शनिवार, 3 सितंबर 2016

गौ महिमा / गौ विचार पोस्टर

जय गौमाता जय गोपाल
आप से निवेदन है की इन सब पोस्टर और ज्यादा से ज्यादा शेयर करे आपके फेसबुक व्हाट्सप्प आदि पर। जिससे गौमाता की महिमा जन जन तक पहुंचेगी।

धन्येवाद
आपका मित्र
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया































































































































शुक्रवार, 2 सितंबर 2016

गौ माँ की गाथा

कान्हा तेरे द्वारे मैं अर्जी देने आई हूँ।हुआ करती थी कभी तेरी गौ मईया, आज दुखिया बन के मैं आई हूँ।सुनता नही कोई मेरा दुखडा, अपनी गाथा मैं तुम्हे सुनाती हूँ।दिखते नही मेरे आँसू किसी को, ये तुमको मैं दिखलाती हूँ।द्वापर में छोडा जैसा मुझको तुम आए, ना हाल मेरा अब वैसा है।क्या सुनाऊँ मैं तुम्हे अपनी कान्हा दुखो का टूटा पहाड मुझपे कैसा है।जिन कानो में तेरी मुरली की तान जाया करती थी।दर्शन कर के कभी मैं तेरे, घास चरा करती थी।उन्ही कानो में आज सत्ता खोरो के भाषण की चींखे गूंजा करती हैं।गौ माँ को हम बचाएगे कहते सभी, पर राेज मेरी संताने मरा करती है।झूठे भाषणो की इन चीखो में मैं, तेरी मुरली की ध्वनी आज भी ढूंढा करती हूँ।तू नही जाने रे मेरे कान्हा मैं तेरी धरती पर अब चारा नही पोलीथिन चबाया करती हूँ।पोलीथिन खा कर मेरे पेट में दर्द बहुत हाँ होता है।पर क्या करूँ ना मिलता है चारा, कोई देता भी है खाने को तो पाेलाेथिन में फेंका करता है।जिस गइया को तूने पूजा, उसे सरे बाजार पीटा जाता है।अब ताे आजा मेरे कान्हा इतना दुख ना अब झेला जाता है।रात काे भी मेरा घूमना ना गवारा किसी को आता है।जब साे जाती दुनियाँ नींद में तब अगवा मुझे किया जाताहै।उठाकर मुझकौ फिर कान्हा वाे दूर हाँ ले जाते है।चंद रुपयो की खातिर मुझे कान्हा माैत की नींद सुलाते है।माैत भी मुझको रे कान्हा ना आसान सी दी जाती है।पाँव पीट पीट कर तडपती मैं ऐसे रूह मेरी नाैंची जातीहै।तू ही बता मेरे कान्हा कैसे मैं धरती पर वास करूँ।ना दिखता मुझकाे तू वहाँ अब किसपे मैं कान्हा आस करूँ।दे दे मेरे सवालो का जवाब रे कान्हा पूछने मैं तुझसे आई हूँ।कान्हा तेरे द्वारे आज मैं अर्जी लगाने आई हूँ।है ठाकुर।।।।

~संत कबीर दास जी की गौभक्ती~

गौ-रक्षा के लिए, संत कबीर ने शादी से भी कर दिया था इंकार !
जनमसाखी भगत कबीर जी की
मूल पंजाबी रचयिता : सोढी मनोहरदास मेहरबान
रचनाकाल : १६६७ विक्रमी, साखी नं• ४ का अनुवाद
 एक दिन=समय गोसाईं कबीर पूरब की धरती नगर बनारस में रहते थे। जब कबीर अठारह बरस के भए तो उनके माता-पिता ने विचारा कि इसका ब्याह कर दिया जाए। कबीर बहुत उदासीन हो रहा है, क्या पता ब्याहे का मन टिक जाए, कबीर को ब्याह ही दें।
जहां पर कबीर को बुलवाया गया था, वहां पर कबीर का होने वाला ससुर पूछने लगा : अरे भाई समधियो ! इसे हमारे यहां ब्याह दो। तब कबीर के मां-बाप ने कहा कि भला होए जी ! चलिए ब्राह्मण से जा कर पूछते हैं, जो साहा जुड़े वह साहा मान लेते हैं। तब कबीर का पिता और ससुर उठ खड़े हुए और मिल कर ब्राह्मण के पास गए। पत्री कढाई, साहा निर्मल निकला, ब्राह्मण से साहा जुड़ाया, साहा जोड़- बांध कर दोनों के हाथ में थमा दिया गया। उसे लेकर कबीर का पिता और भावी ससुर अपने-अपने घर चले आए।
अनाज की सामग्री एकत्र की जाने लगी। घी-शक्कर लिया, चावल-दही लिया। और कबीर का जो काका था, कबीर के बाप का छोटा भाई, तिसको काका कहते हैं। वह कबीर जी का काका जाकर एक गाय मोल ले आया वध करने के निमित्त। तब परिवार के लोग कह उठे कि कबीर का काका एक गाय वध करने को ले लाया है। जब गोसाईं कबीर ने सुना कि काका जी गाय वध करने को ले आया है, तब कबीर बाहर आए। जब देखा कि काका जी गाय ले आया है, तब कबीर जी ने पूछा : ऐ काका जी ! यह गऊ तुम काहे को लाए हो। तब कबीर के काका ने कहा : कबीर ! यह गऊ वध करने को लायी गई है।
तब कबीर ने यह बानी बोली राग गुजरी में :
काका ऐसा काम न कीजै।
इह गऊ ब्रहमन कउ दीजै।। रहाउ ।।
तिसका परमार्थ : तब गोसाईं कबीर ने कहा : काका जी ! यह गऊ वध नहीं करनी है, यह गऊ ब्राह्मण को दे दीजिए। यह गऊ वध करने योग्य नहीं, ब्राह्मण को देने योग्य है। तब गोसाईं कबीर के काका ने कहा : गाय वध किए बिना हमारा कारज नहीं संवरता। यहां बहुत लोग जुड़ेंगे। जब गोवध करेंगे तब ही किसी महमान आए का आदर होगा। तुम यह गोवध मना मत करो।
तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
रोमि रोमि उआ के देवता बसत है।। ब्रहम बसै रग माही।
बैतरनी मिरतक मुकति करत है। सा तुम छेदहु नाही।।
तिसका परमार्थ : तब गोसाईं कबीर ने कहा : काका जी ! तुम इस गऊ के गुण सुन लो। इस गऊ के जितने रोम हैं, इसके रोम-रोम में देवता बसते हैं। और इसकी रगों में स्वयं ब्रह्म ही बसता है। और जी ! इसका एक यह बड़ा गुण है कि वैतरणी मृतक चलते-चलते ब्राह्मण को मिलती है। तब उस मृतक को वह गऊ भव जल तार देती है। ऐसी यह गऊ है जी। इस गऊ का नाम भवजल-तारिणी है जी। इस गऊ का वध करना ठीक नहीं। यह गऊ तुम ब्राह्मण के प्रति धर्मार्थ दे दो जी।
काका कहने लगा : तू यह कहता है कि यह गऊ ब्राह्मण को दे दो और हमारे बड़े बुज़ुर्ग इसे कोह=मार कर लोगों को खिलाते थे। हमें भी उसी राह चलना चाहिए। यदि ऐसा नहीं करेंगे तो लोग कहेंगे कि ये गुमराह हो गए हैं, इनसे यह चीज़ होने को न आई। कबीर जी ! गऊ वध करनी ही भली है। इसे, छोड़ देना हमें समझ नहीं आता। बलिहारी जाऊं कबीर जी ! यह गुनाह हमें बख़्शो जी।
तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
दूधु दही घृत अंब्रित देती। निरमल जा की काइआ।
गोबरि जा के धरती सूची। सा तै आणी गाइआ।।
तिसका परमार्थ : तब गोसाईं कबीर ने कहा : सुनिए काका जी ! यह गाय जो है सो कैसी है, पहले इसका गुण सुन लें कि यह गाय कैसी है। यह गाय ऐसी है जी : यह दूध देती है, तिसका दही होता है जी। दूध से खीर होती है। दही से अमृत वस्तु घृत निकलता है जी। उस से सब भोजन पवित्र होते हैं जी। देवताओं-सुरों नरों को भोग चढ़ता है। इस घृत का धूप वैकुण्ठ लोक जाता है। ठाकुर जी को दूध-दही-घृत भोग चढ़ता है जी और इस गऊ की काया जो है सो निर्मल है। जी ऐसी निर्मला यह गऊ है जिसके गोबर से धरती पवित्र होती है, उसका तुम बुरा चाहते हो ! सो इस बात में तुम्हारा भला नहीं। बलिहार जाऊं काका जी ! यह गऊ तुम ब्राह्मण को दे दो जी, वध करने में भला नहीं।
तब फिर उन कबीर के बाबा=पिता और चाचा ने कहा : जिन शरीकों=रिश्तेदारों भाइयों के यहां हमने यह वस्तु खायी थी वह तो उनको भी खिलानी चाहिए। यदि हम उन्हें यह खिलाएंगे नहीं तो वे उठ जाएंगे। अतः पुत्र जी ! गऊ अवश्य वध करनी चाहिए। ऐसे हमारी इज़्ज़त नहीं रहती।
तब गोसाईं कबीर ने यह बानी बोली :
काहे कउ तुमि बीआहु करतु हउ । कहत कबीर बीचारी।
जिसु कारणि तुमि गऊ बिणासहु। सा हमि छोडी नारी।।
तिसका परमार्थ : तब गोसाईं कबीर ने कहा : सुनिए बाबा-काका जी ! तुम जो हमारा ब्याह करते हो सो किस कारण करते हो जी। जिस कारण तुम गऊ विनाशते हो जी कि हमारा कारज संवरे, वह तुम अपना कारज रख छोड़ो। हमने वह स्त्री ही छोड़ी तो तुम किसका ब्याह करते हो। हमने वह नारी ही छोड़ दी। अजी ! तुम जानो और तुम्हारा ब्याह। हमने तो वह नारी ही छोड़ दी जी।
इस प्रकार जब गोसाईं कबीर कुपित हो उठे, तब उन सभी का अभिमान छिटक गया। उन्होंने आपस में मसलत करी कि जिस कबीर ने यह बात कही है वह ब्याह न करेगा। आओ अब यह गऊ ब्राह्मण को दे दें और हम सीधा अनाज करें जैसा कबीर कहता है।
तब कबीर गोसाईं के पास परिवार के सब लोग मिल कर आए और बोले : भला हो कबीर जी ! जैसा तेरा जी है वैसा ही करेंगे। यह गऊ ब्राह्मण को दीजिए जी। और जो प्रसाद=भोजन तुम कहते हो हम वही प्रसाद सेवन करेंगे जी। बस ! तुम अब स्त्री न छोड़ो जी, अब तुम स्त्री ब्याह लो। तब गोसाईं कबीर ने कहा : न बाबा जी ! हमारे मुख से निकल चुका है, सो अब मैं स्त्री नहीं ब्याहता। तब जितना परिवार था सब कबीर जी को निवेदन करने लगे कि ना जी ! अब हमने गऊ छोड़ दी तो तुम स्त्री न छोड़ो जी।तब गोसाईं कबीर ने कहा : मैं स्त्री तभी न छोड़ूंगा जी जब तुम स्त्री के मां-बाप को भी जाकर कहो कि गोवध नहीं करना। यदि तुम्हारे कहने लगकर वे गोवध नहीं करेंगे तो मैं उस स्त्री से ब्याह कर लूंगा। यदि वे गोवध करेंगे तो मैं वहां न जाऊंगा, न ही मैं वह स्त्री ब्याह कर लाऊंगा।
तब उन्होंने कहा : भला हो जी ! वे लोग चलते-चलते उनके पास पहुंचे और बोले : भाई रे ! हमने जो गऊ वध के लिए लायी थी वह कबीर ने ब्राह्मण को दिलवा दी। उन्होंने सारी बात कह सुनाई कि यह बात ऐसे-ऐसे घटी है। अब कबीर कहता है कि हमारे सास-ससुर को कहो कि हम तब ही तुम्हारे घर आवेंगे जब तुम गोवध न करोगे। तब उन लोगों ने कहा : भाड़ में जाए वह बात जो कबीर जी को न भावे। हम तो तुम्हारे लिए ही गोवध करने वाले थे। क्यों जी ! जब तुम्हीं ख़ुश हो तो हम गोवध नहीं करेंगे। तब कबीर के परिवारी लोग बोले : हमें इस बात में खरी ख़ुशी होगी, यदि तुम लोग गोवध न करो। तब सब मिल कर कबीर जी के पास लौट आए। माता-पिता और सास-ससुर सबने आकर नमस्कार किया और कहा : कबीर जी ! जो तुमने कहा वह हम सबने मान लिया। हमने गाय छोड़ दी जी। पर अब तुम जो आज्ञा करोगे हम वैसा ही प्रसाद बनाएंगे बारात के आवभगत के लिए।
तब गोसाईं कबीर ने कहा : अब तुम यही प्रसाद करो : यही शक्कर-भात-घी-दही मिश्रित प्रसाद करो। तुम्हारा भला होगा।
तब उन लोगों ने गोसाईं कबीर से कहा : भला जी ! हम यही प्रसाद बनाएंगे जी। पर जी ! अब तो तुम्हें ख़ुशी है न हमारे ऊपर। तब गोसाईं कबीर ने कहा : तुम्हारे ऊपर ठाकुर जी की ख़ुशी है, तुम्हारा भला होगा। तब वे सास-ससुर अपने घर चले गए। इधर बाबा-काका-परिवार के सब लोग ख़ुश हुए। इस प्रकार गोसाईं कबीर ब्याहे गए और राम-नाम स्मरण करने लगे.

गौशाला कैसी होनी चाहिए इसका वर्णन स्कंध पुराण में है

गौशाला कैसी होनी चाहिए
इसका वर्णन स्कंध पुराण में है

🐿गौशाला सुदृढ़ विस्तीर्ण और समतल होनी चाहिए।

🐿ठंडी हवा एवं गर्म हवा से सुरक्षा वाली होनी चाहिए।

🐿उसकी समतल भूमि में बालू बिछी होनी चाहिए।

🐿चारा डालने के लिए बड़ी बड़ी नादे होनी चाहिए।

🐿गौमाता को बाँधने के खूंटे नुकीले नहीं होने चाहिए।

🐿कोमल रस्सियों से ही गौमाता को बांधना चाहिए।

🐿पानी पीने के लिए कुण्ड या जलाशय होना चाहिए।

🕷🐜मच्छरों से रक्षा के लिए नीम की पत्तियों का शाम को धुँआ करना चाहिए।

🦄गोशाला साफ़ सुथरी और गोबर से रहित होनी चाहिए।

🐀वहाँ जूठन व कचरा नहीं डालना चाहिए।

🐐वहाँ बकरियों को नहीं बांधना चाहिए।

🙉एवम् थूक मल मूत्र विसर्जन नहीं करना चाहिए।

💥संध्या समय गोशाला में दीपक जलाने से लक्षमी की वृद्धि होती है।

🙏🏻इस तरह की गौशाला को दान करने वाला धन्य है।

🐄नवजात वत्स को गाय का 2 माह तक पूरा दूध पिलाना चाहिए। इसके पश्चात 2 थनों को दुहना चाहिए।

🐠समय समय पर गोओं को नमक देकर पानी पिलाना चाहिए।

🐎रात्रि में दीपक जलाकर बांसुरी या वीणा वाद्य सुनाकर पुराणों की दिव्य कथाये सुनानी चाहिए।

🌲इसे ही गोष्ठी कहा गया है।

🐾उनकी ह्रदय से माता पिता देवता और भगवान् समजकर पूजा करनी चाहिए।

🐾गौशाला में रजस्वला स्त्री को प्रवेश नहीं करना चाहिए ।

🐏रोगी बुड्ढी और दुबली पतली गायों की सेवा दिल लगाकर करनी चाहिए ।

🌹इस तरह सेवा होने पर कोई संशय नहीं है की भगवान् का धाम न मिले ।

देसी घी बनाने की विधि – Desi Ghee Recipe

🌻 *देशी घी बनाने की विधि* 🌻

बाजार में मिलने वाला घी और देशी घी में स्वाद और गुड़ दोनों ही अलग होते हैं, कितना भी शुद्ध बाज़ारू घी हो वो कच्चे दूध के ऊपर से मलाई निकाल कर बनाया जाता है, जबकि देशी घी केवल पकाये हुए दूध से ही तैयार हो सकता है।

✍�आज इसे बनाने की विधि:

*दूध को उबाल कर ठंडा होने दें, उसके बाद उसको मलाई सहित दही जमा दें।*
*दही जमने के बाद उसमें बराबर मात्रा पानी मिलाएं फिर किसी मटकी या किसी बड़े बर्तन में लकड़ी से बनी हाथ की मथानी  से उसे मथते है, सारा कमाल उसे मथने का है ज़्यादा मथ जाने पर घी नही निकलेगा, आसानी से मथने के बाद उसके ऊपर मक्खन आ जायेगा इस मक्खन को इकठ्ठा कर लें, एक दिन के बाद इस मक्खन को किसी कढ़ाई में डाल कर आंच पर गर्म करते हैं, जिससे पानी और मट्ठा जल जायेगा और खुश्बूदार असली देशी घी कढ़ाई में बचेगा।*
जब ये घी बनाया जाता है तो आसपास 50 मीटर तक इस घी की जबरदस्त सुगंध फ़ैल जाती है।
इस घी को खाने के बाद कोई भी बाज़ारू घी खाने की इच्छा नही होगी।

इस घी को गुनगुना करके इसकी 2 -2 बूंद नाक में डालने से कफजनित (कफ से पैदा होने वाली) बीमारियां समाप्त हो जाती हैं।

एक और विधि

मित्रों , देशी गौ घृत बनाने की वैदिक विधि ----------यानी
दूध को हमारे बुजर्ग जैसे गर्म करके  उसमे घी बनाते थी उसकी पूर्ण विधि ---
हम एक हांडी हैं जो करीब 20 लीटर की है ,उसमे 8 किलो दूध और 3   किलो पानी डालते हैं ,
इसके बाद "हारा"  जो लगभग हमारे गांव में हर घर में होता है ,

उसमे गौबर के उपले छोटे छोटे टुकड़े करके उनमे एक छोटी सुलगती चिंगारी छोड़ देते हैं -

जैसे ही उपले सुलगते हैं ,उन पर दूध की हांडी रखते हैं ,,,,,
ये करीब शुबह 8 से 9 बजे तक रखते हैं --
इसके बाद वो हांडी में पड़ा हुवा दूध  शाम के करीब 6,7 बजे तक इन सुलगते  उपलों की धीरे -धीरे  गर्म होता है -
और शाम होते-होते ये दूध लाल सुर्ख बन जाता है ,व् इसके ऊपर एक बड़ी परत मलाई की आ जाती है -या दौरान इस दूध में बहुत ही अच्छी खुशबु आती है -
शाम को 6,7 बजे हांडी को उतारने के बाद जब ये थोड़ा सा ठंडा हो जाये ,तो इसको मिटी का बिलौना होता है उसमें डाल दें ,और दही जमा दें इसका """"

और  ढक दें अच्छी तरह ,इसके बाद शुबह ब्रह्ममहूर्त समय 4 से 6 बजे के बीच इसको लकड़ी मथानी से मन्थन (बिलौना) करें -

और शुरु करने से पहले बिलोने में यदि शर्दी है तो इसमें थोड़ा (1लीटर) गर्म पानी डालें और गर्मी हैं तो मटके का ठंडा पानी डालें ,,,,और मन्थन करें और बिच में फिर एक लीटर पानी डालें और मथकर उसमे से माखन को किसी हंडिया में निकाल लें -
अब उस माखन को गर्म करें ,इसके तीन भाग बनेगें माखन को गर्म करने पर ,,,सबसे ऊपर जो झाग होंगे उसको छछेडू  बोलते हैं और इसके नीचे तरल घी और अंत में नीचे लस्सी होती है -
आप इस घी को सावधानी से निकालें इसमें झाग या लस्सी न आने पाएं -।इसके बाद एक बार पुनः इस अकेले घी को गर्म करें हांडी में -
जब इसमें से लस्सी झाग बिलकुल नजर न आएं -तो उतारकर किसी मर्तबान  ,चीनी मिटी बर्तन में रखें
और हांडी बिलोने की ताजी लस्सी पियें ,जो पेट आदि के लिए बहुत ही लाभकारी है -
इस पोस्ट को आगे शेयर करें

देशी गाय और गव्यों का महेत्वे

आज हम कितने गर्त में गिर चुके है जो गाय को देशी कहकर संबोधित करना पड़ता है और भगवान कृष्ण के वंशजों को देशी गाय की पहचान बतानी पड़ती है। जिस प्रकार हर पीली वस्तु सोना नहींहोती उसी प्रकार हर चार पैर, चार थन वाला जीव गाय नहीं होता । हम दूध के इतने लालची हो गए है कि विदेशी सूअर (जर्सी ,होल्सटीन,फ्रीजियन ) को भी गाय कहने और मानने लगे है गाय तो देशी ही होती है। गाय की पीठ पर विद्यमान सूर्यके्तु नाडी सौर मंडल की समस्त ऊर्जा को अवशोषित कर अपने गव्यों (दूध ,मूत्र,गौमय) में डालकर समस्त मानव जीवन और प्रकृति को निरोगी एवं सम रखने का कार्य करती हैं। हमारा शरीर पंचमहाभूतों से बना हैं ये पंचमहाभूत्त है पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु एंवआकाश । इन पंचमहाभूतों मैं असंतुलन
ही विभिन्न रोगों का कारण हें। किन्तु ईश्वर ने हमें गाय दी है जो अपने पंचगव्यो (गोमय दूध, घृत, गोमूत्र, छाछ) से इन पंचमहाभूतों को संतुलित करती है और हमें निरोगी रखती है। शरीर का पृथ्वी तत्व असंतुलित हुआ है तो हमें गोबर का रस या गोबर के कंडों से बनी भस्म का सेवन कर अपने पृथ्वी तत्व को संतुलित किया जा सकता है । जल तत्व को संतुलित करने के लिए गो मां का दूध ,वायु तत्व के लिए गोमूत्र , आकाश तत्व के लिए छाछ एंव अग्नि के लिए घृत है। अर्थात अपने पाँच महाभूतों को नियमित संतुलित करने के लिए हमें पांचों गव्यों का सेवन करना चाहिए। किंतु पाँचों महाभूतों की बात तो दूर हम एक भी महाभूत को संतुलित नही कर रहे है। अगर पंचमहाभूतों को संतुलित करने के इस सूत्र को हम समझ ले तो हम समझ जाऐंगे की गाय के बिना हमारा अस्तित्त्व सम्भव ही नहीं है। जिस प्रकार शरीर के महाभूतों को गाय के गव्यो से संतुलित किया जा सकता है ठीक उसी प्रकार प्रकृति के महाभूतों को भी बिना गाय के गव्यों से संतुलित्त नही रख सकते है। अर्थात् गाय के बिना पर्यावरण को भी बचाना मुश्किल है। इसीलिए कहा गया है "गावो विश्वस्य मातर:"
अर्थात गाय ही संपूर्ण जगत की मां है।