गौ-सम्मान आह्वान अभियान
प्रेषक: प्रधान संरक्षक: भगवती गौमाता | अध्यक्ष: नंदी भगवान
(समस्त गौभक्त, संत समाज एवं भारत के सजग नागरिक)
आदरणीय श्री नरेन्द्रजी मोदी
प्रधानमंत्री,
भारत सरकार, नई दिल्ली।
द्वारा: श्रीमान जिला कलेक्टर महोदय / तहसीलदार महोदय / उप-खंड अधिकारी (SDM),
तहसील: (अपनी तहसील का नाम), जिला:(अपने जिलके का नाम) (राज्य का नाम)।
विषयः- सम्पूर्ण भारत में अखिल वेदलक्षणा देशी गौवंश की विधिवत सेवा, वेदलक्षणा गौमाता को राष्ट्रीय सम्मान एवं सम्पूर्ण गौ वंश संरक्षण अधिनियम बनाने हेतु समस्त भारतवासियों का विनम्र निवेदन।
परम श्रद्धेय,
सनातन संस्कृति के ध्वजवाहक और हम सभी की आशा के केंद्र
आदरणीय प्रधानमंत्री जी,
हम समस्त सनातनी एवं गौभक्त आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति और सांस्कृतिक पुनरुत्थान के कार्यों के प्रति नतमस्तक हैं। प्रभु श्री राम के मंदिर निर्माण और धारा 370 जैसे ऐतिहासिक निर्णयों के बाद, अब संपूर्ण राष्ट्र को आपसे 'गौमाता के सम्मान और न्याय' की प्रतीक्षा है। वर्तमान में गौवंश की स्थिति अत्यंत पीड़ादायक है; तस्करी, अवैध वध और सड़कों पर उनकी दुर्दशा देख प्रत्येक भारतीय का हृदय विदीर्ण है।
गौवंश की वर्तमान पीड़ाजनक स्थिति को देखते हुए, हम निम्नलिखित आपके समक्ष प्रस्तुत करते हैं:
एकीकृत केंद्रीय कानून एवं स्वतंत्र मंत्रालय: संविधान के अनुच्छेद 48 के तहत गौ-संरक्षण राज्य का विषय है, किंतु राज्यों की असमर्थता को देखते हुए भारत सरकार 'केन्द्रीय गौ-सेवा एवं संरक्षण अधिनियम' लागू करे। समस्त वधशालाओं (Slaughter Houses) के लाइसेंस निरस्त कर गौ-हत्या को गैर-जमानती अपराध घोषित किया जाए। और इसके क्रियान्वयन हेतु स्वतंत्र 'केंद्रीय गौ-सेवा मंत्रालय' का गठन हो।
संवैधानिक सर्वोच्चता: देशी गोवंश को 'राष्ट्रमाता' या 'राष्ट्रीय धरोहर' के रूप में आधिकारिक संवैधानिक मान्यता प्रदान कर उसे सर्वोच्च राष्ट्रीय संरक्षण दिया जाए।
कठोर दंडात्मक प्रावधान: गौ-तस्करी और गोवध को 'संज्ञेय एवं गैर-जमानती अपराध' की श्रेणी में रखकर आजीवन कारावास तथा अपराध में संलिप्त दोषियों की संपत्ति कुर्क (राजसात) करने का कठोर विधिक प्रावधान हो।
आर्थिक आत्मनिर्भरता (गव्य आधारित अर्थव्यवस्था): पंचगव्य (गोबर-गोमूत्र) अनुसंधान को बढ़ावा देकर इन्हें जैविक खाद, कीटनाशक और औषधि के रूप में सरकारी खरीद तंत्र से जोड़ा जाए। स्कूलों में 'मिड-डे मील' व मंदिरों के 'प्रसाद' में केवल देशी गौ-घृत व दुग्ध का उपयोग अनिवार्य हो।
बुनियादी ढांचा विकास: प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर 'नंदीशाला' और जिला स्तर पर न्यूनतम एक 'आदर्श गौ-अभयारण्य' की स्थापना अनिवार्य हो, जहाँ निराश्रित गोवंश को ससम्मान आश्रय मिले।
राजमार्ग सुरक्षा एवं चिकित्सा: राष्ट्रीय व राज्य राजमार्गों पर प्रति 50 किमी पर सुसज्जित 'गौ-वाहिनी एम्बुलेंस' और आधुनिक ट्रॉमा सेंटरों की व्यवस्था हो ताकि दुर्घटनाग्रस्त गोवंश को तत्काल उपचार मिल सके।
शिक्षा एवं सामाजिक सुधार: स्कूली पाठ्यक्रमों में 'गौ-विज्ञान' को अनिवार्य विषय के रूप में शामिल किया जाए ताकि भावी पीढ़ी गौवंश के आध्यात्मिक, वैज्ञानिक और आर्थिक महत्व को समझ सके।
नोट - उक्त विषयो पर विस्तार से चर्चा पृष्ट क्रमांक संख्या 2 से 7 तक है।
आपसे सम्पूर्ण भारत के संत महात्मा, गोभक्त, गोशाला संचालक एवं सनातन धर्म के अनुयाई की तरफ से निवेदन है कि आपकी दृढ़ इच्छाशक्ति के फलस्वरूप ही प्रभु श्री राम के भव्य मंदिर का निर्माण और धारा 370 की समाप्ति जैसे ऐतिहासिक एवं साहसिक कार्य संपन्न होने से आज प्रत्येक भारतवासी स्वयं को सनातनी कहने में गौरव का अनुभव करता है।
किंतु महोदय, यह देखकर हृदय अत्यंत पीड़ा से भर जाता है कि भगवान श्री कृष्ण की आराध्या और भारतीय संस्कृति का प्राण कही जाने वाली वेदलक्षणा भगवती गौमाता आज भी सड़कों एवं गलीयों में अत्यंत कष्टप्रद स्थितियों में है। भूख, दुर्घटना, तस्करी और क्रूर वध के कारण आज भगवान गोवर्धन का प्रभाव क्षीण हो रहा है एवं हमारे पवित्र देशी गोवंश की संख्या निरंतर घट रही है।
जब हम समाचार पत्रों और चलचित्रों के माध्यम से अपने जननायक को स्वयं गौ-सेवा करते हुए देखते हैं, तो हमारी आशा पुनः जागृत हो जाती है एवं पूर्ण विश्वास हो जाता है कि गौमाता को उनका चिर-प्रतीक्षित सम्मान और न्याय केवल आपके द्वारा ही मिलना संभव है।
हमारे में से कई लोगों ने वर्ष 1966 के उस गौरक्षा आंदोलन और उसमें हुए नृशंस नरसंहार की त्रासदी को देखा है एवं झेला भी है। पूर्ववर्ती सरकारों द्वारा गौमाता और गौसेवको पर किए गए अन्यायों को भी निकट से हमने देखा है। वर्ष 2014 से अब तक, हम सभी ने आपकी धर्मनिष्ठा पर अटूट विश्वास रखते हुए एक लंबा समय व्यतीत किया है और धर्म की पुनः स्थापना के प्रत्येक कार्य में आपका साथ दिया है। अतः, यह पत्र लिखते हुए हम अपने सम्मानित प्रतिनिधि को यह स्मरण कराना चाहते हैं कि अब धर्म की पुनः स्थापना का समय आ गया है।
महोदय, यह हमारा अपनी आँखों से देखा कटु व्यक्तिगत अनुभव है कि जिस समय हम यह प्रार्थना पत्र लिख रहे हैं, उस समय हजारों की संख्या में गौवंश ट्रकों में भरकर तस्करी के लिए ले जाया जा रहा होगा। जब आप इसे पढ़ रहे होंगे, तब भी भारत की इस पवित्र धरा पर कई स्थानों पर गौमाता का रक्त बह रहा होगा। यह विचार ही हमारे हृदय को विदीर्ण कर देता है।
शास्त्रों में राजा को प्रजा का पालक और ईश्वर का अंश माना गया है। आप स्वयं एक परम गौसेवक हैं। आपके वक्तव्यों से सदैव यह आभास होता है कि आपके हृदय में गौमाता के प्रति सर्वोच्च स्थान है। ईश्वर साक्षी है कि गौमाता के सम्मान हेतु इस पत्र के साथ संलग्न प्रत्येक हस्ताक्षर "मोदी है तो मुमकिन है" के विश्वास के साथ किया गया है। हम सम्पूर्ण भारत राष्ट्र, केन्द्र शासित प्रदेश, समस्त मुर्धन्य संत समाज, गोमनीक्षी, गौशोधकर्ता, गौवैज्ञानिक, विधि विशेषज्ञ, गोशाला संचालक, गोसेवक एवं गोमाता के प्रति अघात श्रद्धा रखने वाले समस्त नागरिक एवं आपके मतदाता अत्यंत गर्व के साथ यह विश्वास करते है कि आपके प्रभावी एवं सक्षम नेतृत्व ने विगत 12 वर्षों में हम सनातनियों के भीतर सुरक्षा एवं स्वाभिमान का भाव जाग्रत किया है।
हम ईश्वर की शपथ लेकर कहते है कि हम सभी गोमाता की सेवा, सुरक्षा एवं सम्मान हेतु पेश इस प्रार्थना पत्र का उद्देश्य पूर्णतः पवित्र और निस्वार्थ है। हम सभी पूर्णतः अहिंसक, निस्वार्थ एवं निष्पक्ष उदेश्य हेतु समर्पित है हम आपसे किसी राजनैतिक लाभ, शासन और संगठन के विरुद्ध हेतु नही अपितु भारतीय अर्थव्यवस्था, पर्यावरण, परम्परा और संस्कृति की धुरी गोमाता के अस्थितत्व की रक्षा हेतु पार्थना पत्र पेश कर रहे है। हम केवल आपके माध्यम से संपूर्ण भारतीय देशी गोवंश की सुरक्षा और सम्मान सुनिश्चित करना चाहते हैं। गो सम्मान आहवान अभियान में किसी भी व्यक्ति को नेतृत्व नही देकर नन्दी भगवान को अध्यक्ष एवं गोमाता को प्रधान संरक्षक बनाया गया है। यह अभियान किसी भी संस्थान, संगठन तथा ट्रस्ट द्वारा संचालित नही होकर समस्त राष्ट्र एवं संस्कृति प्रेमी भारतीयों द्वारा स्व स्फुत भावना से संचालित है।
विधि विज्ञान, धर्म शिक्षा एवं संस्कृति के क्षेत्रों के विभिन्न विशेषज्ञों, जिन्होंने अपना जीवन गौ-अनुसंधान में समर्पित किया है, उनके अनुभवों के आधार पर हम आपके समक्ष निम्नलिखित प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करते हैं:-
1. वैधानिक एवं प्रशासिनक सुरक्षा (गौ-रक्षा संबंधित मुख्य आग्रह)
1.1 अखिल वेदलक्षणा देशी गौवंश वध प्रतिषेध:-
संपूर्ण भारत के समस्त राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों के क्षेत्राधिकार में सभी आयु वर्ग के गौवंश (स्वस्थ, रुग्ण, वृद्ध, गाय, वृषभ, नंदी, बछड़ा एवं बछिया) के वध एवं किसी भी प्रकार की शारीरिक क्षति पहुँचाने पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया जाए। इस कृत्य को 'संज्ञेय एवं गैर-जमानती अपराध' की श्रेणी में वर्गीकृत किया जाए, जिससे गौवंश की आद्योपान्त सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
1.2 संवैधानिक मान्यता एवं पदः-
भारतीय संविधान में संशोधन कर सम्पूर्ण (नर-मादा) गौवंश को राष्ट्र धरोहर, राष्ट गौरव, अथवा राष्ट्रमाता, राष्ट्र आराध्या, राष्ट्र देव के रूप में आधिकारिक रूप से मान्यता दी जावे। गौवंश को राष्ट्र गौरव एवं राष्ट्र आधार का वैर्धानिक दर्जा प्रदान करते हुए इसे सर्वोच्च राष्ट्रीय सम्मान एवं संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया जाए।
1.3 स्वतंत्र मंत्रालयः-
गोवंश के संरक्षण, सम्पोषण एवं संवर्धन के लिये स्वत्रंत मंत्रालय का गठन किया जाए। समस्त राज्यों में प्रचलित भिन्न-भिन्न गौ-संरक्षण अधिनयमों को निरस्त कर, एक एकीकृत केन्द्रीय गौ-सेवा मंत्रालय का गठन किया जाए। तत्पश्चात् संपूर्ण भारत में गौ-वंश के संरक्षण, संवर्धन एवं कल्याण हेतु केन्द्रीय गौ-सेवा एवं संरक्षण अधिनियम लागू कर समान कानूनी व्यवस्था स्थापित की जाए। राज्य सरकारो द्वारा अब तक बनाये गये नियमों, अधिनियमों को निरशित कर केन्द्रीय कानून के अधीन किया जावे।
1.4 कठोर दंडात्मक प्रावधान एवं संपत्ति राजसात (कुर्की):-
गौ-वंश की अवैध तस्करी एवं वध जैसे जघन्य अपराधों में संलिप्त अभियुक्तों हेतु आजीवन कारावास जैसे कठोर दंड का वैधानिक प्रावधान किया जाए। साथ ही, ऐसे अपराधों से अर्जित की गई अथवा अपराध में प्रयुक्त समस्त चल-अचल संपत्ति को राजसात करने हेतु सद्दढ़ कानून निर्मित किया जाए।
1.5 वाहन राजसात्ः-
तस्करी की गतिविधियों में संलिप्त समस्त वाहनों को बिना किसी प्रतिभूति के तत्काल प्रभाव से राजसात् किया जाए। तत्पश्चात्, सक्षम प्राधिकारी द्वारा उक्त वाहनों की सार्वजनिक नीलामी की जाए और उससे प्राप्त आय को पंजीकृत गौशालाओं के रख-रखाव हेतु हस्तांतरित किया जाए।
1.6 अवैध तस्करी पर अंकुश एवं पशु मेला नियमनः-
पशु मेलों की आड़ में होने वाली अवैध तस्करी एवं गो-वंश के अनैतिक अंतर्राज्यीय परिवहन को रोकने हेतु एक सुद्दढ़ केन्द्रीय गो-वंश संरक्षण अधिनियम बनाया जाए। इसके अंतर्गत समस्त पशु मेलों में गो-वंश के व्यावसायिक क्रय-विक्रय को पूर्णतः प्रतिबंधित कर, केवल कृषि एवं डेयरी प्रयोजनों हेतु पंजीकृत कृषक को विनिमय की अनुमित प्रदान की जाए।
2. आर्थिक एवं संसाधन विकास (गव्य महत्व एवं आत्म निर्भरता)
2.1 वृहद् गव्य अनुसंधानः-
कृषि पारिस्थितिकी में गौवंश की महत्ता को पुनः स्थापित करने हेतु, समस्त राजकीय एवं निजी कृषि विश्वविद्यालयों में पंचगव्य अनुसंधान एवं विकास केन्द्र के विषय पर शोध एवं अध्ययन की स्थापना अनिवार्य की जाए। ये केन्द्र मुख्य रूप से गोमय (गोबर) एवं गोमूत्र आधारित कीट-नियंत्रक औषधियों, जैविक उर्वरकों के मानकीकरण तथा कृषि कार्यों में गौ-शक्ति के वैज्ञानिक उपयोग पर शोध एवं नवाचार हेतु उत्तरदायी हो।
2.2 प्रसंस्करण एवं उद्योगः-
गौवंश के गोमय (गोबर) एवं गोमूत्र आधारित उप-उत्पाद प्रसंस्करण इकाइयों की स्थापना हेतु विशेष प्रोत्साहन प्रदान किया जाए तथा इस क्षेत्र में नवीन वैज्ञानिक अनुसंधान एवं शोध हेतु आवश्यक वित्तीय एवं तकनीकी सहायता सुनिश्चित की जाए।
2.3 उद्यमिता प्रोत्साहनः-
गौ-आधारित सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों की स्थापना करने वाले उद्यमियों हेतु विशेष प्रोत्साहन पैकेज का प्रावधान किया जाए तथा औद्योगिक क्षेत्रों में भू-आंवटन की प्रक्रिया में उन परियोजनाओं को वैधानिक प्राथमिकता प्रदान की जाए जिनका आधार गौवंश संरक्षण एवं संवर्धन हो।
2.4 बाजार प्रोत्साहन एवं विपणनः-
समस्त प्रमुख शॉपिंग मॉल्स तथा खादी इत्यादि शासकीय संस्थानों में गौ-आधारित उत्पादों हेतु पृथक विपणन काउंटरों की स्थापना अनिवार्य की जाए।
2.5 शासकीय उपयोगः-
समस्त राजकीय भवनों, सार्वजनिक उपक्रमों एवं शासकीय चिकित्सालयों के रखरखाव तथा स्वच्छता हेतु गोमय निर्मित पेंट एवं गौ-अर्क आधारित कीटाणुनाशक (गोनाइल) के उपयोग को अनिवार्य रूप से उपयोग में लेना का प्रावधान किया जावे।
2.6 प्राकृतिक कृषि प्रोत्साहनः-
रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के विकल्प के रूप में गौ-आधारित प्राकृतिक कृषि प्रणाली (Go & organic agriculture) को अंगीकार करने वाले कृषकों हेतु विशेष राजकीय प्रोत्साहन रशीश तथा आर्थिक सहायता का वैधानिक प्रावधान किया जाए। एवं इनके कृषि उत्पादों को अधिक मूल्य पर विक्रय की व्यवस्था की जाए।
2.7 वृषभ आधारित कृषिः-
पारंपरिक कृषि पद्धतियों के पुनरुद्धार हेतु नंदी (वृषभ) आधारित खेती को अपनाने वाले कृषकों को चिन्हित कर, उन्है विशेष राजकीय प्रोत्साहन एवं आर्थिक अनुदान उपलब्ध कराने का वैधानिक प्रावधान किया जाए।
2.8 मानव चिकित्सा में गव्य पदार्थों का उपयोगः-
समस्त राजकीय स्वास्थ्य इकाइयों, आयुष चिकित्सालयों एवं अधिकृत औषधि वितरण केन्द्रों के माध्यम से पंचगव्य आधारित औषधियों की उपलब्धता एवं उनका निःशुल्क वितरण अनिवार्य रूप से सुनिश्चित किया जाए।
2.9 शासन नीति निर्माणः-
कृषक समृद्धि एवं गौवंश संरक्षण के अंर्त सबंधों को सृद्दढ़ करने हेतु किसान शब्द की परिभाषा सुनिश्चित की जाये एवं 'पंचगव्य' (दुग्ध, दधि, घृत, गोमय एवं गोमूत्र) के बहुआयामी उपयोग एवं विपणन को प्राथमिकता देने वाली विशेष शासकीय नीतियों का प्रतिपादन किया जाए।
2.10 चिकित्सीय मान्यता एवं आयुर्वेद चिकित्सकों का सशक्तिकरण:-
विभिन्न वैज्ञानिक शौध में गोमूत्र को एन्टीआकसीडेट (मानव के उपयोग योग्य) माना है गोमूत्र को मानव शरीर में रोग प्रतिरोधक क्षमता की वृद्धि के लिये उपयोगी माना है। अतः इसका विनण्वन करने के लिये नियमों में संशोधन कर चिकित्सकिय परामर्श लिखने हेतु आयुवेदिक चिकित्सको को अधिकृत किया जावे।
2.11 ग्राम पंचायत स्तरीय अपशिष्ट प्रबंधन एवं जैविक ऊर्जा नवाचार:-
गोमय (गोबर) से विभिन्न प्रकार की खाद बनाने के लिये ग्राम पंचायत स्तर पर संयत्र स्थापित किये जावे इसे संयत्रों में निर्मित जैविक खाद का विपणन कृषि सहकारी समितियों के माध्यम से किसानो को अनुदानित दर पर उपल्ब्ध करवाया जावे। जिससे देश में जैविक कृषि को प्रोहतसान मिलेगा।
ग्राम पंचायत स्तर पर समितियां बनाई जावे एवं ग्राम में संरक्षित गोवंश के गोबर से सीएनजी बनाकर समितियों के माध्यम से स्थानिय स्तर पर व्यवस्था कि जावे। यह सीएनजी आम नागरिको को स्ती दर पर उपल्बध होगी एवं नर गोवंश का संरक्षण भी होगा।
3. संसाधन, अनुदान एवं चारा प्रबंधन
3.1 गौशाला अनुदान:-
भारत के समस्त राज्यों एवं केन्द्र शासित प्रदेशों में संचालित गौशालाओं हेतु, उनकी क्षेत्रीय भौगोलिक परिस्थितियों, गौ-वंश की धारित संख्या एवं स्थानीय आवश्यकताओं के आधार पर यथोचित राजकीय अनुदान का निर्धारण एवं समयबद्ध वितरण सुनिश्चित करने हेतु एक पारदर्शी केन्द्रीय नीति लागू की जाए।
3.2 चारा प्रबंधन:-
चारे के अधिकतम मूल्य का निर्धारण कर मूल्य वद्धि पर नियंत्रण किया जाये। अवैध संग्रहण पर पूर्ण प्रतिबंध लगे तथा चारा सिडिकेट (भूसा माफिया) के विरुद्ध कठोर दंडात्मक विधिक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए।
3.3 चारा संरक्षण एवं उपयोग:-
समस्त प्रकार के प्राकृतिक घास एवं चारे का उपयोग विशेष रूप से 'गौ-आहार' तथा 'पशु-आहार' हेतु ही आरक्षित किया जाए। औद्योगिक इकाइयों (फैक्ट्रियों) द्वारा ईंधन के रूप में इनके दहन एवं अन्य उपयोग पर पूर्णतः प्रतिबंध लगाया जाए।
3.4 गोचर भूमि संरक्षण:-
समस्त पारंपरिक गोचर, औरण , वन, पर्वत, नदियों के तट स्थल एवं आगोर भूमियों को अतिक्रमण मुक्त कराकर उनका अनन्य उपयोग 'गौ-वंश' हेतु सुरक्षित किया जाए। इसके प्रभावी प्रबंधन हेतु स्वायत्त 'गोचर विकास बोर्ड' का गठन किया जाए। साथ ही, वन भूमि एवं नदी तटवर्ती क्षेत्रों को गौ-चारण हेतु चिन्हित कर चराई हेतु विशेष अनुमति प्रदान करने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
4. गौशाला, अभयारण्य एवं बुनियादी ढांचा
4.1 गौ-अभयारण्य स्थापना:-
भारत के समस्त राज्यों के प्रत्येक जनपद म गौ वंश के प्राकृतिक संरक्षण एवं संवर्धन हेतु न्यूनतम एक 'आदर्श गौ-अभयारण्य' की स्थापना अनिवार्य की जाए, जिसके लिए केन्द्र के निर्देश पर राज्य सरकारों द्वारा उपयुक्त चारागाह भूमि एवं आवश्यक बजट का आवंटन सुनिश्चित किया जाए।
4.2 नंदीशाला स्थापना:-
निराश्रित नर गोवंश के संरक्षण तथा उचित प्रबंधन हेतु प्रत्येक ग्राम पंचायत स्तर पर 'सामुदायिक नंदीशाला' का निर्माण अनिवार्य किया जाए, जिसका संचालन स्थानीय निकाय एवं गौ-सेवा समितियों के समन्वय से सुनिश्चित हो।
4.3 विकसित भारत-रोजगार एवं आजीविका मिशन (जी राम जी) योजना का अभिसरण:-
गौशालाओं के प्रबंधन, विशेष निर्माण कार्य एवं गौ सेवा में संलग्न श्रमिकों (ग्वालों) के मानदेय को जी राम जी योजना के अंतर्गत सम्मिलित किया जाए।
4.4 ऊर्जा एवं विद्युत सहायता:-
समस्त पंजीकृत गौशालाओं को उनमें संरिक्षत 'गौ-वंश' की संख्या के अनुपात में निःशुल्क विद्युत आपूर्ति अथवा टैरिफ दरों में विशेष रियायत प्रदान करने हेतु नीतिगत प्रावधान किए जाएं।
4.5 शहरी नियोजन:-
समस्त महानगरों एवं वृहद् आवासीय परियोजनाओं के विकास हेतु, नगर नियोजन नियमावली में संशोधन कर निर्माता एवं भू विकासकर्ता द्वारा 'गौ-शाला' हेतु एक निश्चित भू-खंड का पृथक आवंटन अनिवार्य सुनिश्चित किया जाए।
4.6 मंदिरों का सहयोग:-
शासकीय नियंत्रण एवं प्रबंधन के अधीन आने वाले समस्त देवस्थानों एवं धार्मिक न्यासों द्वारा अपने परिसर अथवा निकटस्थ भूमि पर 'गौ-शाला संचालन' को वैधानिक रूप से अनिवार्य किया जाए।
4.7 सम्मानजनक अंत्येष्टि व्यवस्था:-
मृत गौ-वंश के ससम्मान संस्कार हेतु स्थानीय प्रशासन एवं नगर निकायों द्वारा 'गौ-समाधि' हेतु समर्पित स्थलों का आवंटन तथा गरिमापूर्ण अंतिम संस्कार की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।
5. स्वास्थ्य, चिकित्सा एवं राजमार्ग सुरक्षा
5.1 गौ-वाहिनी एम्बुलेंस एवं आपातकालीन सेवा:-
राष्ट्रीय एवं राज्य राजमार्गों पर प्रत्येक 50 किलोमीटर की परिधि में अथवा समस्त 'पथकर संग्रहण केन्द्रों' पर गौ-वंश हेतु 'सज्जित एम्बुलेंस' एवं 'प्राथिमक गौ चिकित्सा केन्द्रों' की स्थापना अनिवार्य की जाए।
5.2 गौ-चिकित्सालय :-
समस्त राष्ट्रीय राजमार्गों पर प्रति 150 200 किलोमीटर के अंतराल पर गौ-वंश के उपचार हेतु 'अत्याधुनिक ट्रॉमा एवं गौ-चिकित्सा केन्द्रों की स्थापना सुनिश्चित की जाए, जो आकस्मिक दुर्घटनाओं एवं रोगों के निवारण हेतु पूर्णतः सुसज्जित हों।
5.3 पंचगव्य चिकित्सालय :-
आयुष मंत्रालय के मानकों के अनुरूप, प्रत्येक जनपद स्तर पर एक पंचगव्य चिकित्सालय' की स्थापना अनिवार्य की जाए, जहाँ पंचगव्य आधारित पारंपरिक पद्धितयों द्वारा असाध्य रोगों के उपचार एवं अनुसंधान की व्यवस्था सुनिश्चित हो।
6. शिक्षा एवं पोषण
6.1 शैक्षिणक समावेश:-
समस्त प्राथिमक, माध्यिमक एवं उच्च शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रमों में 'गौवंश' के आध्यात्मिक वैज्ञानिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक महत्व को अनिवार्य विषय के रूप में सम्मिलित किया जाए।
6.2 पोषण एवं स्वास्थ्य सुरक्षा (मिड-डे मील योजना):-
समस्त शासकीय एवं सहायता प्राप्त विद्यालयों में संचालित 'मध्याह्न भोजन योजना' के अंतर्गत विद्याथियों के शारीरिक एवं मानिसक विकास हेतु 'स्वदेशी गौ-वंश' के दुग्ध अथवा उच्च गुणवत्ता युक्त गौ दुग्ध पाउडर की उपलब्धता अनिवार्य रूप से सुनिश्चित की जाए।
7. सामाजिक, धार्मिक एवं कॉर्पोरेट सुधार
7.1 नैवेद्य एवं प्रसाद मानक नियमन:-
समस्त राजकीय नियंत्रण वाले देवस्थानों, धार्मिक न्यासों (Trusts) एवं स्वायत्तशासी मंदिर समितियों द्वारा निर्मित 'भोग एवं प्रसाद' में केवल 'स्वदेशी गौ-वंश' के दुग्ध, दधि (दही) एवं घृत (घी) का उपयोग अनिवार्य सुनिश्चित किया जाए। किसी भी प्रकार के कृत्रिम, रासायिनक या अन्य पशु-वसा युक्त पदार्थों का उपयोग पूर्णतः वर्जित एवं दंडनीय माना जाए।
7.2 कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (CSR) अधिशेष:-
कंपनी अधिनियम, 2013 की धारा 135 के अंतर्गत निर्धारित 'कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी' (CSR) फंड का एक निश्चित प्रतिशत 'गौ-सेवा, गौ-वंश संरक्षण एवं संवर्धन' की परियोजनाओं हेतु आवंटित करना अनिवार्य किया जाए।
7.3 पॉलीथिन प्रतिबंध :-
'एकल उपयोग प्लास्टिक' (Single-use Plastic) के विनिर्माण, भंडारण, विक्रय एवं उपयोग को पूर्णतः प्रतिबंधित किया जाए। इस व्यवस्था का उल्लंघन करने वाले व्यक्तियों अथवा संस्थाओं के विरुद्ध सुसंगत धाराओं के अंतर्गत कठोर दंडात्मक एवं वैधानिक कार्यवाही सुनिश्चित की जाए।
महोदय,
हमारे देश का विधि-विधान भी गौ-वंश के संरक्षण का पक्षधर है।
भारतीय संविधान के भाग 4 (राज्य की निति के निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 48 स्पष्ट रूप से राज्य को यह निर्देश देता है कि वह आधुनिक और वैज्ञानिक आधार पर कृषि और पशुपालन को संगठित करे तथा विशेष रूप से गायों, बछड़ों और अन्य दुधारू पशुओं के वध को प्रतिषिद्ध करने के लिए प्रभावी कदम उठाए। साथ ही, हमारे ‘मूल कर्तव्यों’ में अनुच्छेद 51A (g) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक का यह मूल कर्तव्य सुनिश्चित किया गया है कि वह वनों, झीलों, नदियों और 'वन्यजीवों' सहित प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा करे तथा जीवित प्राणियों के प्रति दया भाव रखे।
महोदय साथ ही भारत के संविधान के भाग 3 (मूल अधिकार) के अंतर्गत अनुच्छेद 25 में 'धर्म की स्वतंत्रता का अधिकार' हे जिसके अंतर्गत संविधान प्रत्येक व्यक्ति को अपने अंतकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने और आचरण एवं प्रचार करने की स्वतंत्रता देता है, जिसमे कई समुदाय के लिए पशु सेवा और संरक्षण श्रद्धा का विषय हे।
न्यायपालिका ने भी समय-समय पर गौ-वंश के महत्व को रेखांकित किया है:
हनीफ कुरैशी बनाम बिहार राज्य (1958): जिसमें माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने माना कि गोवंश का संरक्षण कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था के लिए अनिवार्य है।
मिर्जापुर मोती कुरैशी केस (2005): जहाँ सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ ने स्पष्ट किया कि गौ-वंश के वध पर पूर्ण प्रतिबंध संवैधानिक रूप से वैध है क्योंकि यह जनहित और राष्ट्र की आर्थिक सुदृढ़ता से जुड़ा है।
उत्तराखंड उच्च न्यायालय (2018): जिसने गौ-वंश को 'विधिक व्यक्ति' (Legal Person) का दर्जा देकर उनके अधिकारों की रक्षा का मार्ग प्रशस्त किया।
इलाहाबाद उच्च न्यायालय (2021): जिसने स्पष्ट शब्दों में कहा कि "गौमाता को राष्ट्रीय पशु घोषित किया जाना चाहिए" और गौ-रक्षा को हिंदुओं के मौलिक अधिकार के साथ जोड़कर देखा जाना चाहिए।
मोहम्मद अब्दुल ख़ालिक़ बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (इलाहाबाद उच्च न्यायालय)(2021-2023): जहा कोर्ट ने गाय को ‘कामधेनु’ बताते हुए केंद्रीय सरकार से इसे ‘राष्ट्रीय संरक्षित पशु’ घोषित करने की उम्मीद जतायी।
विभिन्न राज्यों ने अपने स्तर पर कड़े कानून बनाए हैं, जैसे राजस्थान गौ वंशीय अधिनियम 1995, उत्तर प्रदेश गोवध निवारण अधिनियम 1955, गुजरात पशु संरक्षण अधिनियम, हरियाणा गौ वंश संरक्षण और गौ संवर्धन अधिनियम 2015 तथा कर्नाटक पशु वध रोकथाम और संरक्षण अधिनियम 2020। किंतु, इन बिखरे हुए कानूनों के स्थान पर अब एक 'समग्र केंद्रीय कानून' की आवश्यकता है।
अंतिम निवेदन
अतः महोदय, आपसे करबद्ध विनम्र निवेदन है कि उपर्युक्त समस्त मांगों एवं प्रस्तावों पर गंभीरतापूर्वक विचार कर आवश्यक वैधानिक, प्रशासिनक एवं नीतिगत निर्णय शीघ्रातिशीघ्र लिए जाएं, जिससे गौमाता को उनका उचित सम्मान, सुरक्षा एवं संरक्षण प्राप्त हो सके।
हमें आशा ही नहीं बल्कि पूर्ण विश्वास है कि आपके सक्षम एवं धर्मनिष्ठ नेतृत्व में यह ऐतिहासिक कार्य अवश्य संपन्न होगा और भारत पुनः अपनी सनातन गौरवशाली परंपराओं के अनुरूप विश्व में एक आदर्श राष्ट्र के रूप में स्थापित होगा। ईश्वर से हमारी प्रार्थना है कि आपको उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु एवं राष्ट्र सेवा के लिए निरंतर शिक्त प्रदान करे।
धन्यवाद
दिनांक: सादर,
स्थान: समस्त भारतवासी
(संत समाज, गौसेवक, नागरिक एवं मतदाता)
संलग्नक:
गौ भक्तों की हस्ताक्षर सूची (पृष्ठ संख्या:00)
अभियान की विस्तृत कार्ययोजना (पृष्ठ संख्या:00)
पूर्व में दिए गए पत्रों की छायाप्रति (पृष्ठ संख्या:00)
प्रतिलिपि सूचनार्थ एवं आवश्यक कार्यवाही हेतु प्रेषित:
श्रीमान जिला कलेक्टर महोदय, ( जिले का नाम) (राज्य)।
श्रीमान पुलिस अधीक्षक (SP) महोदय,( जिले का नाम) (राज्य)।
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