शनिवार, 19 दिसंबर 2020

गायों के भरण पोषण का भार ठाकुर जी ने हम मनुष्यों को सौंपा है


गायों के भरण पोषण का भार ठाकुर जी ने हम मनुष्यों को सौंपा है इससे हम पल्ला नहीं झाड़ सकते

 🚣🏻‍♀️ एक मल्लाह नाविक नाव खेकर अपने एवं अपने परिवार का भरण पोषण करता था एक बार बारिश के मौसम में उसको कुछ परदेसी यात्रियों को नदिया के पार पहुंचाना था परदेसियों ने मौसम का रुख देखकर उस पार जाने में असमर्थता व्यक्त की लेकिन नाविक ने उन्हें कुशलतापूर्वक उस पार पहुंचाने का आश्वासन देकर अपनी नाव में बिठा लिया जैसे ही नाव बीच धार में पहुंची तेज हवाएं चलने लगी जिस से नाव में भय का वातावरण निर्मित हो गया नाविक को लग गया था कि आज नाव नहीं बच पाएगी इतने यात्रियों के जीवन का भार मेरे ऊपर है अब क्या करूं जब मेरे ही प्राण खतरे में है जैसे तैसे  मैं अपने प्राण तो बचाऊ यह सोचकर उसने यात्रियों से कहा कि अपने अपने प्राण बचाओ मैं तो चला और यह कह कर उसने नदी में छलांग लगा दी मल्लाह के नदी में कूदने से यात्री और ज्यादा भयभीत हो गए थोड़ी देर में तेज बारिश शुरू हो गई और मल्लाह सहित सारे के सारे यात्री नदी में डूब कर मर गए यह प्रकरण जब यमराज के पास पहुंचा तो यमराज ने इस घटना को संज्ञान में लेकर चित्रगुप्त से पूछा की बताओ चित्रगुप्त इतने जनों की मृत्यु का पाप किसके सिर पर मढ़ा जाए चित्रगुप्त ने न्यायोचित विचार कर उत्तर दिया कि यह पाप इस मल्लाह के सिर पर ही मढा जाना चाहिए इस पर मल्लाह ने  गिड़गिड़ा कर अनुनय विनय करते हुए कहा कि महाराज मेरे लाख प्रयत्न करने पर भी नाव को मैं बचा नहीं पाता इसलिए मैं अपने प्राण बचाने के लिए नदी में कूद गया इसमें मेरी क्या गलती है तब यमराज ने कहा इसमें सारी गलती तुम्हारी है जैसे ही तुमने इन यात्रियों को अपनी नाव में बिठाया इन सबके प्राणों का भार तुम्हारे ऊपर आ गया था तुम्हारा नैतिक कर्तव्य बनता था की इनके प्राणों की रक्षा करते लेकिन इनकी प्राण रक्षा की थोड़ी सी भी कोशिश किए बिना ही तुम यह समझ कर पानी में कूद गए की अब बचना मुश्किल है अगर तुम नाव को तूफान से बचाने की कोशिश में मारे जाते तो तुम्हारा कोई दोष नहीं होता किंतु दूसरे के प्राणों का भार तुम्हारे ऊपर होने पर भी  तुमने अपने कर्तव्य को नहीं समझा और स्वयं के प्राण बचाने के चक्कर में तुमने इन सबके जीवन के साथ खिलवाड़ किया अतः इन सारे यात्रियों की अकाल मृत्यु का पाप तुम्हारे सिर पर मढा जाकरतुम्हें घोर यम यातना का दंड दिया जाता है भैया यह कहानी तो यहीं समाप्त हो गई लेकिन इस कहानी में एक संदेश छुपा हुआ है  कि हम मनुष्यों को धरती पर गौ माता के भरण पोषण का भार ठाकुर जी ने सौंपा है लेकिन आज हम अपनी स्वार्थ पूर्ति के वशीभूत होकर इस उत्तरदायित्व से उस मल्लाह की तरह ही विमुख होकर गौ माता को  मौत के मुंह में डाल रहे हैं जरा सोचिए जब हम भगवान के यहां जाएंगे और भगवान हमसे यह पूछेंगे कि मैंने जो तुम्हें गौ माता के भरण पोषण का भार तुम्हें सौंपा था तुमने तो गौ माता को जीते जी स्वयं की स्वार्थ सिद्धि के वशीभूत होकर मार दिया भाइयों इस पाप से हम बच नहीं सकते इसलिए हमारा यह नैतिक कर्तव्य बनता है की इस संसार में रहते हुए हमारे आस पड़ोस में जो भी गऊ माता भूखी प्यासी घूम रही है  उन्हें कभी भी भूख से बीमारी से मरने नहीं देना है क्योंकि भगवान के घर में जब न्याय होगा तो इसके जिम्मेदार उस मल्लाह की तरह हम ही ठहराए जाएंगे 

जय गौ माता जय गोपाल

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

'गोसेवा' भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है

'गोसेवा' भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है, गाय का महत्व 'गौ-सेवा' शब्द से ही प्रकट होता है क्योंकि सेवा के दो प्रधान कारण हैं, एक तो हम बिना उपयोग किसी की सेवा नहीं करते और दूसरा यदि बिना सेवा किए हुए किसी का उपयोग करेंगे तो वह गुनाह होगा। गाय का उपयोग तो स्वतः प्रकट है, जन्म काल से लेकर मृत्यु पर्यन्त किसी न किसी रूप में मनुष्य गाय के प्रति ऋणी रहता ही है और यह ऋण तभी चुकाया जा सकता है जब हम गो-वंश को विकसित करें, गाय की मजबूत बछड़े देने की शक्ति को बढ़ाएं, उसकी दूध देने की शक्ति में वृद्धि करें। हृष्ट-पुष्ट गायों का दूध भी स्वास्थ्यवर्धक होगा। मजबूत बैल ही हमारे खेत भली प्रकार से जोत सकते हैं। हमारी गौ-सेवा का यह अर्थ नहीं है कि जब तक गौ हमें दूध दे तभी तक हम उसका ध्यान रखें और बूढ़ी हो जाने पर उसे मरने के लिए छोड़ दें। यह तो एक निकृष्ट सेवा है। गाय को उचित समय पर उचित मात्रा में चारा-पानी देना, उसके रहने की अच्छी व्यवस्था करना, काम लेने में ज्यादती न करना, उसके सुख-दुख का ध्यान रखना और बूढ़ी हो जाने पर उसको मरने तक खाना देना, इतनी बातें गौ-सेवा में आती हैं इस प्रकार की नीति के द्वारा हम गो वंश की वृद्धि और गो-वध कतई बन्द करना चाहते हैं प्राचीन संस्कृति को कायम रखने के लिए और मनुष्यत्व की रक्षा के लिए जिस गाय ने जीवन भर मनुष्य मात्र की सेवा की उसका बुढ़ापे में वध करना किसी को मंजूर नहीं हो सकता, गाय से हमारा मतलब गाय, बैल, बछड़े, बछड़ी अर्थात् पूरे गो-वंश से है।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

गौ के समान उपकारी जीव मनुष्य के लिये दूसरा कोई भी नहीं है

गौ के समान उपकारी जीव मनुष्य के लिये दूसरा कोई भी नहीं है
(परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानंदजी महाराज)
ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिद्र्यौः समुद्रा समँसरः।
इन्द्र पृथिव्यै वर्षीयान् गोस्तु मात्रा न विद्यते।। (यजुर्वेद 23/48)
जिस ब्रह्मविद्या द्वारा मनुष्य परम सुख को प्राप्त करता है, उसकी सूर्य से उपमा दी जा सकती है। इसी प्रकार द्युलोक की समुद्र से तथा विस्तीर्ण पृथ्वी की इन्द्र से उपमा दी जा सकती है। किन्तु प्राणी मात्र के अनन्त उपकारों को अकेली सम्पन्न करने वाली गौ की किसी से उपमा नहीं दी जा सकती गो निरूपमा है, वास्तव में मनुष्य के लिये गौ के समान उपकारी जीव दूसरा कोई भी नहीं है।
अतएव सभी मानवों को गोमाता की सेवा करने के लिये वेद भगवान का आदेश हुआ। जो व्यक्ति सब प्रकार से अपना कल्याण चाहता हो वह वेद भगवान के आदेश का पालन करे।
 श्रुती स्मृति के प्रमाणानुसार पूज्या गोमाता साक्षात सर्वदेव विग्रह है। पूज्या गोमाता की सेवा से, स्मरण से, उनके सान्ध्यि से तथा पंचगव्य सेवन से मानव में देवत्व का अवतरण होता है। क्योंकि पूज्या गोमाता सत्व का समुद्र है। मन, वाणी तथा कर्म से गोमाता की सेवा करने वाला व्यक्ति पृथ्वी का साक्षात देवता हो जाता है। सत्व से ही देवत्व का निर्माण होता है। मानव का आहार शुद्ध ऊर्जावान एवं सत्व युक्त हो तो मानव देव कोटी प्राप्त कर सकता है। एक मात्र पूज्या गोमाता ही मानव जाति को ऐसा पवित्रतम, ऊर्जावान दिव्य आहार प्रदान कर सकती है।