शुक्रवार, 31 अगस्त 2018

गाय गौ –रक्षा का वैज्ञानिक पक्ष

गाय गौ –रक्षा का वैज्ञानिक पक्ष
यदि सिर्फ ऐतिहासिक, आर्थिक तथा वैज्ञानिक पक्ष भी देखा जाए तो ‘गाय’ भारत ही नहीं दुनिया के लिए बहुत उपयोगी जीव सिद्ध होती है।
आज मै ‘गाय’ के इतिहास पर थोडा प्रकाश डालना चाहता हूँ तथा ‘गाय’ के विषय में कुछ तथ्यों को यहाँ प्रस्तुत करना चाहता हूँ |
‘गाय’ – यह एक ऐसा शब्द है जिससे भारत के कई लोगों की आस्था जुडी हुई है | सदियों से इस भूमि पर गाय का सम्मान तथा रक्षा होते आये हैं | यह इस हद तक भारत के लोगों के मन में बसी हुई है की मुगलों तक को कई बार अपना राज्य बचाने के लिए ‘गौ-हत्या’ प्रतिबंधित करनी पड़ी थी | यही नहीं अंग्रेजों के समय भी प्रथम क्रांति गाय के प्रश्न पर ही हुई थी | पर बाद में अंग्रेजों ने इसी गाय को इस कदर अपने पाठ्यक्रम में बदनाम किया की आज कई भारतीय ‘गाय’ की हत्या तथा इसे भोजन के रूप में ग्रहण करने की वकालत करते हैं |  कुछ महीनो पहले ही केरला में कांग्रेस के कार्यकर्ताओं ने सरेआम सड़क पर गाय को काटकर तथा उसका मॉस पकाकर लोगों में बांटा था  | इसके अगले ही दिन आई.आई.टी. मद्रास में ५० छात्रों ने गाय का मॉस खाने की पार्टी आयोजित करी , जिसमे सभी को गौ मॉस परोसा गया | [i] यह इस बात के विरोध में था के भारत सरकार ने गाय को काटने और बेचने पर रोक क्यों लगाईं | कई वामपंथी लोगों का मानना है के यह उनके खाने के मामले में दखल देना है |
अब समझ नहीं आता के जिस देश में कई तरह की जलवायु तथा लाखो तरह के पकवान एवं सब्जियां हर राज्य में होती हों वहां सिर्फ गाय को खाकर ही भूख मिटाने की जिद कहाँ तक जायज़ है, और वो भी तब जब देश की आधे से ज्यादा आबादी गाय को ‘माँ’ और इश्वर का दर्जा देती हो | यह सब एक विशेष प्रकार की नफरत की राजनीति के लिए किया जा रहा है जिसमे वामपंथी हर वो काम करने के लिए खड़े हो जाते हैं जिसमे हिन्दू धर्म का अपमान होता हो , क्योंकि वामपंथी विचारधारा के मूल में ही यह है के ‘धर्म एक अफीम की तरह है’ तथा धर्म को समाप्त कर देना चाहिए | हालाँकि कार्ल मार्क्स ने वहां रिलिजन शब्द का प्रयोग किया था जो असल में धर्म नहीं है मगर हिन्दुस्तान के वामपंथी धर्म और रिलिजन दोनों को एक ही समझ बैठे , शायद यह उनकी राजनीति चमकाने के लिए उन्हे उचित लगा होगा | ‘गाय’ जो हर थोड़े दिन में कहीं ना कहीं से मीडिया के निशाने पर आ ही जाती है, आज मै  इसके इतिहास पर थोडा प्रकाश डालना चाहता हूँ तथा ‘गाय’ के विषय में कुछ तथ्यों को यहाँ प्रस्तुत करना चाहता हूँ |

अंग्रेजों के समय में रोबर्ट क्लाइव ने सब यह पता लगवाया के भारत की कृषि का मूल क्या है तो पता चला के कृषि की सफलता का मूल ‘गाय’ है |

जैसा की हम सभी जानते हैं के भारत १७वी शताब्दी तक दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक था तथा भारत को सोने की चिड़िया कहा जाता था | यही नहीं भारत का निर्यात भी दुनिया में अत्यधिक मात्रा में होता था | उस समय भारत मसाले, अनाज, कपडे, लकड़ी का सामान इत्यादि कई वस्तुएं दुनिया भर के बाज़ार में बेचता था | अर्थशास्त्र के सभी विद्यार्थी जानते हैं के प्राइमरी सेक्टर से वस्तुए बनती है , फिर द्वितीय चरण में बिकती है तथा तीसरे चरण में उनकी सेवाए प्रदान की जाती है | अतः सबसे आवश्यक होता है प्राइमरी या प्राथमिक क्षेत्र जहाँ से कच्चा माल तैयार होता है | भारत की अधिकतर जनता उस समय कृषि करती थी जिससे सबसे अधिक अनाज, मसाले तथा कपास इत्यादि बनता था तथा इसी कारण लोग भी भूखें नहीं मरते थे एवं भारत का निर्यात भी इतना अधिक था | अंग्रेजों के समय में रोबर्ट क्लाइव ने सब यह पता लगवाया के भारत की कृषि का मूल क्या है तो पता चला के कृषि की सफलता का मूल ‘गाय’ है | गाय के गोबर से ‘खाद’ तथा इसके गौ-मूत्र से ‘कीटनाशक’ बन जाया करता था तथा बैल के द्वारा हल जोतकर खेती कर ली जाती थी | यही नहीं किसान के बच्चों तथा परिवार को गाय का दूध तथा इससे बने दही, लस्सी , छाछ , मक्खन इत्यादि खाने को मिलते थे जिसके कारण कोई कुपोषित नहीं होता था और किसी को भूखा नहीं रहना पड़ता था | यही नहीं फसल काटने पर नीचे का बचा हुआ हिस्सा गाय का चारा बन जाता था तथा ऊपर का अनाज या फसल किसान अपने प्रयोग में लेकर बाकी बेच दिया करता था | इस तरह से भारत के लाखो गाँवों से प्राथमिक क्षेत्र से कच्चा माल तैयार हो जाता था फिर उससे सामान बनाकर जैसे (मसाले, कपडे इत्यादि ) दुनिया भर में बेचा जाता था | इस तरह भारत ना सिर्फ आत्मनिर्भर था बल्कि सोने की चिड़िया भी बना |
रोबर्ट क्लाइव ने १७६० में भारत की कृषि व्यवस्था और भारत के व्यापार को खत्म करने के लिए कलकत्ता में पहले गौ-कत्लखाना खुलवाया| यह इतना बड़ा था के इसमें एक दिन में ३०,००० गाय काटी जाती थी | [ii] इसके बाद भारत की कृषि व्यवस्था और किसानो के हालात बद्दतर होते चले गए | गायों को काटने के साथ साथ अंग्रेजों ने किसानो पर ५० से ९० प्रतिशत तक के कर भी थोप दिए जिससे स्थिति और बिगडती चली गयी |   [iii] यही नहीं अंग्रेजो ने बाद में खाद के नाम पर अपनी इंडस्ट्री का बचा हुआ यूरिया और फॉस्फेट भारत में बेचना शुरू कर दिया तथा बहुत मुनाफा कमाया | अब किसानो को खाद, कीटनाशक के पैसे देने पड़ गए तथा बिना गौ के बंगाल में खेती बहुत मुश्किल हो गयी जिसके कारण बाद में बंगाल में अकाल भी पड़े जिसमे अंग्रेजो ने जो थोडा बहुत अनाज उत्पन्न हुआ था उस अनाज को अपनी सेना को दे दिया था और किसानो को मरने छोड़ दिया था | यहाँ तक के विश्वयुद्ध के समय जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री चर्चिल से पत्रकार ने अनाज की कमी के कारण किसानो के भूखे मरने की बात कही तो उन्होंने जवाब दिया के ‘यदि भारत के लोग भूखे मर रहे हैं तो गांधी अब तक क्यों नहीं मरा’ | [iv] इस तरह अंग्रेजों ने अपने देश के व्यापार को आगे बढाने के लिए भारत की कृषि व्यवस्था और उस पर टिके समस्त व्यापार को समाप्त कर डाला जिसके कारण आज तक कई किसान आत्महत्या कर रहे हैं तथा अभाव में जीवन जी रहे हैं | सिर्फ ‘गाय’ के कारण भारत की कृषि और कृषि आधारित अर्थव्यवस्था इतनी समृद्ध थी तथा गाँव गाँव में दूध दही की नदियाँ बहने के कारण कोई कुपोषण तथा भूख से नहीं मरता था | यही नहीं भगवान् कृष्ण की गाय चराते थे और उसके दूध का मक्खन बड़े चाव से खाते थे | इस तरह गौ तथा गौ वंश पूरे भारत के समाज में रचा बसा था इसीलिए भारत के समाज में गाय को माँ का दर्जा दिया गया था क्योंकि माँ कभी बच्चो को भूखा नहीं मरने देती और इसी कारण कई साम्राज्यों में गाय अवध्य थी जैसे :
बुद्ध, जैन तथा सिक्ख मतों की पुस्तकों में गाय की हत्या पर निषेध लगाया गया है |

दक्षिण भारत के चोला राजा मनु नीतिचोला ने अपने पुत्र को मृत्युदंड सुनाया था क्योंकि एक गाय ने उनके राज्य में न्याय का घंटा बजाया था, जिससे पता चला था के उसका बछड़ा राजकुमार के रथ के नीचे कुचल कर मर गया था  | [v]

सिख साम्राज्य के समय राजा रणजीत सिंह ने अपने यहाँ गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगा दिया था |[vi]

यहाँ तक के हैदर अली ने अपने राज्य के समय गाय काटने वाले के हाथ काट देने का नियम बनाया था |[vii]

अकबर तथा जहाँगीर ने भी इनके समय में कुछ जगहों पर गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाया था [viii] तथा बहादुर शाह जफ़र ने भी इनके कब्जे वाले इलाकों में १८५७ में गौ हत्या निषेध के आदेश दिए थे |[ix]

मराठा साम्राज्य के समय भी गौ हत्या पर इनके साम्राज्य में पूर्णतः प्रतिबन्ध था तथा गाय काटने वालों को कठोर सजा का नियम था जो पेशवा के समय तक भी कायम था |

आज भी भारत में कई गौशालाएं हैं जहाँ जैविक कृषि गाय के गोबर तथा गो मूत्र से की जा रही है जिससे लोगों को जहरीले कीटनाशक डले हुए अनाज से मुक्ति मिल रही है

यही नहीं आज़ादी का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम भी मंगल पांडे द्वारा गाय की चर्बी से बने कारतूस ना चलाने को लेकर ही किया गया था | तथा महात्मा गांधी, लोकमान्य तिलक, लाला लाजपत राय, मदन मोहन मालवीय आदि भी आजादी के आन्दोलन में लोगों से यही कहते थे के स्वतंत्रता मिलने पर सबसे पहला कार्य गौ हत्या पर प्रतिबन्ध लगाने का करेंगे |[x]मगर अफ़सोस आज़ादी के बाद गौ कतलखानो की संख्या ३६००० तक पहुँच गयी | यही नहीं भारत के लोग खुद अंग्रेजी शिक्षा पढ़कर तथा वामपंथ के प्रभाव में आकर गाय काटने और गाय खाने की बात करने लगे |
आज भी भारत में कई गौशालाएं हैं जहाँ जैविक कृषि गाय के गोबर तथा गो मूत्र से की जा रही है जिससे लोगों को जहरीले कीटनाशक डले हुए अनाज से मुक्ति मिल रही है तथा किसानो को ट्रक्टर तथा डीजल पेट्रोल का खर्चा भी नहीं उठाना पड रहा क्योंकि बैल खेत जोतने में काम आ जाते हैं | महाराष्ट्र के कोल्हापुर के शेल्केवाडी [xi] गाँव में हर घर में गाय के गोबर से बनने वाली गोबर गैस से सारा खाना पकाया जाता है अतः यह गाँव एल.पी.जी. से भी मुक्त हो गया है | यही नहीं गाय के गोबर से बनी गैस को सिलिंडर में भरके लोग गाड़ियाँ तक चलाने की तकनीक आज विकसित कर चुके हैं |[xii]
इन सब विशेषताओं के साथ साथ प्राचीन आयुर्वेद में गाय के पंचगव्य तथा गौमूत्र से कई बीमारियाँ ठीक करने का वर्णन है | अतः देसी गाय के गौमूत्र तथा पंचगव्य से आज पथमेड़ा , जड़खोर ,गौ विज्ञानं अनुसंधान केंद्र नागपूर ,पतंजलि , आर्ट ऑफ़ लिविंग तथा कई गौशालाएं एवं आयुर्वेद और सिद्धा के आचार्य कई तरह की दवाये बना रहे हैं तथा इससे बहुत से बड़े एवं असाध्य रोगों का इलाज भी इन्होने कर के दिखाया है |[xiii] पथमेड़ा ,महर्षि वाङ्ग्भट गौशाला वालाजाबाद , रामदेव बाबा तथा गायत्री परिवार के गाय के कई उत्पादों एवं औषधियों पर बहुत से शोध भी हुए हैं जिनके आधार पर वैज्ञानिक तौर पर यह कहा जा सकता है के गौ मूत्र तथा पंचगव्य एक प्रमाणिक औषधि है |[xiv] इसके अलावा गाय के घी से किये गए अग्निहोत्र यज्ञ से वायु से जहरीली गैस हटाकर उसे शुद्ध करने के प्रयोग तो जापान के हिरोशिमा, नागासाकी तथा भोपाल में गैस त्रासदी के बाद किये ही जा चुके हैं | यज्ञ का अपना एक पूरा विज्ञान हिन्दू धर्म के कई शास्त्रों में भरा पड़ा है |

इस पूरे लेख में मैंने गाय में ३३ कोटि देवी देवता का वास तथा गाय के धार्मिक पक्ष की तो बात ही नहीं की है क्योंकि कुछ अंग्रेजी तथा विज्ञान पढ़े हुए लोगों को धर्म की बाते समझ नहीं आएँगी | मगर यदि सिर्फ ऐतिहासिक, आर्थिक तथा वैज्ञानिक पक्ष भी देखा जाए तो ‘गाय’ भारत ही नहीं दुनिया के लिए बहुत उपयोगी जीव सिद्ध होती है | शायद इसीलिए अमेरिका गौ मूत्र पर पेटेंट करवा रहा है तथा ब्राजील गिर गाय की नस्ल को बढ़ा रहा है | पर भारत के अंग्रेजी तथा वामपंथी दिमाग के लोगों को यदि सिर्फ विरोध के लिए विरोध करना है तो इनके लिए कुछ नहीं किया जा सकता क्योंकि –

‘उस व्यक्ति को जगाया जा सकता है जो नींद में हो मगर जो सोने का नाटक कर रहा हो उसे नहीं जगाया जा सकता’


मंगलवार, 21 अगस्त 2018

भारतीय गोवंश में है विश्व का सर्वोत्तम दूध..

दुनियाभर में #दूध की शुद्धता की मिसाल बनी #भारतीय #दुधारू संपदा पर ग्रहण लग चुका है।

मवेशियों की दर्जनों प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। सिंथेटिक #दूध का प्रचलन, हरे चारों की कमी एवं पशु कटान की वजह से पोषण की #गंगा का स्रोत सूखने लगा है।
दूध बढ़ाने के नाम पर #भारतीय नस्लों के साथ #विदेशी नस्लों की घोलमेल ने #अमृत को भी कठघरे में खड़ा कर दिया है। #न्यूजीलैंड में प्रोफेसर #डा. वुडफोर्ड ने शोध पत्र में साफ किया है कि #भारत की सभी #गायों में बीटा कैसिन-दो पाया जाता है, जिसमें #स्वास्थ्य एवं बुद्धिवर्धक समस्त गुणधर्म हैं। दर्जनों रोगों को समूल नष्ट करने की प्रवृत्ति का #वैज्ञानिक आधार पर सत्यापन किया जा चुका है।
वैदिक मान्यता के मुताबिक, #भारतीय #गोवंश समुद्र मंथन से उत्पन्न हुआ, इसी वजह से जंगली प्रवृत्ति से दूर रहा। #दूध की गुणवत्ता के वैज्ञानिक आंकलन में भी #भारतीय #गोवंश की प्रामाणिकता सिद्ध हुई है।
न्यूजीलैंड के डा. कीथ वुडफोर्ड ने #एशिया एवं #यूरोपीय नस्लों पर शोध कर निष्कर्ष निकाला कि प्राचीन काल में #यूरोपीय नस्ल की गायों में म्यूटेशन होने की वजह से #दूध में बीटा कैसिन ए-दो खत्म हो गया और इसकी जगह बीटा कैसिन-एक नामक विषाक्त प्रोटीन बनने लगा, जबकि #भारतीय नस्लों में म्यूटेशन न होने से #दूध की गुणवत्ता बनी रही। #उत्तर प्रदेश मेरठ में 1200 डेयरियों में से उत्पादित करीब 20 लाख लीटर दूध में से 60 फीसदी का उत्पादन #गायों से होता है। कई केन्द्रों में गाय के दूध से जुड़े उत्पादों को भी बनाया जा रहा है।
विदेशी नस्ल के #दूध में अफीम !!
अमेरिका में हुए शोध के मुताबिक #विदेशी नस्ल की #गायों में बीटा कैसिन ए-एक नामक दुग्ध प्रोटीन पाया जाता है, जिसे #अफीम जैसा #जहरीला बताया गया। इस #दूध का प्रोटीन पाचन के मध्य एक उत्पाद बनाता है जो #पाचन से पहले ही रक्तप्रवाह में मिल जाता है, #जिससे हृदय रोग, शुगर, कैंसर, सिट्जनोफ्रेनिया, एवं अन्य कई जानलेवा #बीमारियां बनती हैं। द डेविल इन मिल्क नामक किताब में साफ किया गया है कि ए-दो प्रकार के #दूध का प्रयोग ही मानव #स्वास्थ्य के लिए #उत्तम है। #अमेरिका एवं #न्यूजीलैंड की #कंपनियां जेनेटेकली टेस्टेड ए-दो दूध बाजार में उपलब्ध करवा रही हैं।
क्या कहते हैं वैज्ञानिक…???
भारतीय पशुओं की नस्लीय विशेषता हमेशा सम्मान का पात्र रही है। #गोवंश के मूत्र में रेडियोधर्मिता सोखने की क्षमता पायी जाती है, जो भोपाल गैस त्रासदी के दौरान भी सिद्ध हो चुकी है। #गोबर से लीपे हुए घरों पर कम असर हुआ। #अमेरिका ने भी #गोमूत्र में कैंसर विरोधी तत्व होने को लेकर पेटेंट दिया है। #गाय के #दूध से #स्वर्ण भस्म भी बनता है। मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया ने भी #गाय के दूध को सर्वोत्तम माना है। #गाय का #घी खाने से कोलेस्ट्रोल नहीं बढ़ता।
-डा. डी.के. सधाना, पशु वैज्ञानिक, एनडीआरआइ, करनाल
देशी गाय के दूध से बनी दही में ऐसा बैक्टीरिया पाया जाता है जो एड्स विरोधी गुणधर्म रखता है। जैव प्रौद्योगिकी के इस युग में #गोवंश के लिए अपार संभावनाएं हैं। #भारतीय जलवायु की विविधता से भी #दूध की गुणवत्ता बढ़ती है।
– डा. मनोज तोमर, वैज्ञानिक, जिला विज्ञान केन्द्र।
दूध : कुछ तथ्य…!
1. पश्चिम यूपी में #गाय-भैंसों के बीच गाय की भागीदारी 60  फीसदी तक है, जो वक्त के साथ कम होती जा रही है।
2. पशुपालन के प्रति अरुचि एवं अंधाधुंध कटान की वजह से अब देश में नस्ल कम हो गई।
3. दुनिया की #सर्वोत्तम नस्ल गिर गाय की संख्या सौराष्ट्र में दस हजार से भी कम, जबकि ब्राजील में सर्वाधिक है।
4. कई कृषि विवि में साहीवाल, गिर, थारपारकर, अंगोल एवं राठी समेत #उत्तम नस्ल की #गायों का संस्थान खोला गया, किंतु विदेशी फंड के लिए क्रास ब्रीड का राग अलापा जा रहा है।
5. विश्वभर में 250 गायों के नस्ल में से 32 नस्लें #भारतीय गोवंश की हैं।
6. केरल की वैचूर प्रजाति दुनिया की सबसे छोटी नस्ल है। सांड की ऊंचाई महज तीन फुट होती है। जिनकी संख्या कम हो चुकी है।
7. इस प्रजाति की #गाय में सर्वाधिक 7 फीसदी वसा पाया जाता है, किंतु संख्या बढ़ाने पर सरकारों ने कोई रुचि नहीं ली।

संदर्भ : हिन्दू जन जागृति समिति

अभी #सरकार को कत्लखाने पर सब्सिडी बन्द करके #भारतीय #गोवंश की नस्लों की #गौशाला के लिए #सब्सिडी देनी चाहिए जिससे फिर से #भारतीय #गोवंश में बढ़ोतरी हो और #देश में #गौ दुग्ध से हर व्यक्ति #स्वस्थ्य रहे ।


सभी के ऊपर गौहत्या का पाप लग रहा है।

सभी के ऊपर गौहत्या का पाप लग रहा है। गौहत्या रोकने का सरल उपाय, आइये कंधा से कंधा मिलकर समाज को परिवर्तित करें।





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सरकार द्वारा दी जा रही ‪सबसिडी ‬का पैसा कहा से आता है????? ‪कभी ‬सोचा है आपने?? आपके हमारे मेहनत की कमाई का ‪टैक्स ‬देने से जो धन सरकार के पास एकत्र होता है उसी से सरकार सबको सबसिडी देती है। जो मैं कहना चाहता हूँ उससे पहले 2 बाते जान लेते है जो सनातन धर्म कहता है:- 
1): आपसे गलती से भी अगर धर्मविरोधी कार्य अगर हुआ हो तो उसके पाप का दंड आपको भुगतना ही होगा। प्राचीन काल की कई घटनाओ से ये साक्ष्य मिलता है। 
2): इसी तरह अगर आपके धन से जाने अनजाने मे ही अगर धर्मविरोधी कार्य हो गए तो हम आप भी उतने ही पाप के भागीदार है जीतने की पाप करने वाला। 

तो, भाइयो बात मेरी ये थी की जो लोग ईमानदारी से अपना कर चुकाते है अगर उनके कर का पैसा सरकार ‪कतलखाने ‬में सबसिडी के तौर पर दे रही हो और उन कतलखानों में अगर‪ गौहत्या ‬होती हो, तो भाइयो व बहेनों बुरा मत मानिएगा, आप और हम भी गौ हत्यारे हुये, क्यूंकी हमरे पैसा का कुछ अंश गौहत्या के काम में आया है। इसलिए अगर आप हमेशा पूरे जीवन अपने गुरु शरण मे गए हो, कोई बुरा कार्य न किया हो और अंतमें ईश्वर के पास जने पर कई गौहत्या का पाप अपके सिर पर हो, तो अचरज न कीजिएगा, याद रखिएगा की आपका और हमारा दिया गया कर‪ ‬से ही सरकार कई धर्मविरोधी कार्य करती है। 
उनमेँ प्रमुख कार्य है :- 
1) ‪कतलखानों ‬को दी जा रही सबसिडी। 
2) धर्मांतरण करा रही ईशाई मिश्नरियोँ‪ ‬के ‪VISA‬में छूट। 
3) कुछ धर्मो के तथाकथित स्कूलो को दी जा रही सबसिडी जहाँ बन रहे हैँ ‪राष्ट्रद्रोही (मदरशे‬) जो हमारे पैसो से दी गयी सबसिडी से ‪हथियार ‬खरीद कर हमरे ही भाई बहनों को आए दिन दंगे कराकर, तो कहीं बिस्फोट कर के जिले के जिले तबाह‪ ‬करके मासूमो की हत्या कर रहे है। तो अब प्रश्न ये उठता है की हम क्या करें??? तो इस बात का सटीक बेजोड़ एक समाधान हैं, 
नीचे दिये गए सारे बिन्दुओ को गौर से पढे:- 
1): सबसे पहली बात अपने धर्म मेँ विश्वास और एकता हर कीमत पर बनाए रहे और जो भी कोई हमारी श्रद्धा तोड़े उसकी बात कभी न सुने, चाहे वो किसी धर्म का ही क्यू न हो। या मुहतोड जबाब देँ। (क्यूंकी गीता में श्री कृष्ण ने मूर्खो का संग करने से साफ माना किया है, कुछ तथकथित भगवा वस्त्रधारी खंगरेसी ‪एजेंट ‬हमारे धर्म में भी है, उनसे सावधान रहे।)
 2) सरकार को कर (‪incomeTAX‬) जब तक कोई न दे, जब तक सरकार गलत कामो मे दी जा रही सबसिडी और अन्य प्रकार की सरकारी छूट बिलकुल बंद न कर दें। (विश्वास कीजिये अगर 20 करोड़ भारतीय भी ऐसा करके अगर एकसाल कर (TAX) न दे तो सरकार आपकी बातें जरूर मान जाएगी, क्यूंकी सरकार हुमसे और हमरे लिए है। हम चुप है इशलिए वो मनमानी कर रहे हैँ। 
3): अपने धर्म से जुड़े, सनातन धर्म की महानता को पहचाने, अपनी संस्कृति को पाश्चात्य संस्कृत से अच्छा मानने की भूल न करे॥ (तिलक लगाने में शर्मा न करे, ससम्मान धार्मिक कार्यो को अपनाइए, और ईश्वरीय तत्व से जुड़िये।) 
4): चरित्रवान बने। (मांस, मदिरा और सबसे बड़ी बात रसते पर चल रही बहनों को घूरना और गलत नजरों से देखना, गलत बाते करना दूसरों की बहनों के बारे में कुछ उटपटाँग करना बंद करे।) 
5.) भारत मेँ जितने भी संगठन सनातन धर्म की रक्षा मेँ बनेँ हैँ उनसे जुडेँ और देश-समाज मेँ चल रही किसी भी घटना से अनजान न रहेँ। सजग रहेँ। जो भी करेँ जनकल्याण के लिए करेँ। ऐसा करेँ जिसमेँ सबका मंगल सबका भला हो।