मंगलवार, 26 अप्रैल 2016

25. गौ-चिकित्सा - (सींगरोग)

गौ-चिकित्सा - सींगरोग । 


सींग का टूट जाना
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यदि सींग टूटने पर रक्त बह रहा हो तो सींग के ऊपर पुरूष के बाल लपेटकर कपड़ा बाँध दें और उसके ऊपर गाय का या बकरी का दूध या अलसी का तेल व कपूर मिलाकर पट्टी को तेलकपूर से तर कर दें । इस प्रयोग से यथाशीघ्र लाभ होता हैं । यदि इस प्रयोग के क्रियान्वयन से ख़ून बहना नहीं रूकता है तो फिटकरी मिले हूए ठण्डे जल से तर करके पट्टी बाँधकर इसके बाद ऊपर वाली दवा का प्रयोग करना चाहिए ।

24 - गौ - चिकित्सा (आग से जलना)

१ - आग से जल जाना 
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कारण व लक्षण - पशु जिस स्थान पर बँधे होते है उस स्थान पर आग लग जाने से या किसी भी कारण से आग से जल जाने पर इलाज इस प्रकार करें । 

१ - औषधि - अलसी का तेल १२० ग्राम , चूने का पानी ६० ग्राम , राल ( बारूद ) १२ ग्राम , राल को पीसकर तीनों आपस में मिलाएँ फिर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक लगायें। 

२ - औषधि - असली शहद २४० ग्राम , बढ़िया सिन्दुर ( कामियाँ सिन्दुर ) १२० ग्राम , दोनों को आपस में ख़ूब फैंट कर रोगी पशु को दिन में तीन बार लगाये , ठीक होने तक लगाते रहे। या पहले शहद लगाकर ऊपर से सिन्दुर भी लगा सकते है । 

३ - औषधि - उँधा फूली के पत्तों का रस ( पाना चोली ) १२ ग्राम , अलसी का तेल ६० ग्राम , दोनों को आपस में फैटकर रोगी पशु को अच्छा होने तक दिन में दो तीन बार लगाते रहे । 

४ - औषधि - कई बार मक्खियाँ बहुत अधिक सताती है तो ऐसी स्थिति में हमें डीकामाली ( मालती बेल ) ६० ग्राम , अलसी का तैल १२० ग्राम , डीकामाली को महीन पीसकर तथा तैल में भिगोकर रोगी पशु को ठीक होने तक दिन में तीन बार लगायें। कई बार अलसी के तैल के स्थान पर नारियल का तैल भी उक्त स्थान पर लगा सकते है। इससे ज़्यादा फ़ायदा होगा। एक बात और ध्यान रखना चाहिए कि डीकामाली को पीसकर रख लें । लगाने से पहले ही तैल में मिलाएँ क्योंकि मिलाकर अधिक समय रखने पर डीकामाली की गन्ध उड़ जाती है। 

५ - औषधि - मोरपंख को जलाकर उसकी राख को चलनी में छानकरनारियल के तैल में मिलाकर पशु को अच्छा होने तक दिन में दो बार लगाते रहें। 
मोरपंख व नारियल तैल को आप किसी भी घाव पर लगा सकते है जहाँ मक्खियाँ ज़्यादा सताती हो वहाँ प्रयोग करें । 

६ - औषधि - बेर की पत्ती ( बोर की पत्ती ) २४ ग्राम , अलसी का तैल ६० ग्राम , पत्तियों को ख़ूब महीन पीसकर तथा तैल में मिला कर रोगी पशु को दिन में दो बार लगाते रहे ठीक होने तक। 

७ - औषधि - घृतकुमारी ( एलोविरा ) गूद्दा ४८० ग्राम गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी २४० ग्राम , घृतकुमारी के गूद्दे को दही में मिलाकर ख़ूब मथकर इसमें पानी मिला कर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक रोज़ पिलाते रहें। 

८ - औषधि - बेल ( बिल्व फल ) का गूद्दा ४८० ग्राम , गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी ९६० ग्राम , पहले बेल फल के गूद्दे को पानी में मथकर छान लें, फिर उसे दही में मथकर रोगी पशु को दिन में तीन बार अच्छा होने तक पिलाते रहें । 

९ - औषधि - मेंथी के बीज ४८० ग्राम , गाय के दूध की दही ९६० ग्राम , पानी १८२० ग्राम , पहले मेंथी के दानों को महीन पीसकर पानी मे गलाये फिर दही में मिलाकर रोगी पशु को दिन में दो बार पिलाते रहे अच्छा होने तक। पशु अवश्य ठीक होगा । 

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२ - गरम पानी से जल जाना 
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कारण व लक्षण - कभी- कभी अज्ञानतावश पशु को अधिक गरम पानी से सेंक देतें हैं या गरम - गरम पानी फैंक देत है उसके ऊपर , जिससे पशु जल जाता है । उसकी चमड़ी सुन्न पड़ जाती है और तिडक जाती है । 

१ - औषधि - गेरू ६० ग्राम , अलसी का तैल १२० ग्राम , गेरू को महीन पीसकर कपडछान करके तैल में मिलाकर रोगग्रस्त स्थान पर दोनों वक़्त , सुबह- सायं ठीक होने तक लगाते रहे । 

२ - औषधि - चूने का पानी ६० ग्राम , अलसी का तैल ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर ख़ूब हिलायें और उसके बाद में रोगी पशु को लगायें । 

३ - औषधि - सिन्दुर ६० ग्राम , शहद ६० ग्राम , दोनों को मिलाकर जले हुए स्थान पर लेप कर दें । और ठीक होने तक करते रहें । 

गुरुवार, 7 अप्रैल 2016

गोकृपा महोत्सव।।नन्दगाँव।।8 से 16 अप्रैल 2016

॥ श्री सुरभ्यै नम: ॥
        ॥ जय सियाराम , वन्दे गौ मातरम् ॥
॥ गौमाता राष्ट्रमाता के चरणों में,हमारा कोटी-कोटी वंदन ॥
     गौहत्या का कलंक भारत के माथे से मिटाना हैं ,
          पुनः राष्ट्र को विश्व गुरु बनाना हैँ ।
विश्व की सबसे बडी गौशाला श्री गौधाम पथमेडा जहां लगभग दो लाख देशी गौवंश की सेवा हो रही हैं ।
इस घोर कलीकाल में गौऋषी स्वामी श्री दत्तशरणांनदजी महाराज साक्षात प्रभु श्रीकृष्ण के अवतार हैं , श्रद्धेय स्वामी रामसुखदासजी महाराज के पदचिन्हो पर चलते हुए हम जैसे कंचन कामनी में आशक्त मनुष्यों को गौसेवा में लगा कर हमारा लोक और परलोक दोनों को सुधार रहे हैं ।
गौरक्षा के इस शुभ कार्य में पथमेडा महाराजश्री के साथ श्री मलुकपीठ वाले महाराज श्रीराजेन्द्रदेववाचार्यजी महाराज  बराबर का साथ दे कर एक और एक ग्यारह होते हैं इसे सिद्ध कर रहे हैं ।
1966 में धर्म सम्राट करपात्रीजी महाराज के नेतृत्व में गौहत्या बंदी आंदोलन को 2016 में 50 वर्ष पुरे हो रहे हैं,इस अवसर पर श्री पथमेडा महाराज जी की प्रेरणा से 8/4/2016 से 16/4/2016 तक श्रीमनोरमा गौलोक महातीर्थ में 1008 गौमाताओं के सान्नीध्य में श्री मद् भागवदजी का सस्वर पारायण होगा, गौमाता सुरभी शक्ति पीठ की स्थापना भी होगी, जिससे सभी गौभक्तों को अध्यात्मीक ऊर्जा प्राप्त होगी और इस सात्विक ऊर्जा का उपयोग भारतीय देशी गौवंश के संरक्षण संवर्धन नस्ल सुधार और संपूर्ण राष्ट्र में गौहत्या बंदी कानुन लागु करवाकर गौमाता को राष्ट्र माता के पद पर सुशोभित करने में गौभक्त इस ऊर्जा का उपयोग करेंगे ।
राष्ट्र भक्तों ने 2014 के चुनाव में एक अभियान चला कर देश की बागडोर मोदी जी को सौंप दी हैं, मोदीजी का सौभाग्य हैं की उनके शासन काल 2016 में गौहत्या बंदी आंदोलन की स्वर्ण जयंती मनाई जाएगी, इस शुभअवसर पर मोदीजी को राजधर्म का पालन करते हुए करोड़ों-करोड़ राष्ट्रभक्तों की भावनाओं का सम्मान करते हुए तत्काल प्रभाव से भारतीय देशी गौवंश के संरक्षण संवर्धन नस्ल सुधार की दिशा में ठोस कदम उठाते हुए संपूर्ण राष्ट्र में गौहत्या बंदी कानून लागु करके गौमाता को राष्ट्र माता पद पर सुशोभित करें और राजधर्म का पालन करें ।
2016 की गोपाष्टमी तक मोदीजी के कार्यकाल का आधा समय पुरा हो जाएगा यदी इस समय तक देशी गौवंश की रक्षार्थ कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाया गया तो , इसके बाद की स्थीती की पुरी जिम्मेदारी स्वंय मोदीजी की होगी जो राष्ट्र भक्त मोदीजी के हाथ में सत्ता दे सकते हैं वे सत्ता ले भी सकते हैं ।
सावधान , अब राम कृष्ण की भुमी पर गौहत्या बर्दाश्त नहीं किया जाएगा ,
गौरक्षार्थ हम सर्वस्व बलीदान करने के लिए तैयार हैं ।
मोदीजी से नम्र निवेदन हैं 1966 का आंदोलन दोहराने को मजबूर ना करें । यदी दोबारा आंदोलन हुआ तो गौ विरोधीयो के लिए छुपने की जगह कम पड जाएगी ।।
         हमारा परम धन , गौधन ।
गौवंश की कृपा दृष्टि सभी , गौभक्तों पर सदैव बनी रहे ,
     यही मंगल कामना गौमाता के चरणों में ।
          ॥ गौवंश बचाओ , भारत बचाओ ॥ 
             ॥ जय गौमाता , जय गोपाल ॥

गो कृपा का पाने सन्देश
प्रिये पधारो म्हारे देश।
निवेदक
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया

गोमाता की आराधना

जय जय गोमाता सुखसागर। जय देवी अमृत की गागर॥
जीवनरस सरिता तुम दाता। तेरी महिमा गाएँ विधाता॥
वेद-पुराणों ने गुण गाया। धर्म सनातन ने अपनाया॥
दर्शन तेरा मंगलकारी। सदगुण पा जाते नर-नारी॥
वास सभी देवों का तुझमें। पुण्य सभी तीर्थों का तुझमें॥
मनोकामना पूरण करती। कामधेनु बन झोली भरती॥
चरणों की रज अति उपकारी। महापापनाशक, सुखकारी॥
जगमाता हो पालनहारी। गोपालक हैं कृष्णमुरारी॥
कृपा तिहारी बड़ी निराली। धर्म, अर्थ को देनेवाली॥
गोदर्शन यात्री जो पावे। निश्चय यात्रा सफल बनावे॥
गोरस होता सुधा समाना। सत्य सनातन सबने माना॥
दुग्ध, दही, घी, गोमूत्र पावन। गौमय रस होता मनभावन॥
पंचगव्य मिश्रण है इनका। रोग मिटें जिनसे बन तिनका॥
पंचगव्य भारी फलदायी। जनमानस ने सेहत पायी॥
जिस घर में हो वास तिहारा। घर वो है मंदिर सा प्यारा॥
रहती सुख-समृद्धि हमेशा। सदा दूर ही भागे क्लेशा॥
जन जो गुड़ का भोग लगावे। बने प्रतापी, पुण्य कमावे॥
जिसकी सच्ची श्रद्धा होती। नर वो जनमानस का मोती॥
भाग्यवान पाता है मौका। मिलती गौसेवा की नौका॥
तरणी ये वर देनेवाली। भवबाधा को हरणेवाली॥
करता है जो तेरी सेवा। पाता मुँहमाँगा फल, मेवा॥
माता हम हैं शरण तिहारी। हरदम रक्षा करो हमारी॥


गाय को गोमाता के रूप में मानना भी अत्यन्त वैज्ञानिक है।

गाय को गोमाता के रूप में मानना भी अत्यन्त वैज्ञानिक है।

गाय को गोमाता के रूप में मानना भी अत्यन्त वैज्ञानिक है। मां के दूध के बाद सबसे पौष्टिक आहार देसी गाय का दूध ही है। इसमें जीव के लिये उपयोगी ऐसे संजीवन तत्व है कि इसका सेवन सभी विकारों को दूर रखता है। जिस प्रकार मां जीवन देती है उसी प्रकार गोमाता पूरे समाज का पोषण करने का सामर्थ्य रखती है । इसमें माता के समान ही संस्कार देने की भी क्षमता है । देशज वंशों की गाय स्नेह की प्रतिमूर्ति होती है। गाय जिस प्रकार अपने बछड़े अर्थात वत्स को स्नेह देती है वह अनुपमेय है, इसलिये उस भाव को वात्सल्य कहा गया है। वत्स के प्रति जो भाव है वह वत्सलता है। भारत में गाय को देवी का दर्जा प्राप्त है। ऐसी मान्यता है कि गाय के शरीर में 33 करोड़ देवताओं का निवास है। यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है।प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था। जिस राज्य में जितनी गायें होती थीं उसको उतना ही सम्पन्न माना जाता है। कृष्ण के गाय प्रेम को भला कौन नहीं जानता। इसी कारण उनका एक नाम गोपल भी है।
मानव को स्वयं में परिपूर्ण होने के लिये आत्मीयता के इस संस्कार की बड़ी आवश्यकता है। परिवार, समाज, राष्ट्र व पूरी मानवता को ही धारण करने के लिये यह त्याग का संस्कार अत्यन्त आवश्यक है। पूरे विश्व का पोषण करने में सक्षम व्यवस्था के निर्माण के लिये अनिवार्य तत्व का संस्कार गोमाता मानव को देती है। शोषण मानव को दानव बनाता है।

गोमूत्र सभी रोगों की रामबाण औषधि- स्वामी अखिलेश्वरानंद

गोमूत्र सभी रोगों की रामबाण औषधि- स्वामी अखिलेश्वरानंद


गाय भारतीय समाज-जीवन के सभी पहलुओं को र्स्पा और प्रभावित करती है। गाय में अर्थशास्त्र, समाजशास्त्र, चिकित्साशास्त्र का समावेश है। यह कहना है स्वामी अखिलेश्वरानंद का। स्वामी जी विश्व मंगल गो-ग्राम यात्रा के स्वागत के लिए पठानकोट में आयोजित एक जनसभा को सम्बोधित कर रहे थे।
स्वामी जी ने कहा कि गाय अपने आप में एक सम्पूर्ण विज्ञान है। गोमूत्र सभी रोगों की रामबाण औषधि है। यह सम्पूर्ण शरीर का शोधन करके रागों का नाश करता है। उन्होंने कहा कि भारतीय शास्त्रों में गोविज्ञान की बात कही गयी है। गाय का दूध, मूत्र, गोबर आर्थिक विकास में उपयोगी है और वैज्ञानिक कसौटी पर पर भी खरे उतरे हैं। उन्होंने कहा कि गाय को अपने जीवन से दूर करने के कारण ही पंजाब की समृध्दि में कमी आयी है।
इससे पहले कठुआ में आयोजित स्वागत सभा में बोलते हुए गो विज्ञान अनुसंधान केंद्र के सुरो धवन ने गाय की उपयोगिता और पंचगव्य को लेकर हुए आधुनिक शोधों के बारे में जानकारी दी। उन्होंने कहा कि बाजार में उपलब्ध घी बनाने की प्रक्रिया दोषपूर्ण है। बाजारु घी स्वास्थ्य को हानि पहुंचाता है। जबकि ठीक प्रकार से बनाया गया गाय का घी हृदयरोगियों के लिए भी लाभदायक है।
यात्रा को जम्मू से हिमाचल प्रदो में प्रवो करने पर नूरपुर में यात्रा का भव्य स्वागत किया गया। कांगडा में आयोजित स्वागत -सभा में बोलते हुए ज्वाला देवी मंदिर के स्वामी सूर्यनाथ ने कहा कि स्वतंत्रता के बाद पं. जवाहर लाल नेहरु और उनके समर्थकों के कारण गोहत्या पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने वाला प्रस्ताव संसद में पारित नही हो सका। उन्होंने गोशालाओं मे सुधार करने की भी बात कही।
गोकर्ण पीठाधीश्‍वर जगद्गुरु शंकराचार्य राघवेश्वर भारती ने आंकडों का हवाला देते हुए कहा कि 1947 में एक हजार भारतीयों पर 430 गोवंश उपलब्ध थे। 2001 में यह आंकडा घटकर 110 हो गयी। और 2011 में यह आंकडा घटकर 20 गोवंश प्रति एक हजार व्यक्ति हो जाने का अनुमान है।
उन्होंने कहा कि गोमाता की रक्षा करके ही भारतमाता और प्रकृति माता की रक्षा की जा सकती है।
फिल्म अभिनेता सुरेश ओबेराय ने अपना व्यक्तिगत अनुभव बताते हुए कहा कि गोदुग्ध के सेवन से उनके पूरे परिवार में प्यार का माहौल बन गया है। उन्होंने कहा कि गोवंश के महत्व को तार्किक रुप से समझने की आवश्यकता है।

गोमाता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ- महात्‍मा गॉधी

गोमाता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ- महात्‍मा गॉधी


गाय भारतीय संस्कृति का मूल आधार है। हमारे देश का संपूर्ण राष्टजीवन गाय पर आश्रित है। गौमाता सुखी होने से राष्ट सुखी होगा और गौ माता दुखी होने से राष्ट के प्रति विपत्तियां आयेंगी, ऐसा माना जा सकता है।
गाय को आज व्यावहारिक उपयोगिता के पैमाने पर मापा जा रहा है किंतु यह ध्यान रखना आवश्यक है कि आधुनिक विज्ञान की सीमाएं हैं। आज का विज्ञान गाय की सूक्ष्म व परमोत्कृष्ट उपयोगिता के विषय में सोच भी नहीं सकता। भारतीय साधु, संत तथा मनीषियों को अपनी साधना के बल पर गाय की इन सूक्ष्म उपयोगिताओं के बारे में ज्ञान प्राप्त किया था। इसलिए ही उन्होंने गाय को गौमाता कहा था। भारतीय शास्त्रों में गौ महात्म्य के विषय में अनेक कथाएं मिलती हैं।
गाय का सांस्कृतिक व आर्थिक महत्व है। संक्षेप में कहा जाए तो भारतीय ग्रामीण अर्थ व्यवस्था का आधार गाय ही है। गाय के बिना भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था की कल्पना तक नहीं की जा सकती।
महात्मा गांधी एक मनीषी थे। वह भारतीयता के प्रबल पक्षधर थे। उनका स्पष्ट मत था कि भारत को पश्चिम का अनुकरण नहीं करना चाहिए। भारत को अपनी संस्कृति. विरासत व मूल्यों के आधार पर विकास की राह पर आगे बढना चाहिए। गांधी जी ने अपनी प्रसिद्ध पुस्तक हिन्द स्वराज में लिखा है – अंग्रेजों के विकास माडल को अपनाने से भारत, भारत नहीं रह जाएगा और भारत सच्चा इंगलिस्तान बन जाएगा।
गांधी जी का यह स्पष्ट मानना था कि देश में ग्राम आधारित विकास होने की आवश्यकता है। ग्राम आधारित विकास के लिए भारत जैसे देश में गाय का कितना महत्व है, उनको इस बात का अंदाजा था। गांधी जी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व कहा है। गांधी जी कहते थे कि जो हिन्दू गौ रक्षा के लिए जितना अधिक तत्पर है वह उतना ही श्रेष्ठ हिन्दू है। गौरक्षा के लिए गांधी जी किसी भी सीमा तक जाने के लिए तैयार थे।
महात्मा गांधी ने गाय को अवमानवीय सृष्टि का पवित्रतम रुप बताया है। उनका मानना था कि गौ रक्षा का वास्तविक अर्थ है ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा। उन्होंने 1921 में यंग इंडिया पत्रिका में लिखा “ गाय करुणा का काव्य है। यह सौम्य पशु मूर्तिमान करुणा है। वह करोड़ों भारतीयों की मां है। गौ रक्षा का अर्थ है ईश्वर की समस्त मूक सृष्टि की रक्षा। प्राचीन ऋषि ने, वह जो भी रहा हो, आरंभ गाय से किया। सृष्टि के निम्नतम प्राणियों की रक्षा का प्रश्न और भी महत्वपूर्ण है क्योंकि ईश्वर ने उन्हें वाणी नहीं दी है। ” ( यंग इंडिया, 6-11-1921)
गांधी जी ने अत्यंत मार्मिक शब्दों में लिखा – “ गाय अवमानवीय सृष्टि का पवित्रतम रुप है। वह प्राणियों में सबसे समर्थ अर्थात मनुष्यों के हाथों न्याय पाने के वास्ते सभी अवमानवीय जीवों की ओर से हमें गुहार करती है। वह अपनी आंखों की भाषा में हमसे यह कहती प्रतीत होती है : ईश्वर ने तुम्हें हमारा स्वामी इसलिए नहीं बनाया है कि तुम हमें मार डालो, हमारा मांस खाओ अथवा किसी अन्य प्रकार से हमारे साथ दुर्वव्यहार करो, बल्कि इसलिए बनाया है कि तुम हमारे मित्र तथा संरक्षक बन कर रहो।” ( यंग इंडिया, 26.06.1924)
महात्मा गांधी गौ माता को जन्मदात्री मां से भी श्रेष्ठ मानते थे। गौ माता निस्वार्थ भाव से पूरे विश्व की सेवा करती है। इसके बदले में वह कुछ भी नहीं मांगती। केवल जिंदा रहने तक ही नहीं बल्कि मरने के बाद भी वह हमारे काम में आती है। अगर निस्वार्थ भाव से सेवा का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण कहीं देखने को मिलता है तो वह गौ माता है।
गांधी जी लिखते हैं – “ गोमाता जन्म देने वाली माता से श्रेष्ठ है। हमारी माता हमें दो वर्ष दुग्धपान कराती है और यह आशा करती है कि हम बडे होकर उसकी सेवा करेंगे। गाय हमसे चारे और दाने के अलावा किसी और चीज की आशा नहीं करती। हमारी मां प्राय: रुग्ण हो जाती है और हमसे सेवा करने की अपेक्षा करती है। गोमाता शायद ही कभी बीमार पडती है। गोमाता हमारी सेवा आजीवन ही नहीं करती, अपितु अपनी मृत्यु के उपरांत भी करती है। अपनी मां की मृत्यु होने पर हमें दफनाने या उसका दाह संस्कार करने पर भी धनराशि व्यय करनी पडती है। गोमाता मर जाने पर भी उतनी ही उपयोगी सिद्ध होती है जितनी अपने जीवन काल में थी। हम उसके शरीर के हर अंग – मांस, अस्थियां. आंतें, सींग और चर्म का इस्तमाल कर सकते हैं। ये बात हमें जन्म देने वाली मां की निंदा के विचार से नहीं कह रहा हूं बल्कि यह दिखाने के लिए कह रहा हूं कि मैं गाय की पूजा क्यों करता हूं। ”( हरिजन , 15.09-1940)
गांधीजी गौ रक्षा के लिए संपूर्ण विश्व का मुकाबला करने के लिए तैयार थे। 1925 में यंग इंडिया में उन्होंने इस बात का उल्लेख किया है। उन्होंने लिखा है – “ मैं गाय की पूजा करता हूं और उसकी पूजा का समर्थन करने के लिए दुनिया का मुकाबला करने को तैयार हूं। ” – (यंग इंडिया, 1-1-1925)
गांधीजी का मानना था कि गौ हत्या का कलंक सिर्फ भारत से ही नहीं बल्कि पूरे देश से बंद होना चाहिए। इसके लिए भारत से यह कार्य शुरु हो, यह वह चाहते थे। उन्होंने लिखा है – “ मेरी आकांक्षा है कि गौ रक्षा के सिद्धांत की मान्यता संपूर्ण विश्व में हो। पर इसके लिए यह आवश्यक है पहले भारत में गौवंश की दुर्गति समाप्त हो और उसे उचित स्थान मिले ” – (यंग इंडिया, 29-1-1925)
आर्थिक दृष्टि से लाभदायक न होने वाले पशुओं की हत्या की जो परंपरा पश्चिम में विकसित हुई है गांधी जी उसकी निंदा करते थे। गांधीजी उसे ‘हृदयहीन व्यवस्था’ कहते थे। उन्होंने बार-बार कहा कि ऐसी व्यवस्था का भारत में कोई स्थान नहीं है। इस बारे में उन्होंने एक बार हरिजन पत्रिका में लिखा। गांधीजी की शब्दों में – “ जहां तक गौरक्षा की शुद्ध आर्थिक आवश्यकता का प्रश्न है, यदि इस पर केवल इसी दृष्टि से विचार किया जाए तो इसका हल आसान है। तब तो बिना कोई विचार किये उन सभी पशुओं को मार देना चाहिए जिनका दूध सूख गया है या जिन पर आने वाले खर्च की तुलना में उनसे मिलने वाले दूध की कीमत कम है या जो बूढे और नाकारा हो गए हैं। लेकिन इस हृदयहीन व्यवस्था के लिए भारत में कोई स्थान नहीं है , यद्यपि विरोधाभासों की इस भूमि के निवासी वस्तुत: अनेक हृदयहीन कृत्यों के दोषी हैं। ” (हरिजन ,31.08. 1947)
महात्मा गांधी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व कहा है। गौ के महात्म्य के बारे में उन्होंने लिखा है – हिन्दू धर्म का केन्द्रीय तत्व गोरक्षा है। मैं गोरक्षा को मानव विकास की सबसे अदभुत घटना मानता हूं। यह मानव का उदात्तीकरण करती है। मेरी दृष्टि में गाय का अर्थ समस्त अवमानवीय जगत है। गाय के माध्यम से मनुष्य समस्त जीवजगत के साथ अपना तादात्म्य स्थापित करता है। गाय को इसके लिए क्यों चुना गया, इसका कारण स्पष्ट है। भारत में गाय मनुष्य की सबसे अच्छी साथिन थी। उसे कामधेनु कहा गया। वह केवल दूध ही नहीं देती थी, बल्कि उसी के बदौलत कृषि संभव हो पाई। ” – (यंग इंड़िया, 6.10.1921)
महात्मा गांधी ने गौ रक्षा को हिन्दू धर्म के संरक्षण के साथ जोडा है। उनके शब्दों में – गो रक्षा विश्व को हिन्दू धर्म की देन है। हिन्दू धर्म तब तक जीवित रहेगा जब तक गोरक्षक हिन्दू मौजूद है। ”- (यंग इंड़िया, 6.10.1921)
अच्छे हिन्दुओं को हम कैसे परखेंगे। क्या उनके मस्तक से, तिलक से या मंत्रोच्चार से। गांधी जी का स्पष्ट मानना था कि गौ रक्षा की योग्यता ही हिन्दू होने का आधार है। गांधी जी के शब्दों में – “ हिन्दुओं की परख उनके तिलक, मंत्रों के शुद्ध उच्चारण, तीर्थयात्राओं तथा जात -पात के नियमों के अत्यौपचारिक पालन से नहीं की जाएगी, बल्कि गाय की रक्षा करने की उनकी योग्यता के आधार पर की जाएगी। ” (यंग इंडिया . 6.10.1921)
गांधी जी के उपरोक्त विचारों से स्पष्ट है कि बापू गौ रक्षा को कितना महत्वपूर्ण मानते थे। लेकिन इसे त्रासदी ही कहना चाहिए कि गांधी के देश में गौ हत्या धडल्ले से चल रही है। महात्मा गांधी के विचारों की हत्या कर दी गई है। आवश्यकता इस बात की है कि गांधी जी के विचारों के आधार पर, भारतीय शाश्वत संस्कृति व परंपराओं के आधार पर भारतीय व्यवस्था को स्थापित किया जाए और गौ माता की रक्षा के लिए जरूरी कदम उठाए जाएं, तभी गांधीजी के सपनों का राम राज्य स्थापित हो पाएगा।