शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

शिवाजी महाराज ने गौ माता के लिए लड़ी थी एक लड़ाई !

हिन्दू सम्राट छत्रपति गौभक्त श्री शिवाजी महाराज जी की जयंती पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

मात्र दस वर्ष की उम्र में शिवाजी महाराज ने गौ माता के लिए लड़ी थी एक लड़ाई !

अगर हिन्दू इतिहास के सबसे बड़े गौ-भक्तों के नाम के जगह लिखे जायें तो शिवाजी महाराज का नाम शुरूआती क्रम में रहेगा.
लेकिन जिस तरह से हमारे इतिहास से खिलवाड़ किया गया है उसका उदाहरण आज हम आपको पेश करने वाले हैं. हम अगर बोलते हैं कि हिन्दू इतिहास से खिलवाड़ किया गया है तो बुद्धिजीवी लोग इसका उदाहरण मांगते हैं. आज हम आपको शिवाजी महाराज की ऐसी कहानी बताने वाले हैं जो अब इतिहास से हटा दी गयी है.

गौ भक्त शिवाजी महाराज के लिए गाय सदैव पूजनीय रही थी. वह हमेशा बोलते थे कि गाय हिन्दू धर्म की शान है. जो भी इसको मात्र पशु समझ रहा है वह अज्ञानी है. खुद शिवाजी महाराज की दिनचर्या में गौ माता की सेवा शामिल थी. ऐसा ही एक किस्सा है, जो अब भूला दिया गया है. बचपन से ही शिवाजी गाय को आदरणीय और पूजनीय मानते थे और मात्र 10 वर्ष की आयु में ही शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिया था कि उनका जन्म पापियों का नाश करने के लिए ही हुआ है.

जब शिवाजी महाराज ने गौ माता के लिए काट दिया था कसाई का सर।
हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के पश्चात् गो ब्राह्मण प्रतिपालक की उपाधि धारण करके स्वयं को गौरवान्वित किया था.

यह घटना शिवाजी महाराज के बाल्यकाल की है.

अपने पिता के साथ वे बादशाह के यहाँ जा रहे थे. यह बात बीजापुर की है. शिवाजी महाराज बचपन से हिन्दू लोगों के प्रिय भी थे. जब पिता और पुत्र दोनों रास्ते से गुजर रहे थे तो दोनों देखते हैं कि रास्ते में एक कसाई गाय को घसीटते हुए ले जा रहा था और वहां के बाजार के हिन्दू सर झुकाए बैठे हुए थे. मुग़ल शासन था, कौन क्या कर सकता था? उस समय शिवाजी की उम्र दस वर्ष की थी. कुछ इतिहास की पुस्तकें बताती हैं कि लोगों के मन में मुग़ल शासन का ऐसा डर था कि वह कुछ नहीं बोलते थे. हिन्दू मंदिर तोड़े जा रहे थे, गायों का क़त्ल हो रहा था और घर से बहू-बेटियां उठाई जा रही थीं. किन्तु कोई भी कुछ नहीं बोलता था.

जब बालक गौ भक्त शिवाजी यह देखते हैं कि कसाई गो-माता पर अत्याचार करते हुए, उनको काटने ले जा रहा है वह तभी अपनी तलवार निकालते हैं और पहले तो गाय की रस्सी काटकर उसे बंधन मुक्त करते हैं और वह कसाई कुछ कहता इससे पहले ही उसका सर धड़ से अलग कर देते हैं.

जब हिन्दुओं ने देखी बालक की बहादुरी

जब हिन्दू लोगों ने एक बालक गौ भक्त शिवाजी की इतनी बहादुरी देखी तो सबसे अन्दर जैसे नई ऊर्जा शक्ति का संचार हो गया था.

इस बात का जब बादशाह को पता चला तो वह कोई भी कार्यवाही इसलिए नहीं कर सका था क्योकि एक तो यह कार्य करने वाला एक बालक था और दूसरा कि उस समय सभी हिन्दुओं का साथ गौ भक्त शिवाजी को प्राप्त हो गया था.

लेकिन कुछ इतिहासकारों ने गौ भक्त शिवाजी की इस वीरतापूर्ण कहानी को किताबों से हटवा दिया ताकि हिन्दू इस कहानी को ना पढ़ सकें.

आज आवश्यकता है कि इस तरह की कहानियों को एक जगह एकत्रित किया जाये ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सही इतिहास पहुँचाया जा सके. जय हिन्द जय गौमाता।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

श्री आनंदवन परिसर, गोधाम पथमेड़ा के गौसेवा सदन(गोष्ठ) के आवश्यक तत्व :

श्री आनंद वन परिसर, गोधाम पथमेड़ा के गौसेवा सदन(गोष्ठ) के आवश्यक तत्व :- 
1. गोष्ठ की साइज - 3 से 4 बीघा।
2. गोष्ठ में गोवंश की संख्या - 100 से 125
3. गोवंश का वर्गीकरण - प्रत्येक गोष्ठ में एक ही प्रकार का, एक ही उम्र का गोवंश रखा जाता है। नर व मादा गोवंश अलग अलग, बीमार, विकलांग, सूरदास, कमजोर, बूढ़ा, वत्स, गर्भवती, दूधारू, 1 वर्ष से कम, 1 से 2 वर्ष का, 2 वर्ष से 3 वर्ष का आदि आदि कई प्रकार से वर्गीकृत करके जगोवंश को अलग अलग गोष्ठ में रखा जाता है।
4 . गोष्ठ की दीवार - प्रत्येक गोष्ठ को पक्की दीवार या लोहे की जाली लगी हुई है। 
5. मुख्य गोष्ठ के अंदर छोटा गोष्ठ - प्रत्येक गोष्ठ के अंदर एक कोने में एक छोटा गोष्ठ होता है। जब चारा, दा ला या पोष्टिक आहार आदि देना होता है या सफाई करनी हो तो सभी गोवंश को उस छोटे गोष्ठ में भेजकर गेट बंद कर देते हैं। फिर कार्य पूर्ण होने पर सबको बड़े गोष्ठ में आने दिया जाता है।
6. गोष्ठ का प्रवेश द्वार - प्रत्येक गोष्ठ के एक बड़ा दरवाजा लगा होता है जिसमें बैलगाड़ी, ट्रैक्टर, बड़ी गाड़ी अंदर अा सके। ग्वालों व अन्य लोगों के आने जाने के लिए बड़े द्वार में एक छोटा दरवाजा लगा रहता है।
7. ग्वाला - प्रत्येक गोष्ठ में आवश्यकतानुसार कम से कम एक ग्वाला परिवार होता है। दूधारू या बीमार गोवंश में अधिक भी ग्वाल होते हैं। 10 से 12 ग्वालों के ऊपर एक व्यवस्थापक होता है।
8. चारा की व्यवस्था करना - गोवंश को चारा देने हेतु बैलगाड़ी की व्यवस्था होती है। प्रत्येक गोष्ठ में एक बैलगाड़ी बेलों की जोड़ी सहित होती है। चारा परोसने के लिए लंबी नाद होती है या वृत्ताकार फर्में होते हैं। जिनकी प्रतिदिन नियमित सफाई होती है।
9. पानी की व्यवस्था - प्रत्येक गोष्ठ में एक होद या फर्मा पानी के लिए होता है जिसमें बड़े टैंक से पाइप द्वारा कनेक्शन किया होता है। 24 घंटे अनवरत पानी सप्लाई चालू रहती है। प्रत्येक पानी के होद में सप्ताह में एक बार चूने की पुताई की जाती है। जिससे जल एकदम स्वच्छ रहता है।
10. सेंधा नमक - प्रत्येक गोष्ठ में गोवंश के सेवन हेतु प्रर्याप्त मात्रा में सेंधा नमक रखा जाता है। गोमाता प्रेम से नमक चाटती रहती है जिससे पोषक लवणीय तत्वों की पूर्ति होती है।
11. सर्दी, गर्मी, बरसात से बचाव - हरेक गोष्ठ में कई छायादार जाल के वृक्ष हैं तथा एक बड़ा शेड बना होता है।
12. गोबर धन - प्रत्येक गोष्ठ में नियमित रूप से दिन में कई बार गोमय लिया जाकर एक बड़ी ढेरी बनाई जाती है। इसे बाद में सेंद्रिय खाद बनाने में काम लेते हैं या सीधा गोबर खाद के रूप में बेचा जाता है।

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

पशुशाला और गौशाला में भेद


।।पशुशाला और गौशाला में भेद।।

भगवान् शिव ने लक्षणा-शब्द शक्ति के रूप में गौशाला की परिभाषा को परिभाषित करते हुए कहते हैं:-

स्वगां भोजित्वा तु  यत्फलं  लभेत  नर:।
द्विगुणं तस्य लभते परगां भोजयेद् यदि।
गुरोर्गां भोजयित्वा तु चतुर्गुणफलं लभेत्।। 
               संदर्भ:-श्री गौ तंत्र २.१४-१५

भावार्थ:- स्वयं की गौ की सेवा करने से उसके ग्रास देने से जो पुण्य प्राप्त होता हैं, उससे दुगुना पुण्य दूसरे द्वारा छोड़ी हुई गौ की सेवा करने से होता है। अगर गुरु द्वारा स्थापित गौशाला में गौओं की सेवा की जाए तो उसका चारगुणा ज्यादा पुण्य प्राप्त होता हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि गुरु द्वारा संचालित गौशाला में जो गौएं हैं उनकी महिमा का नित गान होता हैं, वे सब गौएं सबला हैं, प्रसन्न रहती हैं, वहां आने वाले भक्त गौ महिमा से परिचित होते हैं और वहां गाय पशु नहीं 'माता' कहलाती हैं इसलिए चारगुणा अधिक पुण्य है। जबकि अन्य जगह पे जो गौएं घूम रही हैं,उनको घर में लाकर पूजने से अधिक पुण्य है। अर्थात् जहां गौ महिमा नहीं हैं यदि गोग्रास देने वाला गौ महिमा से परिचित नहीं हैं तो गौ भी अवला रूप में रहती है और सेवा का उतना ही पुण्य प्राप्त होता हैं जितना किसी पशु पर दया करने का पुण्य है।
ॐ जगदम्बायै च विद्महे पशुरूपायै धीमहि सा नो धेनु: प्रचोदयात्।।
गाय पशु रूप में होते हुए भी जगदम्बा हैं और यह देवी हमें मोक्ष की राह पर ले जाएगी किन्तु यह तभी सम्भव है जब सेवक स्वयं को गोपुत्र मानकर और गौ को माता मानकर सेवा करें और गौ महिमा से परिचित हो!
                           ।।मां।।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

माँ की ममता

माँ की ममता

इस हिन्दोस्तां के माटी की महिमा अपरम्पार है
गौ गंगा गीता से निर्मित इसका श्यामल सार है
परम पूज्य व पाप हारिणी गौ गंगा और गीता हैं
तरण तारिणी मोक्ष दायिनी तीनो परम पुनीता हैं
रोम रोम में देव रमे हों ऐसी पवित्र गौ माता है
चार धाम का पुण्य भी गौ सेवा से मिल जाता है
जो जन इसकी सेवा करते भव सागर तर जाते हैं
वेद पुराण उपनिषद भी इसकी महिमा बतलाते हैं
सकल पदारथ दूध दही घी औषधि गुणकारक हैं
स्वस्थ प्रदायक मंगलकारक समूल रोग निवारक हैं
भगवान कृष्ण ग्वालों संग खुद भी गायें चराते थे
बछड़ों के संग क्रीड़ा करते दूध दही घी खाते थे
प्रेम पास में बंधी गायें कान्हा को देख रंभातीं थीं
मोहक बंसी ध्वनि सुनकर आप लौट आ जाती थीं
गौ सेवा का पुण्य प्रताप ऋषि मुनियों भी गाया है
गौ माता के आगे खुद भगवन ने शीश नवाया है
इसी मात के जीवन में अब गहरा संकट आया है
त्राहि त्राहि कर मात पुकारे कैसा कलियुग आया है
यह अपने ही पुत्रों के आगे दर दर आज भटकती है
पेट पालने को गौ माता त्रण को आज तरसती है
कुछ अधम नीच निशाचर हैं हमको आज लटा रहे
हैं सठ कामी पापी पिशाच गैया को आज कटा रहे
घनघोर पिशाच प्रवृत्ति अब यहाँ दिखाई जाती हैं
झुण्ड झुण्ड में गायें आज आरों से कटाई जाती हैं
गर ऐसी पिशाच प्रव्रत्ति पर अंकुश न लगाया जायेगा
दूर नही किंचित वह दिन जब यहाँ विनाश आ जायेगा
अपने ही पुत्रों के आगे गर कोई माता ऐसे तड़पेगी
तुम्ही बताओ अंतर्मन से सन्तान कैसे सुखी रहेगी
अब गौ माता की सेवा का प्रण हम सबको करना होगा
धर्म धर्म और धर्म की खातिर हम सबको लड़ना होगा
इस गोवंश की रक्षा खातिर कुछ ऐसा आज प्रबंध हो
होय वधिक को फांसी जब फिर फौरन गोवध बंद हो