अभी नहीं तो कभी नहीं – गौ-रक्षा एक अनिवार्य संकल्प
आज गौ-तस्करी, गौ-हत्या और गौ-मांस के निर्यात जैसी भयावह समस्याएँ हमारे सामने खड़ी हैं। यदि हम अब भी जागरूक नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियाँ हमारी इस उदासीनता का खामियाजा भुगतेंगी। गौ-रक्षा केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक कर्तव्य ही नहीं, बल्कि एक सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आवश्यकता भी है।
गौ-पालन के लाभ और इसकी आवश्यकता
गौ-पालन केवल एक परंपरा नहीं, बल्कि कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था का एक मजबूत आधार हो सकता है। आज के दौर में कृषि घाटे का व्यवसाय बनती जा रही है, जिससे करोड़ों किसान प्रभावित हैं। गौ-पालन को वैज्ञानिक और व्यावसायिक दृष्टिकोण से अपनाकर किसानों की आर्थिक स्थिति को सुधारा जा सकता है।
गाय से प्राप्त दूध, घी, दही, गोमूत्र और गोबर जैसे उत्पाद स्वास्थ्य के लिए अमृत समान हैं। यही नहीं, जैविक खेती में गोबर खाद और गोमूत्र से बनी जैविक कीटनाशक का उपयोग करने से रासायनिक खादों पर निर्भरता कम होती है, जिससे मिट्टी की उर्वरता बनी रहती है। किसानों को इस दिशा में प्रशिक्षित करने की सख्त जरूरत है।
गोशालाओं का विकास – गौ-रक्षा की रीढ़
गौ-रक्षा का सबसे प्रभावी माध्यम गोशालाएँ हैं। यदि गोशालाओं को उचित संसाधनों से सुसज्जित किया जाए, तो वे केवल गायों के संरक्षण का ही नहीं, बल्कि आजीविका और स्वावलंबन का भी केंद्र बन सकती हैं।
गोशालाओं के लाभ:
- गौ-संरक्षण – बूढ़ी और अनुपयोगी समझी जाने वाली गायों को यहाँ उचित देखभाल मिल सकती है।
- गौ-आधारित उद्योग – गोबर से खाद, कंडे, बायोगैस, गौमूत्र से दवा और पंचगव्य उत्पादों का निर्माण कर आत्मनिर्भरता बढ़ाई जा सकती है।
- रोजगार का सृजन – ग्रामीण युवाओं को गौ-पालन और गौ-उद्योग से जोड़कर नए रोजगार के अवसर प्रदान किए जा सकते हैं।
गांव-गांव में गोशालाएँ और गौ-चर भूमि
गौ-रक्षा को प्रभावी बनाने के लिए प्रत्येक गाँव में कम से कम एक गोशाला होनी चाहिए। प्रत्येक परिवार में कम से कम एक गाय पालने को प्रोत्साहित किया जाए। इसके लिए शासन और समाज को मिलकर योजना बनानी होगी। गौ-चर भूमि का संरक्षण अत्यंत आवश्यक है ताकि गौवंश को उचित चरागाह उपलब्ध हो।
जनजागरण और सरकार की भूमिका
गौ-रक्षा केवल कुछ संस्थानों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। इसके लिए व्यापक जनजागरण अभियान चलाने की जरूरत है। शासन और ग्रामवासियों को मिलकर यह सुनिश्चित करना होगा कि गौ-हत्या और तस्करी पर सख्त रोक लगे, तथा गौ-पालन को आर्थिक रूप से लाभकारी बनाया जाए।
निष्कर्ष
यदि हम अभी नहीं जागे, तो गौ-संरक्षण केवल किताबों में सिमटकर रह जाएगा। प्रत्येक व्यक्ति को अपनी संस्कृति, अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य की रक्षा के लिए गौ-सेवा का संकल्प लेना होगा। आइए, मिलकर इस पुनीत कार्य को गति दें – अब नहीं तो कभी नहीं!
गौमाता की जय!
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