सामाजिक, धार्मिक संस्थाएँ
वर्तमान में प्रशासन से ज्यादा प्रभावी कार्य सामाजिक, धार्मिक संस्थाएं कर रही हैं। बात चाहे समाज में व्याप्त कुरीतियों को मिटाने की हो या भ्रष्टाचार मिटाने की, बात चाहे पर्यावरण को बचाने की हो या पशु-पक्षी बचाने की, बात चाहे ग्रामीण विकास की हो या मानवजाति के नैतिक व आध्यात्मिक विकास की, बात चाहे प्राकृतिक आपदा से राष्ट्र को उभारने की हो या विदेशी आक्रमणों से राष्ट्र व संस्कृति को बचाने की हो, आपने सदैव आगे बढ़कर जनकल्याण व राष्ट्र के बहुआयामी विकास में अपना योगदान दिया हैं। आज भी कुछ संगठित शक्तियाँ हमारी संस्कृति, हमारे स्वास्थ्य, हमारे खेत-खलिहान व पर्यावरण को अपने कुविचारों व रसायनों से दूषित कर रही हैं। ऐसी परिस्थिति में यह राष्ट्र आपकी ओर अपेक्षा भरी निगाहों से देख रहा हैं। आइये निम्न पुनीत कार्य करे संस्कृति, मानव व मातृभूमि के स्वास्थ्य की रक्षा करें।
१. अपने परिसर में गोशाला स्थापित करनी चाहिये।
२. पंचगव्य औषधि, कृषिउत्पाद जैसे खाद, कीटनियंत्रक आदि तथा अन्य उत्पाद जैसे टिकिया, शैम्पू, उबटन, धूप बत्ती का निर्माण, बिक्री व प्रशिक्षण कार्यक्रम संचालित करने चाहिये।
३. प्रसाद, भोग में देसी गाय का दुध, दही, घृत का ही उपयोग करना चाहिये।
४. गोवंश की आध्यात्मिक व वैज्ञानिक महत्ता, पंचगव्य स्वास्थ्य के लिये तुलनात्मक लाभकारी, जैविक कृषि के लाभ व रासायनिक कृषि व खाद्यान्नों का स्वास्थ्य में व पर्यावरण पर दूष्प्रभाव संबधी विषयों पर संस्था में तथा गाँव शहर के योग्य स्थानों पर चित्र व फलक लगाकर जनसामान्य को जागृत करना चाहिये।
५. उपरोक्त विषयों पर चर्चा, संगोष्ठी, गोयात्रा का आयोजन करना चाहिये।
६. इन्हीं विषयों पर जनजागरण हेतु पत्रक, पत्रिकाएँ व चित्र प्रकाशित कर वितरित करने चाहिये।
७. संस्था में तथा संस्था से संलग्न लोगों के व्यापारिक प्रतिष्ठानों में गोग्रास दान पेटी लगवानी चाहिये।
८. गाय की चर्बी, चमडी हड्डियों से बने हिंसात्मक उत्पादों का बहिष्कार करने का संदेश जनसामान्य तक पहुँचाना चाहिये।