शनिवार, 3 सितंबर 2016
शुक्रवार, 2 सितंबर 2016
गौ माँ की गाथा
~संत कबीर दास जी की गौभक्ती~
मूल पंजाबी रचयिता : सोढी मनोहरदास मेहरबान
रचनाकाल : १६६७ विक्रमी, साखी नं• ४ का अनुवाद
जहां पर कबीर को बुलवाया गया था, वहां पर कबीर का होने वाला ससुर पूछने लगा : अरे भाई समधियो ! इसे हमारे यहां ब्याह दो। तब कबीर के मां-बाप ने कहा कि भला होए जी ! चलिए ब्राह्मण से जा कर पूछते हैं, जो साहा जुड़े वह साहा मान लेते हैं। तब कबीर का पिता और ससुर उठ खड़े हुए और मिल कर ब्राह्मण के पास गए। पत्री कढाई, साहा निर्मल निकला, ब्राह्मण से साहा जुड़ाया, साहा जोड़- बांध कर दोनों के हाथ में थमा दिया गया। उसे लेकर कबीर का पिता और भावी ससुर अपने-अपने घर चले आए।
तब कबीर ने यह बानी बोली राग गुजरी में :
इह गऊ ब्रहमन कउ दीजै।। रहाउ ।।
तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
बैतरनी मिरतक मुकति करत है। सा तुम छेदहु नाही।।
तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
गोबरि जा के धरती सूची। सा तै आणी गाइआ।।
तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
जिसु कारणि तुमि गऊ बिणासहु। सा हमि छोडी नारी।।
इस प्रकार जब गोसाईं कबीर कुपित हो उठे, तब उन सभी का अभिमान छिटक गया। उन्होंने आपस में मसलत करी कि जिस कबीर ने यह बात कही है वह ब्याह न करेगा। आओ अब यह गऊ ब्राह्मण को दे दें और हम सीधा अनाज करें जैसा कबीर कहता है।
तब उन लोगों ने गोसाईं कबीर से कहा : भला जी ! हम यही प्रसाद बनाएंगे जी। पर जी ! अब तो तुम्हें ख़ुशी है न हमारे ऊपर। तब गोसाईं कबीर ने कहा : तुम्हारे ऊपर ठाकुर जी की ख़ुशी है, तुम्हारा भला होगा। तब वे सास-ससुर अपने घर चले गए। इधर बाबा-काका-परिवार के सब लोग ख़ुश हुए। इस प्रकार गोसाईं कबीर ब्याहे गए और राम-नाम स्मरण करने लगे.
गौशाला कैसी होनी चाहिए इसका वर्णन स्कंध पुराण में है
गौशाला कैसी होनी चाहिए
इसका वर्णन स्कंध पुराण में है
🐿गौशाला सुदृढ़ विस्तीर्ण और समतल होनी चाहिए।
🐿ठंडी हवा एवं गर्म हवा से सुरक्षा वाली होनी चाहिए।
🐿उसकी समतल भूमि में बालू बिछी होनी चाहिए।
🐿चारा डालने के लिए बड़ी बड़ी नादे होनी चाहिए।
🐿गौमाता को बाँधने के खूंटे नुकीले नहीं होने चाहिए।
🐿कोमल रस्सियों से ही गौमाता को बांधना चाहिए।
🐿पानी पीने के लिए कुण्ड या जलाशय होना चाहिए।
🕷🐜मच्छरों से रक्षा के लिए नीम की पत्तियों का शाम को धुँआ करना चाहिए।
🦄गोशाला साफ़ सुथरी और गोबर से रहित होनी चाहिए।
🐀वहाँ जूठन व कचरा नहीं डालना चाहिए।
🐐वहाँ बकरियों को नहीं बांधना चाहिए।
🙉एवम् थूक मल मूत्र विसर्जन नहीं करना चाहिए।
💥संध्या समय गोशाला में दीपक जलाने से लक्षमी की वृद्धि होती है।
🙏🏻इस तरह की गौशाला को दान करने वाला धन्य है।
🐄नवजात वत्स को गाय का 2 माह तक पूरा दूध पिलाना चाहिए। इसके पश्चात 2 थनों को दुहना चाहिए।
🐠समय समय पर गोओं को नमक देकर पानी पिलाना चाहिए।
🐎रात्रि में दीपक जलाकर बांसुरी या वीणा वाद्य सुनाकर पुराणों की दिव्य कथाये सुनानी चाहिए।
🌲इसे ही गोष्ठी कहा गया है।
🐾उनकी ह्रदय से माता पिता देवता और भगवान् समजकर पूजा करनी चाहिए।
🐾गौशाला में रजस्वला स्त्री को प्रवेश नहीं करना चाहिए ।
🐏रोगी बुड्ढी और दुबली पतली गायों की सेवा दिल लगाकर करनी चाहिए ।
🌹इस तरह सेवा होने पर कोई संशय नहीं है की भगवान् का धाम न मिले ।
देसी घी बनाने की विधि – Desi Ghee Recipe
🌻 *देशी घी बनाने की विधि* 🌻
बाजार में मिलने वाला घी और देशी घी में स्वाद और गुड़ दोनों ही अलग होते हैं, कितना भी शुद्ध बाज़ारू घी हो वो कच्चे दूध के ऊपर से मलाई निकाल कर बनाया जाता है, जबकि देशी घी केवल पकाये हुए दूध से ही तैयार हो सकता है।
✍आज इसे बनाने की विधि:
*दूध को उबाल कर ठंडा होने दें, उसके बाद उसको मलाई सहित दही जमा दें।*
*दही जमने के बाद उसमें बराबर मात्रा पानी मिलाएं फिर किसी मटकी या किसी बड़े बर्तन में लकड़ी से बनी हाथ की मथानी से उसे मथते है, सारा कमाल उसे मथने का है ज़्यादा मथ जाने पर घी नही निकलेगा, आसानी से मथने के बाद उसके ऊपर मक्खन आ जायेगा इस मक्खन को इकठ्ठा कर लें, एक दिन के बाद इस मक्खन को किसी कढ़ाई में डाल कर आंच पर गर्म करते हैं, जिससे पानी और मट्ठा जल जायेगा और खुश्बूदार असली देशी घी कढ़ाई में बचेगा।*
जब ये घी बनाया जाता है तो आसपास 50 मीटर तक इस घी की जबरदस्त सुगंध फ़ैल जाती है।
इस घी को खाने के बाद कोई भी बाज़ारू घी खाने की इच्छा नही होगी।
इस घी को गुनगुना करके इसकी 2 -2 बूंद नाक में डालने से कफजनित (कफ से पैदा होने वाली) बीमारियां समाप्त हो जाती हैं।
एक और विधि
मित्रों , देशी गौ घृत बनाने की वैदिक विधि ----------यानी
दूध को हमारे बुजर्ग जैसे गर्म करके उसमे घी बनाते थी उसकी पूर्ण विधि ---
हम एक हांडी हैं जो करीब 20 लीटर की है ,उसमे 8 किलो दूध और 3 किलो पानी डालते हैं ,
इसके बाद "हारा" जो लगभग हमारे गांव में हर घर में होता है ,
उसमे गौबर के उपले छोटे छोटे टुकड़े करके उनमे एक छोटी सुलगती चिंगारी छोड़ देते हैं -
जैसे ही उपले सुलगते हैं ,उन पर दूध की हांडी रखते हैं ,,,,,
ये करीब शुबह 8 से 9 बजे तक रखते हैं --
इसके बाद वो हांडी में पड़ा हुवा दूध शाम के करीब 6,7 बजे तक इन सुलगते उपलों की धीरे -धीरे गर्म होता है -
और शाम होते-होते ये दूध लाल सुर्ख बन जाता है ,व् इसके ऊपर एक बड़ी परत मलाई की आ जाती है -या दौरान इस दूध में बहुत ही अच्छी खुशबु आती है -
शाम को 6,7 बजे हांडी को उतारने के बाद जब ये थोड़ा सा ठंडा हो जाये ,तो इसको मिटी का बिलौना होता है उसमें डाल दें ,और दही जमा दें इसका """"
और ढक दें अच्छी तरह ,इसके बाद शुबह ब्रह्ममहूर्त समय 4 से 6 बजे के बीच इसको लकड़ी मथानी से मन्थन (बिलौना) करें -
और शुरु करने से पहले बिलोने में यदि शर्दी है तो इसमें थोड़ा (1लीटर) गर्म पानी डालें और गर्मी हैं तो मटके का ठंडा पानी डालें ,,,,और मन्थन करें और बिच में फिर एक लीटर पानी डालें और मथकर उसमे से माखन को किसी हंडिया में निकाल लें -
अब उस माखन को गर्म करें ,इसके तीन भाग बनेगें माखन को गर्म करने पर ,,,सबसे ऊपर जो झाग होंगे उसको छछेडू बोलते हैं और इसके नीचे तरल घी और अंत में नीचे लस्सी होती है -
आप इस घी को सावधानी से निकालें इसमें झाग या लस्सी न आने पाएं -।इसके बाद एक बार पुनः इस अकेले घी को गर्म करें हांडी में -
जब इसमें से लस्सी झाग बिलकुल नजर न आएं -तो उतारकर किसी मर्तबान ,चीनी मिटी बर्तन में रखें
और हांडी बिलोने की ताजी लस्सी पियें ,जो पेट आदि के लिए बहुत ही लाभकारी है -
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देशी गाय और गव्यों का महेत्वे
ही विभिन्न रोगों का कारण हें। किन्तु ईश्वर ने हमें गाय दी है जो अपने पंचगव्यो (गोमय दूध, घृत, गोमूत्र, छाछ) से इन पंचमहाभूतों को संतुलित करती है और हमें निरोगी रखती है। शरीर का पृथ्वी तत्व असंतुलित हुआ है तो हमें गोबर का रस या गोबर के कंडों से बनी भस्म का सेवन कर अपने पृथ्वी तत्व को संतुलित किया जा सकता है । जल तत्व को संतुलित करने के लिए गो मां का दूध ,वायु तत्व के लिए गोमूत्र , आकाश तत्व के लिए छाछ एंव अग्नि के लिए घृत है। अर्थात अपने पाँच महाभूतों को नियमित संतुलित करने के लिए हमें पांचों गव्यों का सेवन करना चाहिए। किंतु पाँचों महाभूतों की बात तो दूर हम एक भी महाभूत को संतुलित नही कर रहे है। अगर पंचमहाभूतों को संतुलित करने के इस सूत्र को हम समझ ले तो हम समझ जाऐंगे की गाय के बिना हमारा अस्तित्त्व सम्भव ही नहीं है। जिस प्रकार शरीर के महाभूतों को गाय के गव्यो से संतुलित किया जा सकता है ठीक उसी प्रकार प्रकृति के महाभूतों को भी बिना गाय के गव्यों से संतुलित्त नही रख सकते है। अर्थात् गाय के बिना पर्यावरण को भी बचाना मुश्किल है। इसीलिए कहा गया है "गावो विश्वस्य मातर:"
अर्थात गाय ही संपूर्ण जगत की मां है।































































































































