मंगलवार, 12 सितंबर 2017
शुक्रवार, 8 सितंबर 2017
शुक्रवार, 1 सितंबर 2017
गौ माता केवल हिंदुओं की माता नही अपितु, समस्त विश्व की माता है।
गौ माता केवल हिंदुओं की माता नही अपितु, समस्त विश्व की माता है।
माता केवल हिंदुओं की माता नही अपितु ‘गावो विश्वस्य मातरः’ गौवें समस्त विश्व की माता है।गाय समान रूप से विश्व के मानव मात्र का पालन करने वाली मां है। ‘माताः सर्वभूतानाम गावः सर्वसुखप्रदाः’ गाय सब प्राणियों की माता हैं और प्राणियों को सब प्रकार के सुख प्रदान करती हैं।
गाय माता सम्पतियों का भंडार हैं।
ऋग्वेद,यजुर्वेद,पद्यपुरण,स्कन् दपुराण,गौ माता सर्वदेवमयी ओर साक्षात विष्णु रूप है। भगवान राम के पूर्वज राजा दिलीप नंदिनी गाय के पीछे घूमते थे एक बार शेर ने गाय पर हमला कर दिया ।महाराज दिलीप ने गाय के बदले अपना शरीर अर्पण कर दिया भगवान परीक्षा ले रहे थे राजा पास हुआ और संतान प्राप्ति हुई वंश चला और उसी क्षत्रिय कुल में भगवान राम जैसे महापुरुष हुए।
द्वापर में भगवान कृष्ण का एक प्रिय नाम गोपाल है वे नंगे पांव गाय चराते थे ।इंद्र के प्रकोप को टालने के लिए ग्वालो के साथ गोवेर्धन पर्वत उठा गौमाता व समाज की रक्षा की।कृष्ण ने गौमाता सेवा की भविष्य में इतना ज्ञान हुआ के आज हम गीता के नाम से पढ़ते ओर जानते है।
शिव का वाहन भी नंदी हैं भारत के दक्षिण की ओंगोल नस्ल के सांड था जैन आदि तीर्थंकर} भगवान ऋषभदेव का चिन्ह भी बैल था।प्राचीन सिक्को ओर पिरामिड पर बैलो की मूर्तियां हैं।ईस्वी पूर्व छठी शताब्दी से भारत स्वतन्त्र होने तक गौ ओर वृषभ प्रायः अधिकांश शासको के सिक्कों पर अंकित रहते थे।
गोस्वामी तुलसीदास के अनुसार धर्म,काम,मोक्ष,अर्थ में चारों फल गाय के चार थन है। दशम गुरु गोविंद सिंह ने चंडी दी वार में माँ दुर्गा भवानी से गो रक्षा की मांग की थी:-‘यही देहु आज्ञा तुर्क गाहै खपाऊ।गऊघात का दोष जग सिउ मिटाऊँ।यही आस पूर्ण करो तू हमारी,मिटे कष्ट गौअन छटे खेद भारी।भगवान बुद्ध को ज्ञान हुआ जब सुजाता ने गाय के दूध से बनी खीर खिलाई ओर खाते ही ज्ञान और मुक्ति का मार्ग मिला।
भगवान महावीर भी कहते है गो रक्षा बिना मानव रक्षा सम्भव नही।पैगम्बर हजरत मुहमद ने कहा हैं गाय का दूध रसायन,गाय का घी अमृत,तथा मास बीमारी है साथ ही गाय दौलत की रानी हैं।
ईसा मसीह ने कहा हैं एक बैल को मारना एक मनुष्य को मारने के समान है। दयानंद सरस्वती ने गौमाता के सम्बंध में ‘गो करुणा निधि ‘ में कहते है एक गाय अपने जीवन काल में 4 लाख 90 हज़ार 440 मनुष्यों का एक समय का भोजन जुटाती है जबकि उसके मास से 90 मासाहारी केवल एक समय का पेट भर सकते है।गांधी ने कहा है गौ रक्षा का प्रश्न स्वराज्य से के प्रश्न से भी अधिक महत्वपूर्ण है उनका कहना है गौमाता की रक्षा ईश्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है।प्रथम राष्ट्रपति डॉ राजेन्द्र प्रसाद ने कहा था ”भारत में गौपालन सनातन धर्म है”।पूज्य देवराहा बाबा कहते थे जब तक गौमाता का रक्त भूमि पर गिरता रहेगा तब तक देश सुख शांति और धन धान्य से व कोई भी धार्मिक व सामाजिक अनुष्ठान पूर्ण नही होगा मतलब वंचित रहेगा।
गाय की रक्षा मानवता की रक्षा
गौमाता चराचर जगत की माता हैं। इनकी रक्षा करना हमारा नैतिक कर्तव्य है। अथर्ववेद में आता है कि गौहत्यारे को काँच की गोली से उड़ा दो। अतः हे भारतवासियो ! जागो और गोवंश की हत्या रोकने के लिए आगे आओ। गौमाता धरती का गौरव है। भारत की 40 करोड़ एकड़ भूमि पर पैदावार तथा छोटे-बड़े भूखंडों के अनुकूल कृषिकार्य मात्र गोवंश ही कर सकता है।
गायों से प्राप्त विभिन्न पदार्थों से विभिन्न उत्पाद बनाये जाते हैं जो मानव-जीवन के लिए अति आवश्यक हैं। गौमाता जो आजीवन हमें अपने दूध- दही- घी आदि से पोषित करती है। अपने इन सुंदर उपहारों से जीवनभर हमारा हित करती रहती है।
ऐसी गौमाता की महानता से अनभिज्ञ होकर मात्र उसके पालन-पोषण का खर्च वहन ना कर पाने के बहाने उन्हें कत्लखानों के हवाले करना विकास का कौन सी मानवीयता है ? क्या गौमाता के प्रति हमारा कोई कर्त्तव्य नहीं बनता है ?
पंडित मदन मोहन मालवीयजी ने कहा है, ‘’यदि हम गौओं की रक्षा करेंगे तो गौएँ भी हमारी रक्षा करेंगी।‘’ गौमाता की दुर्दशा देख उसकी रक्षार्थ भारत के मनीषियों ने अनेकों बलिदान दिये। पूर्वकाल में करपात्रीजी महाराज, संत प्रभुदत्तजी ब्रह्मचारी, महात्मा गांधी , आचार्य विनोबाजी भावे आदि अनेकों संत-महात्माओं व समाज-सेवकों ने गौवध-विरोधी आंदोलन चलाये। बाबा रामदेव , साध्वी ऋतम्भरा तथा अन्यानेक सन्त महात्मा आज भी गोरक्षा के मुहिम में लगे हुए हैं।
देश में समय-समय पर गौहत्या के विरोध में आन्दोलन हुए हैं। 1967 में गौ-हत्या को लेकर उग्र आन्दोलन हुआ, संसद भवन को साधु-सन्तों ने घेरा था तो पुलिस ने उन पर बल प्रयोग किया था और लाठी-गोलियां भी चलाई थीं। तत्कालीन गृहमन्त्री स्व. गुलजारी लाल नन्दा को इस्तीफा देना पड़ा था। तत्कालीन इन्दिरा सरकार ने भारत की सांस्कृतिक एवं धार्मिक आस्था से जुड़े इस मसले को गंभीरता से नहीं लिया और उन्हें करारी हार का सामना करना पड़ा।
क्योंकि गाय भारत की आत्मा है, जन-जन की आस्था का केन्द्र है। अनेक धर्मगुरु एवं शंकराचार्यजी गौवंश के संवर्धन के लिए जीवनपर्यन्त समर्पित रहे और उन्होंने देश के विभिन्न स्थानों पर गौशालाएं व गोचर भूमि सृजन के लिए प्रयास किये।
गौवंश का कारोबार केवल दूध व डेयरी उत्पादन के लिए ही हो। हमें नहीं भूलना चाहिए कि दुग्ध उत्पादन से लेकर डेयरी उद्योग के विभिन्न कार्यों में मुसलमान नागरिक बहुतायत में लगे हुए हैं और उनकी रोजी-रोटी इसी से चलती है। कानून का पालन करना इनका भी पहला धर्म है और गौवंश की रक्षा करने में इन्हें भी अपना योगदान देना होगा और भारत के सुदूर गांवों में कुछ अपवादों को छोड़ कर मुस्लिम नागरिक अपना यह कर्तव्य निभाते भी हैं।
एशिया का सबसे बड़ा कत्लखाना भारत में :- भारतवर्ष सदियों से अहिंसा का पुजारी रहा है। आज भारत एक हिंसक और मांस निर्यातक देश के रूप में उभरता जा रहा है। यह बड़ी विडम्बना है कि एशिया का सबसे बड़ा कत्लखाना अन्य इस्लामिक देशों में नहीं बल्कि भारत के महाराष्ट्र प्रान्त में है। जहाँ हजारों गायें रोज कटती है। दूसरी अल कबीर गोवधशाला आंध्रप्रदेश में है।
यहाँ रोज 6 हजार गौएँ , इससे दुगुनी भैसें तथा पड़वे काटे जाते हैं। इसका लगभग 20,000 टन मांस विदेशों में निर्यात होता है। यह भारत के लिए चुल्लू भर पानी में डूग मरने जैसी हालात है। हिन्दू बहुल समाज होने के बावजूद गोवंश की हत्या जारी है। इनका हजारों-हजारों टन मांस विदेशों मे निर्यात होता है। पूज्य गौमाता के साथ ऐसी निर्दयता किसी प्रकार क्षम्य नहीं है।
निर्दयतापूर्वक मारा जाना :- कत्लखाने में गौओं को मौत के कुएँ में 4 दिन तक भूखा रखा जाता है। अशक्त होकर गिरने पर घसीटते हुए मशीन के पास ले जाकर उन्हें पीट-पीटकर खड़ा किया जाता है। मशीन की एक पुली (मशीन का पकड़नेवाला एक हिस्सा) गाय के पिछले पैरों को जकड़ लेती है। तत्पश्चात् खौलता हुआ पानी 5 मिनट तक उस पर गिराया जाता है । पुली पिछले पैरों को ऊपर उठा देती है।
जिससे गायें उलटी लटक जाती हैं। फिर इन गायों की आधी गर्दन काट दी जाती है ताकि खून बाहर आ जाय लेकिन गाय मरे नहीं । तत्काल गाय के पेट में एक छेद करके हवा भरी जाती है, जिससे गाय का शरीर फूल जाता है । उसी समय चमड़ा उतारने का कार्य होता है ।
गर्भवाले पशु का पेट फाड़कर जिंदा बच्चे को बाहर निकाला जाता है । उसके नर्म चमड़े (काफ-लेदर) को बहुत महँगे दामों में बेचा जाता है। आज देश में वैध तथा अवैधरूप से हजारों कत्लखाने चल रहे हैं, जिनमें प्रतिदिन लाखों की संख्या में पशुधन काटा जाता है ।
गाय धरती का वरदान, जिसकी महिमा महान :- गौमाता के दर्शन एवं गाय के खुरों की धूलि मस्तक पर लगाने से भाग्य की रेखाएँ बदल जाती हैं, घर में सुख-समृद्धि एवं शांति बनी रहती है। जहाँ पर गौएँ रहती हैं उस स्थान को तीर्थभूमि कहा गया है, ऐसी भूमि में जिस मनुष्य की मृत्यु होती है उसकी तत्काल सद्गति हो जाती है, यह निश्चित है। – (ब्रह्मवैवर्तपुराण,श्रीकृष्णजन्म खंड रू 21.91-93)
गो-ग्रास देने तथा गाय की परिक्रमा करने से मनोकामना सिद्ध होती है, धन-संपदा स्थिर रहती है तथा अभीष्ट की प्राप्ति होती है। गाय को प्रेम से सहलाने से ग्रहबाधा, पीड़ा, कष्ट आदि दूर होते हैं। गौ के शरीर के रोम-रोम से गूगल जैसी पवित्र सुगंध आती है। उसके शरीर से अनेक प्रकार की वायु निकलती है जो वातावरण को जंतुरहित करके पवित्र बनाती है ।
यज्ञ से जीवन रक्षा :- देशी गाय के गोबर के कण्डों पर गाय का घी, जौ, तिल, चावल और मिश्री अथवा शक्कर डालकर हवन किया जाता है तो महत्वपूर्ण गैसें उत्पन्न होती हैं । उनमें से एक प्रोपिलीन ऑक्साईड गैस बरसात लाने में सहायक होती है । श्इथिलीन ऑक्साइडश् का गैस संक्रामक रोगों में एवं जीवनरक्षक दवाओं के रूप में प्रयोग होता है। इससे पर्यावरण शुद्ध, पवित्र तथा आरोग्यप्रद बनता है । इसलिए प्राचीन काल में अपने पूर्वज, राजा-महाराजा, ऋषि-मुनि, संत-महात्मा निरंतर अश्वमेध, विष्णुयाग, सहस्रकुंडी इत्यादि यज्ञ करते रहते थे। इससे खूब वर्षा होती थी व पर्यावरण शुद्ध और पवित्र होता था, महामारियाँ भी नहीं फैलती थीं।
अकाशीय ऊर्जा का संग्राहक – अंतरिक्ष में असंख्य तारे, नक्षत्र, सूर्य, चन्द्र, ग्रह, उपग्रह और असंख्य आकाशगंगाएँ हैं। आकाश से दिन-रात अनेक प्रकार की ऊर्जा की वर्षा पृथ्वी पर होती रहती है। उस ऊर्जा को झेलने का कार्य गौ के सींग करते हैं। गाय के सींगों का आकार पिरामिड जैसा होता है। यह एक शक्तिशाली श्एन्टेनाश् है।
सींगों की मदद से गौ सभी अवकाशीय ऊर्जाओं को शरीर में संचित कर लेती है और वही ऊर्जा हमें गोझरण, दूध और गोबर के द्वारा देती है। इसके अलावा गाय की पीठ पर ककुद (डिल्ला) होता है जो कि सूर्य-अकाशीय कई तत्त्वों को शरीर में दूध, गोझरण तथा गोबर के द्वारा हमें देता है। गोमूत्र अवकाशीय ऊर्जा का भंडार है।
!!गौमाता की महिमा!!
!!गौमाता की महिमा!!
गोवंश आज व्यावहारिक उपयोगिता की दृष्टि से भौतिक तुला पर तौला जा रहा है किन्तु स्मरण रहे कि आज का भौतिक विज्ञान गोवंश की उस सुक्ष्मातिसुक्ष्म परमोत्कृष्ट उपयोगिता का पता ही नहीं लगा सकता जिसे भारतीय शास्त्रकारों ने अपनी दिव्यदृष्टि से प्रत्यक्ष कर लिया था। गोवंश की धार्मिक महानता उसमें जिन सूक्ष्मातिसूक्ष्म कारण रूप तत्त्वों की प्रखरता के कारण है उनकी खोज और जानकारी के लिये आधुनिक वैज्ञानिकों के भौतिक यन्त्र सदैव स्थूल ही रहेंगे। यही कारण है कि बीसवीं सदी का प्रौढ़ विज्ञानवेत्ता भी गोमाता के रोम-रोम में देवताओं के निवास का रहस्य और प्रातः गोदर्शन, गोपूजन, गोसेवा आदिका वास्तविक तथ्य समझाने में असफल रहता है। गोधनका धार्मिक महत्व भाव-जगत से सम्बन्ध रखता है और वह या तो ऋतम्भरा प्रज्ञा द्वारा अनुभवगम्य है अथवा शास्त्रप्रमाणद्वारा जाना जा सकता है, भौतिक यन्त्रों द्वारा नहीं।
जिन्होंने जगत के हित की जिम्मेदारी अपने ऊपर ले रखी है, उन देशों के शासकों को इन सब बातों पर खूब विचार करके तुरंत गोहिंसा-निवारण और गो-संरक्षण के कार्यं में लग जाना चाहिये। और सर्वसाधारण को भी सावधानी के साथ गौधन की रक्षा करनी चाहिये।
अपनी माता से भी गोमाता श्रेष्ठ है क्योंकि अपनी माता ज्यादा से ज्यादा दो साल तक बच्चे को दूध पिलाती है। गोमाता तो आजीवन दूध देकर पालती है। अतः गोमाता की महिमा अपार है।
गोमाता के प्रत्येक अंग में देव रहते हैं। इसलिये श्रुति-स्मृति-पुराण कहते हैं कि मनुष्यों के उद्धार के लिये आयी हुई यह प्रत्यक्ष देवता है अतः केवल व्यवहारिक -दृष्टि से ही नहीं बल्कि धार्मिक एवं पारमार्थिक दृष्टि से भी प्रत्येक घर में गाय अवश्य रखनी ही चाहिये, उसका पालन-पोषण होना ही चाहिये।
‘वन’ पर्वत, नदी और तीर्थों पर किसी का स्वामित्व नहीं होता; सबके लिये ये खुले रहते हैं। कोई उन्हें अपनी ही स्वत्व मानकर इनका परिग्रह न कर बैठे।
यदि इस नीति के अनुसार वन, पर्वत, नदी और तीर्थ गौधन के लिये खुले रखे जाये तो करोड़ों गौवंश का पालन-पोषण हो सकता है और उससे भूमि की शस्योत्पादन-शक्ति भी कई गुना बढ़ सकती है।
आज गोरक्षा धार्मिक, आर्थिक, व्यावहारिक – प्रत्येक दृष्टि से परमावश्यक है। शास्त्रों में गो जाति की महिमा, गोसेवा का माहात्म्य विस्तृत रूप से वर्णित है उसका संग्रह आवश्यक है गोग्रास यदि प्रत्येक कुटुम्ब अपने शास्त्रानुसार भोजन निर्माण ओर बलि वैश्वदेव तथा गोग्रास निकालने का नियम बना लें और प्रात: गोदर्शन, गोपूजा प्रारम्भ कर दें, तो बहुत अंशों में गोरक्षा का प्रश्न समाप्त हो सकता है।
भारतीयों ने जब से गौवंश सेवा की उपेक्षा की तभी से भारत की दुर्दशा का प्रारम्भ हुआ है। परम कृपालु भगवान श्री गोपालकृष्ण भारतीयों के हृदय में सद्बुद्धि प्रेरित करें। यह निश्चित है कि यदि सभी भारतीय गो-रक्षा करने के लिये कटिबद्ध हो जाये तो भारत पूर्ववत सुखी हो सकता है।
जब तक हम और कुछ नहीं कर सकते, तब तक हिंदुत्वके नाते इतना तो करें ही- 1. किसी प्रकार भी सामर्थ्य होने पर जितनी रख सकें उतना गौवंश रखे चाहे उसके लिये घोड़े-मोटर कम कर दें।2. गोभक्षकों से खान-पान, रोटी-बेटी आदि का किसी भी दषा में सम्बन्ध न करें।3. किसी भी मूल्य पर किसी भी दशा में गोवंश को कसाईयों के हाथों न बेचें।4. गो-ग्रास जो घर-घर अब तक निकलता था, उसे फिर से निकलवाना आरम्भ करें।5. गौधन को अपने परिजन की भाँति समझ कर उनकी सेवा करें गौमाता के आशीर्वाद से सभी समृद्धियाँ स्वतः प्राप्त हो सकती है।6. जहाँ तक हो, ताजा शुद्ध गो-घृत, गो-दुग्ध का व्यवहार करें ओर उसकी वृद्धि के लिये प्रयत्न करें।
7.गोवध बंद कराने की जो प्रतिज्ञा करें, उन्हें ही शासन कार्यो में निर्वाचित करें।
8. गोरक्षा में प्राचीन पद्धति का ही अनुसरण किया जाय, कृत्रिम उपायों से दुग्ध वृद्धि, सम्पूर्ण दुग्ध को चूस लेना आदि व्यवहारों को न बरतें।
9. बैलों की वृद्धि के लिये उन्हें आरम्भ में पूर्ण दूध दें और उनसे आवश्यकता से अधिक काम न लें। वृद्ध बैलों की स्वयं सेवा न कर सके तो उन्हें कसाइयों को न दें उनकी रक्षा के लिये बैल गो-रक्षण-संघ बनावें।
10. गोशालाओं की दशा सुधारें। यही सच्चा हिंदुत्व है। गोरक्षा और हिदुत्व में अन्योन्याश्रय सम्बन्ध हैं। गोरक्षा के बिना हिंदुत्व नहीं और हिंदुत्वके बिना जैसी हम चाहते हैं, वैसी गोरक्षा हो नहीं सकती।
देश को इस राष्ट्रघात और धर्मघात से बचाने के लिये निमित मात्र भी विलम्ब न करके तत्काल गो-सेवा में लग जाना चाहिये। आज केवल गोपूजा और गो-प्रदिक्षणा से ही गोसेवा नहीं हो सकती। प्रत्येक आर्य स्त्री-पुरूष जब तक गो-दुग्ध और गो-दुग्धान्न् का सेवन करने की प्रतिज्ञा न करेंगे, तब तक गो-सेवा पूरी नहीं होगी।
हिंदुस्थानी सभ्यता का नाम ही ‘‘ गोसेवा’’ है। लेकिन आज गाय की हालत हिंदुस्थान में उन देशों से कहीं अधिक खराब है जिन्होंने गोसेवा का नाम नहीं लिया था। हमने नाम तो लिया, पर काम नहीं किया। जो हुआ, सो हुआ। लेकिन अब तो चेतें।
इस युग में भी सब तरह के वैज्ञानिक आविष्कारों के होने पर भी हमारे देश में सभी धर्मावलम्बियों के सामाजिक और आर्थिक जीवन का प्रधान आधार गोवंश ही है। ऐसी अवस्था में सभी भारतवासियों को गोवंश ह्रास और अवनति को रोकने और उसकी वृद्धि और उन्नति के उपायों को कार्यान्वित करने में सहयोग देना चाहिये। हमारी तो प्रत्येक धार्मिक और आर्थिक, इहलौकिक और पारलौकिक उद्देश्य को सिद्धि के लिये यह नितान्त परमावश्यक है।
गोरक्षा हिंदू धर्म का एक प्रधान अंग माना गया हैं प्रायः प्रत्येक हिंदू गौ को माता कहकर पुकारता है और माता के समान ही उसका आदर करता है। जिस प्रकार कोई भी पुत्र अपनी माता के प्रति किये गये अत्याचार को सहन नहीं करेगा, उसी प्रकार एक आस्तिक और सच्चा हिंदू गोमाता के प्रति निर्दयता के व्यवहार को नहीं सहेगा। गोहिंसा की तो वह कल्पना भी नहीं कर सकता। गौधन के प्राण बचाने के लिये वह अपने प्राणों की आहुति दे देगा, किन्तु उसका बाल भी बाँका न होने देगा।
सरकार तथा सार्वजनिक संस्थाओं को चाहिये कि वे वर्तमान या भावी गोशालाओं के उपयोग के लिये निःशुल्क गोचर भूमि प्रदान करें। गोवंश की रक्षा में देश की रक्षा समायी हुई है। जैसे कोई अपनी माता पर किये गये अत्याचार को सहन नहीं करेगा, उसी प्रकार गोमाता की हत्या को सहन नहीं करेगा।
राज्य बाजार में बिकने आने वाली तमाम गौधन को अधिक-से-अधिक कीमत देकर खरीद लें। सरकार विस्तृत गोचर भूमि की व्यवस्था करे तथा गोरक्षा का शास्त्र लोगों को समझाने के लिये श्रेष्ठ विशेषज्ञों की सेवा प्राप्त करे। गोवंश की क्षति यह ऐसी हानि है कि इसको कोई व्यक्ति या संस्था नहीं रोक सकती। यह बात मुख्यतः सरकार के ही हाथ की है। इसमें लोगों को गो पालना, दुग्धालय चलाना और साँड़ चुनने की शिक्षा देनी जरूरी है। मेरे नम्र विचार के अनुसार सारी प्रजाके साथ दृढ़ता से और ज्ञानपूर्वक काम करते हुए गोधन की रक्षा करना राज्य का कर्तव्य है। राज्य के बालकों और लोगों को नीरोग और सात्विक दूध मिल सके- ऐसी व्यवस्था करना राज्य के प्रथम कर्तव्यों में से एक कर्तव्य है। गोवंश की रक्षा ईश्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है। भारत की सुख-समृद्धि गौधन के साथ जुड़ी हुई है।
यही आस पूरन करो तुम हमारी, मिटे कष्ट गौअन, छुटै खेद भारी।
कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का दारोमदार गोवंश पर निर्भर है। जो लोग यन्त्रीकृत ‘फार्मो’ के और तथा-कथित वैज्ञानिक पद्धतियों के सपने देखते हैं, वे एक अवास्तविक संसार में रहते हैं। हमारे लिये गोहत्या बंदी अनिवार्य है। मेरे विचार से भारत की वर्तमान परिस्थिति में गोहत्या निषेध से बढ़कर कोई वैज्ञानिक तथा विवेकपूर्ण कृत्य नहीं है।
भारत में गोवंश के प्रति सैंकड़ों लोगों में आस्था है उसकी उपेक्षा नही की जानी चाहिये।
सम्पूर्ण गोवंश परम उपकारी है। सबका कर्तव्य है कि तन-मन-धन लगाकर गोहत्या पर पूर्णरूप से बंदी लगवाये।
गोवंश के तीन बड़े दुष्मनों को दूर भगाओ- ट्रेक्टर, बछड़े-बछियों को मारकर निकाला गया काॅफ लेदर और गोमांस के व्यापारी को।
जब तक भारत की भूमि पर गोरक्त गिरेगा, तब तक देश सुख-शांति और धन-धान्य से वंचित रहेगा।
कृषि-प्रधान भारत में किसी भी उम्र के गाय-बैलों की हत्या कानून नहीं होनी चाहिये। गोहत्या मातृहत्या है। संविधान में आवश्यक संषोधन किया जाकर सम्पूर्ण गोवंश-हत्या-बंदी का केन्द्रीय कानून बने। उसमें कोई अपवाद न हो। एक भी अपवाद रहा तो पूरा गोवंश कटेगा। गोवंश के मांस का निर्यात पूर्णतः बंद हो। इसके लिये सत्याग्रह करना पड़े तो सत्याग्रह करो।
सम्पूर्ण गोवंश-हत्या बंद करके राष्ट्र की उन्नति के लिये गौधन को “राष्ट्र-माता”घोषित कर भारत-सरकार यषोभागी बने।
आज गोवंश का हनन हो रहा है। गोरक्षण आज का सर्वोच्च राष्ट्रहित है।
गोरक्षा से बढ़कर कोई धर्म नहीं है और गोहत्या से बढ़कर कोई पाप नहीं है।
गोवध-बंदी-हेतु प्रत्येक व्यक्ति नित्य एक हजार बार भगवान के नाम का जाप करें।
‘गौधन’ के बिना भारत-भूमि की सत्ता अक्षुण्ण नहीं रह सकती ।
जब तक गोमाता का रूधिर भूमि पर गिरता रहेगा, कोई भी धार्मिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक आदि लौकिक-अलौकिक अनुष्ठान सफल नहीं होगें।
एक गाय अपने जीवन काल में पंचगव्यों द्वारा सात्विक एवं पौष्टिक आहार प्रत्यक्ष रूप से हजारों मनुष्यों को प्रदान करती है जिससे मानव का शारीर स्वस्थ, मन पवित्र और बुद्धि तीक्ष्ण हो जाती है जिसके परिणाम स्वरूप मानव जीवन में देवत्व का विकास होने लगता है। देवत्व का विकास ही वास्तविक सर्वोच्च मानवीय चेतना का विकास है। वेद अवतरण का उदेश्य मानव की सर्वोच्च चेतना को विकसित करना है अतः गोसंरक्षण, गोसंवर्धन, गोपालन और गव्यों का विनियोग करना वैदिक सनातन धर्मावलंबी एवं सम्पूर्ण मानव जाति का कर्तव्य है।
गौधन मनुष्य का सर्वश्रेष्ठ हितैषी है। तूफान, ओला, अनावृष्टि या बाढ़ आवे और हमारी फसलों को नष्ट करके हमारी आशाओ पर पानी फेर दे, किन्तु फिर भी जो बचा रहेगा उसी से गाय हमारे लिये पौष्टिक और जीवन धारण करने वाला आहार तैयार कर देगी। उन हजारों बच्चों के लिये तो गाय जीवन ही है, जो दूधरहित वर्तमान नारीत्व की रेती पर पड़े हुए हैं।
हम उसके सौन्दर्य तथा उसकी उपयोगिता के लिये उसे प्यार करते हैं। उसकी कृतज्ञता में कभी कमी नहीं आयी। हमारे ऊपर दुर्भाग्य का हाथ तो होना ही चाहिये, क्योंकि हम लोग सालों से अपने कर्तव्य से गिर गये हैं। हम जानते हैं कि गाय हमारे एक मित्र के रूप में है जिससे कभी कोई अपराध नहीं हुआ। जो हमारी पाई-पाई चुका देती है। और घर की दोषों की रक्षा करती है।
कोई भी जाति या देश गाय के बिना उच्च सभ्यता नहीं प्राप्त कर सका है। पृथ्वी पर सबसे अच्छा पोषण गाय पैदा करती है। घास-चारा खाकर आरोग्य-शक्ति और पोषण देने वाला दुग्धान्न देती है। गाय अपने बच्चों ओर पालने वाले के घर के खाने भर के लिये ही नहीं देती, वरं वह इतना दुग्धान्न् देती है कि वे लोग स्वयं खाकर बेच भी सकें। गाय के बिना खेती स्थिर और समृद्ध नहीं हो सकती और न लोग सुखी तथा स्वस्थ ही हो सकते हैं जहाँ गाय है और उसकी उचित देख-भाल होती है, वहीं सभ्यता बढ़ती है, पृथ्वी उपजाऊ होती है, घर अच्छे बनते हैं और मनुष्यों का ऋृण चुक जाता है।
मैं गौधन की प्रसंसा करूँगा किन्तु यों ही साधारण दृष्टि से नहीं, वरं इसलिये कि वह इसकी अधिकारिणी है और ऐसा करना हमारा कर्तव्य है। मैं गाय को भागवत् सृष्टि के चर प्राणी-समाज में एक ऊँचे आदरणीय स्थान पर खड़ी देखना चाहूँगा। गाय से बढ़कर अन्य कोई भी पशु मनुष्य का मित्र नहीं है और न गाय जैसा कोई मधुर स्वभाव वाला है। अपने दीप्त, शांत और ध्यानमग्न नेत्रों से संसार को देखने वाली गाय के सौम्य रूप में सचमुच देवत्व भरा है। उसमें एक महानता और भव्यता है, जो ग्रामदेवता के उपयुक्त है। उसमें शत -प्रतिशत मातृत्व है और उसका मनुष्य-जाति से यही माता का सम्बन्ध है।
मैं यह नहीं मानता कि गाय एक उदास, अबोध और व्यक्तित्व शून्य प्राणी है किन्तु ऐसा न मानने वाले किसी संशययुक्त मनुष्य को यह मनाना भी मेरे लिये कठिन है। जब तक मनुष्य अपने पशु-मित्रों के प्रति सहानुभूति पूर्ण व्यवहार न करेगा तब तक वह उनकी अत्यन्त प्रिय तथा मनोरम विशेषताओं के विषय में सदा अँधेरे में ही रहेगा।
‘गाय हमारे दुग्ध-भुवन की देवी है। यह भूखों को खिलाती है, नंगों को पहनाती है और बीमारों को अच्छा करती है।
आज हमारा देश स्वतन्त्र हो चुका है और हम भी स्वतन्त्र कहलाते हैं फिर भी हमारे पवित्र भारत में गोवंश की रक्षा न होकर उसका उत्तरोत्तर हाश्य होता जा रहा है। हजारों-लाखों की संख्या में निरपराध गौधन प्रतिदिन इसी स्वतन्त्र भारत में मारी जाती हैं। जब से भारत भूमि में गोसंहार होने लगा है, तभी से हम भारतीय नाना प्रकार के रोग एवम विविध कष्टोें से पीडि़त हो रहे हैं। हमें एक समय पर वर्षां द्वारा न जल प्राप्त होता है और न धरती माता द्वारा उचित रूप में अन्न प्राप्त होता है।
गोधन भारतीय संस्कृति और सभ्यता का अन्यतम रक्षक है। अतः गो जाति का ह्रास हिंदूजाति और हिंदू धर्म का ह्रास है। इसलिये सभी दृष्टि से गोवंश की रक्षा परमावष्यक है। हमें चाहिये, हम संगठितरूप से समस्त भारतवर्ष में गोरक्षार्थ रचनात्मक दृढ़ आन्दोलन उपस्थित करें और प्रान्तीय तथा केन्द्रीय सरकार से भी गोरक्षार्थ प्रार्थना करें।
वर्तमान पिंजरापोल, गोशालाओं का सुधार करना चाहिये और जो पिंजरापोल, गोशाला दयाभाव से केवल बूढ़ी, अपंग गायों के लिये खोले गये हैं, उन्हें डेरी फार्म न बनाकर उस काम के लिये रहने देना चाहिये।
गायों का गर्भाधान, विशेष दूध देने वाली गौमाता के पुत्र, बलवान् तथा श्रेष्ठ जाति के देशी साँड़ से ही करना चाहिए अच्छी नस्ल के देशी साँड़ों का संवर्धन तथा विस्तार करना, बूढ़े साँड़ों से तथा जर्सी साँड़ों से गर्भाधान का काम कतई नही करना चाहिये|
कसाईखानों में मारी हुई गायों के चमड़े इत्यादि से बनी हुई वस्तुएँ- जुते, बटुए, कमरपट्टे, बिस्तरबंद, घड़ी के फीते, चष्मे के घर, पेटियाँ, हैंडबेग आदि का व्यवहार न करने की शपथ करना-कराना चाहिये।
गोवध में सहायक चमड़े, मांस आदि का व्यापार, जिससे गोवध होता है -बिलकुल न करना।
ट्रेक्टरों का व्यवहार न करके या कम से कम करके, हल जोतने का काम बैलों से ही लेना तथा रासायनिक खाद का उपयोग न करके गोबर, गोमूत्र की खाद से ही काम लेना चाहिये और इनकी उपयोगिता का प्रतिपादन करना चाहिये।
जिनका भगवत्प्रार्थना में विश्वास है, उनको चाहिये कि वे श्रद्धापूर्वक नित्य भगवान से प्रार्थना किया करें। यदि प्रार्थना सत्य होगी और हृदय से होगी तो ऐसे संयोग अपने-आप बनेंगे जिनसे गोरक्षा का मार्ग सुगम हो जायगा।
जो परात्पर ब्रह्म भगवान् श्रीकृष्ण बड़े-बड़े महान् योगियों के समाधि लगाने पर भी ध्यान में नहीं आते वे ही साक्षात् परात्पर ब्रह्म श्रीकृष्ण पूज्या गोमाता के पीछे-पीछे नंगे पाँवों जंगलों में, वनों में अपने हाथ में बंशी लिये घूम रहे हे इससे बढ़कर आश्चर्य की बात भला और क्या होगी? इससे बढ़कर पूज्या गौमाता की अद्भुत महत्ता का जीता जागता ज्वलन्त उदाहरण और प्रत्यक्ष प्रमाण भला और क्या हो सकता है?
गोमाता विशुद्ध सत्त्वमयी भगवती पृथ्वी की प्रतिमूर्ति हैं, समग्र धर्म, यज्ञ, सत्कर्म और विश्व संचालन का आधार है और सीधेपन तथा वाल्सल्य की तो सीमा ही नहीं है इसके दर्शन, स्पर्श, वन्दन, अभिनन्दन आदि से सारे पाप-तापों का शमन होकर परम कल्याण एवं सुख, शान्ति, आनन्द का संचार होता है तथा सब प्रकार के मंगलमय अभ्युदय का आगमन होता है, यह सब का हृदय जानता है। इसलिये यह निरन्तर पूजनीय, वन्दनीय एवं अभिनन्दनीय है।
गौधन की उपेक्षा से आज पृथ्वी नरक बन गयी है पर पूरा विश्वास कीजिये इन देवता-देवियों और उत्सवों की जगह सच्ची महा महिमामयी देवी गोमाता की सेवा से साक्षात् स्वर्ग या गोलोक ही इस भूमण्डल पर उतर जायेगा तथा सच्चे सुख, शान्ति, आनन्द और कल्याण की मधुमयी सुधा धारा निरन्तर प्रवाहित होने लगेगी। सब लोगों के विचार बदल जायेंगे। परस्पर सौहार्द का वातावरण उपस्थित होकर प्रतिक्षण दिव्य ज्ञान-विज्ञान एवं भक्तियोग आदि के चमत्कारपूर्ण प्रचार-प्रसार सर्वत्र दीखने लगेंगे।
गाय का इतना महत्वपूर्ण स्थान इसी बात से अवगत होता है कि समस्त प्राणियों को धारण करने के लिये धरती माता गौ रूप ही धारण करती है। जब-जब पृथ्वी पर असुरों का भार बढ़ता है, तब-तब वह देवताओं के साथ श्रीमन्नारायण की शरण में गोरूप ही धारण करके जाती है।
देश के धर्म और संस्कृति के संरक्षकों, मनुष्यों एवं विशेषकर गोविन्द के भक्तों को विचार करके ऐसा मार्ग प्रशस्त करना चाहिये, ऐसी शुभ योजना बनाकर जनता के समाने रखनी चाहिये, जिससे गोसेवा के लिये उत्साह बढ़े और उसके द्वारा धर्म और अर्थ दोनो पुरुषार्थों की सिद्धि सहज में ही सुलभ हो सके तभी गोविन्द की गाय की सेवा भगवान की प्रसन्नता की हेतु बन सकेगी।
ध्यान रहे, विदेशी दुर्नीति, सरकार की तुष्टीकरण की रीति और व्यापारियों की अर्थलोलुपता से भरी हुई दृष्टि- इन तीनों से भारत में गोहत्या हो रही है। गौधन, सुर, संत और भूदेवी का हृदय भारत पर संकट की स्थिति जिन राजनेताओ के द्वारा उत्पन्न की जा रही है, उन्हें सावधान रहना चहिये, इन्हीं की रक्षाके लिये भगवान अवतरित होते हैं ऐसा ध्यान रखना चाहिये।
गाय विश्व की माता है- ‘गावो विश्वस्य मातरः।’ सूर्य, वरुण, वायु आदि देवताओं को यज्ञ, होम में दी हुई आहुति से जो खुराक, पुष्टि मिलती है, वह गाय के घी से ही मिलती है। होम में गाय के घी की ही आहुति दी जाती है, जिससे सूर्य की किरणें पुष्ट होती हैं। किरणें पुष्ट होने से वर्षा होती है और वर्षा से सभी प्रकार के अन्न, पौधे, घास आदि पैदा होते हैं, जिनसे सम्पूर्ण स्थावर-जंगम, चर-अचर प्राणियों का भरण-पोषण होता है।
गाय की रक्षा से मनुष्य, देवता, भूत-प्रेत, यक्ष-राक्षस, पशु-पक्षी, वृक्ष-घास आदि सबकी रक्षा होती है।
जैसे भगवान् की सेवा करने से त्रिलोकी की सेवा होती है, ऐसे ही निष्काम भाव से गाय की सेवा करने से विश्वमात्र की सेवा होती है; क्योंकि गाय विश्व की माता है। गाय की सेवा से लौकिक और पारलौकिक- दोनों तरह के लाभ होते हैं। गाय की सेवासे अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष- ये चारों पुरुषार्थ सिद्ध होते हैं।
रुपयों से वस्तुएँ श्रेष्ठ हैं, वस्तुओं से पशु श्रेष्ठ हैं, पशुओं से मनुष्य श्रेष्ठ हैं, मनुष्यों में भी विवेक श्रेष्ठ है और विवेक से भी सत-तत्व (परमात्मतत्त्व) श्रेष्ठ है और परंतु आज सत्-तत्व की उपेक्षा हो रही है, तिरस्कार हो रहा है और असत्-वस्तु रुपयों को बड़ा महत्व दिया जा रहा है। रुपयों के लिये अमूल्य गोधन को नष्ट किया जा रहा है। गायों से रुपये पैदा किये जा सकते हैं, पर रुपयों से गायें पैदा नहीं की जा सकती हैं, गायों की परम्परा तो गायों से ही चलती है। जब गायें नहीं रहेंगी, तब रुपयों से क्या होगा ? उल्टा देश निर्बल और पराधीन हो जायेगा। रुपये तो गायों के जीवित रहने से ही पैदा होंगे। गायों को मारकर रुपये पैदा करना बुद्धिमानी नहीं है। बुद्धिमानी तो इसी में है कि गायों की वृद्धि की जाये गायों की वृद्धि होने से दूध, घी आदि की वृद्धि होगी, जिनसे मनुष्यों का जीवन चलेगा, उनकी बुद्धि बढ़ने से विवेक को बल मिलेगा, जिसे सत-तत्त्व की प्राप्ति होगी। सत-तत्त्व की प्राप्ति होने पर पूर्णता हो जायेगी अर्थात् मनुष्य कृतकृत्य, ज्ञात-ज्ञातव्य और प्राप्त-प्राप्तव्य हो जायेगा।
1. बूचड़खानों को हर तरह के उचित उपाय करके बंद करवाना चाहिये, गौओं की उत्तम वंश-वृद्धि के उपाय करने चाहिये,गौधन के लिये पर्याप्त चारे-दाने की व्यवस्था होनी चाहिये,घास के लहलहाते मैदान गौओं के लिये सर्वत्र खुले होने चाहिये,प्रत्येक सद्गृहस्थ को अपने घर में गौ अवश्य रखनी चाहिये और उसका प्रेम के साथ पालन करना चाहिये, कोई भी हानिकारक वस्तु गौओं को कभी नहीं खिलानी चाहिये, बैलों के काम और चारे-दाने पर विशेष ध्यान रखना चाहिये,गौओं की तंदुरुस्ती और स्वच्छतापर विशेष ध्यान देना चाहिये, उत्सवों पर गौओं का विशेष पूजन होना चाहिये, गो जाति के लिये हृदय में अगाध प्रेम होना चाहिये।
प्राणी जब यह जान जायेगा कि गाय धरती के लिये वरदान है तो उसकी रक्षा में वह स्वयं तत्पर होगा। किसी के उपदेश, आदेश की आवश्यकता नहीं होगी।
गौ हमारी सभ्यता और संस्कृति की मेरुदण्ड है। गौविहीन भारतीय संस्कृति की तो कल्पना ही नहीं की जा सकती। गौ हमारी राष्ट्र-लक्ष्मी है। वह हमारी समृद्धि की आधारशिला है। गौने हमें जीवनदायिनी शक्ति दी है, हमें आरोग्य, आनन्द और शान्ति प्रदान की है। गौ हमारी सारी आर्थिक योजनाओं और सारी आध्यात्मिक शक्तियों की स्रोत है। हमें यह नहीं भूलना चाहिये कि गौमाता तो हमारी कल्याणकारिणि माता है।
यदि हम चाहते हैं कि हमारी भारत-भू अन्नपूर्णा बनी रहे, यदि हम चाहते हैं कि हमारे बच्चे तेजस्वी, ओजस्वी, वर्चस्वी और प्राणवान बने रहें तो हमें गायों का अच्छी तरह से पालना करना होगा, उनकी रक्षा करनी होगी, और सेवा करनी होगी।
आज विश्व में अमेरिका एवं यूरोप समृद्ध माने जाते हैं, ये दोनों राष्ट्र गौ की सेवा पूर्णरूप में करते हुए गौ के ऋणी एवं कृतज्ञ हैं। किंतु इस दिशा में गौ और गोविन्द के प्रेमी हमारे भारत की स्थिति गोसेवा से विरत हो जाने से परम दयनीय हो गयी है।
आज पर्यावरण-प्रदुषण की बात बड़े जोर-शोर से चल रही है, पर इन महानुभावों ने इस पर कभी विचार ही नहीं किया कि विषुद्ध पर्यावरण के मूल में गौधन का ही अस्तित्व है। गौ घर-घर रहेगी तो उसके गोमूत्र -गोबर मात्र से ही समस्त राष्ट्र का प्रदूषण दूर किया जा सकता है। इससे उत्तम साधन समस्त राष्ट्र के प्रदूषण को दूर करने का और क्या हो सकता है?
पशुत्व की जड़ता से मातृत्व की चोटी तक गाय को पहुँचाने का श्रेय समाज अथवा शास्त्रों को नहीं अपितु इस भोली-भाली मूर्ति में पायी जाने वाली अद्भुत गुणसम्पदा को है। साहित्य एवं व्यवहार में मनुष्य की सज्जनता की उपमा गाय की नैसर्गिक सरलता से दिया जाना एक सामान्य बात है। यह पशु नहीं परोपकार का प्रतिमान है, मानदण्ड है।
गौ सर्वार्थसिद्धि का एक सम्पूर्ण साधन तथा भारतीय संस्कृति का मूलाधार है, भारतीय दर्षन का आध्यात्मिक मूल है।
विश्व में कलियुग के प्रभाव से प्रायः सभी वस्तुओं का प्रभाव लुप्त-सा होता जा रहा है, परंतु गौमाता एवं गोसेवा का प्रभाव वर्तमान समय में भी लुप्त नहीं हो सका है। यदि भक्तिपूर्वक गो-सेवा की जाय तो वह अपने भक्त की सभी इच्छाएँ पूर्ण करने में सक्षम है।
गोसेवा से श्रेष्ठतम महान पुत्र की प्राप्ति होती है। कुलगुरु-वसिष्ठ द्वारा महाराज दिलीप को सुरभि नन्दिनी की भक्तियुक्त सेवा का आदेश हुआ। गो-सेवा के परिणाम स्वरूप ही राजा दिलीप के पुत्र रघु हुए। महाराज ऋतम्भर ने मुनि जाबालि के आदेशानुसार भक्ति-भावना से गो-सेवा की, परिणास्वरूप सत्यवान नामक पुत्र की प्राप्ति हुई।
भारत वर्ष के उज्जवल भविष्य का पुनर्निर्माण गोसेवा, गोवंश की रक्षा एवं गोमाता के आशीर्वाद पर ही आधारित है।
गोसेवा भगवत्प्राप्ति के अन्यतम साधनों में से एक है। इससे भगवान शीघ्र प्रसन्न हो जाते है। यह बड़ी ही विचित्र बात है कि भगवान जहाँ मनुष्यों के इष्टदेव हैं, वहीं गौ उनकी भी इष्टदेवी है।
गोसेवा से गोसेवक निष्पाप हो जाता है। गोखुर से उड़ती हुई धूलि से आच्छादित आकाश पृथ्वी को ऊसर होने से बचाता है। गोपालव्रत स्थार्थ नहीं वरन परमार्थ है।
भगवती सुरभि के अंश से उत्पन्न गाय को पशु कहने वालों को पाप घेरता है। इनमें देवत्व और मातृत्व का दर्शन करते हुए श्रद्धा समर्पित करनी चाहिये|
गौधन के सेवक भी जिस भूमि पर निवास करते हैं। वह भूमि भी समस्त तीर्थों द्वारा अभिनन्दित होती है। गोमाता की सेवा से पंचगव्य लेने से तथा चरणोदकमार्जन से तीर्थ स्नान का फल प्राप्त होता है। गाय जहाँ पर पानी पीती है अथवा जिस जल से पार होती है वहाँ सरस्वती जी विद्यमान होती हैं।
गोसेवा बड़ी से बड़ी दुस्तर विपत्तियों से रक्षा करती है। ज्योतिषशास्त्र में ग्रहों की विपरीत अवस्था में गोसेवा ही प्रमुख उपाय बताया गया है।
गौ भारत की राष्ट्रीय समृद्धि और सम्पदा की विशिष्ट प्रतीक रही है। तपोवन -संस्कृति की यह महत्वपूर्ण अंग थी। गृहस्थों की ही नहीं आश्रम में रहने वाले ऋषियों की समृद्धि का परिचय भी उनके यहाँ रहने वाली गौओं की संख्या से मिलता है।
तीव्र गति से नाम जप पूर्वक ही गोसेवा और गोरक्षार्थ प्रयास करना चाहिये। साथ ही गौ को पशु न समझकर सर्वदेवमयी धेनु-साक्षात् भगवान का स्वरूप मानकर उसकी सेवा-शुश्रुषा, पूजा करनी चाहिये।
इसमें संदेह नहीं कि गोहत्या-बंदी के साथ-साथ गायों की दुग्धोत्पादन-क्षमता बढ़ाने, नस्ल-सुधार एवं गोमय और गोमूत्र के समुचित उपयोगकी व्यवस्था के लिये गोसंवर्धन का सबल प्रयास अपेक्षित है।
गोमाता को कभी भूलकर भी भैंस, बकरी आदि अन्य पशुओं की भाँति साधारण पशु नहीं मानना चाहिये। वह सामान्य पशु नहीं है। उसके शरीर में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास है। गोमाता परब्रह्म श्रीकृष्ण की परमाराध्या है और गोमाता भवसागर से पार लगाने वाली साक्षात देवी है, यह मानना चाहिये।
मनुष्य की सम्पूर्ण क्रियाओं का मूल मन है और गौ मनकी शुद्धि का मूल हेतु है। मानव-जीवन से पशु-जगत का यों भी घनिष्ठ सम्बन्ध है, फिर दिव्य पशु तो मानव-जीवन की आधारशिला है। वेद में सामान्य और दिव्य पशुओं का पर्याप्त विवेचन हुआ है। गौ और गौ की संतान दोनों ही दिव्य पशु हैं।
इस गाय की रक्षा करना ईष्वर की सारी मूक सृष्टि की रक्षा करना है। जिस अज्ञात ऋषि या दृष्टा ने गोपूजा चलायी, उसने गाय से सिर्फ शुरुआत की, इसके सिवा और कोई ध्येय हो नहीं सकता है। इस पशुसृष्टि की फरियाद मूक होने से और भी प्रभावशाली है। गोरक्षा हिंदू-धर्म की दुनिया को दी हुई एक कीमती भेंट है।
इस पृथ्वी पर मूर्तिमन्त गौ जिस परम शक्ति की प्रतीकस्वरूपा है, उसकी व्याख्या वेदों में भी साध्य नहीं है। गौ विश्व की माता है, यह पार्थिव जगत् में जितना सत्य है उससे भी अधिक इसका महत्व आध्यात्मिक दृष्टि से है।
गौ समस्त प्राणियों की परम श्रेष्ठ शरण है, यह सम्पूर्ण विश्व की माता है- ‘सर्वेषामेव भूतानां गावः शरणमुत्तमम्’,‘गावो विश्वस्य मातरः।’ यह निखिलागमनिगमप्रतिपाद्य सर्ववन्दनीया एवं अमितशक्तिप्रदायिनी दिव्यस्वरूपा है। कोटि-कोटि देवताओं की दिव्य अधिष्ठान है। इसकी पूजा समस्त देवताओं की पूजा है। इसका निरादर समस्त देवताओं का निरादर है।
गोमाता ईश्वर का प्रत्यक्ष स्वरूप है। इसका प्रमाण है गोमाता का स्वाभाविक निष्काम भाव, उसके भोजन की सात्त्विकता तथा सभी के प्रति समदृष्टि।
गो-दुग्ध अमृत है, गंगा-जल पवित्र एवं तारक है, गीता निष्कामकर्मद्वारा ब्राह्मी स्थिति तक पहुँचा देती है और गायत्री-मन्त्र हमारी बुद्धि को पवित्र एवं परिष्कृत करता है।
गाय दरवाजे की शोभा ही नहीं, वह श्रीसम्पदा है, लक्ष्मी है, धरती की भाँति पूज्या है। जिस वात्सल्य-रस की इतनी महिमा और चर्चा है, वह गाय का अपने बछड़े के प्रति अहैतु स्नेह को देखकर ही है। सचमुच गाय हमारी माँ है।
गौ और पृथ्वी एक-दूसरे के पूरक हैं। पृथ्वी जीवों का आधार है और गौ जीवों का जीवनाधार है। इस प्रकार गौ और पृथ्वी का तादात्म्य है। गौ के गोबर तथा मूत्र पृथ्वी की उर्वराशक्ति की अभिवृद्धि करते हैं और यह अभिवृद्धि भी स्वाभाविक होती है। इसमें स्थायित्व एवं निरन्तरता होती है। अतः यह पृथ्वी को अत्यन्त प्रिय होता है। पुराणों तथा शास्त्रों में गौ को पृथ्वी का जीवन्त रूप माना गया है।
हमें सर्वात्मना सर्वभावेन निरन्तर गौ का सानिध्य एवं गोसेवाको अपनी दिनचर्या का अंग बनाना चाहिये क्योंकि अन्य आसुरी सम्पदाएँ तो हमें अशान्त ही कर सकती हैं। केवल गो ही हमें शान्त और सुखमय करती है।
गौ एक अमूल्य स्वर्गीय ज्योति है, जिसका निर्माण भगवान ने मनुष्यों के कल्याणार्थ आशीर्वाद रूप में पृथ्वीलोक में किया है। अतः इस पृथ्वी पर गोमाता मनुष्यों के लिये भगवान का प्रसाद है। भगवान के प्रसादस्वरूप अमृतरूपी गोदुग्ध का पान कर मानवगण ही नहीं, किंतु देवगण भी तृप्त और संतुष्ट होते हैं। इसीलिये गोदुग्ध को ‘अमृत’ कहा जाता है। यह अमृतमय गोदुग्ध देवताओं के लिये भोज्य-पदार्थ कहा गया है। अतः समस्त देवगण गोमाता के अमृतरूपी गोदुग्ध के पान करने के लिये गोमाता के शरीर में सर्वदा निवास करते हैं।
सब गृहस्थों को भोग (योग्य पदार्थ) देने वाले और परोसने वाले गौ-बैल ही हैं। इसलिये माता-पिता के समान उन्हें भी पूज्य माने और उनका सत्कार करें।
गोग्रास के निमित्त आये हुए पैसों में से एक पाई भी कभी भूल से भी अपने काम में मत लगाओ जितना बने अपनी ओर से गोहित में तन-मन-धन लगाते रहो। पर गौ के हक का द्रव्य और स्वत्व कभी भूल कर भी मत लो। इसी में भलाई है। गोमाता के नामपर पैसा खाने वालों को नरक का कीड़ा बनना पड़ता है। गौ के हक का द्रव्य तो साक्षात अग्नि के अंगारे हैं। क्या अंगारों को कोई पचा सकेगा।
!! जय गौमाता – जय गोपाल !!
गौ माता – सर्वदेवमयी हि गौः
गौ माता – सर्वदेवमयी हि गौः
श्रीमद् भगद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराया। अर्जुन को इस विराट रूप में सम्पूर्ण विभूतियों सहित चराचर जगत, त्रिभुवन त्रैलोक्य और सारे देवी देवताओं के दर्शन हुए। सनातनधर्म में 33 करोड़ देवता माने गए हैं और इन सभी देवी देवताओं का निवास गौ माता में होने के कारण गावो विश्वस्य मातरः अर्थात गाय चराचर जगत की माता है। यही कारण है कि केवल गौ की पूजा एवं सेवा से सम्पूर्ण देवी देवताओं का आराधन हो जाता है। वेदों, स्मृतियों तथा विभिन्न पुराणों में गौ के विश्वरूप का वर्णन किया गया है तथा गो महिमा और गो सेवा की महिमा भी बताई गई है।
वेदों में गौ तथा बैल को भी विश्वरूपी बताया गया है। प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान ग्रिफिथ महोदय ने इन वैदिक सूक्तों की अत्यधिक प्रशंसा की है। इन मंत्रों में यह भाव दिखाया गया है कि जनसाधारण अपने हृदय में यह समझे कि हम सब गोमाता के ही अंग हैं। गौ के शरीर को कष्ट होने पर हमको ही कष्ट होगा क्योंकि गौ के साथ हमारा सम्बन्ध शरीर और अंगों के रूप में है। वेदों की यह भी भावना है कि गौ हमारे परिवार की मुखिया है, और हम उसके परिवार के सदस्य हैं। यदि गौ के मनुष्यों के प्रति उपकारों पर चिन्तन किया जाय तो वेदों का यह कथन आसानी से समझ मेें आ जाएगा। साथ ही वेदों के इन सूक्तों से अहिंसा का उत्तम उपदेश दिया है। हिंसक पशु व राक्षस आदि भी अत्यधिक भूख लगने पर भी अपने अंगों को नहीं खा जाते। इसी प्रकार यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि मैं गो के शरीर का एक भाग हूँ इसलिए मुझे वैसे ही गौ की रक्षा करनी चाहिये जैसे मैं अपने शरीर की करता हूँ।
गौ को माता कहने का अर्थ यही है कि वह हमारे लिये पवित्र, पूजनीय, वन्दनीय व पालनीय है। दुराचारी व्यक्ति भी किसी स्त्री को ‘माता’ कहता है तो उसके चित्त में भी तत्काल पवित्रता आ जाती है। अतः गौ को माता कहने को तात्पर्य है कि उसे पवित्र दृष्टि से देखा जाय। इन्द्रादि देवगण गौमाता के देह में स्थित हैं अतः उसका शरीर ही स्वर्ग है। इसी प्रकार वेदों के साथ ही वृहत्पाराशर स्मृति, पद्म पुराण, भविष्य पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, स्कन्द पुराण एवं महाभारत में भी विभिन्न प्रकार से गौ माता के शरीर में विभिन्न देवों की स्थिति का वर्णन विस्तार से उपलब्ध है। उदाहरर्णाथ भविष्य पुराण के उत्तर पर्व 69/25-37 का अवलोकन करें-
शृगमूले गवां नित्यं ब्रह्मा विष्णुश्च संस्थितौ।
शृगाग्रे सर्वतीर्थानि स्थावराणि चराणि च ।।25।।
गौओं के सींग के मूल में सदा ब्रहमा और विष्णु प्रतिष्ठित हैं। अग्रभाग में चराचर समस्त तीर्थ स्थित हैं।
शिवो मध्ये महादेवः सर्वकारणकारणम्।
ललाटे संस्थिता गौरी नासावंशे च षण्मुखः।।26।।
सभी कारणों के कारण महादेव शिव सींगों के मध्य में, ललाट में गौरी तथा नासिकास्थि में भगवान कार्तिकेय स्थित हैं।
कम्बलाश्वतरौ नागौ नासापुटसमाश्रितौं।
कर्णयोऽश्विनौ देवौ चक्षुम्र्यां शशिभास्करौ।।27।।
नासिका छिद्रों में कम्बल व अश्वतर नाग, कानों में अश्विनी देव व आँखों में चन्द्र व सूर्य स्थित हैं।
दन्तेषु वसवः सर्वे जिह्वायां वरूणः स्थितः।
सरस्वती च कुहरे यमयक्षौ च गण्डयोः।।28।।
गौ के दांतों में आठों वसु, जीभ में वरूण, कण्ठ में माता सरस्वती व गण्डस्थलों में यमराज व यक्षगण स्थित हैं।
सन्ध्याद्वयं तथोष्ठाभ्यां ग्रीवायां च पुरन्दरः।
रक्षांसि ककुदे द्यौश्च पाष्र्णिकाये व्यवास्थिता।।29।।
दोनां होंठों में दोनों सन्ध्यादेवियाँ ग्रीवा में इन्द्र ककुद में राक्षस, पाष्र्णि भाग में आकाश व्यवस्थित है।
चतुष्पात्सकलो धर्मों नित्यं जंघासु तिष्ठति।
खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पलगाः।।30।।
चारों चरणों से युक्त धर्म जंघाओं में, खुरों में गन्धर्वदेवगण, खुरों के अग्रभाग में सर्प निवास करते हैं।
खुराणां पश्चिमे भागे राक्षसाः सम्प्रतिष्ठिताः।
रूद्रा एकादश पृष्ठे वरूणः सर्वसन्धिषु।।31।।
खुरों के पश्चिमी भाग में राक्षसगण, पीठ में ग्यारह रूद्र तथा सभी जोडों में वरूण देव प्रतिष्ठित हैं।
श्रोणीतटस्थाः पितरः कपोलेषु च मानवाः।
श्रीरपाने गवां नित्यं स्वाहालंकार माश्रिताः।।32।।
गौ की कमर में पितरगण, कपोलों में मानव, अपानभाग में स्वाहा देवी के साथ अलंकार रूप में लक्ष्मी जी आश्रित हैं।
आदित्या रश्मयो बालाः पिण्डीभूता व्यवस्थिताः।
साक्षाद्गंगा च गोमूत्रे गोमये यमुना स्थिता।।33।।
सूर्य किरणें केश समूहों में पिण्डीरूप में, गौ के मूत्र मेें साक्षात गंगा व गोबर में यमुना जी व्यवस्थित हैं।
चयस्त्रिंशद् देवकोट्यो रोमकूपे व्यवस्थिताः।
उदरे पृथिवीं सर्वा सशैलवन काननाः।।34।।
सभी रोमकूपों में तैंतीस कोटि देवता, पेट में पर्वतों व वनों से सुशोभित पूरी पृथ्वी व्यवस्थित हैं।
चत्वारः सागराः प्रोक्ता गवां ये तु पयोधराः।
पर्जन्यः क्षीरधारासु मेघा विन्दु व्यवास्थिताः।।35।।
चारों पयोधरों में चार महासागर, दूध की धारा में पर्जन्यदेव तथा दुग्ध बिन्दुओं में मेघ नामक देवता व्यवस्थित हैं।
जठरे गार्हपत्योग्निर्दक्षिणाग्नि हृदि स्थितः।
कण्ठे आहवनीयोऽग्निः सम्योऽग्निस्तालुनि स्थितः।।36।।
गौ की जठराग्नि में गाहिपत्याग्नि, हृदय मेें दक्षिणाग्नि, कष्ठ में आहवनीय अग्नि और तालु मेें सम्याग्नि स्थित हैं।
अस्थिव्यवस्थिताः शैला मज्जासु क्रतवः स्थिताः।
ऋग्वेदोऽथर्ववेदश्च सामवेदो यजुस्तथा।।30।।
गौ की अस्थियों में पर्वत, मज्जओं में यज्ञ देव तथा चारों वेद (क, यजु, अथर्व व साम) भी गौओं में ही प्रतिष्ठित हैं।
पौराणिक प्रार्थना-
या लक्ष्मीः सर्व भूतानां या च देवेषु संस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम शान्तिं प्रयच्छतु।।1।।
देहस्था या च रूद्राणी शंकरस्य सदा प्रिया।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु।।2।।
विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः।
चन्द्रार्कशक्रशक्तिर्या धेनुरूपास्तु सा श्रिये।।3।।
चतुर्मखस्य या लक्ष्मीर्या लक्ष्मी र्धनदस्य च।
लक्ष्मीर्या लोकपालानां सा धेनुर्वरदास्तु मे।।4।।
स्वधा या पितृमुख्याना स्वाहा यज्ञभुजा च या।
सर्वपापहरा धेनुस्तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ में।।5।।
जो गौ सभी प्राणियों की वास्तविक लक्ष्मी हैं, देवताओं में छवि रूप से स्थित हैं, शंकरप्रिया रूद्राणि जिसके शरीर में स्थित हैं, भगवान विष्णु के वक्ष में स्थित लक्ष्मी हैं, जो अग्नि की स्वाहा रूपी शक्ति हैं, जो चन्द्र सूर्य व इन्द्र की इष्टशक्ति हैं, जो ब्राहमा जी की आत्मशक्तिरूपा विद्याधिष्ठात्री सरस्वती हैं, जो कुबेर की लक्ष्मी रूपा शक्ति हैं, जो लोकपालों की ऐश्वर्यरूपी लक्ष्मी हैं, जो पितरों की स्वधा रूपी शक्ति व देवों के लिये स्वाहा रूपी शक्ति हैं, वह गौ माता देवी मुझे शान्ति, अपाप, कल्याण, वर तथा परम् शान्ति प्रदान करें।
श्रीमद् भगद्गीता में भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने विराट स्वरूप का दर्शन कराया। अर्जुन को इस विराट रूप में सम्पूर्ण विभूतियों सहित चराचर जगत, त्रिभुवन त्रैलोक्य और सारे देवी देवताओं के दर्शन हुए। सनातनधर्म में 33 करोड़ देवता माने गए हैं और इन सभी देवी देवताओं का निवास गौ माता में होने के कारण गावो विश्वस्य मातरः अर्थात गाय चराचर जगत की माता है। यही कारण है कि केवल गौ की पूजा एवं सेवा से सम्पूर्ण देवी देवताओं का आराधन हो जाता है। वेदों, स्मृतियों तथा विभिन्न पुराणों में गौ के विश्वरूप का वर्णन किया गया है तथा गो महिमा और गो सेवा की महिमा भी बताई गई है।
वेदों में गौ तथा बैल को भी विश्वरूपी बताया गया है। प्रसिद्ध पाश्चात्य विद्वान ग्रिफिथ महोदय ने इन वैदिक सूक्तों की अत्यधिक प्रशंसा की है। इन मंत्रों में यह भाव दिखाया गया है कि जनसाधारण अपने हृदय में यह समझे कि हम सब गोमाता के ही अंग हैं। गौ के शरीर को कष्ट होने पर हमको ही कष्ट होगा क्योंकि गौ के साथ हमारा सम्बन्ध शरीर और अंगों के रूप में है। वेदों की यह भी भावना है कि गौ हमारे परिवार की मुखिया है, और हम उसके परिवार के सदस्य हैं। यदि गौ के मनुष्यों के प्रति उपकारों पर चिन्तन किया जाय तो वेदों का यह कथन आसानी से समझ मेें आ जाएगा। साथ ही वेदों के इन सूक्तों से अहिंसा का उत्तम उपदेश दिया है। हिंसक पशु व राक्षस आदि भी अत्यधिक भूख लगने पर भी अपने अंगों को नहीं खा जाते। इसी प्रकार यह सिद्धान्त स्थिर हुआ कि मैं गो के शरीर का एक भाग हूँ इसलिए मुझे वैसे ही गौ की रक्षा करनी चाहिये जैसे मैं अपने शरीर की करता हूँ।
गौ को माता कहने का अर्थ यही है कि वह हमारे लिये पवित्र, पूजनीय, वन्दनीय व पालनीय है। दुराचारी व्यक्ति भी किसी स्त्री को ‘माता’ कहता है तो उसके चित्त में भी तत्काल पवित्रता आ जाती है। अतः गौ को माता कहने को तात्पर्य है कि उसे पवित्र दृष्टि से देखा जाय। इन्द्रादि देवगण गौमाता के देह में स्थित हैं अतः उसका शरीर ही स्वर्ग है। इसी प्रकार वेदों के साथ ही वृहत्पाराशर स्मृति, पद्म पुराण, भविष्य पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण, स्कन्द पुराण एवं महाभारत में भी विभिन्न प्रकार से गौ माता के शरीर में विभिन्न देवों की स्थिति का वर्णन विस्तार से उपलब्ध है। उदाहरर्णाथ भविष्य पुराण के उत्तर पर्व 69/25-37 का अवलोकन करें-
शृगमूले गवां नित्यं ब्रह्मा विष्णुश्च संस्थितौ।
शृगाग्रे सर्वतीर्थानि स्थावराणि चराणि च ।।25।।
गौओं के सींग के मूल में सदा ब्रहमा और विष्णु प्रतिष्ठित हैं। अग्रभाग में चराचर समस्त तीर्थ स्थित हैं।
शिवो मध्ये महादेवः सर्वकारणकारणम्।
ललाटे संस्थिता गौरी नासावंशे च षण्मुखः।।26।।
सभी कारणों के कारण महादेव शिव सींगों के मध्य में, ललाट में गौरी तथा नासिकास्थि में भगवान कार्तिकेय स्थित हैं।
कम्बलाश्वतरौ नागौ नासापुटसमाश्रितौं।
कर्णयोऽश्विनौ देवौ चक्षुम्र्यां शशिभास्करौ।।27।।
नासिका छिद्रों में कम्बल व अश्वतर नाग, कानों में अश्विनी देव व आँखों में चन्द्र व सूर्य स्थित हैं।
दन्तेषु वसवः सर्वे जिह्वायां वरूणः स्थितः।
सरस्वती च कुहरे यमयक्षौ च गण्डयोः।।28।।
गौ के दांतों में आठों वसु, जीभ में वरूण, कण्ठ में माता सरस्वती व गण्डस्थलों में यमराज व यक्षगण स्थित हैं।
सन्ध्याद्वयं तथोष्ठाभ्यां ग्रीवायां च पुरन्दरः।
रक्षांसि ककुदे द्यौश्च पाष्र्णिकाये व्यवास्थिता।।29।।
दोनां होंठों में दोनों सन्ध्यादेवियाँ ग्रीवा में इन्द्र ककुद में राक्षस, पाष्र्णि भाग में आकाश व्यवस्थित है।
चतुष्पात्सकलो धर्मों नित्यं जंघासु तिष्ठति।
खुरमध्येषु गन्धर्वाः खुराग्रेषु च पलगाः।।30।।
चारों चरणों से युक्त धर्म जंघाओं में, खुरों में गन्धर्वदेवगण, खुरों के अग्रभाग में सर्प निवास करते हैं।
खुराणां पश्चिमे भागे राक्षसाः सम्प्रतिष्ठिताः।
रूद्रा एकादश पृष्ठे वरूणः सर्वसन्धिषु।।31।।
खुरों के पश्चिमी भाग में राक्षसगण, पीठ में ग्यारह रूद्र तथा सभी जोडों में वरूण देव प्रतिष्ठित हैं।
श्रोणीतटस्थाः पितरः कपोलेषु च मानवाः।
श्रीरपाने गवां नित्यं स्वाहालंकार माश्रिताः।।32।।
गौ की कमर में पितरगण, कपोलों में मानव, अपानभाग में स्वाहा देवी के साथ अलंकार रूप में लक्ष्मी जी आश्रित हैं।
आदित्या रश्मयो बालाः पिण्डीभूता व्यवस्थिताः।
साक्षाद्गंगा च गोमूत्रे गोमये यमुना स्थिता।।33।।
सूर्य किरणें केश समूहों में पिण्डीरूप में, गौ के मूत्र मेें साक्षात गंगा व गोबर में यमुना जी व्यवस्थित हैं।
चयस्त्रिंशद् देवकोट्यो रोमकूपे व्यवस्थिताः।
उदरे पृथिवीं सर्वा सशैलवन काननाः।।34।।
सभी रोमकूपों में तैंतीस कोटि देवता, पेट में पर्वतों व वनों से सुशोभित पूरी पृथ्वी व्यवस्थित हैं।
चत्वारः सागराः प्रोक्ता गवां ये तु पयोधराः।
पर्जन्यः क्षीरधारासु मेघा विन्दु व्यवास्थिताः।।35।।
चारों पयोधरों में चार महासागर, दूध की धारा में पर्जन्यदेव तथा दुग्ध बिन्दुओं में मेघ नामक देवता व्यवस्थित हैं।
जठरे गार्हपत्योग्निर्दक्षिणाग्नि हृदि स्थितः।
कण्ठे आहवनीयोऽग्निः सम्योऽग्निस्तालुनि स्थितः।।36।।
गौ की जठराग्नि में गाहिपत्याग्नि, हृदय मेें दक्षिणाग्नि, कष्ठ में आहवनीय अग्नि और तालु मेें सम्याग्नि स्थित हैं।
अस्थिव्यवस्थिताः शैला मज्जासु क्रतवः स्थिताः।
ऋग्वेदोऽथर्ववेदश्च सामवेदो यजुस्तथा।।30।।
गौ की अस्थियों में पर्वत, मज्जओं में यज्ञ देव तथा चारों वेद (क, यजु, अथर्व व साम) भी गौओं में ही प्रतिष्ठित हैं।
पौराणिक प्रार्थना-
या लक्ष्मीः सर्व भूतानां या च देवेषु संस्थिता।
धेनुरूपेण सा देवी मम शान्तिं प्रयच्छतु।।1।।
देहस्था या च रूद्राणी शंकरस्य सदा प्रिया।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु।।2।।
विष्णोर्वक्षसि या लक्ष्मीः स्वाहा या च विभावसोः।
चन्द्रार्कशक्रशक्तिर्या धेनुरूपास्तु सा श्रिये।।3।।
चतुर्मखस्य या लक्ष्मीर्या लक्ष्मी र्धनदस्य च।
लक्ष्मीर्या लोकपालानां सा धेनुर्वरदास्तु मे।।4।।
स्वधा या पितृमुख्याना स्वाहा यज्ञभुजा च या।
सर्वपापहरा धेनुस्तस्माच्छान्तिं प्रयच्छ में।।5।।
जो गौ सभी प्राणियों की वास्तविक लक्ष्मी हैं, देवताओं में छवि रूप से स्थित हैं, शंकरप्रिया रूद्राणि जिसके शरीर में स्थित हैं, भगवान विष्णु के वक्ष में स्थित लक्ष्मी हैं, जो अग्नि की स्वाहा रूपी शक्ति हैं, जो चन्द्र सूर्य व इन्द्र की इष्टशक्ति हैं, जो ब्राहमा जी की आत्मशक्तिरूपा विद्याधिष्ठात्री सरस्वती हैं, जो कुबेर की लक्ष्मी रूपा शक्ति हैं, जो लोकपालों की ऐश्वर्यरूपी लक्ष्मी हैं, जो पितरों की स्वधा रूपी शक्ति व देवों के लिये स्वाहा रूपी शक्ति हैं, वह गौ माता देवी मुझे शान्ति, अपाप, कल्याण, वर तथा परम् शान्ति प्रदान करें।
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