता रहा है। वैदिक काल से ही गाय को आध्यात्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक और औषधीय कारणों से पोषित किया जाता रहा है। आज के आधुनिक युग में स्वदेशी गाय के आर्थिक पछ को मजबूत करना एक बहुत बड़ी चुनौती है। वैज्ञानिक शोधो से यह सिद्ध हो चूका है कि गाय से प्राप्त पांच प्रमुख  पदार्थ दूध, दही, घी, मूत्र और गोबर, जिसे पंचगव्य के नाम से जाना जाता है, से मनुष्यों के प्रमुख तीनो दोषों (वात, पित्त, कफ ) का निराकरण किया जा सकता है।  यद्यपि आधुनिक विज्ञानं ने भी देशी गायो को कई आयामों में विदेशी गायो  से श्रेष्ठ माना है, लेकिन कम दूध उत्पादन के आर्थिक पक्ष की वजह से यह इतनी निर्बल हो गयी कि अब उसके दर्शन अधिकतर गौशाला में ही हो रहे है। पिछले दो दशक में देशी नस्ल की गायो को एक ओर जहां पशु पालकों और किसानो ने रखना कम कर दिया है, वही दूसरी ओर आम जन मानस में पुनः देशी गाय के लिए वैज्ञानिक महत्वा से कारण जागरूकता बढ़ी है। 

शनिवार, 2 नवंबर 2019

गोपाष्टमी — गो पूजन का एक पवित्र दिन

गोपाष्टमी — गो पूजन का एक पवित्र दिन

कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी के त्यौहार रूप में मनाया जाता है गोपाष्टमी का पर्व गोवर्धन पर्वत से जुड़ा त्यौहार है | श्रीकृष्ण ने गौचारण लीला गोपाष्टमी के दिन शुरू की थी। कहा जाता है की द्वापर युग में श्री कृष्ण भगवान ने गोवर्धन पर्वत को कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा को ब्रज वासियों की भारी वर्षा से रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा लिया था | श्री कृष्ण भगवान की इस लीला से सभी ब्राज़ वासी उस पर्वत के निचे कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तक रहे तब जाकर इन्द्र देव को पछतावा हुआ | और इन्द्र देव को वर्षा रोकनी पड़ी | तब से लेकर आज तक गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है | वर्ष में जिस दिन गायों की पूजा अर्चना की जाती है | वह दिन भारत में गोपाष्टमी के नाम से मनाया जाता है । जहाँ गाय पाली-पौंसी जाती हैं उस स्थान को गोवर्धन कहा जाता है । गोपाष्टमी,  ब्रज  में भारतीय संस्कृति  का एक प्रमुख पर्व है।  गायों  की रक्षा करने के कारण भगवान श्री कृष्ण जी का अतिप्रिय नाम ‘गोविन्द’ पड़ा। कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। इसी समय से अष्टमी को गोपोष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा।

शुलक्षमी कार्तिके तु स्मृता गोपाष्टमी बुधै । 
तद-दिनाद वासुदेवो’भुद गोपः पूर्वं तु वत्सपः ॥ 


“शास्त्रज्ञों एवं आचार्यों के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है । इस दिन से भगवान वासुदेव ने गोपालन की सेवा प्रारम्भ की, इसके पूर्व वे केवल बछड़ों की देखभाल करते थे ।”

गोपाष्टमी,  ब्रज  में भारतीय संस्कृति  का एक प्रमुख पर्व है। अतिप्रिय गाय की रक्षा तथा गोचारण करने के कारण भगवान श्री कृष्ण को ‘गोविन्द या गोपाल’ नाम से संबोधित किया जाता है । भगवान ने कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। इसी समय से अष्टमी को गोपोष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा ।

कार्तिक मास में आने वाला यह महोत्सव अति उत्तम फलदायक है। जो लोग नियम से कार्तिक स्नान करते हुए जप, होम, अर्चन का फल पाना चाहते हैं उन्हेें गोपाष्टमी पूजन अवश्य करना चाहिए। इस दिन गाय, बैल और बछड़ों को स्नान करवा कर उन्हें सुन्दर आभूषण पहनाएं। यदि आभूषण सम्भव न हो तो उनके सींगों को रंग से सजाएं अथवा उन्हें  पीले फूलों की माला से सजाएं। उन्हें हरा चारा और गुड़ खिलाना चाहिए। उनकी आरती करते हुए उनके पैर छूने चाहिएं। गौशाला के लिए दान दें। गोधन की परिक्रमा करना अति उत्तम कर्म है। गोपाष्टमी को गऊ पूजा के साथ गऊओं के रक्षक ‘ग्वाले या गोप’ को भी तिलक लगा कर उन्हें मीठा खिलाएं। ज्योतिषियों के अनुसार गोपाष्टमी पर पूजन करने से भगवान प्रसन्न होते हैं, उपासक को धन और सुख-समृ्द्धि की प्राप्ति होती है और घर-परिवार में लक्ष्मी का वास होता है।
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दीपावली के बाद ‘गोपाष्टमी’ त्यौहार सभी हिन्दू मनाते हैं। गोपाष्टमी हमारे निजी सुख और वैभव में हिस्सेदार होने वाले गौवंश का सत्कार है। द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज में गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा लिया था तभी से इस महोत्सव को मनाने की परम्परा शुरु हुई। गोपाष्टमी की पूजा प्रत्येक वर्ष ” कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी ” के दिन गौ माता की पूजा की जाती है |

श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान ने अपने भक्तों की रक्षा करने और अपने भक्तों को दिए वचन को पूरा करने के लिए धरती पर अवतार लेकर गिरिराज गोवर्धन का मान बढ़ाने गोसंवर्धन के लिए ही यह लीला की।

हिन्दू संस्कृति में गाय का विशेष स्थान हैं।  माँ का दर्जा दिया जाता हैं क्यूंकि जैसे एक माँ का ह्रदय कोमल होता हैं, वैसा ही गाय माता का होता हैं।  जैसे एक माँ अपने बच्चो को हर स्थिती में सुख देती हैं, वैसे ही गाय भी मनुष्य जाति को लाभ प्रदान करती हैं।
गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशाला में गोसंवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं। गोपाष्टमी की पूजा विधि पूर्वक विध्दान पंडितो द्वारा संपन्न की जाती है। बाद में सभी प्रसाद वितरण किया जाता है। सभी लोग गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ रक्षा व गौ संवर्धन का संकल्प करते हैं।

शास्त्रों में गोपाष्टमी पर्व पर गायों की विशेष पूजा करने का विधान निर्मित किया गया है। इसलिए कार्तिक माह की शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को प्रात:काल गौओं को स्नान कराकर, उन्हें सुसज्जित करके गन्ध पुष्पादि से उनका पूजन करना चाहिए। इसके पश्चात यदि संभव हो तो गायों के साथ कुछ दूर तक चलना चाहिए कहते हैं ऎसा करने से प्रगत्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। गायों को भोजन कराना चाहिए तथा उनकी चरण को मस्तक पर लगाना चाहिए। ऐसा करने से सौभाग्य की वृध्दि होती है।

हिन्दू धर्म में गायो का दर्जा उतना ही बताया गया है की जितना माँ का दर्जा होता है | कहा जाता है की माँ का ह्रदय जितना कोमल और सरल होता है उतना ही गौ माता का होता है | कहा जाता है की माँ अपने बच्चे के लालन पालन में कोई कमी नहीं रखती है उसी प्रकार गौ माता भी मनुष्य जाती को लाभ प्रदान करती है | कहा जाता है की गाय से उत्पन प्रतेक चीज लाभदायक होती है चाहे वह उसक दूध ,दही ,यहाँ तक की उसका मूत्र भी लाभदायक होता है | इसलिए हमारा कर्तव्य बनता है की गाय की हम रक्षा करे | कहा जाता है की दवापर युग में कृष्ण भगवान ने गायो की सेवा की थी | जब भगवान ने गायो की सेवा की तो हम तो मनुष्य है | हमारी तो गाय पूज्यनीय है और माता के सामान है | तो हमें भी गायो की पूजा करनी चाहिए |

कथा है कि बालक श्री कृष्ण आज से पहले केवल बछड़ों को चराने जाते थे और उन्हें अधिक दूर जाने की भी अनुमति नहीं  थी ।

इसी दिन बालक कृष्ण ने माँ यशोदा से गायों की सेवा करनी की इच्छा व्यक्त की और कहा कि, माँ मुझे गाय चराने की अनुमति चाहिए। उनके अनुग्रह पर नन्द बाबा, और यशोदा मैया ने शांडिल्य ऋषि द्वारा अच्छा समय देखकर उन्हें भी गाय चराने ले जाने के लिए जो समय निकाला, वह गोपाष्टमी का शुभ दिन था। मैया ने भगवान को बहुत सुन्दर रूप से तैयार किया । उन्हें बड़े गोप-सखाओं जैसे वस्त्र पहनाये, सिर पर मोरमुकुट, पैरों में पैजनिया पहनाई । परंतु जब मैया उन्हें सुन्दर सी पादुका पहनाने लगी तो वे बोले यदि सभी गौओं और गोप-सखाओं को भी पादुकाएं पहनाएंगी तभी वे भी पहनेंगे । गोविन्द के इस प्रेम-पूर्ण व्यवहार से मैया का हृदय भर आया और वे भावविभोर हो गयीं । इसके पश्चात् बालक कृष्ण ने गायों की पूजा की तथा प्रदक्षिणा करते हुए साष्टांग प्रणाम किया और बिना पादुका पहने गोचारण के लिए निकल पड़े ।
ब्रज में किवदंती यह भी है कि, राधारानी भी भगवान के साथ गोचारण के लिए जाना चाहती थीं परंतु स्त्रियों को इसकी अनुमति नहीं थी इसलिए वे और उनकी सखियाँ गोप-सखाओं का भेष धारण करके उनके समूह में जा मिले । परंतु भगवान ने श्रीमती राधारानी को तुरंत पहचान लिया । इसी लीला के कारण आज के दिन ब्रज के सभी मंदिरों में राधारानी का गोप-सखा के रूप में श्रृंगार किया जाता है ।


गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशाला में गोसंवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं।  इसके लिए दीपक, गुड़, केला, लडडू, फूल माला, गंगाजल इत्यादि वस्तुओं से इनकी पूजा की जाती है। महिलाएं गऊओं से पहले श्री कृष्ण की पूजा कर गऊओं को तिलक लगाती हैं। गायों को हरा चारा, गुड़ इत्यादि खिलाया जाता है तथा सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।  बाद में सभी को प्रसाद वितरण किया जाता है। सभी लोगों को गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ रक्षा व गौ संवर्धन का संकल्प करते हैं ।

गोपाष्टमी के दिन गायों को हरा चारा, गुड़ इत्यादि खिलाया जाता है तथा उनसे सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि गोपाष्टमी पूजन के पश्चात् गायों की चरणधूलि को अपने मस्तक पर लगाने से सौभाग्य की वृद्धि होती है। यदि संभव हो सके तो इस दिन गायों के साथ कुछ दूर तक चलना भी चाहिए क्योंकि माना जाता है कि ऐसा करने से प्रगति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। कई स्थानों पर गोपाष्टमी के अवसर पर गायों की उपस्थिति में प्रभातफेरी और सत्संग के कार्यक्रम भी संपन्न होते हैं और अन्नकूट भंडारे का आयोजन किया जाता है। गोपाष्टमी पर्व की पूर्व संध्या पर कई मंदिरों में सत्संग-भजन का आयोजन भी किया जाता है। गोपाष्टमी पूजन बहुत पुण्यदायी माना जाता है और गो सेवा करने से जीवन धन्य हो जाता है।


महात्मा गांधी की दृष्टि में गौ रक्षा का महत्व

महात्मा गांधी की दृष्टि में गौ रक्षा का महत्व


गाय भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। हमारे देश का संपूर्ण राष्टजीवन गाय पर आश्रित है। गौमाता सुखी होने से राष्ट सुखी होगा और गौ माता दुखी होने से राष्ट के प्रति विपत्तियां आयेंगी, ऐसा माना जा सकता है।

गाय को आज व्यावहारिक उपयोगिता के पैमाने पर मापा जा रहा है किंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आधुनिक विज्ञान की सीमाएं हैं। आज का विज्ञान गाय की सूक्ष्म व परमोत्कृष्ट उपयोगिता के विषय में सोच भी नहीं सकता। भारतीय साधु, संत तथा मनीषियों को अपनी साधना के बल पर गाय की इन सूक्ष्म उपयोगिताओं के बारे में ज्ञान प्राप्त किया था। इसलिए ही उन्होंने गाय को गौमाता कहा था। भारतीय शास्त्रों में गौ महात्म्य के विषय में अनेक कथाएं मिलती हैं।

गाय का सांस्कृतिक व आर्थिक महत्व है। संक्षेप में कहा जाए तो भारतीय ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का आधार गाय ही है। गाय के बिना भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कल्पना तक नहीं की जा सकती।

महात्मा गांधी एक मनीषी थे। वह भारतीयता के प्रबल पक्षधर थे। उनका स्पष्ट मत था कि भारत को पश्चिम का अनुकरण नहीं करना चाहिए। भारत को अपनी संस्कृति. विरासत व मूल्यों के आधार पर विकास की राह पर आगे बढना चाहिए। गांधी जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिन्द स्वराज में लिखा है – अंग्रेजों के विकास माडल को अपनाने से भारत, भारत नहीं रह जाएगा और भारत सच्चा इंगलिस्तान बन जाएगा।

गांधी जी का यह स्पष्ट मानना था कि देश में ग्राम आधारित विकास होने की आवश्यकता है। ग्राम आधारित विकास के लिए भारत जैसे देश में गाय का कितना महत्व है, उनको इस बात का अंदाजा था। गांधी जी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व कहा है। गांधी जी कहते थे कि जो हिन्दू गौ रक्षा के लिए जितना अधिक तत्पर है वह उतना ही श्रेष्ठ हिन्दू है। गौरक्षा के लिए गांधी जी किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे।

महात्मा गांधी ने गाय को अवमानवीय सृष्टि का पवित्रतम रुप बताया है। उनका मानना था कि गौ रक्षा का वास्तविक अर्थ है ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा। उन्होंने 1921 में यंग इंडिया पत्रिका में लिखा “ गाय करुणा का काव्य है। यह सौम्य पशु मूर्तिमान करुणा है। वह करोड़ों भारतीयों की मां है। गौ रक्षा का अर्थ है ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा। प्राचीन ऋषि ने, वह जो भी रहा हो, आरंभ गाय से किया। सृष्टि के निम्नतम प्राणियों की रक्षा का प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईश्वर ने उन्हें वाणी नहीं दी है। ” ( यंग इंडिया, 6-11-1921)

गांधी जी ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में लिखा – “ गाय अवमानवीय सृष्टि का पवित्रतम रुप है। वह प्राणियों में सबसे समर्थ अर्थात मनुष्यों के हाथों न्याय पाने के वास्ते सभी अवमानवीय जीवों की ओर से हमें गुहार करती है। वह अपनी आंखों की भाषा में हमसे यह कहती प्रतीत होती है : ईश्वर ने तुम्हें हमारा स्वामी इसलिए नहीं बनाया है कि तुम हमें मार डालो, हमारा मांस खाओ अथवा किसी अन्य प्रकार से हमारे साथ दुर्वव्यहार करो, बल्कि इसलिए बनाया है कि तुम हमारे मित्र तथा संरक्षक बन कर रहो।” ( यंग इंडिया, 26.06.1924)

महात्मा गांधी गौ माता को जन्मदात्री मां से भी श्रेष्ठ मानते थे। गौ माता निस्वार्थ भाव से पूरे विश्व की सेवा करती है। इसके बदले में वह कुछ भी नहीं मांगती। केवल जिंदा रहने तक ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी वह हमारे काम में आती है। अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहीं देखने को मिलता है तो वह गौ माता है।

गांधी जी लिखते हैं – “ गोमाता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है। हमारी माता हमें दो वर्ष दुग्धपान कराती है और यह आशा करती है कि हम बडे होकर उसकी सेवा करेंगे। गाय हमसे चारे और दाने के अलावा किसी और चीज की आशा नहीं करती। हमारी मां प्राय: रुग्ण हो जाती है और हमसे सेवा करने की अपेक्षा करती है। गोमाता शायद ही कभी बीमार पडती है। गोमाता हमारी सेवा आजीवन ही नहीं करती, अपितु अपनी मृत्यु के उपरांत भी करती है। अपनी मां की मृत्यु होने पर हमें दफनाने या उसका दाह संस्कार करने पर भी धनराशि व्यय करनी पडती है। गोमाता मर जाने पर भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होती है जितनी अपने जीवन काल में थी। हम उसके शरीर के हर अंग – मांस, अस्थियां. आंतें, सींग और चर्म का इस्तमाल कर सकते हैं। ये बात हमें जन्म देने वाली मां की निंदा के विचार से नहीं कह रहा हूं बल्कि यह दिखाने के लिए कह रहा हूं कि मैं गाय की पूजा क्यों करता हूं। ”( हरिजन , 15.09-1940)

गांधीजी गौ रक्षा के लिए संपूर्ण विश्व का मुकाबला करने के लिए तैयार थे। 1925 में यंग इंडिया में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है – “ मैं गाय की पूजा करता हूं और उसकी पूजा का समर्थन करने के लिए दुनिया का मुकाबला करने को तैयार हूं। ” – (यंग इंडिया, 1-1-1925)

गांधीजी का मानना था कि गौ हत्या का कलंक सिर्फ भारत से ही नहीं बल्कि पूरे देश से बंद होना चाहिए। इसके लिए भारत से यह कार्य शुरु हो, यह वह चाहते थे। उन्होंने लिखा है – “ मेरी आकांक्षा है कि गौ रक्षा के सिद्धांत की मान्यता संपूर्ण विश्व में हो। पर इसके लिए यह आवश्यक है पहले भारत में गौवंश की दुर्गति समाप्त हो और उसे उचित स्थान मिले ” – (यंग इंडिया, 29-1-1925)

आर्थिक दृष्टि से लाभदायक न होने वाले पशुओं की हत्या की जो परंपरा पश्चिम में विकसित हुई है गांधी जी उसकी निंदा करते थे। गांधीजी उसे ‘हृदयहीन व्यवस्था’ कहते थे। उन्होंने बार-बार कहा कि ऐसी व्यवस्था का भारत में कोई स्थान नहीं है। इस बारे में उन्होंने एक बार हरिजन पत्रिका में लिखा। गांधीजी की शब्दों में – “ जहां तक गौरक्षा की शुद्ध आर्थिक आवश्यकता का प्रश्न है, यदि इस पर केवल इसी दृष्टि से विचार किया जाए तो इसका हल आसान है। तब तो बिना कोई विचार किये उन सभी पशुओं को मार देना चाहिए जिनका दूध सूख गया है या जिन पर आने वाले खर्च की तुलना में उनसे मिलने वाले दूध की कीमत कम है या जो बूढे और नाकारा हो गए हैं। लेकिन इस हृदयहीन व्यवस्था के लिए भारत में कोई स्थान नहीं है , यद्यपि विरोधाभासों की इस भूमि के निवासी वस्तुत: अनेक हृदयहीन कृत्यों के दोषी हैं। ” (हरिजन ,31.08. 1947)


महात्मा गांधी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व कहा है। गौ के महात्म्य के बारे में उन्होंने लिखा है – हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व गोरक्षा है। मैं गोरक्षा को मानव विकास की सबसे अदभुत घटना मानता हूं। यह मानव का उदात्तीकरण करती है। मेरी दृष्टि में गाय का अर्थ समस्त अवमानवीय जगत है। गाय के माध्यम से मनुष्य समस्त जीवजगत के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है। गाय को इसके लिए क्यों चुना गया, इसका कारण स्पष्ट है। भारत में गाय मनुष्य की सबसे अच्छी साथिन थी। उसे कामधेनु कहा गया। वह केवल दूध ही नहीं देती थी, बल्कि उसी के बदौलत कृषि संभव हो पाई। ” – (यंग इंड़िया, 6.10.1921)

महात्मा गांधी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म के संरक्षण के साथ जोडा है। उनके शब्दों में – गो रक्षा विश्व को हिन्दू धर्म की देन है। हिन्दू धर्म तब तक जीवित रहेगा जब तक गोरक्षक हिन्दू मौजूद है। ”- (यंग इंड़िया, 6.10.1921)

अच्छे हिन्दुओं को हम कैसे परखेंगे। क्या उनके मस्तक से, तिलक से या मंत्रोच्चार से। गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि गौ रक्षा की योग्यता ही हिन्दू होने का आधार है। गांधी जी के शब्दों में – “ हिन्दुओं की परख उनके तिलक, मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, तीर्थयात्राओं तथा जात -पात के नियमों के अत्यौपचारिक पालन से नहीं की जाएगी, बल्कि गाय की रक्षा करने की उनकी योग्यता के आधार पर की जाएगी। ” (यंग इंडिया . 6.10.1921)

गांधी जी के उपरोक्त विचारों से स्पष्ट है कि बापू गौ रक्षा को कितना महत्वपूर्ण मानते थे। लेकिन इसे त्रासदी ही कहना चाहिए कि गांधी के देश में गौ हत्या धडल्ले से चल रही है। महात्मा गांधी के विचारों की हत्या कर दी गई है। आवश्यकता इस बात की है कि गांधी जी के विचारों के आधार पर, भारतीय शाश्वत संस्कृति व परंपराओं के आधार पर भारतीय व्यवस्था को स्थापित किया जाए और गौ माता की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं, तभी गांधीजी के सपनों का राम राज्य स्थापित हो पाएगा।