सोमवार, 11 नवंबर 2013

** गोमूत्र से रोशन होंगी गरीबों कि झोपड़ियां | Electricity Generation by Cow Urine **



गोमूत्र से बैटरी वाली लालटेन चलेगी. इस बैटरी को बिजली से चार्ज नहीं करना पड़ेगा.
एसिड की जगह गोमूत्र का इस्तेमाल होगा. बैटरी लो होने पर चार्ज करने के बजाए गोमूत्र बदलने से लालटेन में लगी 12 वोल्ट की बैटरी पुन: फुल चार्ज हो जाएगी और लाइट जलने लगेगी.
यह अनोखा व बेहद उपयोगी प्रयोग किया है कामधेनू पंचगव्य एवं अनुसंधान संस्थान अंजोरा के डायरेक्टर डॉ. पी.एल. चौधरी ने. बैटरी में 500 ग्राम गोमूत्र का उपयोग कर 400 घंटे तक 3 वॉट के एलईडी (लेड) बल्ब से रौशनी प्राप्त की जा सकती है.
श्री चौधरी के इस मॉडल का मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के समक्ष प्रदर्शन किया जा चुका है. उन्होंने खुशी जाहिर करते हुए इसे प्रदेश पंचगव्य संस्थान के लिए बड़ी उपलब्धि बताया.
गोमूत्र से लालटेन के इस प्रयोग को नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ रायपुर ने भी प्रमाणित किया है. डॉ. चौधरी ने बताया कि इस लालटेन में बैटरी के भीतर डाले जाने वाली एसिड की जगह गोमूत्र डाला गया. इसमें किसी भी प्रकार का कोई केमिकल नहीं मिलाया गया है, न ही बैटरी में कोई बदलाव किया गया है.
खास बात यह है कि बैटरी सिर्फ देशी गाय के गोमूत्र से ही चलेगी. इसे मोटर साइकिल की पुराने बैटरी का उपयोग कर विकसित किया गया है. उन्होंने बताया कि लालटेन में जब बल्ब की रोशनी कम होने लगती है तो गोमूत्र को बदलना होता है.
यह चमत्कारी प्रयोग है जो आदिवासी या अन्य इलाकों जहां बिजली की परेशानी होती है उन क्षेत्रों में काफी उपयोगी साबित होगा. उन्होंने इस प्रयोग को पेटेन्ट कर अनुसंधान को आगे भी जारी रखने की बात कही. एनआईटी रायपुर ने इस प्रयोग को पर्यावरण मित्र और गैर पंरापरागत साफ सुथरी ऊर्जा का स्रोत बताते हुए इसे ग्रामीण क्षेत्रों के लिए काफी उपयोगी बताया है.
किसानों को मिलेगी प्रेरणा एसिड की जगह गोमूत्र से चलने वाली बैटरी के बारे में डॉ. पी.एल. चौधरी ने बताया कि बैटरी से लाइट बंद होने पर यह इमरजेंसी लाइट की तरह कार्य करेगा. इससे मोबाइल को भी चार्ज किया जा सकता है. गोमूत्र बैटरी को ऊर्जा मिलने से बिजली की खपत कम होगी. किसानों को पशुपालन के लिए प्रेरणा मिलेगी. डॉ. चौधरी ने बताया कि यह कमाल केवल देशी नस्ल की गाय के मूत्र में ही संभव है

http://navabharat.org/chhattisgarh-cg/147-durg-bhilai-news/43529--गोमूत्र-से-जलेगी-लालटेन

http://www.youtube.com/watch?v=VFB4jnj7Rwc


शनिवार, 9 नवंबर 2013

Gau Raksha: Muslim View

Gau Raksha: Muslim View 
When we try to define mother, there are numerous dimensions to it. Mother is the one who gives birth, who looks after; feeds milk and loves you. Of the all, when the infant is born, the milk of the mother is no less than a potion. However, after few months our mother is unable to feed us milk, from where we become dependent on the cow. Considering its services, it is indeed our mother. And when we term her as our mother, we can seldom disrespect her, forget slaughtering her. Even in the Koran mother is considered next to Allah.

With all good intentions of settling the long-standing contentious issues between the Hindus and Muslims amicably Darul Uloom, Deoband had issued fatwa. It was those of the rare fatwa that were appreciated by leaders of both the communities. When the fatwa was issued Shahi Imam of Fatehpuri mosque had said, There may be some people who indulge in cow slaughter, we ourselves discourage and stop them. We also want peace and communal harmony in the country. Since 1971, the day I took over as Shahi Imam of Fatehpuri mosque in Delhi, I always advised Muslims to keep in mind the sentiments of Hindus and not to indulge in any activity that hurt their sentiments. I think no Muslim should adopt rigid attitude on this issue. Undoubtedly, cow has religious importance for Hindus and their sentiments should not be hurt.

It would be noteworthy the Hikmat which dictates every Muslim that milk of the cow is greatly useful for health and beef is harmful for health as it causes various diseases. Most of the educated Muslims are aware of this fact and usually avoid it.

Veteran Islamic scholar and director, Islamic Centre, New Delhi, Maulana Wahiddudin Khan had once stated: Islam has already banned it by teaching its followers not to indulge in any act that hurts the sentiments of their neighbours. If anyone is found indulging in any such practice anywhere in the country, he should be condemned jointly. We need to maintain cordial relations with the communities with whom we have to live.

Given these facts it is eminent that Muslims involving in cow slaughters are not just hurting the sentiments of Hindus, but also violating the fundamentals of Islam which is always for the peace and harmony.

Considering this, I suppose the Hindu organisations have to change its mindset the way it looks at the Muslim community. They must understand that you cannot blame the whole community for the misdeeds of a few. Likewise, those in the business of cow slaughter must understand the fact that even their religion and its prime leaders are against their acts.

Lastly, I wish to put forward a view told to me by Akbar Ali, District (Udupi) Organiser of Jamat-e-Islami: I suppose people have to understand three fundamental things.
  • There is only one God.
  • We are children of one parent and finally
  • We are all Indians.

In simple we are one family. And within any family there is bound to have difference of opinions, but they can never be settled with violence. Does any one fight with sword within a family when there is a conflict? If not, then why should we resort to arms in this case?

शुक्रवार, 8 नवंबर 2013

श्री कृष्ण की गौ चारण लीला..


श्री कृष्ण की गौ चारण लीला....

भगवान अब ‘पौगंण्ड-अवस्था’ में अर्थात छठे वर्ष में प्रवेश किया.

एक दिन भगवान मैया से बोले – ‘मैया! अब हम बड़े हो गये है. 

मैया ने कहा- अच्छा लाला! तुम बड़े हो गये तो बताओ क्या करे?

भगवान ने कहा - मैया अब हम बछड़े नहीं चरायेगे, अब हम गाये चरायेगे.

मैया ने कहा - ठीक है!
बाबा से पूँछ लेना.

झट से भगवान बाबा से पूंछने गये.

बाबा ने कहा – लाला!, तुम अभी बहुत छोटे हो, अभी बछड़े ही चराओ .

भगवान बोले- बाबा मै तो गाये ही चराऊँगा.

जब लाला नहीं माने तो बाबा ने कहा - ठीक है लाला!, जाओ पंडित जी को बुला लाओ, वे गौ-चारण का मुहूर्त देखकर बता देगे.

भगवान झट से पंडितजी के पास गए बोले- पंडितजी! बाबा ने बुलाया है गौचारण का मुहूर्त देखना है आप आज ही का मुहूर्त निकल दीजियेगा, यदि आप ऐसा करोगे तो मै आप को बहुत सारा माखन दूँगा .

पंडितजी घर आ गए पंचाग खोलकर बार-बार अंगुलियों पर गिनते.

बाबा ने पूँछा -पंडित जी क्या बात है?
आप बार-बार क्या गिन रहे है .

पंडित जी ने कहा – क्या बताये, नंदबाबाजी, केवल आज ही का मुहूर्त निकल रहा है इसके बाद तो एक वर्ष तक कोई मुहूर्त है ही नहीं.

बाबा ने गौ चारण की स्वीकृति दे दी .

भगवान जिस समय, जो काम करे, वही मुहूर्त बन जाता है उसी दिन भगवान ने गौ चारण शुरू किया वह शुभ दिन कार्तिक-माह का “गोपा-अष्टमी” का दिन था.

माता यशोदा जी ने लाला का श्रृंगार कर दिया और जैसे ही पैरों में जूतियाँ पहनाने लगी तो बाल कृष्ण ने मना कर दिया और कहने लगे - मैया ! यदि मेरी गौ जुते नही पहनती तो मै कैसे पहन सकता हूँ यदि पहना सकती हो तो सारी गौओ को जूतियाँ पहना दो.

और भगवान जब तक वृंदावन में रहे कभी भगवान ने पैरों में जूतियाँ नाही पहनी.

अब भगवान अपने सखाओ के साथ गौए चराते हुए वृन्दावन में जाते और अपने चरणों से वृन्दावन को अत्यंत पावन करते.
यह वन गौओ के लिए हरी-हरी घास से युक्त एवं रंग- बिरंगे पुष्पों की खान हो रहा था, आगे-आगे गौएँ उनके पीछे-पीछे बाँसुरी बजाते हुए श्यामसुन्दर तदन्तर बलराम और फिर श्रीकृष्ण के यश का गान करते हुए ग्वालबाल.

इस प्रकार विहार करने के लिए उन्होंने उस वन में प्रवेश किया.
और तब से गौ चारण लीला करने लगे.
भगवान कृष्ण का "गोविन्द" नाम भी गायों की रक्षा करने के कारण पडा़ था.
क्योंकि भगवान कृष्ण ने गायों तथा ग्वालों की रक्षा के लिए सात दिन तक गोवर्धन पर्वत को अपनी छोटी अंगुली पर उठाकर रखा था.
आठवें दिन इन्द्र अपना अहं त्याग कर भगवान कृष्ण की शरण में आया था.
उसके बाद कामधेनु ने भगवान कृष्ण का अभिषेक किया.
और इंद्र ने भगवान को गोविंद कहकर संबोधित किया .
और उसी दिन से इन्हें गोविन्द के नाम से पुकारा जाने लगा.

इसी दिन से अष्टमी के दिन गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा.

गौ ही सबकी माता है, भगवान भी गौ की पूजा करते है, सारे देवी-देवो का वास गौ में होता है, जो गौ की सेवा करता है गौ उसकी सारी इच्छाएँ पूरी कर देती है.
तीर्थों में स्नान-दान करने से, ब्राह्मणों को भोजन कराने से, व्रत-उपवास और जप-तप और हवन- यज्ञ करने से जो पुण्य मिलता है, वही पुण्य गौ को चारा या हरी घास खिलाने से प्राप्त हो जाता है.....।

अपना वोट उस कमीने को मत दो जो गऊ हत्या के पाप में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष जुड़ा हो

अपना वोट उस कमीने को मत
दो जो गऊ हत्या के पाप में
प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष जुड़ा हो वह
चाहे आपके
कितना ही करीबी हो अगर आपने ऐसे
कमीनो को वोट
दिया तो आप भी इस गऊ हत्या में
शामिल माने जायेंगे,,
गऊ हत्यारे माने जायेंगे,,,
आप पाप के भागी होंगे यही सत्य है,,,
गऊ हत्या = राष्ट्र की हत्या !!!


गुरुवार, 7 नवंबर 2013

विकृतिकरण है भारतीय गोवंश का संकरीकरण

हम 1947 में राजनीतिक रूप से स्वतंत्र हो गए। लेकिन लगभग 1000 वर्षों की गुलामी का प्रभाव तो आनेवाले कई वर्षों तक रहनेवाला था। हमारे वर्तमान सत्ताधीशों की नीतियों में इसके स्पष्ट दर्शन होते हैं।

गोवंश संबंधी उनकी सोच इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। उनका मानना है कि दूध गाय का प्रमुख उत्पाद है और दूध न देनेवाली गाय नकारा या अनुत्पादन अर्थात खाली/सूखी है। 2-4 से 10 लीटर तक दूध देने वाली भारतीय गौएं कमजोर नस्ल की हैं जबकि जर्सी, होलस्टीन, फ्रीजियन आदि उत्तम नस्ल की हैं क्योंकि ये 35-40 लीटर दूध प्रतिदिन देती हैं। ऐसी धारणा बनाते समय हमारे नीति निर्धारकों ने इस तथ्य को बिल्कुल नजरंदाज कर दिया कि विभिन्न नस्लों की भारतीय गौएं जो कई पीढ़ीयों से कुपोषण या कम खान-पान की शिकार थीं, उनका आहार संतुलित करके दूध बढ़ाया जा सकता है। उन्होंने इस बात को भी नजरंदाज किया कि सभी विपरीत परिस्थितियों के बावजूद गीर, अंगोल, साहीवाल जैसी भारतीय नस्ल की कई गौएं आज भी 15 लीटर से 40 लीटर तक दूध देने में सक्षम हैं। 

जिस सोच के तहत भारतीय गायों को घटिया नस्ल का बताया गया उसी सोच के अनुसार भारतीय कृषि की प्राचीन परंपराओं को भी पिछड़ा हुआ और अवैज्ञानिक घोषित कर दिया गया। चारों ओर हरित क्रांति का वातावरण बनाया गया जिसमें कृषि उत्पादन बढ़ाने के लिए रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का खेतों में भरपूर उपयोग किया गया। इस पूरी प्रक्रिया में वेद-पुराणों एवं अन्य शाश्वत ग्रंथों में वर्णित ‘गोमय वसते लक्ष्मी’ का ब्रह्मवाक्य भुला दिया गया। 

हम यह भूल गए हैं कि गोबर और गोमूत्र वास्तव में गोवंश का स्थाई उत्पाद है क्योंकि यह जीवन भर प्राप्त होता है। दूध तो गाय से निश्चित अवधि तक ही प्राप्त होता है। उसे गाय का एकमात्र उपयोगी उत्पाद मानना हमारी खंडित सोच का नतीजा है। दूध को इस प्रकार एकतरफा अनावश्यक महव देने के कारण ही संकरीकरण की शुरुआत हुई। 

आधुनिक विज्ञान भी पूर्णत: मानता है कि संकरीकरण के पश्चात मूल गुणधर्म नष्ट हो जाते हैं एवं कालांतर में दूसरी तीसरी पीढ़ी तक संकर के गुणधर्म भी नष्ट होते चले जाते हैं। इस संदर्भ में निम्न बिंदु विचारणीय हैं : 

1. प्रयोगशाला में अप्राकृतिक रूप से कुछ बातें सिद्ध करने एवं प्रत्यक्ष धरातल पर व्यवहार में लाखों करोड़ों लोगों के बीच उसे साबित करने में बहुत अंतर होता है। संकर नस्लों में 20-25 से 50 प्रतिशत तक अंश रखा जाएगा ऐसा सोचा गया जो कहीं भी स्थापित नहीं हो पाया। संकर नस्ल की गायों में दूध 40 लीटर से ज्यादा मिलेगा, ऐसा मानना था किंतु औसत संकरित नस्ल में 5-7 लीटर प्रतिदिन से अधिक दूध नहीं मिलता। 

2. विदेशी नस्लें 0-10 डिग्री सेटींग्रेड तापमान वाले प्रदेशों में विकसित हुई हैं। हमारे यहां के 0-40 सेंटीग्रेड के बदलते हुए तापमान को सहने की आदत इनमें नहीं है। 

3. इंग्लैंड, अमेरिका व अन्य यूरोपीय देशों में पिछले 60-70 वर्षों से मांसाहार गोवंश व अन्य प्राणियों को बड़ी मात्रा में खिलाया जा रहा है। जिसमें मैड काउ (मस्तिष्क का विघटन) रोग गोवंश में व बाद में मनुष्य तक पहुंचता है। अमेरिका व दूसरे देशों में बी.जी.एच. (बोवाईन ग्रोथ हार्मोन) नामक इंजेक्शन मोन्सैन्टो व कुछ अन्य तीन-चार बहुराष्ट्रीय कंपनियां 1989 से बना रही है। ऐसी गायों के दूध से कैंसर बढ़ता है, यह सिद्ध हो चुका है। 

4. भारत सरकार द्वारा गठित 15वें राष्ट्रीय गोवंश आयोग के सदस्य के नाते मुझे 2000 से ज्यादा पशु वैज्ञानिकों, चिकित्सा विशेषज्ञों एवं पशुपालन अधिकारियों से मिलने का मौका मिला है। हमने 19-20 प्रांतों में सघन दौरा करके महत्वपूर्ण जानकारियां एकत्रित कीं। हमने स्पष्ट रूप से देखा कि संकरीकरण के पीछे हम इतने पागल हो चुके हैं कि सभी प्रकार की सावधानी को हमने ताक पर रख दिया है। हमने देखा कि कहीं भी विदेशी सांड़ो के वीर्य, बी.जी.एच. के प्रभाव, ऐंटिबायोटिक के प्रभाव, दूध-गोबर-गोमूत्र के सूक्ष्म तत्वों की जांच नहीं की जा रही है। इसी कारण से हमारे यहां पिछले 60 वर्षों में बूसोलिसीस, थलियोरीसिन रिंडरपेस्ट व अन्य संक्रामक रोग बड़ी तेजी से फैल रहे हैं। स्वतंत्रता पूर्व इन रोगों का भारत में नामोनिशान भी नहीं था। 

5. भारतीय नस्ल की गायों में बीमारी कम होती है। थनैला रोग, परजीवी रोग, हरपीज विषाणु रोग होने की आवृत्ति इन गायों में कम (21.4 प्रतिशत) पाई गई है। इनमें चिचिड़िया का प्रकोप 13.0 प्रतिशत और थिलैरिया रोग की आवृत्ति 2.25 प्रतिशत ही पाई गई है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनके जीने की दर (सरवाइवल रेट) 80-90 प्रतिशत तक पाई गई है। इसके विपरीत संकर नस्ल की गायों में थनैला, परजीवी तथा हरपीज विषाणु रोग का भयंकर प्रकोप (72.7 प्रतिशत) होता है। इन गायों में चिचड़ियां अधिक (17.0 प्रतिशत) लगती हैं तथा थिलैरिया संक्रमण भी 8-12 प्रतिशत पाया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनके जीने की दर 40-50 प्रतिशत ही है। 

6. भारतीय गाय एवं बैलों के कंधे पर टाट, कुकुद (hump) होता है। बैलों/सांड़ों में यह विशेष रूप से बड़ा होता है। खेती-बाड़ी एवं भार ढोने के लिए यह बहुत उपयोगी तथा आवश्यक है। विदेशी मूल के गोवंश की कंधे सीधी होती है व उनमें टाट नहीं होती है। इस कारण से इनके बैल खेती-बाड़ी व भारवाहन के लिए विशेष उपयोगी नहीं हैं। चुस्ती-फुर्ती एवं ताकत की दृष्टि से भी भारतीय नस्ल के बैल संकर प्रजाति के बैलों से अधिक सक्षम पाए गए हैं। 

7. भारतीय गोवंश में गर्दन के नीचे गलकम्बल (dewlap) अत्याधिक विकसित होता है। इससे उनमें गर्मी सहने की क्षमता अधिक होती है। विदेशी गोवंश में गलकम्बल इतना विकसित नहीं होता है, जिससे उनमें गर्मी सहने की क्षमता कम होती है। 

8. देशी गाय पालने का औसत खर्च रू. 4517.73 प्रति गाय आता है। प्राय: ये गायें चारागाह में चरकर ही अपना पेट भर लेती हैं। थोड़ा दाना व चारा खाकर ये दूध देती रहती हैं। रहने के लिए किसी विशेष आवास की आवश्यकता नहीं पड़ती। विपरीत मौसम में भी इनकी दूध देने की क्षमता में 5 से 10 प्रतिशत की ही कमी होती है। इसके विपरीत विदेशी मूल की गायों का रखरखाव खर्चीला होता है। इनके आवास और आहार की विशेष व्यवस्था करनी पड़ती है। विपरीत परिस्थितियों में इनका दूध उत्पादन 70 से 80 प्रतिशत कम हो जाता है। ऐसी गायों के रखरखाव की लागत औसतन रू. 7437.56 प्रति गाय है। 

9. देशी नस्लों का दूध अधिक पौष्टिक होता है। वैज्ञानिक रूप से वसा, प्रोटीन आदि में तो खास अंतर नहीं दिखता। किंतु कुछ सूक्ष्म तत्व यथा साइटोकाइन्स, लवण, इन्टरफैरान आदि तत्व देशी गाय के दूध मे अधिक होते हैं जिनके कारण इनका सेवन करने से शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। इसके विपरीत अप्राकृतिक रूप से अधिक मात्रा में दूध देने के कारण विदेशी नस्लों का दूध प्राय: पतला व देशी गाय के दूध की अपेक्षा कम पौष्टिक होता है। 

10. देशी गाय के पंचगव्य अर्थात दूध, दही, घी, गोबर, गोमूत्र से विभिन्न प्रकार की औषधियां निर्मित की जाती हैं जो मानव स्वास्थ्य के लिए अत्यंत उपयोगी सिद्ध हुई हैं। विदेशी गायों के उत्पादों में इस प्रकार के गुणों का वर्णन कहीं नहीं मिलता है।


गौमाता की महिमा

''प्रिये गौ माता प्रिये गोपाल''


गौमाता की महिमा

इस पृथ्वी पर गाय के समान कोई धन नहीं है ।


गौमाता सर्वदेवमयी है । अथर्ववेद में रुद्रों की माता, वसुओं की दुहिता,
आदित्यों की स्वसा और अमृत की नाभि-संज्ञा से विभूषित  किया गया है।

गौ सेवा से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष इन चारों तत्वों की प्राप्ति सम्भव
बताई गई है । भारतीय शास्त्रों के अनुसार गौ में तैतीस  कोटि देवताओं का
वास है । उसकी पीठ में ब्रह्मा, गले में विष्णु और मुख में रुद्र आदि
देवताओं का निवास है । इस प्रकार सम्पूर्ण देवी-देवताओं की  आराधना केवल
गौ माता की सेवा से ही हो जाती है । गौ सेवा भगवत् प्राप्ति के अन्य
साधनों में से एक है । जहां भगवान मनुष्यों के इष्टदेव है,  वही गौ  को
भगवान के इष्टदेवी माना है । अत: गौ सेवा से लौकिक लाभ तो मिलतें ही हैं
पारलौकिक लाभ की प्राप्ति भी हो जाती है ।

शास्त्रों में उल्लेख है कि गौ  सेवा से मनुष्य को धन, संतान और दीर्घायु
प्राप्त होती हैं ।

गाय जब संतुष्ट होती है  तो वह समस्त पाप-तापों को  दूर  करती   है । दान
 में  दिये जाने पर वह स्वर्ग लोक को प्राप्त करती है अत: गोधन ही वास्तव
में सच्चा धन है ।  गौ सेवा से ही  भगवान श्री  कृष्ण को भगवता,  महर्षि
गौतम,  कपिल,  च्यवन सौभरि तथा आपस्तम्ब आदि को परम सिद्धि प्राप्त हुई ।
महाराजा दिलीप को रघु जैसे चक्रवर्ती पुत्र की प्राप्ति हुई । गौसेवा से
ही अहिंसा धर्म  को सिद्ध कर भगवान महावीर एवं गौतम बुद्ध ने अहिंसा धर्म
को विश्व में फैलाया । जैन धर्म के प्रथम तीर्थकर भगवान आदीनाथ को ऋषभ भी
कहते हैं जिनका सूचक बैल ;ऋषभ द्ध है । वेद-शास्त्र स्मृतियां, पुराण तथा
इतिहास गौ की  महिमा से ओत-प्रोत है । और यहां तक की स्वयं वेद गाय को
नमन करता है ।

ऋग्वेद  में  कहा गया है  कि जिस स्थान पर  गाय सुखपूर्वक  निवास करती है
वहां  की रजत पवित्र हो जाती है । पुरातन काल से ही  हमारी  भारतीय
संस्कृति में गाय श्रद्धा का पात्र रही  है । पुराण काल में एक ऐसी गाय
की कल्पना की गई है  जो  हमारी  सभी  इच्छाओं  की पूर्ति  करती  है । इसे
कामधेनू कहते हैं । यह स्वर्ग में रहती हैं और जन समाज के कल्याण के लिए
मानव  लोक  में अवतार ले लेती है ।

भारतीय संस्कृति ही नही अपितु सारे विश्व में गौ का बड़ा सम्मान रहा है ।
जैसे हम गौ की पूजा करते हैं उसी  प्रकार  पारसी  समाज के  लोग सांड़ की
पूजा करते हैं । सर्वविदित है कि मिश्र देश के प्राचीन सिक्कों पर बैल की
मूर्ति अंकित रहती थी ।

गौभक्त मनुष्य जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है वह सब उसे प्राप्त होती है
। स्त्रियों में भी जो गोओं की भक्त है वे मनोवांछित कामनाएं प्राप्त कर
लेती है ।पुत्रार्थी मनुष्य पुत्र पाता है और कन्यार्थी कन्या । धन चाहने
वाले को धन और धर्म चाहने वाले को धर्म प्राप्त होता है ।

हमारे जितने भी शास्त्र, वेद, पुराण, उपनिषद है सब के सब गौ माता की
महिमा से भरे पड़े है, कोई भी भक्त ऐसा नहीं है जिसे गौ माता की सेवा के
बिना प्रभु की प्राप्ति हुई हो, परन्तु आज का ये कलयुगी भक्त गौ माता की
सेवा तो बहुत दूर की बात है दर्शन भी नहीं करना चाहते, और फिर भगवान् की
बड़ी-२ बाते करते है। पहले के गुरु जन, ऋषि-मुनि केवल गौ सेवा का ही उपदेश
देते थे, और उस्सी के फलस्वरूप उन्हें प्रभु की प्राप्ति हो जाती थी,
जितने भी भक्तो का शास्त्र में भखान है सब के मूल में सिर्फ और सिर्फ गौ
माता है, जिसका हम जाने-अनजाने में आज मास खा रहे है और फिर हम हरिमिलन
की आस करते है।
''बिनु गौ सेवा नहीं मिले हरी''

दूध, घी, दही के अतिरिक्त गौ का मूत्र और
गोबर भी इतने ही उपयोगी माने गये है ।

 गवा मूत्रपूरीषस्य नोद्विजेत: कदाचन ।
धर्म, अर्थ ,काम और मोक्ष इन चारों पुरुषार्थों की सिद्धि गौ से ही सम्भव है ।

गौ रक्षा हिन्दु धर्म का एक प्रधान अंग माना गया है । प्राय: प्रत्येक
हिन्दु गौ को माता कहकर पुकारता है और माता  समान ही  उसका आदर करता है ।
जिस प्रकार कोई भी  पुत्र  अपनी माता  के प्रति किये गये अत्याचार को सहन
नही करेगा उसी प्रकार  एक सच्चा  हिन्दु  गौमाता के प्रति निर्दयता के
व्यवहार  को सहन  नही करेगा ।

प्रभु की असीम अनुकम्पा सदा बरसती रहे , ऐसी मंगल कामना संस्था करती है ।



''प्रिये गौ माता प्रिये गोपाल''

बुधवार, 6 नवंबर 2013

देसी गाय के दूध का महत्व

देसी गाय के दूध का महत्व
आधुनिक विज्ञानका यह मानना है
कि सृष्टिके आदि कालमें, भूमध्य रेखा के दोनो ओर प्रथम
एक गर्म भूखंड उत्पन्न
हुआ था इसे भारतीय परम्परामे
जम्बुद्वीपका नाम दिया जाता है |
सभी स्तनधारी भूमि पर पैरों से
चलनेवाले प्राणी दोपाए, चौपाए जिन्हें वैज्ञानिक
भाषामें अनग्युलेट
मेमलके (ungulate mammal) नामसे
जाना जाता है, वे इसी जम्बू द्वीपपर
उत्पन्न हुये थे |
इस प्रकार सृष्टिमें सबसे
प्रथम मनुष्य और गौका इसी जम्बुद्वीप
भूखंडपर उत्पन्न होना माना जाता है |
इस प्रकार यह भी सिद्ध होता है
कि भारतीय गाय ही विश्वकी मूल
गाय है इसी मूल भारतीय
गायका लगभग ८००० वर्ष पूर्व, भारत जैसे
गर्म क्षेत्रोंसे यूरोपके ठंडे क्षेत्रोंके लिए
पलायन हुआ, ऐसा माना जाता है |
जीव विज्ञानके अनुसार भारतीय
गायोंके २०९ तत्व के डीएनए में ६७ पद पर
स्थित एमिनो एसिड प्रोलीन
(Proline) पाया जाता है
इन गौओंके ठंडे यूरोपीय
देशोंको पलायनमें भारतीय गायके
डीएनएमें प्रोलीन Proline
एमीनोएसिड हिस्टीडीनके
(Histidine) साथ उत्परिवर्तित
हो गया |
इस
प्रक्रियाको वैज्ञानिक भाषामें
म्युटेशन ( Mutation ) कहते हैं |
1. मूल गायके दूधमें पोरलीन(Proline)
अपने स्थान ६७ पर अत्यधिक दृढतासे
आग्रहपूर्वक अपने पडोसी स्थान ६६ पर
स्थित अमीनोएसिड आइसोल्यूसीनसे
(Isoleucine) जुडा रहता है; परन्तु जब
प्रोलीनके स्थानपर हिस्टिडीन आ
जाता है तब इस हिस्टिडीनमें अपने
पडोसी स्थान 66 पर स्थित
आइसोल्युसीनसे जुडे रहनेकी प्रबल
इच्छा नही पाई जाती |
इस स्थितिमें
यह एमिनो एसिड Histidine, मानव
शरीरकी पाचन क्रियामें सरलतासे टूट
कर पसर जाता है |
इस प्रक्रियासे एक 7
एमीनोएसिडका छोटा प्रोटीन
स्वच्छ्न्द रूपसे मानव शरीरमें
अपना भिन्न अस्तित्व बना लेता है |
इस 7 एमीनोएसिडके प्रोटीनको बीसीएम 7 BCM7
(बीटा Caso Morphine7) नाम
दिया जाता है |
2. BCM7 एक Opioid (narcotic) अफीम
परिवारका मादक तत्व है
जो अत्यधिक शक्तिशाली Oxidant
ऑक्सीकरण तत्त्वके रूपमें मानव
स्वास्थ्यपर अपनी श्रेणीके दूसरे अफीम
जैसे ही मादक
तत्वों जैसा दूरगामी दुष्प्रभाव
छोडता है |
जिस दूधमें यह
विषैला मादक तत्व बीसीएम 7
पाया जाता है, उस
दूधको वैज्ञानिकोंने ए1 दूधका नाम
दिया है |
यह दूध उन विदेशी गौओंमें
पाया गया है जिनके डीएनएमें ६७
स्थानपर प्रोलीन न हो कर
हिस्टिडीन होता है |
आरम्भमें जब दूधको बीसीएम7 के कारण
बडे स्तरपर जानलेवा रोगोंका कारण
पाया गया तब न्यूज़ीलेंडके सारे
डेरी उद्योगके दूधका परीक्षण आरम्भ
हुआ |
सारे डेरी दूधपर किए जानेवाले
प्रथम अनुसंधानमे जो दूध मिला वह
बीसीएम7 से दूषित पाया गया |
इसलिए यह सारा दूध ए1 कहलाया |
तदोपरांत ऐसे दूधकी आविष्कार आरम्भ
हुई जिसमें यह बीसीएम7 विषैला तत्व न
हो |
इस दूसरे अनुसंधान अभियानमें
जो बीसीएम7 रहित दूध
पाया गया उसे ए2 नाम दिया गया |
सुखद बात यह है कि विश्वकी मूल
गायकी प्रजातिके दूधमें, यह विष तत्व
बीसीएम7 नहीं मिला, इसलिए
देसी गायका दूध ए2 प्रकारका दूध
संबोधित किया जाता है |
देसी गायके दूधमें यह स्वास्थ्य नाशक
मादक विष तत्व बीसीएम7
नही होता |
आधुनिक वैज्ञानिक अनुसंधानसे अमेरिकामें यह
भी पाया गया कि ठीकसे पोषित
देसी गायके दूध और दूधके बने पदार्थ
मानव शरीरमें कोई भी रोग उत्पन्न
नहीं होने देते |
भारतीय परम्परामें
इसलिए देसी गायके दूधको अमृत
कहा जाता है |
आज
यदि भारतवर्षका डेरी उद्योग
हमारी देसी गायके ए2
दूधकी उत्पादकताका महत्व समझ लें
तो भारत सारे विश्व डेरी दूध
व्यापारमें सबसे बडा दूध निर्यातक देश
बन सकता है |
देसी गायकी पहचान
आज के वैज्ञानिक युग में, यह
भी महत्त्वका विषय है
कि देसी गायकी पहचान
प्रामाणिक रूपसे हो सके |
साधारण
बोल चालमे जिन गौओं में कुकुभ, गल
कम्बल छोटा होता है उन्हे
य देसी नहीं माना जाता और
सबको जर्सी कह दिया जाता है |
प्रामाणिक रूपसे यह जाननेके लिए
कि कौन सी गाय मूल
देसी गायकी प्रजातिकी हैं,
गौका डीएनए जांचा जाता है | इस
परीक्षणके लिए गायकी पूंछके बालके
एक टुकडेसे ही यह सुनिश्चित
हो जाता है कि वह गाय देसी गाय
मानी जा सकती है या नहीं |
यह
अत्याधुनिक विज्ञानके अनुसन्धान
का विषय है |
पाठकोंकी जानकारीके लिए भारत
सरकारसे इस अनुसंधानके लिए आर्थिक सहयोगके
प्रोत्साहनसे भारतवर्षके
वैज्ञानिक इस विषयपर अनुसंधान कर
रहे हैं और निकट भविष्यमें वैज्ञानिक
रूपसे देसी गायकी पहचान सम्भव
हो सकेगी |
इस महत्वपूर्ण
अनुसंधानका कार्य दिल्ली स्थित
महाऋषि दयानंद गोसम्वर्द्धन
केंद्रकी पहल और भागीदारीपर और
कुछ भारतीय वैज्ञानिकोंके निजी उत्साहसे आरम्भ
हो सका है |
ए1 दूधका मानव स्वास्थ्यपर दुष्प्रभाव
जन्मके समय बालकके शरीरमें blood brain
barrier नही होता | माताके स्तन
पान करानेके बाद तीन चार
वर्षकी आयु तक शरीरमें यह ब्लडब्रेन
बैरियर स्थापित हो जाता है |
इसलिए जन्मोपरांत माताके पोषन और
स्तनपान द्वारा शिषुको मिलनेवाले
पोषणका, बचपनमें ही नही, बडे
हो जानेपर भविष्यमें भी मस्तिष्कके
रोग और शरीरकी रोग निरोधक
क्षमता ,स्वास्थ्य, और व्यक्तित्वके
निर्माणमें अत्यधिक महत्व
बताया जाता है |
बाल्य कालके रोग (Pediatric disease)
आजकल भारत वर्षमें ही नहीं सारे
विश्वमें, जन्मोपरान्त बच्चोंमें
जो Autism (बोध अक्षमता ) और
Diabetes type1 (मधुमेह) जैसे रोग बढ रहे हैं
उनका स्पष्ट कारण ए1 दूध
का बीसीएम7 पाया गया है |
वयस्क समाजके रोग (Adult disease)
मानव शरीरके सभी metabolic
degenerative disease शरीरके स्वजन्य
रोग जैसे उच्च रक्त चाप (high blood
pressure) हृदय रोग (Ischemic Heart
Disease) तथा मधुमेहका (Diabetes)
प्रत्यक्ष सम्बंध बीसीएम 7 वाले ए1 दूध
से स्थापित हो चुका है |
यही नहीं बुढापेके मानसिक रोग
भी बचपनमें ए1 दूधका प्रभावके
रूपमें भी देखे जा रहे हैं |
सम्पूर्ण विश्वमें डेयरी उद्योग आज
चुपचाप अपने पशुओंकी प्रजनन
नीतियोंमें ” अच्छा दूध अर्थात् BCM7
मुक्त ए2 दूध “ के उत्पादनके आधारपर
परिवर्तन ला रहा हैं |
वैज्ञानिक
शोध इस विषयपर
भी किया जा रहा है कि किस
प्रकार अधिक ए2 दूध
देनेवाली गौओंकी प्रजातियां विकसित
की जा सकें |
डेरी उद्योगकी भूमिका
मुख्य रूपसे यह हानिकारक ए1 दूध
होल्स्टिन फ्रीज़ियन
प्रजातिकी गायमें ही मिलता है, यह
भैंस जैसी दीखनेवाली, अधिक दूध देनेके
य कारण सारे
डेरी उद्योगकी पसन्दीदा गाय है |
होल्स्टीन, फ्रीज़ियन दूधके ही कारण
लगभग सारे विश्वमें डेरीका दूध ए1
पाया गया | विश्वके सारे
डेरी उद्योग और राजनेताओंकी आज
यही कठिनाई है कि अपने सारे ए1 दूध
को एक दम कैसे अच्छे ए2 दूधमें कैसे
परिवर्तित करें |
आज
विश्वका सारा डेरी उद्योग
भविष्यमें केवल ए2 दूधके उत्पादनके लिए
अपनी गौओंकी प्रजातिमे नस्ल
सुधारके नये कार्यक्रम चला रहा है |
विश्व बाज़ारमे भारतीय नस्लके गीर
वृषभोंकी इसलिए अत्यधिक मांग
भी हो गयी है | साहीवाल नस्लके
अच्छे वृषभकी भी बहुत मांग बढ गयी है |
सबसे पहले यह अनुसंधान न्यूज़ीलेंडके
वैज्ञानिकोंने किया था; परन्तु
वहांके डेरी उद्योग और
सरकारी तंत्रकी मिलीभगतसे यह
वैज्ञानिक अनुसंधान छुपानेके
प्रयत्नोंसे उद्विग्न होनेपर, वर्ष २००७ में
Devil in the Milk-illness, health and
politics A1 and A2 Milk” नामकी पुस्तक
कीथ वुड्फोर्ड द्वारा न्यूज़ीलेंडमें
प्रकाशित हुई |
ऊपर उल्लेखित पुस्तकमें
विस्तारसे लगभग तीस वर्षोंके विश्व
भरके आधुनिक चिकित्सा विज्ञान
और रोगोंके अनुसंधानके आंकडोंके
आधारपर यह सिद्ध किया जा सका है
कि बीसीएम7 युक्त ए1 दूध मानव
समाजके लिए विषतुल्य है |
इन पंक्तियोंके लेखकने भारतवर्षमें २००७ में
ही इस पुस्तकको न्युज़ीलेंडसे मंगा कर
भारत सरकार और डेरी उद्योगके
शीर्षस्थ अधिकारियोंका इस
विषयपर ध्यान आकर्षित कर,
देसी गायके महत्वकी ओर वैज्ञानिक
आधारपर प्रचार और
ध्यानाकर्षणका एक अभियान
चला रखा है; परन्तु अभी भारत
सरकारने इस विषयको गम्भीरतासे
नही लिया है |
डेरी उद्योग और भारत सरकारके गोपशु
पालन विभागके
अधिकारी व्यक्तिगत स्तरपर तो इस
विषयको समझने लगे हैं; परंतु
भारतवर्षकी और
डेरी उद्योगकी नीतियोंमें
परिवर्तित करनेके लिए जिस
नेतृत्वकी आवश्यकता होती है उसके
लिए तथ्योंके अतिरिक्त सशक्त
जनजागरण भी आवश्यक होता है इसके
लिए जन साधारणको इन तथ्योंके
बारेमे अवगत कराना भारत वर्षके हर देश
प्रेमी गोभक्तका दायित्व बन
जाता है |
विश्व मंगल गो ग्रामयात्रा इसी जन
चेतना जागृतिका शुभारम्भ है |
देसी गायसे विश्वोद्धार
भारत वर्षमें यह विषय डेरी उद्योगके गले
सरलतासे नही उतर रहा,हमारा सम्पूर्ण
डेरी उद्योग तो प्रत्येक प्रकारके
दूधको एक जैसा ही समझता आया है |
उनके लिए देसी गायके ए2 दूध और
विदेशी ए1 दूध देनेवाली गायके दूधमें
कोई अंतर नही होता था |
गाय और
भैंसके दूधमें भी कोई अंतर
नहीं माना जात,सारा ध्यान अधिक
मात्रामें दूध और वसा देनेवाले पशुपर
ही होता है |
किस दूधमें
क्या स्वास्थ्य नाशक तत्व हैं, इस
विषयपर डेरी उद्योग कभी सचेत
नहीं रहा है |
सरकारकी स्वास्थ्य
संबन्धित नीतियां भी इस विषयपर
केंद्रित नहीं हैं |
भारतमें किए गए NBAGR (राष्ट्रीय पशु
आनुवंशिक संसाधन ब्यूरो) द्वारा एक
प्रारंभिक अध्ययनके अनुसार यह
अनुमान है कि भारत वर्ष में ए1 दूध देने
वाली गौओंकी संख्या पंद्रह
प्रतिशतसे अधिक नहीं है |
भरत्वर्षमें
देसी गायोंके संसर्गकी संकर नस्ल
ज्यादातर डेयरी क्षेत्रके साथ ही हैं |
आज सम्पूर्ण विश्वमें यह चेतना आ गई है
कि बाल्यावस्थामें बच्चोंको केवल ए2
दूध ही देना चाहिये | विश्व बाज़ारमें
न्युज़ीलेंड, ओस्ट्रेलिया, कोरिआ,जापान और अब
अमेरिका मे प्रमाणित
ए2 दूधके मूल्य साधारण ए1 डेरी दूधके
यदामसे कही अधिक हैं |
ए2 से देने
वाली गाय विश्वमें सबसे अधिक
भारतवर्षमें पाई जाती हैं |
यदि हमारी देसी गोपालनकी नीतियोंको समाज
और शासनका प्रोत्साहन मिलता है
तो सम्पूर्ण विश्व के लिए ए2 दूध आधारित
बालाहारका निर्यात
भारतवर्षसे किया जा सकता है | यह
एक बडे आर्थिक महत्वका विषय है |