कृषि में गाय के गोबर की खाद्य, औषधि और उद्योगों से पर्यावरण में काफ़ी सुधार है। जुताई करते समय गिरने वाले गोबर और गौमूत्र से भूमि में स्वतः खाद डलती जाती है। प्रकृति के 99% कीट प्रणाली के लिये लाभ दायक है, गौमूत्र या खमीर हुए छाछ से बने कीटनाशक इन सहायक कीटों को प्रभावित नहीं करते एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद और मूत्र 100 एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है।
मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013
गौमाता ----- कृषि
कृषि में गाय के गोबर की खाद्य, औषधि और उद्योगों से पर्यावरण में काफ़ी सुधार है। जुताई करते समय गिरने वाले गोबर और गौमूत्र से भूमि में स्वतः खाद डलती जाती है। प्रकृति के 99% कीट प्रणाली के लिये लाभ दायक है, गौमूत्र या खमीर हुए छाछ से बने कीटनाशक इन सहायक कीटों को प्रभावित नहीं करते एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद और मूत्र 100 एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है।
गौमाता ------ आहार
चाय, कॉफ़ी जैसे लोकप्रिय पेय पदार्थों में दूध एक जरूरी पदार्थ है, भारत में ऐसी अनेक मिठाइयाँ जो गौ दूध पर आधारित होती है। दही, मक्खन और घी भारतीय भोजन के आवश्यक अंग हैं। घी में तले व्यंजनों का खाद अप्रतिम होता है। छाछ न केवल प्यास बुझाती हैं बल्की बहुत से प्रचलित व्यंजनों का आधार है।
गौमाता ------- धार्मिक महत्त्व
हमारी संस्कृति के अनुसार गाय और मंदिरों का एक दूसरे से मज़बूत रिश्ता है, धार्मिक अनुष्ठानों में गाय की अपनी एक महत्त्वपूर्ण भूमिका है।
गाय को दैविक माना गया है, तथा हिन्दू संस्कृति के अनुसार दिन की शुरुआत गाय की पूजा से शुरू होती है। गाय को खिलाना और उसकी पूजा करना दैविक अनुष्ठान है ।
पारिवारिक उत्सवों तथा त्योहारों में गाय की प्रधानता है, ऐसे अनेक त्योहार है, जहाँ गाय अपना एक प्रमुख स्थान रखती है।
अनेक मंदिरों के प्रवेशद्वार पर गाय का छप्पर होता है जिससे मनुष्य में पवित्रता की भावना बढ़ती है।
हिंदुओं के हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश उनकी माता पार्वती को गाय के गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है।
धार्मिक अनुष्ठानों में गाय की महत्ता
हमारी संस्कृति में गायों और मंदिरों में एक मजबूत रिश्ता है ।
गो तुलाभार
गाय को दैविक माना गया है ।
दिन गाय की पूजा से शुरू होता है ।
गाय को खिलाना और उसकी पूजा करना दैविक अनुष्ठान है ।
पारिवारिक उत्सवों में गाय की प्रधानता है ।
ऐसे अनेक त्योहार हैं जहाँ गाय प्रमुख होती है ।
अनेक मंदिरों के प्रवेशद्वार पर गाय का छप्पर होता है जिससे पवित्रता की भावना बढ़ती है ।
पंचगव्य से सफाई और शुद्धि की हमारी परंपरा है ।
भगवान की मूर्तियों को दूध, दही और घी से स्नान कराते हैं ।
पवित्र प्रदीप प्रज्जवलन हेतु हम घृत का प्रयोग करते हैं । देवताओं को भी घी का नैवेद्य चढ़ाते हैं ।
भगवान के प्रसाद में घी और दूध डाला जाता है ।
देवताओं के शृंगार में मक्खन का प्रयोग होता है ।
सोमवार, 14 अक्टूबर 2013
गाय माता की रक्षा को हमें सबसे अग्रणी राष्ट्रीय कर्त्तव्य समझना चाहिए।
सभी गोभग्त गोप्रेमी बन्धुओ से मेरा निवेदन है की कर्प्या इसे ज्यादा से ज्यादा संख्या में शेयर करे और अपने गोव्त्श होने का फर्ज निभाए...
जय गोमाता जय गोपाल...
मेरे मन में गाय के प्रति जो पूर्व स्थापित श्रद्धा थी वह श्रद्धा अब लौहवत अर्थात् लोहे के समान दृढ़ हो गई है।
संस्कार रूप में यह श्रद्धा भारतवासियों को प्राप्त हुई।
इस संस्कार का मूल वाक्य है - ‘गाय हमारी माता है।’
श्रीकृष्ण जी के बाल्यकाल की एक संक्षिप्त घटना है।
एक दिन बालक कृष्ण अपनी माँ से बोले, ‘‘माता मैं गायों का नौकर बनकर सेवा करना चाहता हूँ और मैं गाय चराने के लिए उनके साथ जाऊँगा।’’
माँ ने इसे आपत्तिजनक न समझते हुए स्वीकृति दे दी।
माँ ने कृष्ण को कहा कि वह उसके लिए रेशमी जूते बनवाकर देगी जिससे उसे गाय चराते समय कष्ट न हो।
इस पर बालक कृष्ण बोले, ‘‘माँ तू मेरे लिए जूते बनवा सकती तो मेरी गाय माता के लिए भी बनवा दो।’’
इस पर मइया ने कहा कि तू छोटा सा बालक है और तेरे छोटे- छोटे कोमल पाँव हैं, जबकि गाय तो पशु है, वह जूते कैसे पहन सकती है?
इस पर कृष्ण जी बिगड़ पड़े कि मइया ने मेरी गाय माता को पशु क्यों कह दिया?
अन्ततः माँ ने हार मान ली।
इसी प्रकरण में अब कृष्ण जी यह कहने लगे, ‘‘मैं गाय चराने के लिए डंडा लेकर नहीं जाऊँगा, क्योंकि गाय माता को डंडे से मैं नहीं हाँक सकता।
मैं तो सुरीली बाँसुरी बजाऊँगा और मेरे भाव और बाँसुरी की ध्वनि के पीछे मेरी माता स्वतः आती जायेंगी।’’
इस छोटे से प्रकरण से हम यह आंकलन कर सकते हैं कि यह संस्कारवश जन्म- जन्मान्तरों से चलती आई श्रद्धा ही थी जिसने बालक कृष्ण के मन में बाल्यावस्था मेंही गाय माता के प्रति इतने भाव भर रखे थे।
गाय वास्तव में किसी एक आदमी के लिए नहीं, किसी एक राष्ट्र के लिए नहीं, बल्कि समूचे विश्व के लिए भौतिक कल्याण का विशाल स्रोत है।
गाय माता की रक्षा हमारा कानूनी और संवैधानिक अधिकार है और समाज के किसी भी वर्ग को या किसी भी सरकार को यह अधिकार नहीं है कि हमें इस अधिकार से वंचित किया जाये।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बात को खुले रूप से घोषित किया है कि गाय की हत्या करना किसी वर्ग का धार्मिक अधिकार नहीं है।
गायें हमारी हैं और हम गायों के हैं, गाय बचेगी तो राष्ट्र बचेगा, गाय की हत्या का अर्थ है राष्ट्र की हत्या।
गाय माता के बल पर ही समाज का आध्यात्मिक उत्थान भी सम्भव है, अन्यथा नहीं।
गाय माता से भौतिक लाभ लेने के बावजूद भी हमें इस आध्यात्मिक पथ पर भी स्वयं को चलाना पड़ेगा।
मैं किसी भी कीमत पर गाय माता की रक्षा के पथ से विचलित नहीं हो सकती , पथ भ्रष्ट नहीं हो सकती।
गाय माता की रक्षा मेरे लिए कोई सांसारिक व्यापारिक कार्य नहीं है।
मुझे यह विश्वास है कि गाय माता की रक्षा से समाज के समस्त वर्गों का ही नहीं अपितु समस्त जीव-जन्तु और वनस्पति सम्पदा का भी कल्याण ही कल्याण है।
इसलिए गाय माता की रक्षा को हमें सबसे अग्रणी राष्ट्रीय कर्त्तव्य समझना चाहिए।
जय गोमाता जय गोपाल...
मेरे मन में गाय के प्रति जो पूर्व स्थापित श्रद्धा थी वह श्रद्धा अब लौहवत अर्थात् लोहे के समान दृढ़ हो गई है।
संस्कार रूप में यह श्रद्धा भारतवासियों को प्राप्त हुई।
इस संस्कार का मूल वाक्य है - ‘गाय हमारी माता है।’
श्रीकृष्ण जी के बाल्यकाल की एक संक्षिप्त घटना है।
एक दिन बालक कृष्ण अपनी माँ से बोले, ‘‘माता मैं गायों का नौकर बनकर सेवा करना चाहता हूँ और मैं गाय चराने के लिए उनके साथ जाऊँगा।’’
माँ ने इसे आपत्तिजनक न समझते हुए स्वीकृति दे दी।
माँ ने कृष्ण को कहा कि वह उसके लिए रेशमी जूते बनवाकर देगी जिससे उसे गाय चराते समय कष्ट न हो।
इस पर बालक कृष्ण बोले, ‘‘माँ तू मेरे लिए जूते बनवा सकती तो मेरी गाय माता के लिए भी बनवा दो।’’
इस पर मइया ने कहा कि तू छोटा सा बालक है और तेरे छोटे- छोटे कोमल पाँव हैं, जबकि गाय तो पशु है, वह जूते कैसे पहन सकती है?
इस पर कृष्ण जी बिगड़ पड़े कि मइया ने मेरी गाय माता को पशु क्यों कह दिया?
अन्ततः माँ ने हार मान ली।
इसी प्रकरण में अब कृष्ण जी यह कहने लगे, ‘‘मैं गाय चराने के लिए डंडा लेकर नहीं जाऊँगा, क्योंकि गाय माता को डंडे से मैं नहीं हाँक सकता।
मैं तो सुरीली बाँसुरी बजाऊँगा और मेरे भाव और बाँसुरी की ध्वनि के पीछे मेरी माता स्वतः आती जायेंगी।’’
इस छोटे से प्रकरण से हम यह आंकलन कर सकते हैं कि यह संस्कारवश जन्म- जन्मान्तरों से चलती आई श्रद्धा ही थी जिसने बालक कृष्ण के मन में बाल्यावस्था मेंही गाय माता के प्रति इतने भाव भर रखे थे।
गाय वास्तव में किसी एक आदमी के लिए नहीं, किसी एक राष्ट्र के लिए नहीं, बल्कि समूचे विश्व के लिए भौतिक कल्याण का विशाल स्रोत है।
गाय माता की रक्षा हमारा कानूनी और संवैधानिक अधिकार है और समाज के किसी भी वर्ग को या किसी भी सरकार को यह अधिकार नहीं है कि हमें इस अधिकार से वंचित किया जाये।
सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस बात को खुले रूप से घोषित किया है कि गाय की हत्या करना किसी वर्ग का धार्मिक अधिकार नहीं है।
गायें हमारी हैं और हम गायों के हैं, गाय बचेगी तो राष्ट्र बचेगा, गाय की हत्या का अर्थ है राष्ट्र की हत्या।
गाय माता के बल पर ही समाज का आध्यात्मिक उत्थान भी सम्भव है, अन्यथा नहीं।
गाय माता से भौतिक लाभ लेने के बावजूद भी हमें इस आध्यात्मिक पथ पर भी स्वयं को चलाना पड़ेगा।
मैं किसी भी कीमत पर गाय माता की रक्षा के पथ से विचलित नहीं हो सकती , पथ भ्रष्ट नहीं हो सकती।
गाय माता की रक्षा मेरे लिए कोई सांसारिक व्यापारिक कार्य नहीं है।
मुझे यह विश्वास है कि गाय माता की रक्षा से समाज के समस्त वर्गों का ही नहीं अपितु समस्त जीव-जन्तु और वनस्पति सम्पदा का भी कल्याण ही कल्याण है।
इसलिए गाय माता की रक्षा को हमें सबसे अग्रणी राष्ट्रीय कर्त्तव्य समझना चाहिए।
शनिवार, 12 अक्टूबर 2013
लेख थोडा बड़ा है किन्तु अवश्य पढ़े .. अगर संभव हो तो शेयर जरुरकरना...!
आज कुछ तूफानी नही बल्कि जमीनी करते हैंजमीन से २०००० फुट की उंचाई पर थम्स अप पीने की बजाय जमीनपर रहकर गाय के दूध का आनंद लीजिये, दही की लस्सी पीजिये औरघी मक्खन खाइएआज दक्षिण भारत में सबसे अधिक गौ हत्या हो रही है और वहां केहिन्दू भी गौ मांस का भक्षण कर रहे हैं ,,कारण तेजी सेफैलता इस्लामीकरण और ईसाईकरण और दूसरा कारण महगाई आलू२० रुपये किलो और गौ मांस ४५ रुपये किलो .. गरीबी इंसान सेक्या क्या न करवा दे और हम हिन्दू लोग तो माहिर हैं समझौता करनेमें .हिन्दू धर्म में गाय को माता का दर्जा दिया गया .. श्री कृष्णजी कोगाय प्रेम इतना अधिक था की वो गाय के ह्रदय में जा बसे ,जब कृष्ण जी गाय के ह्रदय में जा बसे तो सम्पूर्ण देवी देवता(३३कोटि )ने भी यही सोचा की जब कृष्ण गाय में निवास करेंगे तो हमभी गाय में ही निवास करेंगेश्री हरी विष्णु को गाय में निवासकरता देखकर माता लक्ष्मी नेभी गायसे विनती की की उन्हें भी अपने शारीर में स्थान दे गौ माता..गाय नेकहा की मेरे पास कोई जगह नही बची आप मेरे गोबर में निवास करलें ,इसी वजह से जब लक्ष्मी जी कि पूजा होती है तो गोबर का लेपलगाया जाता है. जब गंगा मैया ने देखा कि भगवन शिव भी गाय में निवास करने लगेतो उन्होंने भी पनाह मांगी गौ माता से .गौ माता ने उन्हें मूत्र में स्थानदे दिया , यही वजह है कि गौ मूत्र इतना पावन मन जाता है औररोगों और तमाम असाध्य व्याधियों का उपचार कर देता है यहगौ मूत्र .भोपाल गैस त्रासदी के बाद लाखो लोग मरे किन्तु वही एकबस्ती थी जहाँ के लोग स्वस्थ थे ,कारण यह थाकि हर घर पर गाय केगोबर का लेप लगा था और पूरी बस्ती मेंश्यामा तुलसी जी का पौधा बहुतायत संख्या में थाप्राचीन काल में लोग घर में घुसनेसे पहले हाथ पैर धोकर घर के बाहरबने गोबर के लेप पर पैर रखकर अन्दर आते थे जिससे कीटाणु अन्दरन आयेआज अचानक मैं यह मुद्दा लेकर क्यूँ उठ गया तो सुनिए -देश में प्रतिदिन हजारों कि संख्या में गाय मारी जा रही हैं ख़ास तौरपर वो गाय जो दुधारू नही रहीं , स्वयं कई ग्वाले या आम लोग गायको कसाइयों को बेच आते हैं, यहाँ गौर करने लायक बात यह है कि गायके दूध से ज्यादा उसका मूत्र और गोबर कीमती है , गाय का दूध ३०रुपये लीटर और गौमूत्र को अगर फिल्टर कर दें तो वो ६० से लेकर१५० रुपये लीटर तक बिक जाता है , गाय का गोबर , इससे अच्छी खादकोई भी नही.. हम रासायनिक खादों का प्रयोग करते हैं और बीमारपड़ते हैं और बीमार पड़ने पर अंग्रेजी दवा यानी कि खाद में भी अंग्रेजकमाए और उनकी खाद से जो बिमारी हो उसके इलाजका पैसा वो भी अंग्रेज कमाए. इसी निति के तहत अंग्रेजों ने भारत मेंगौ वध शाला बहुत संख्या में खुलवाई और अपेक्षा कृत कम पढ़े लिखेमुस्लिमों को येसिखा दिया कि गाय का मांस बेचनेपर उन्हें बहुत कमाईहोगीआज इन मुस्लिमों को खुद नही पता कि जिस गाय को वो मारकर बेचरहे हैं उस गाय को जिन्दा रखकर उसकी अल्प सेवा करके उसके मूत्रऔर गोबर से वो कितना कमा सकते हैं .यही हाल हिन्दू का है उन्हें भी नही पता कि गाय अगर दुधारू नही तबभी वो उसके मूत्र और गोबर से बहुत कमा सकते हैं ,इतना कमा सकतेहैं जितना उस गाय को बेचने पर कभी नही कमा सकतेदेश में रोजगार कि कमी नही ..कमी हैसोच की .अगर हम गौ पालन करें तो उसके मूत्र को प्युरीफाइड करनेकी विधि भी बहुत सरल है और इस मूत्र को हम स्वयं खुले बाजार मेंबेच सकते हैं अच्छे दाम पर या फिर कई दवाई कम्पनियाँ हमसे खरीदसकती हैं ये मूत्र.गाय की गोबर की खाद को हम अच्छे दाम में बेच सकते हैं और स्वस्थभारत के निर्माण में एक छोटा सा ही सही योगदान कर सकते हैंजो लोग वास्तु शास्त्र में यकीं रखते हैं उनको भी बता दूँ की गाय जिसघर में हो उस घर में कितने भी वास्तु दोष हों वो घर सदैवफलता फूलता ही रहता है ,गाय सभी वास्तु दोषों का अकेले निवारण करदेती है.इस प्रकार गौ पालन एक ऐसी विधा है जिससे रोजगार ,धर्म ,देश औरसमाज कल्याण और साथ ही आत्म निर्भरता के लिए कई रास्ते खुलतेहैंवन्दे गौ मातरम...............
शुक्रवार, 11 अक्टूबर 2013
!! गौरक्षा भी राष्ट्र रक्षा है !!
आप भारतीय है तो समझिए कि गाय हमारी माता है। गो दुग्ध स्वास्थ्य सुख दाता है।
आप किसान है तो कृषि गोरक्ष वाणिज्यं के अनुसार काम किजीए।
आप व्यवसायी है तो अर्थव्यवस्था का आधारभूत गाय को बचाने के लिए धन दीजिए।
आप सरकारी या गैर सरकारी कर्मचारी है तो साथ काम आने वाले को गाय का महत्व समझाइए।
आप विचारक हैं तो बुद्धि-बल तेज बढ़ाने के लिए गौ दुग्ध पीजिए।
आप संत-महन्त हैं तो गौ दुग्ध का ही भोग लगाइए।
आप भी प्रेमी है तो कत्ल को जाने से रोकी गई गायों को सम्भालिएं।
आप पुलिस है तो कानून की अवहेलना कर गाय-बैलों को कत्लखाने पहंचाने वालों को पकडिये।
आप वकील है तो पशु व्यापारियों के चंगुल से गाय-बैल छुड़ाने वाले लोगों का उत्साह बनाए रखने के लिए निःशुल्क मुकदमा लडिये।
आप न्यायाधीश है तो संवीधान द्वारा सुरक्षित गाय को मारने ले जाने वाले को अपराधी मानकर दण्डित कीजिए।
आप पशु व्यापारी है तो देश की अपार संपदा को नष्ट करने वाले गो व्यापार बन्द कीजिए।
आप कसाई है तो गाय पर छुरी चलाकर राष्ट्रघात मत कीजिए।
आप लेखक है तो गाय के आर्थिक, सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करने वाली रचना कीजिए।
आप पत्रकार हैतो गाय के संबंधित समाचारों को प्रमुखता दीजिए।
आप संवेदनशील है तो अपना मर्यादित आत्मभाव पीडितों तक पहचाने के लिए गौसेवा कीजिए।
आप चिन्तक है तो लोगों के चित्त-चरित्र को प्रभावित कीजिए जिससे गौरक्षा मूलक, स्थानीय उद्योग प्रधान लोकशिक्षण परिणाम दिखाए और 21 वीं सदी रोशन हो जाए।केवल भारतीय गाय के दूध-घी का उपयोग करना चाहिए।
जब यज्ञ करें तो भारतीय गाय के घी का ही उपयोग करें ।
माताएं बहने व भाई पंचगव्य से बनी हुई सौन्दर्य प्रसाधन एवं अन्य सामग्री का ही उपयोग करें।
राष्ट्र- एवं स्वहित में गौरक्षा। क्या इनमे से आप कोई भी एक उपाय अपना सकते है ?
देश हित में....
आप किसान है तो कृषि गोरक्ष वाणिज्यं के अनुसार काम किजीए।
आप व्यवसायी है तो अर्थव्यवस्था का आधारभूत गाय को बचाने के लिए धन दीजिए।
आप सरकारी या गैर सरकारी कर्मचारी है तो साथ काम आने वाले को गाय का महत्व समझाइए।
आप विचारक हैं तो बुद्धि-बल तेज बढ़ाने के लिए गौ दुग्ध पीजिए।
आप संत-महन्त हैं तो गौ दुग्ध का ही भोग लगाइए।
आप भी प्रेमी है तो कत्ल को जाने से रोकी गई गायों को सम्भालिएं।
आप पुलिस है तो कानून की अवहेलना कर गाय-बैलों को कत्लखाने पहंचाने वालों को पकडिये।
आप वकील है तो पशु व्यापारियों के चंगुल से गाय-बैल छुड़ाने वाले लोगों का उत्साह बनाए रखने के लिए निःशुल्क मुकदमा लडिये।
आप न्यायाधीश है तो संवीधान द्वारा सुरक्षित गाय को मारने ले जाने वाले को अपराधी मानकर दण्डित कीजिए।
आप पशु व्यापारी है तो देश की अपार संपदा को नष्ट करने वाले गो व्यापार बन्द कीजिए।
आप कसाई है तो गाय पर छुरी चलाकर राष्ट्रघात मत कीजिए।
आप लेखक है तो गाय के आर्थिक, सांस्कृतिक पक्ष को उजागर करने वाली रचना कीजिए।
आप पत्रकार हैतो गाय के संबंधित समाचारों को प्रमुखता दीजिए।
आप संवेदनशील है तो अपना मर्यादित आत्मभाव पीडितों तक पहचाने के लिए गौसेवा कीजिए।
आप चिन्तक है तो लोगों के चित्त-चरित्र को प्रभावित कीजिए जिससे गौरक्षा मूलक, स्थानीय उद्योग प्रधान लोकशिक्षण परिणाम दिखाए और 21 वीं सदी रोशन हो जाए।केवल भारतीय गाय के दूध-घी का उपयोग करना चाहिए।
जब यज्ञ करें तो भारतीय गाय के घी का ही उपयोग करें ।
माताएं बहने व भाई पंचगव्य से बनी हुई सौन्दर्य प्रसाधन एवं अन्य सामग्री का ही उपयोग करें।
राष्ट्र- एवं स्वहित में गौरक्षा। क्या इनमे से आप कोई भी एक उपाय अपना सकते है ?
देश हित में....
सोमवार, 7 अक्टूबर 2013
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