गुरुवार, 19 फ़रवरी 2026

मंदिर-मस्जिद दूर है, कठिन जाप हरि नाम्। श्री चरणों में गाय के, बसते चारों धाम्॥

मंदिर-मस्जिद दूर है, कठिन जाप हरि नाम्।  
श्री चरणों में गाय के, बसते चारों धाम्॥

हमारे समाज में लोग अक्सर ईश्वर की खोज मंदिरों और मस्जिदों में करते हैं। वे कठिन साधनाएँ, जटिल अनुष्ठान और कठोर तपस्या को ही भगवान तक पहुँचने का मार्ग मान लेते हैं। परंतु यह दोहा हमें बताता है कि ईश्वर तक पहुँचने के लिए केवल कठिन जाप ही आवश्यक नहीं है। सच्ची भक्ति सरलता, करुणा और सेवा में निहित है।  

भारतीय संस्कृति में गाय को ‘माता’ कहा गया है। वह केवल एक पशु नहीं, बल्कि जीवनदायिनी है। उसका दूध, गोबर, मूत्र—सब हमारे जीवन और पर्यावरण के लिए उपयोगी हैं। यही कारण है कि गाय को धर्म, संस्कृति और अर्थव्यवस्था का आधार माना गया है।  

चार धाम—बद्रीनाथ, द्वारका, जगन्नाथपुरी और रामेश्वरम्—हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र माने जाते हैं। परंतु इस दोहे में कहा गया है कि वे सभी धाम श्रीहरि के चरणों में गाय के रूप में विराजमान हैं। इसका अर्थ यह है कि यदि हम गाय की सेवा करते हैं, तो वही चार धाम की यात्रा के समान पुण्य प्रदान करती है।  

इस दोहे का मूल संदेश है कि धर्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक स्वरूप करुणा, सेवा और संरक्षण में है। गाय की सेवा करना, उसे सम्मान देना, उसके जीवन की रक्षा करना—यह सब ईश्वर की सच्ची भक्ति है।  

आज के समय में जब पर्यावरण संकट और सामाजिक विघटन बढ़ रहा है, तब यह दोहा हमें पुनः याद दिलाता है कि हमें प्रकृति और जीवों के प्रति संवेदनशील होना चाहिए। गाय केवल धार्मिक प्रतीक नहीं, बल्कि पर्यावरणीय संतुलन और ग्रामीण अर्थव्यवस्था की धुरी है।  

अतः, मंदिर-मस्जिद की दूरी और कठिन जाप से अधिक महत्वपूर्ण है करुणा और सेवा। यदि हम गाय की रक्षा करें, उसकी सेवा करें, तो वही ईश्वर की सच्ची उपासना है। यही भारतीय संस्कृति का सार है—**“सर्वे भवन्तु सुखिनः”**।  

इस दोहे के माध्यम से हमें यह सीख मिलती है कि ईश्वर की प्राप्ति कठिन साधना से नहीं, बल्कि सरल सेवा और करुणा से होती है। गाय की सेवा करना ही चारों धाम की यात्रा के समान है। यही हमारी संस्कृति का अमूल्य संदेश है।

बुधवार, 28 जनवरी 2026

पत्रकार व मीडियाकर्मी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कैसे गौसेवा कर सकते है।

पत्रकार व मीडियाकर्मी, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया

वर्तमान युग सूचना क्रांति का युग है। बीसवीं इक्कीसवीं शताब्दि की सबसे असरकारी बहुप्रचारित घटना है सूचना विस्फोट। पत्रकार व मीडिया कर्मी सूचना युग के युग प्रवर्तक व युग निर्माता है। लोकतंत्र का यह स्तम्भअपनी निष्पक्षता, तत्परता एवं ज्ञानशीलता के चलते जनसामान्य के हृदय पर राज कर रहा है। गोरक्षा, गो संवर्धन तथा गो सेवा हेतु आम जन को शिक्षित, प्रेरित, सक्रिय करने का उत्तरदायित्व इस वर्ग का बनता है। निम्न बिंदुओं पर विचार और क्रियान्वयन आवश्यक है :-

१. पत्रकार अपने लेखों का विषय गोसेवा, गो संवर्धन को बनावें ।

२. विभिन्न टी वी चैनलों पर गोरक्षा, गोसंवर्धन से सम्बंधित समाचार प्रमुखता से प्रसारित करें ।

३. गो सेवा, गोरक्षा, गो संवर्धन सम्बंधी विषयों पर विशेष कार्यक्रम, छोटा चलचित्र बनाइ जावें तथा विभिन्न चैनल इन्हे प्रसारित करें ।

४. गोहत्या एवं उससे राष्ट्र को हानि जैसे विषयों पर भी लगातार समाचार व कार्यक्रम प्रसारित करें।

५. समाचार पत्रों में गौहत्या संबंधी खबरें प्रमुखता से छापी जावें ताकि प्रशासन पुलिस की नींद उडे व कार्यवाही हो ।

६. गोहत्यारों को यदि सजा न मिले तो ऐसी खबरे भी समाचार पत्रों में छापें, न्यूज चैनल से प्रसारित करे। ताकि कारगर कानून व क्रियान्वयन हेतु वातावरण तैयार हो सके ।

७. गोशालाओं पर आधारित समाचार छापें । लेख तैयार कर प्रकाशित करवाएं । आम जनता में गोशाला श्रध्दा केन्द्र बने ऐसा वातावरण तैयार हो ।

८. पंचगव्य उत्पाद जैसे मंजन, धूप बत्ती, शैम्पू, उबटन, स्नान चूर्ण (अंगराग पाउडर), मालिश तेल इत्यादि की उपयोगिता पर आधारित लेख व समाचार प्रकाशित, प्रसारित करें।

९. गोपर्व व गौ उत्सवों यथा बलराज जयंती (हलधर षष्ठी), श्री कृष्ण जन्माष्टमी, गोपाष्टमी, गोवत्स व्दादशी, मकर संक्रांति इत्यादि के समाचार समाचार पत्रों में प्रकाशित हों। इन पर लेख लिखकर प्रकाशित करवाएँ। टी वी चैनलों पर इन कार्यक्रमों के समाचार तथा इनका सीधा प्रसारण भी करें।

१०. जैविक कृषि, डेप खाद, मशीनों की बजाय बैलो से कृषि का महत्व इत्यदि विषयों पर समाचार, लेख, कार्यक्रम प्रकाशित प्रसारित करें ।

११. जर्सी गाय, भैंस की तुलना में, देसी गाय से प्राप्त होनेवाले दूध, दही, घृत, गोमूत्र व गोमय में वैज्ञानिक रुप से अधिक लाभप्रदता व गुणवत्ता होती हैं, इस आशय संबंधी तथ्यों को तथा अनुसंधानो को जनसामान्य तक लेख / वृत्तचित्रों व अन्य कार्यक्रमों द्वारा पहुँचाये।

१२. रासायनिक कीटनाशक व उर्वरकों के भूमि की उर्वराशक्ति व उत्पादनक्षमता व पर्यावरण पर पडनेवाले दुष्प्रभावों इनसे उत्पादित खाद्यान्नों का जनस्वास्थ्य पर होनेवाले दुष्परिणामों को किसानों व आम जनता तक पहुँचाये।

१३. अॅलोपॅथी औषधियों की तुलना में पंचगव्य चिकित्सा व औषधि की सर्व सुलभता, अधिक प्रभाव गुणवत्ता संबंधी तथ्यों को लेख विविध कार्यक्रमों द्वारा पहुँचाये।

१४. गोवंश के चमडे, चर्बी व हड्डियों से निर्मित खाद्य पदार्थ औषधी, सौंदर्य प्रसाधन अन्य हिसंक उत्पादोंके उपयोग संबधी विज्ञापन प्रकाशित /प्रसारित न करें।

१५. ऐसे हिंसक उत्पादों विरोध में जन-आंदोलन खडा करने हेतु अपने सशक्त माध्यम का उपयोग करें।