शनिवार, 2 नवंबर 2019

गोपाष्टमी — गो पूजन का एक पवित्र दिन

गोपाष्टमी — गो पूजन का एक पवित्र दिन

कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी के त्यौहार रूप में मनाया जाता है गोपाष्टमी का पर्व गोवर्धन पर्वत से जुड़ा त्यौहार है | श्रीकृष्ण ने गौचारण लीला गोपाष्टमी के दिन शुरू की थी। कहा जाता है की द्वापर युग में श्री कृष्ण भगवान ने गोवर्धन पर्वत को कार्तिक शुक्ल की प्रतिपदा को ब्रज वासियों की भारी वर्षा से रक्षा करने के लिए गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा लिया था | श्री कृष्ण भगवान की इस लीला से सभी ब्राज़ वासी उस पर्वत के निचे कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा से लेकर सप्तमी तक रहे तब जाकर इन्द्र देव को पछतावा हुआ | और इन्द्र देव को वर्षा रोकनी पड़ी | तब से लेकर आज तक गोवर्धन पर्वत की पूजा की जाती है | वर्ष में जिस दिन गायों की पूजा अर्चना की जाती है | वह दिन भारत में गोपाष्टमी के नाम से मनाया जाता है । जहाँ गाय पाली-पौंसी जाती हैं उस स्थान को गोवर्धन कहा जाता है । गोपाष्टमी,  ब्रज  में भारतीय संस्कृति  का एक प्रमुख पर्व है।  गायों  की रक्षा करने के कारण भगवान श्री कृष्ण जी का अतिप्रिय नाम ‘गोविन्द’ पड़ा। कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। इसी समय से अष्टमी को गोपोष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा।

शुलक्षमी कार्तिके तु स्मृता गोपाष्टमी बुधै । 
तद-दिनाद वासुदेवो’भुद गोपः पूर्वं तु वत्सपः ॥ 


“शास्त्रज्ञों एवं आचार्यों के अनुसार कार्तिक मास की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को गोपाष्टमी के रूप में मनाया जाता है । इस दिन से भगवान वासुदेव ने गोपालन की सेवा प्रारम्भ की, इसके पूर्व वे केवल बछड़ों की देखभाल करते थे ।”

गोपाष्टमी,  ब्रज  में भारतीय संस्कृति  का एक प्रमुख पर्व है। अतिप्रिय गाय की रक्षा तथा गोचारण करने के कारण भगवान श्री कृष्ण को ‘गोविन्द या गोपाल’ नाम से संबोधित किया जाता है । भगवान ने कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। इसी समय से अष्टमी को गोपोष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा ।

कार्तिक मास में आने वाला यह महोत्सव अति उत्तम फलदायक है। जो लोग नियम से कार्तिक स्नान करते हुए जप, होम, अर्चन का फल पाना चाहते हैं उन्हेें गोपाष्टमी पूजन अवश्य करना चाहिए। इस दिन गाय, बैल और बछड़ों को स्नान करवा कर उन्हें सुन्दर आभूषण पहनाएं। यदि आभूषण सम्भव न हो तो उनके सींगों को रंग से सजाएं अथवा उन्हें  पीले फूलों की माला से सजाएं। उन्हें हरा चारा और गुड़ खिलाना चाहिए। उनकी आरती करते हुए उनके पैर छूने चाहिएं। गौशाला के लिए दान दें। गोधन की परिक्रमा करना अति उत्तम कर्म है। गोपाष्टमी को गऊ पूजा के साथ गऊओं के रक्षक ‘ग्वाले या गोप’ को भी तिलक लगा कर उन्हें मीठा खिलाएं। ज्योतिषियों के अनुसार गोपाष्टमी पर पूजन करने से भगवान प्रसन्न होते हैं, उपासक को धन और सुख-समृ्द्धि की प्राप्ति होती है और घर-परिवार में लक्ष्मी का वास होता है।
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दीपावली के बाद ‘गोपाष्टमी’ त्यौहार सभी हिन्दू मनाते हैं। गोपाष्टमी हमारे निजी सुख और वैभव में हिस्सेदार होने वाले गौवंश का सत्कार है। द्वापर युग में जब भगवान श्री कृष्ण ने ब्रज में गोवर्धन पर्वत को अपनी अंगुली पर उठा लिया था तभी से इस महोत्सव को मनाने की परम्परा शुरु हुई। गोपाष्टमी की पूजा प्रत्येक वर्ष ” कार्तिक शुक्ल पक्ष की अष्टमी ” के दिन गौ माता की पूजा की जाती है |

श्रीमद्भागवत के अनुसार भगवान ने अपने भक्तों की रक्षा करने और अपने भक्तों को दिए वचन को पूरा करने के लिए धरती पर अवतार लेकर गिरिराज गोवर्धन का मान बढ़ाने गोसंवर्धन के लिए ही यह लीला की।

हिन्दू संस्कृति में गाय का विशेष स्थान हैं।  माँ का दर्जा दिया जाता हैं क्यूंकि जैसे एक माँ का ह्रदय कोमल होता हैं, वैसा ही गाय माता का होता हैं।  जैसे एक माँ अपने बच्चो को हर स्थिती में सुख देती हैं, वैसे ही गाय भी मनुष्य जाति को लाभ प्रदान करती हैं।
गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशाला में गोसंवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं। गोपाष्टमी की पूजा विधि पूर्वक विध्दान पंडितो द्वारा संपन्न की जाती है। बाद में सभी प्रसाद वितरण किया जाता है। सभी लोग गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ रक्षा व गौ संवर्धन का संकल्प करते हैं।

शास्त्रों में गोपाष्टमी पर्व पर गायों की विशेष पूजा करने का विधान निर्मित किया गया है। इसलिए कार्तिक माह की शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को प्रात:काल गौओं को स्नान कराकर, उन्हें सुसज्जित करके गन्ध पुष्पादि से उनका पूजन करना चाहिए। इसके पश्चात यदि संभव हो तो गायों के साथ कुछ दूर तक चलना चाहिए कहते हैं ऎसा करने से प्रगत्ति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। गायों को भोजन कराना चाहिए तथा उनकी चरण को मस्तक पर लगाना चाहिए। ऐसा करने से सौभाग्य की वृध्दि होती है।

हिन्दू धर्म में गायो का दर्जा उतना ही बताया गया है की जितना माँ का दर्जा होता है | कहा जाता है की माँ का ह्रदय जितना कोमल और सरल होता है उतना ही गौ माता का होता है | कहा जाता है की माँ अपने बच्चे के लालन पालन में कोई कमी नहीं रखती है उसी प्रकार गौ माता भी मनुष्य जाती को लाभ प्रदान करती है | कहा जाता है की गाय से उत्पन प्रतेक चीज लाभदायक होती है चाहे वह उसक दूध ,दही ,यहाँ तक की उसका मूत्र भी लाभदायक होता है | इसलिए हमारा कर्तव्य बनता है की गाय की हम रक्षा करे | कहा जाता है की दवापर युग में कृष्ण भगवान ने गायो की सेवा की थी | जब भगवान ने गायो की सेवा की तो हम तो मनुष्य है | हमारी तो गाय पूज्यनीय है और माता के सामान है | तो हमें भी गायो की पूजा करनी चाहिए |

कथा है कि बालक श्री कृष्ण आज से पहले केवल बछड़ों को चराने जाते थे और उन्हें अधिक दूर जाने की भी अनुमति नहीं  थी ।

इसी दिन बालक कृष्ण ने माँ यशोदा से गायों की सेवा करनी की इच्छा व्यक्त की और कहा कि, माँ मुझे गाय चराने की अनुमति चाहिए। उनके अनुग्रह पर नन्द बाबा, और यशोदा मैया ने शांडिल्य ऋषि द्वारा अच्छा समय देखकर उन्हें भी गाय चराने ले जाने के लिए जो समय निकाला, वह गोपाष्टमी का शुभ दिन था। मैया ने भगवान को बहुत सुन्दर रूप से तैयार किया । उन्हें बड़े गोप-सखाओं जैसे वस्त्र पहनाये, सिर पर मोरमुकुट, पैरों में पैजनिया पहनाई । परंतु जब मैया उन्हें सुन्दर सी पादुका पहनाने लगी तो वे बोले यदि सभी गौओं और गोप-सखाओं को भी पादुकाएं पहनाएंगी तभी वे भी पहनेंगे । गोविन्द के इस प्रेम-पूर्ण व्यवहार से मैया का हृदय भर आया और वे भावविभोर हो गयीं । इसके पश्चात् बालक कृष्ण ने गायों की पूजा की तथा प्रदक्षिणा करते हुए साष्टांग प्रणाम किया और बिना पादुका पहने गोचारण के लिए निकल पड़े ।
ब्रज में किवदंती यह भी है कि, राधारानी भी भगवान के साथ गोचारण के लिए जाना चाहती थीं परंतु स्त्रियों को इसकी अनुमति नहीं थी इसलिए वे और उनकी सखियाँ गोप-सखाओं का भेष धारण करके उनके समूह में जा मिले । परंतु भगवान ने श्रीमती राधारानी को तुरंत पहचान लिया । इसी लीला के कारण आज के दिन ब्रज के सभी मंदिरों में राधारानी का गोप-सखा के रूप में श्रृंगार किया जाता है ।


गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशाला में गोसंवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं।  इसके लिए दीपक, गुड़, केला, लडडू, फूल माला, गंगाजल इत्यादि वस्तुओं से इनकी पूजा की जाती है। महिलाएं गऊओं से पहले श्री कृष्ण की पूजा कर गऊओं को तिलक लगाती हैं। गायों को हरा चारा, गुड़ इत्यादि खिलाया जाता है तथा सुख-समृद्धि की कामना की जाती है।  बाद में सभी को प्रसाद वितरण किया जाता है। सभी लोगों को गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ रक्षा व गौ संवर्धन का संकल्प करते हैं ।

गोपाष्टमी के दिन गायों को हरा चारा, गुड़ इत्यादि खिलाया जाता है तथा उनसे सुख-समृद्धि की कामना की जाती है। ऐसा माना जाता है कि गोपाष्टमी पूजन के पश्चात् गायों की चरणधूलि को अपने मस्तक पर लगाने से सौभाग्य की वृद्धि होती है। यदि संभव हो सके तो इस दिन गायों के साथ कुछ दूर तक चलना भी चाहिए क्योंकि माना जाता है कि ऐसा करने से प्रगति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। कई स्थानों पर गोपाष्टमी के अवसर पर गायों की उपस्थिति में प्रभातफेरी और सत्संग के कार्यक्रम भी संपन्न होते हैं और अन्नकूट भंडारे का आयोजन किया जाता है। गोपाष्टमी पर्व की पूर्व संध्या पर कई मंदिरों में सत्संग-भजन का आयोजन भी किया जाता है। गोपाष्टमी पूजन बहुत पुण्यदायी माना जाता है और गो सेवा करने से जीवन धन्य हो जाता है।


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