मंदिर-मस्जिद दूर है, कठिन जाप हरि नाम्।
श्री चरणों में गाय के, बसते चारों धाम्॥
हमारे समाज में लोग अक्सर ईश्वर की खोज मंदिरों और मस्जिदों में करते हैं। वे कठिन साधनाएँ, जटिल अनुष्ठान और कठोर तपस्या को ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग मान लेते हैं। परंतु यह दोहा हमें बताता है कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए केवल कठिन जाप ही आवश्यक नहीं है। सच्ची भक्ति सरलता, करुणा और सेवा में निहित है।
भारतीय संस्कृति में गाय को ‘माता’ कहा गया है। वह केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवनदायिनी है। उसका दूध, गोबर, मूत्र—सब हमारे जीवन और पर्यावरण के लिए उपयोगी हैं। यही कारण है कि गाय को धर्म, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का आधार माना गया है।
चार धाम—बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथपुरी और रामेश्वरम्—हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। परंतु इस दोहे में कहा गया है कि वे सभी धाम श्रीहरि के चरणों में गाय के रूप में विराजमान हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि हम गाय की सेवा करते हैं, तो वही चार धाम की यात्रा के समान पुण्य प्रदान करती है।
इस दोहे का मूल संदेश है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप करुणा, सेवा और संरक्षण में है। गाय की सेवा करना, उसे सम्मान देना, उसके जीवन की रक्षा करना—यह सब ईश्वर की सच्ची भक्ति है।
आज के समय में जब पर्यावरण संकट और सामाजिक विघटन बढ़ रहा है, तब यह दोहा हमें पुनः याद दिलाता है कि हमें प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। गाय केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी है।
अतः, मंदिर-मस्जिद की दूरी और कठिन जाप से अधिक महत्वपूर्ण है करुणा और सेवा। यदि हम गाय की रक्षा करें, उसकी सेवा करें, तो वही ईश्वर की सच्ची उपासना है। यही भारतीय संस्कृति का सार है—**“सर्वे भवन्तु सुखिनः”**।