सोमवार, 18 जुलाई 2016
गुरुवार, 14 जुलाई 2016
गोमुत्र
गाय के गोबर में लक्ष्मी और मूत्र में गंगा का वास होता है, जबकि आयुर्वेद में गौमूत्र के ढेरों प्रयोग कहे गए हैं। गौमूत्र का रासायनिक विश्लेषण करने पर वैज्ञानिकों ने पाया, कि इसमें 24 ऐसे तत्व हैं जो शरीर के विभिन्न रोगों को ठीक करने की क्षमता रखते हैं। आयुर्वेद के अनुसार गौमूत्र का नियमित सेवन करने से कई बीमारियों को खत्म किया जा सकता है। जो लोग नियमित रूप से थोड़े से गौमूत्र का भी सेवन करते हैं, उनकी रोगप्रतिरोधी क्षमता बढ़ जाती है। मौसम परिवर्तन के समय होने वाली कई बीमारियां दूर ही रहती हैं। शरीर स्वस्थ और ऊर्जावान बना रहता है। इसके कुछ गुण इस प्रकार गए हैं :-
1. गौ मूत्र कड़क, कसैला, तीक्ष्ण और ऊष्ण होने के साथ-साथ विष नाशक, जीवाणु नाशक, त्रिदोष नाशक, मेधा शक्ति वर्द्धक और शीघ्र पचने वाला होता है। इसमें नाइट्रोजन, ताम्र, फास्फेट, यूरिया, यूरिक एसिड, पोटाशियम, सल्फेट, फास्फेट, क्लोराइड और सोडियम की विभिन्न मात्राएं पायी जाती हैं। यह शरीर में ताम्र की कमी को पूरा करने में भी सहायक है।
2. गौमूत्र को न केवल रक्त के सभी तरह के विकारों को दूर करने वाला, कफ, वात व पित्त संबंधी तीनो दोषों का नाशक, हृदय रोगों व विष प्रभाव को खत्म करने वाला, बल-बुद्धि देने वाला बताया गया है, बल्कि यह आयु भी बढ़ाता है।
3. पेट की बीमारियों के लिए गौमूत्र रामवाण की तरह काम करता है, इसे चिकित्सीय सलाह के अनुसार नियमित पीने से यकृत यानि लिवर के बढ़ने की स्थिति में लाभ मिलता है। यह लिवर को सही कर खून को साफ करता है और रोग से लड़ने की क्षमता विकसित करता है।
4. 20 मिली गौमूत्र प्रात: सायं पीने से निम्न रोगों में लाभ होता है।
1. भूख की कमी, 2. अजीर्ण, 3. हर्निया, 4. मिर्गी, 5. चक्कर आना, 6. बवासीर, 7. प्रमेह, 8.मधुमेह, 9.कब्ज, 10. उदररोग, 11. गैस, 12. लूलगना, 13.पीलिया, 14. खुजली, 15.मुखरोग, 16.ब्लडप्रेशर, 17.कुष्ठ रोग, 18. जांडिस, 19. भगन्दर, 20. दन्तरोग, 21. नेत्र रोग, 22. धातु क्षीणता, 23. जुकाम, 24. बुखार, 25. त्वचा रोग, 26. घाव, 27. सिरदर्द, 28. दमा, 29. स्त्रीरोग, 30. स्तनरोग, 31.छिहीरिया, 32. अनिद्रा।
5. गौमूत्र को मेध्या और हृदया कहा गया है। इस तरह से यह दिमाग और हृदय को शक्ति प्रदान करता है। यह मानसिक कारणों से होने वाले आघात से हृदय की रक्षा करता है और इन अंगों को प्रभावित करने वाले रोगों से बचाता है।
6. इसमें कैसर को रोकने वाली ‘करक्यूमिन‘ पायी जाती है |
7. कैंसर की चिकित्सा में रेडियो एक्टिव एलिमेन्ट प्रयोग में लाए जाते है | गौमूत्र में विद्यमान सोडियम,पोटेशियम,मैग्नेशियम,फास्फोरस,सल्फर आदि में से कुछ लवण विघटित होकर रेडियो एलिमेन्ट की तरह कार्य करने लगते है और कैंसर की अनियन्त्रित वृद्धि पर तुरन्त नियंत्रण करते है | कैंसर कोशिकाओं को नष्ट करते है | अर्क आँपरेशन के बाद बची कैंसर कोशिकाओं को भी नष्ट करता है | यानी गौमूत्र में कैसर बीमारी को दूर करने की शक्ति समाहित है |
8. दूध देने वाली गाय के मूत्र में “लेक्टोज” की मात्रा आधिक पाई जाती है, जो हृदय और मस्तिष्क के विकारों के लिए उपयोगी होता है।
9. गाय के मूत्र में आयुर्वेद का खजाना है! इसके अन्दर ‘कार्बोलिक एसिड‘ होता है जो कीटाणु नासक है, यह किटाणु जनित रोगों का भी नाश करता है। गौमूत्र चाहे जितने दिनों तक रखे, ख़राब नहीं होता है।
10. जोड़ों के दर्द में दर्द वाले स्थान पर गौमूत्र से सेकाई करने से आराम मिलता है। सर्दियों के मौषम में इस परेशानी में सोंठ के साथ गौ मूत्र पीना फायदेमंद बताया गया है।
11. गैस की शिकायत में प्रातःकाल आधे कप पानी में गौ मूत्र के साथ नमक और नींबू का रस मिलाकर पीना चाहिए।
12. चर्म रोग में गौ मूत्र और पीसे हुए जीरे के लेप से लाभ मिलता है। खाज, खुजली में गौ मूत्र उपयोगी है।
13. गौमूत्र मोटापा कम करने में भी सहायक है। एक ग्लास ताजे पानी में चार बूंद गौ मूत्र के साथ दो चम्मच शहद और एक चम्मच नींबू का रस मिलाकर नियमित पीने से लाभ मिलता है।
14. गौमूत्र का सेवन छानकर किया जाना चाहिए। यह वैसा रसायन है, जो वृद्धावस्था को रोकता है और शरीर को स्वस्थ्यकर बनाए रखता है।
15.गौमूत्र किसी भी प्रकृतिक औषधी के साथ मिलकर उसके गुण-धर्म को बीस गुणा बढ़ा देता है| गौमूत्र का कई खाद्य पदार्थों के साथ अच्छा संबंध है जैसे गौमूत्र के साथ गुड़, गौमूत्र शहद के साथ आदि|
16.अमेरिका में हुए एक अनुसंधान से सिध्द हो गया है कि गौ के पेट में “विटामिन बी” सदा ही रहता है। यह सतोगुणी रस है व विचारों में सात्विकता लाता है।
17.गौमूत्र लेने का श्रेष्ठ समय प्रातःकाल का होता है और इसे पेट साफ करने के बाद खाली पेट लेना चाहिए| गौमूत्र सेवन के 1 घंटे पश्चात ही भोजन करना चाहिए|
18. गौमूत्र देशी गाय का ही सेवन करना सही रहता है। गाय का गर्भवती या रोग ग्रस्त नहीं होना चाहिए। एक वर्ष से बड़ी बछिया का गौ मूत्र बहुत लाभकारी होता है।
19. मांसाहारी व्यक्ति को गौमूत्र नहीं लेना चाहिए| गौमूत्र लेने के 15 दिन पहले मांसाहार का त्याग कर देना चाहिए| पित्त प्रकृति वाले व्यक्ति को सीधे गौमूत्र नहीं लेना चाहिए, गौमूत्र को पानी में मिलाकर लेना चाहिए| पीलिया के रोगी को गौमूत्र नहीं लेना चाहिए| देर रात्रि में गौमूत्र नहीं लेना चाहिए| ग्रीष्म ऋतु में गौमूत्र कम मात्र में लेना चाहिए|
20. घर में गौमूत्र छिड़कने से लक्ष्मी कृपा मिलती है, जिस घर में प्रतिदिन गौमूत्र का छिड़काव किया जाता है, वहां देवी लक्ष्मी की विशेष कृपा बरसती है।
21.गौमूत्र में गंगा मईया वास करती हैं। गंगा को सभी पापों का हरण करने वाली माना गया है, अत: गौमूत्र पीने से पापों का नाश होता है।
22.जिस घर में नियमित रूप से गौमूत्र का छिड़काव होता है, वहां बहुत सारे वास्तु दोषों का समाधान एक साथ हो जाता हैं।
23. देसी गाय के गोबर-मूत्र-मिश्रण से ‘`प्रोपिलीन ऑक्साइड” उत्पन्न होती है, जो बारिस लाने में सहायक होती है| इसी के मिश्रण से ‘इथिलीन ऑक्साइड‘ गैस निकलती है जो ऑपरेशन थियटर में काम आता है |
24. गोमुत्र कीटनाशक के रूप में भी उपयोगी है। देसी गाय के एक लीटर गोमुत्र को आठ लीटर पानी में मिलाकर प्रयोग किया जाता है । गोमुत्र के माध्यम से फसल को नैसर्गिक युरिया मिलता है। इस कारण खाद के रूप में भी यह छिड़काव उपयोगी होता है ।गौमूत्र से औषधियाँ एपं कीट नियंत्रक बनाया जा सकता है।
25. अमेरिका ने गौ मूत्र पर 6 पेटेंट ले लिए हैं, और अमेरिकी सरकार हर साल भारत से गाय का मूत्र आयात करती है और उससे कैंसर की दवा बनाती हैं । उसको इसका महत्व समझ आने लगा है। जबकि हमारे शास्त्रो मे करोड़ो वर्षो पहले से इसका महत्व बताया गया है।
जय गौ माता।
बुधवार, 13 जुलाई 2016
गोपाल संग कजरी गाय (5)
गोपाल संग कजरी गाय...... (5)
आज तो कजरी की सोती आँखों में भी युगल की छवि ही है वही जो उसने वन में देखी, कजरी का चित्त अभी भी वहीं अटका है।
सुबह तक वो इसी आवेश में है कि वन में फिर से श्याम के साथ श्यामा जु के दर्शन होंगे।
सुबह ही श्यामसुंदर उठकर आते हैं पर ये क्या, कजरी को तो कन्हैया में भी किशोरी जु दिख रहीं हैं।
वो भाव में यही महसूस कर रही है कि मईया नहीं श्यामा जु ही आज दूध दुहने आईं हैं।
कजरी को जैसे ही मईया स्पर्श करतीं हैं तो वो आज पहली बार सिहर जाती है क्योंकि उसे आज मईया की उंगलियों के स्पर्श में श्यामा जु के स्पर्श का एहसास हो रहा है।
राधे जु की कोमल व मखमली हाथों का स्पर्श पाते ही कजरी कुछ समय के लिए शांत तो हो ही जाती है और साथ ही कोमलांगी की कोमल छुअन के लिए स्थिर भी ताकि श्यामा जु को उसे दुहने में कोई परेशानी ना हो।
पर नटखट श्यामसुंदर सब समझ पा रहे हैं और स्थिति का फायदा उठा कजरी की पीठ पर चढ़ बैठते हैं और उसे गुदगुदाना आरम्भ कर देते हैं।
अब कजरी क्या करे? वो जरा सा हिलती है और फिर से स्थिर हो जाती है।
फिर कन्हैया नीचे उतरकर कजरी की पूंछ से खेलने लगते हैं पर अब कजरी नहीं हिलती पर मईया कान्हा को वहाँ से यह कहकर भगा देती हैं कि:-
"काहे तंग करे है लल्ला तू कजरी को, वाको कोई दूजो कार्य ना है पर मोकू बहुत हैं, देर मत करवा अब और।
यापे दूध धरयो है और याके बाबा को भी ग्वालों संग मथुरा जानो है, चल जा तू।"
कान्हा वहाँ से चले जाते हैं और कजरी अभी भी मईया को राधा ही समझ रही है।
वन विहार के लिए जाती कजरी को हर कहीं प्रिया जु ही नज़र आ रहीं हैं।
उस पर प्रिया-प्रियतम के दिव्य दर्शन का गहरा असर हुआ है और वो इस भावावेश में डूबती ही जा रही है।
श्यामसुंदर कजरी के नेत्रों से बहती अश्रुधार को रोक ही नहीं पा रहे हैं और उसके लिए चिंतित भी हैं।
वे जानते हैं कि इसका निवारण अब राधे ही कर सकतीं हैं।
वे राह चलते-चलते ही कजरी से बतियाने का प्रयास करते हैं पर आज कजरी को कान्हा की भी सुधि ना है, वो तो उनमें भी राधे को ही देख रही है।
कान्हा वंशी बजाते हैं तब भी उसे श्यामा जु के ही अधर पर वंशी लगी दिख रही है।
श्यामसुंदर अब शांत कजरी के भावदशा को भलिभाँति जानते हुए चुपचाप वन की और बढ़ रहे हैं और मन ही मन श्यामा जु से कजरी की हालत का बखान करते हैं और उन्हें आज वन आने में विलम्ब नहीं करने का आग्रह करते हैं।
श्यामा जु से भी कजरी की हालत छुपी ना है और वो कन्हैया को आश्वस्त करतीं हुईं वन समय पर पहुँचने की स्वीकृति देतीं हैं।
समस्त गईयों को सखाओं संग वन विहार के लिए भेज कर श्यामसुंदर कजरी को उसी पेड़ के नीचे ले जाते हैं और वंशी बजाते हैं और श्यामा जु भी वहाँ पहुँच जाती हैं।
श्यामा जु के हाथों में कजरी को खिलाने का चारा है और वो श्यामसुंदर को बिना देखे ही सीधे कजरी के पास ही आ बैठतीं हैं।
करूणामयी राधे भला कैसे करूणामयी कजरी के नयनों में अश्रु देख सकतीं हैं।
वो पास बैठ कजरी को अपने स्नेहिल स्पर्श से अपना लाड-दुलार देने लगतीं हैं और साथ ही उसे सहलाती हैं।
कजरी अब श्यामा जु का स्पर्श पाकर धीरे-धीरे अपने भावावेश से बाहर आने लगती है।
प्रिया जु उसे अपने हाथों से चारा खिलातीं हैं और कुछ देर उस संग बतियाती रहतीं हैं।
श्यामसुंदर बैठे प्रिया जु को निहार रहे हैं, उनका वश चले तो कजरी को हटा खुद ही राधे के सस्नेह स्पर्श का आनंद लें पर नहीं अभी वो ऐसा नहीं कर सकते, बस चुपचाप बैठे निहार ही रहे हैं प्रिय श्याम।
प्रिया जु जानतीं हैं श्याम जु को पर वो भी मजे ले ले कर कजरी पर अपना प्यार लुटा रहीं हैं।
पर अब कजरी पूर्णतः अपने दिव्य भावावेश से बाहर आ चुकी है और वो जा मिलती है सब गईयों में।
भीतर मन में वो अब श्यामाश्याम को ही भजती है और उसके करूणा भरे विशाल नेत्रों में उनकी दिव्य छवि हमेशा के लिए अंकित हो चुकी है।
वो कन्हैया के साथ वन से लौट आती है......
आज श्यामसुंदर कजरी से खूब हंसी-ठिठोली कर रहे हैं।
कहते हैं:- "वाह री कजरी तू तो बड़े भाग वाली है, इतना स्नेह पा लिया राधे से।
मेरा तो ख्याल ही ना रहा तूझे और ना ही राधे को, तू तो बड़ी चतुर है री कजरी।
अब मुझे भी तेरे से किशोरी का प्रेम पाने के लिए कुछ सीखना चाहिए।
कल मैं भी निकुंज में भावभावित होकर तेरी तरह अश्रु बहाऊंगा और मुख फुलाके बैठ जाऊँगा।
हमेशा श्यामा जु के नाज नखरे उठाता हूँ और कल देखना प्रिया जु आज जैसे तुम्हें सहला रहीं थीं मुझे भी सहलाऐंगी।"
ये सुन कजरी रंभाती है और श्यामसुंदर के कानों में राधे की मधुर खिलखिलाने वाली हंसी सुनाई देती है।
जिसे सुन कन्हैया इधर-उधर देखते हैं और राधे को वहाँ ना पाकर मन ही मन कहते हैं:- "हाँ-हाँ हसो तुम भी मुझ पर, स्नेह तो सारा कजरी पर लुटा दिया और अब हंसी मेरी उड़ालो तुम दोनों।"
इतना कहकर श्यामसुंदर कजरी को पुचकारते दुलराते वंशी बजाते नंद भवन पहुँच जाते हैं।
क्रमशः
शनिवार, 9 जुलाई 2016
ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीशरणानन्दजी महाराज के श्री मुख से गौमहिमा
🌺गाय सारे राष्ट्र व🌺 🌺विश्व की माता है🌺
ब्रह्मलीन श्रद्धेय स्वामी श्रीशरणानन्दजी महाराज
१. हार्दिक इच्छा है कि कोई घर ऐसा न हो, जिसमें गाय न हो; गाय का दूध न हो। हर घर में गाय हो और गाय का दूध पीने को मिलना चाहिये। गाय ने मानवबुद्धि की रक्षा की है।
२.बेईमानीका समर्थन करना और उससे एक-दूसरेपर अधिकार जमाना, यह बढ़ता जा रहा है । इसका कारण है कि बुद्धि सात्विक नहीं है, बुद्धि सात्विक क्यों नहीं? कारण मन सात्विक नहीं है । मन सात्विक क्यों नहीं? कारण शरीर सात्विक नहीं है। शरीर सात्विक नहीं है, तो इसका कारण? आहार सात्विक नहीं है।
३.मैं आपसे निवेदन करना चाहता था कि सचमुच जितना आपलोग गाय के सम्बन्धमें जानते हैं, उसका हजारवाँ हिस्सा भी मैं नहीं जानता हूँ, लेकिन क्या सचमुच आपलोग गाय के साथ मातृ-सम्बन्ध जोड़नेके लिए राजी हैं? अगर हाँ, तो हमारा बेड़ा पार हो जायगा।
४.जो लोग सेवा करना चाहते हैं--वे कैसे हैं, इस बातपर जोर डालिये। समाज क्या करता है, राज्य क्या करता है, कुछ लोग देते हैं कि नहीं, वह गौण है। मुख्य बात यह है कि अपने दिलमें गायके प्रति पीड़ा होती है कि नहीं?
५.गाय हमारी ही नहीं, मानवसमाजकी माँ है, सारे राष्ट्रकी और सारे विश्वकी माँ है। गायकी रक्षा होती है तभी प्रकृति भी अनुकूल होती है, भूमि भी अनुकूल होती है। गायकी सेवा होनेसे भूमिकी सेवा होती है और भूमि स्वयं रत्न देने लगती है।
६.जैसे-जैसे आप गोसेवा करते जायँगे, वैसे-वैसे आपको यह मालूम होता जायगा कि गाय आपकी सेवा कर रही है। आपको यह लगेगा कि आप गाय कि सेवा कर रहे हैं तो गाय हर तरह से स्वास्थ्य की दृष्टिसे, बौद्धिक दृष्टिसे, धार्मिक दृष्टिसे आपकी सेवा कर रही है।
७.हम सच्चे सेवक होंगे तो हमारी सेवा होगी, हमारी सेवाका मतलब मानवजातिकी सेवा होगी, मानवमात्रकी सेवासे ही सब कुछ हो सकता है। मानव जब सुधरता है तो सब कुछ सुधरता है और मानव जब बिगड़ता है तो सब कुछ बिगड़ जाता है।
(कल्याण भाग 84 पृष्ठ 638 से) जय गोमाता...
बुधवार, 6 जुलाई 2016
गोपाल संग कजरी गाय ::4::
गोपाल संग कजरी गाय.....!! (4)
वंशी बजाते श्याम कजरी के संग नंदभवन तो पहुँच जाते हैं लेकिन कजरी अभी भी गहरे भावावेश में ही है।
पूरी राह वो श्यामसुंदर के दिव्य पर धूल-धूसरित व श्यामा जु के भव्य दर्शन का आनंद उठाती मदमाती सी चलती रही और खूंटी से बंधी हुई उसी दिव्य आवेश में ही गुम है।
दिन ढला शाम हुई कि अचानक ही कजरी ने रम्भाना आरम्भ कर दिया।
कान्हा मईया यशोदा के पास बैठे मईया को अपनी प्यारी चिकनी-चुपड़ी बातों से रिझा रहे हैं, राधे जु के बारे में बतियाते वो इठला रहे हैं।
जब से किशोर अवस्था में कदम पड़े हैं तब से माँ ने शायद ही कभी कोई दूसरी वार्ता सुनी होगी कन्हैया के मुख से।
नहीं तो पहले कभी-कबार बालसखाओं की या गोपियों की शिकायत भी कर ही लिया करते थे लल्ला।
पर अब कुछ और सूझता ही नहीं है लाडली के सिवाए।
सखियों की शिकायत तो चाहे करें कभी से कि वो राधा और कान्हा के मिलने में घड़ी घड़ी अपनी मनुहार करवाती हैं और अब सब सखागण जान से प्यारे हो गए हैं क्योंकि वो हमेशा कन्हैया का ही पक्ष लेते हैं, राधे की सखियों के समक्ष।
पर अब मईया भी क्या करे, जानती हैं लल्ला का भी इसमें क्या कसूर।
सारा दोष तो बाली उमरीया का ही है ना और मईया भी खूब आनंद से लाल के मुख से अपनी लाडली की रोमांचक बातें सुनती हैं।
राधे के सौंदर्य व कुशलता की बातें मोहन नटखट के मुख से सुनकर मईया अपनी चूनर में मुख छुपा-छुपा कर हंसती हैं और कभी मुस्करा कर अपने लल्ला की बलाईयां लेती हुईं कहती हैं कि मेरा लाल कितना भी बड़ा हो जाए पर रहेगा चंचल और भोला ही।
कान्हा की मटकती आँखों की पुतलियों में मईया बार-बार श्यामा जु के ही दर्शन करतीं हैं और कहती हैं:-
'हाँ हाँ काले कनुवे तेरा बियाह गोरी-गोरी सुंदर सुशील राधे से ही करवाए दूंगी, बस तेरे बाबा को आ जाने दे तो बात करने बरसाना भेज दूंगी' और मईया खिलखिला कर हंस देतीं हैं।
तब कान्हा मईया से रूठ जाते हैं कि क्यों मोहे कारा कनुवा कहे है।
मईया तू भी अब मुझसे ज्यादा स्नेह राधे से ही करने लगी है ना।
पहले तो तुझे मुझ जैसा कोई ना दिखता था और अब राधे गोरी है तो मैं कनुवा हो गया, अब बता मैं कैसे गोरा हो जाऊं।
तू राधे को दुल्हनिया बनवा देगी मेरी तब तो मुझसे नेहा लगाना भूल ही जाएगी ना।
ऐसे कहते कहते श्यामसुंदर मुख फेर लेते हैं, लो अब पड़ गए लेने के देने।
पर मईया तो मईया हैं ना, झट से बात बदल देतीं हैं और घुमा-फिरा कर फिर से राधे जु की तारीफ पर कान्हा को बहला-फुसला कर ले ही आतीं हैं और कान्हा भी मान जाते हैं।
अब वो छोटे तो नहीं हैं पर मईया से रूष्ट भी नहीं रह पाते ना।
भोले श्यामसुंदर मईया की हंसी को समझ तो जाते हैं पर माता यशोमती के आनंद के लिए खुद ही हास-परिहास का माध्यम बनने से नहीं हिचकते।
कान्हा मन ही मन सोच रहे हैं कि आज कजरी को खास देखरेख की आवश्यकता है और वो मईया को रोक खुद वहाँ कजरी के पास जाते हैं, और उसे प्रेम से सहलाते हैं।
उसने आज शाम होने तक भी कुछ ना खाया है ये जान वो कजरी को माँ के हाथों बनाए लड्डू व रोटी खिलाते हैं।
कजरी श्यामसुंदर के हाथों भोग पाकर कुछ देर शांत होकर बैठ जाती है पर आज ना जाने वो क्यों बार-बार रम्भाने लगती है।
नंदबाबा और मईया को लगता है कि जैसे आज कजरी कुछ ठीक नहीं है, तो श्यामसुंदर माँ-बाबा को कह कर कि मैं देखता हूँ बाहर आँगन में जाते हैं।
वहीं कजरी के पास बैठे कान्हा उसके कानों में कुछ कहते हैं जिसे देख माँ-बाबा अपने कान्हा का भोलापन देख मुस्कराते हैं।
पर यहाँ श्यामसुंदर तो कजरी की दशा को जानते हैं,
हाँ कजरी मुझे पता है तुझे क्या हुआ है, आज देख लिया ना तूने भी किशोरी जु को और जान गई है ना कि वो जादूगरनी है कोई।
वन विहार से लौटते समय मेरी भी विचित्र दशा होती है राधे से मिलने के बाद।
आज तू भी उसी वियोग को सह नहीं पा रही है ना और मेरी तरह उसे बार-बार पुकार उठती है।
देख कजरी अब माँ-बाबा को सोने दे और तू भी सो जा।
मुझे तो नींद आने वाली है नहीं राधे की याद में पर तू सो जा,कल सुबह जल्दी उठ कर फिर तुझे राधा से मिलवाने ले चलूंगा।
इतना सब कहकर कन्हैया मधुर वंशी बजाने लगते हैं।
कजरी तो सो जाती है पर कन्हैया चाँद में राधा जु की छवि को निहारते हुए उनसे बातें करते रहते हैं।
माँ-बाबा तो सो गए और कजरी भी, कान्हा वंशी तो नहीं बजा रहे और राधे को भी सो जाने को कहकर वे खुद भी स्वप्न संगम की आस लेकर सो जाते हैं, उनके अधरों पर मदमाती मुस्कन है।
आज तो कजरी की सोती आँखों में भी युगल की छवि ही है वही जो उसने वन में देखी, कजरी का चित्त अभी भी वहीं अटका है।
सुबह तक वो इसी आवेश में है कि वन में फिर से श्याम के साथ श्यामा जु के दर्शन होंगे।
सुबह ही श्यामसुंदर उठकर आते हैं पर ये क्या, कजरी को तो कन्हैया में भी किशोरी जु दिख रहीं हैं।
वो भाव में यही महसूस कर रही है कि मईया नहीं श्यामा जु ही आज दूध दुहने आईं हैं।
क्रमशः























