मंगलवार, 15 अक्टूबर 2013

गौ माता का इतिहास


लगभग 5100 वर्ष पूर्व महाराजाधिराज श्रीकृष्णचन्द्रजी ने वैर भाव से भजने वाले जरासन्ध की कामना पूरी करने के उद्देश्य से मथुरा का त्याग किया था। अपने सहचर व परिकर सभी राजपुरूषों का निवास राजधानी में ही रखा गया था। परन्तु भगवान श्रीकृष्ण की प्राण स्वरूपा गायें व गोपालकों के लिए तो समुद्र के मध्य कोई स्थान नहीं था। ऐसी स्थिति में गायें तथा गोपालकों से भगवान दूर हो गये। अपने को निराश्रित मानकर भगवान श्रीकृष्ण जिस दिशा से पधारे थे उसी दिशा में गायें तथा गोपालक भी बड़ी दयनीय तथा दुःखी अवस्था में चल पड़े। कई दिन निराश्रित तथा वियोग की पीड़ा सहने के बाद भगवान श्रीकृष्ण के दर्शन गायों तथा गोपालकों के लिए एक महान केर तथा जाल के जंगलों में सामने आते हुए हुआ।

भगवान श्रीकृश्ण के दर्शन कर गाय व गोपालक इतने आनन्द विभोर हो गए कि उनकों रात दिन का भी ध्यान नहीं रहा। इसी प्रकार तीन दिन बीत गये, तब उद्धव जी ने उनको याद दिलाया कि गोवंश तथा गोपालकों की देख-रेख तथा सेवा कार्य अनिरूद्ध को ही सौंपा जावे। आपके अन्य धर्म कार्य अधूरे पड़े है, उनको गति प्रदान करने के लिए कृपया आप इस भावावस्था से उतरिये। तब भगवान श्रीकृष्ण ने कहा कि भैया इस पवित्र भूमि पर जब मैंने गायों व गोपालको को देखा तो ऐसे महान आनंद की अनुभूति हुई कि मुझे दिन रात का ध्यान ही नहीं रहा। ऐसा आनंद वृदांवन में भी प्राप्त नहीं हुआ था। वास्तव में यहाँ तो आनन्द ही आनन्द है। यह वन ही आनंद का है। यहाँ आनंद के अतिरिक्त दूसरा कुछ नही यह आनंदवन है। इस प्रकार इस भूमि का नाम आनंदवन पड़ा था। अब पुनः इस भूमि को आनंदवन नाम का सम्बोधन प्राप्त हुआ है। भगवान श्रीकृष्ण की आज्ञा अनुसार प्रधुम्न के पुत्र अनिरूद्ध ने आनंदवन को केन्द्र बनाकर, मारवाड़, काठीयाबाड़, थारपारकर अर्थात मेवाड़ से लेकर गिरनार तक सिन्धु नदी, सरस्वती नदी तथा बनास नदी के किनारे गोपालकों तथा गोवंश को लेकर विकेन्द्रित कर दिया, जहाँ विस्तृत चारागाह थे। हजारों कोसों में गोचर ही गोचर पड़ा था। गोपालकों ने इन नदियों के किनारे गोसंरक्षण,गोपालन एवं गोसंवर्धन का महान कार्य प्रारम्भ किया। सुरभि, नन्दिनी व कामधेनु की संतान पुनःभगवान श्रीकृष्ण का सानिध्य पाकर निर्भय व सन्तुष्ट हो गई। दोनों तरफ सिन्धु तथा बनास नदियों का प्रवाह, भूगर्भ में सरस्वती तथा पश्चिम में अथाह समुद्र, इसके बीच में सहस्रों योजन गोचर भूमि जहाँ सेवण, भुरट, कुरी, झेरण, भरकड़ी गाठीया आदि विपुल मात्रा में प्राकृतिक घास तथा गेहूँ, बाजरा, ज्वार, मक्का, जौ, मोठ, मूंग, मतीरा आदि की मौसमी पैदावार से गायों व गोपालक किसानों की सम्पूर्ण आवश्यकता सहज ही पूरी हो जाती थी। इन गायों में से भगवान श्रीकृष्ण एक लाख गायों का दान अन्य गोपालक राजा व ब्राह्मणों को दिया करते थे।

भगवान श्रीकृष्ण के इस धरा धरती से तिरोहित होने पर नाना प्रकार के प्राकृतिक उपद्रव हुए। वायु तथा अग्नि ने अपनी मर्यादा का त्याग कर दिया। परिणाम स्वरूप समुद्र के मध्य स्थापित द्वारकापुरी तथा सिन्धु व बनास के मध्य समुद्र के किनारे पर सम्पूर्ण गोचर जलमग्न हो गया। इसके बाद लगभग दो हजार वर्ष बाद पुनः इसी भूमि पर गोसंरक्षण, गोसंवर्धन का पुनीत कार्य श्रीकृष्ण के वंशज तथा ब्राह्मणों द्वारा प्रारम्भ हुआ। थार में भाटी व सोढ़ा राजपूतों ने मारवाड़ में राजपुरोहितों तथा चैधरियों ने और काठीयावाड़ में अहीर, भरवाड़, कच्छी तथा पटेलों सहित विभिन्न गोपालक किसानों ने प्रति परिवार हजारों लाखों की संख्या में गोसंरक्षण गोपालन व गोसंवर्धन के महत्वशाली कार्य को विराट रूप प्रदान किया।
गावो विश्वस्य मातरः

आज भारत वर्ष मे ही नहीं पूरे विश्व मे सभी मानव सुखी है पर जीव मात्र की माता कहलाने का अधिकार रखने वाली वेदों द्वारा पूज्यनीय, देवताओं को भी भोग और मोक्ष प्रदान करने की शक्ति रखने वाली गौ माता आज सड़कों पर मल, गन्दगी, प्लास्टिक खाने को मजबूर है |

भगवान श्री कृष्ण की कृपा से आज भी भारत वर्ष मे ही नहीं पूरे विश्व मे कुछ ऐसे पुण्यवान, भामाशाह और अपनी माँ के कोख को धन्य करने वाले गौ भक्त भी है, जिनके सहयोग से आज भी लाखो गौवंश गौशालाओं मे, किसानों के यहाँ, अपने घर पर ही सुरक्षित है | क्या ये गौभक्त, जिनकी वजह से पूरी सृष्टी का संतुलन बना हुआ है, आगे भी इसी प्रकार गौ – सेवा में संलग्न रह सकेंगे ?

शेष मानव जाति को जिनको परमात्मा ने सोचने के लिए बुद्धि दे रखी है का भी कर्तव्य बनता है कि इस गो संवर्धन को उठाने मे, इस राम सेतु को बनाने मे ग्वाल -बालो एवं गिलहरी की तरह थोडा – थोडा यथा योग्य योगदान दे | जब हम थोडा-थोडा योगदान देंगे तो हम सभी गौभक्तों के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं रहेगा |

शास्त्र कहता है — गौ भक्त जिस-जिस वस्तु की इच्छा करता है वह सब उसे प्राप्त होती है | स्त्रियों मे भी जो गौओं की भक्त है, वे मनोवांछित कामनाएं प्राप्त कर लेती है | पुत्रार्थी पुत्र पाता है, कन्यार्थी कन्या, धनार्थी धन, धर्मार्थी धर्म, विद्यार्थी विद्या और सुखार्थी सुख पा जाता है | विश्व भर मे कही भी गौभक्त को कुछ भी दुर्लभ नहीं है | यहाँ तक की मोक्ष भी बिना गाय के पूंछ पकडे संभव नहीं | वैतरणी पर यमराज एवं उसके गण भयभीत होकर गाय के पूंछ पकडे जीव को प्रणाम करते है |

देवताओं और दानवो के द्वारा समुद्र मंथन के वक्त ५ गायें उत्पन्न हुई, इनका नाम था- नंदा, सुभद्रा, सुरभि, सुशीला और बहुला | ये सभी गायें भगवान की आज्ञा से देवताओं और दानवों ने महर्षि जमदग्नि, भारद्वाज, वशिष्ट, असित और गौतम मुनि को समर्पित कर दीं | आज जितने भी देशी गौवंश भारत एवं इतर देशो मे है, वह सब इन्ही ५ गौओं की संताने है और हमारे पूर्वजो एवं ऋषियों का यह महाधन है | क्या हम सिर्फ गोत्र बताने के लिए ही अपने ऋषियों की संताने हैं? उनकी सम्पति गौ धन को बचाना हमारा कर्तव्य नहीं |

आज भारत वर्ष मे ही करोड़ों लोग सुबह – शाम देवालयों मे माथा टेक कर भगवान से मनोकामनाएँ मांगते है, पर इन मे से लाखों लोगो को यह तक भी मालूम नहीं है की जिस देवता से वे याचना कर रहे है उन्हें कुछ भी दे देने की शक्ति तभी आएगी जब हवन द्वारा अग्नि के मुख से देवताओं तक शुद्ध गौ घृत पहुंचेगा | जब हम हवन में गाय के घी से मिश्रित चरू देवताओं को अर्पण करते है | उस उत्तम हविष्य से देवता बलिष्ट एवं पुष्ट होते है | जब देवता शक्तिशाली होगा तभी अपनी शक्ती के बल पर आपकी-हमारी मनोकामनाएं पूरी करने मे समर्थ होंगे | पर जब गौवंश ही नहीं रहेगा तो शुद्ध गौ घृत कहा से आएगा? और शुद्ध गौ घृत नहीं होगा तो हवन कहा से होगा? और हवन नहीं होंगे तो देवता पुष्ट कैसे होंगे? और देवता पुष्ट नहीं होंगे तो शक्तिहीन देवता मनोकामनाएं पूर्ण कैसे करेँगे ? आज हम लोग पेड़ लगा देते है पानी खाद नहीं डालेंगे तो फल कहा से लगेंगे? यह प्रकृति के नियम के विरुद्ध है |

आज जितने भी कथाएं होती है, यज्ञ, अनुष्टान होते हैं, जप-तप होते है उनमें नाम-जप का कुछ प्रभाव पड़ता हो पर अंत मे जो यज्ञ होता है वह सफल कितने होते है यह राम को ही मालूम | क्योंकि इन यज्ञों मे शुद्ध गौ घृत का उपयोग नहीं के बराबर होता है | आज भारत वर्ष मे पूर्व की अपेक्षा यज्ञ, धर्म, कर्म अधिक हो रहे है पर फल नहीं मिलता, यज्ञ सफल नहीं होते, क्या कारण है? इसके मूल मे यही है की जिस धरती पर गौ, ब्राहमण, साधू-संत, स्त्री दुखी होते है वहां पर पुण्य कर्म फल नहीं देते |

कृषि प्रधान अर्थव्यवस्था में गाय की भूमिका



भारतीय संस्कृति में गाय का महत्व, गायत्री गंगा और गीता से भी बढ़कर है, क्योंकि गायत्री की साधना में कठिन तपस्या अपेक्षित हैं, गंगा के सेवन के लिये भी कुछ त्याग करना ही पड़ता है और गीता को जितनी बार पढ़ोगे उसमें हर बार कुछ न कुछ नया मिलता है, जिसका रहस्य समझना कठिन है, लेकिन गौ का लाभ तो घर बैठे ही मिल जाता है। वेदों का कथन है कि यदि किसी को इस माया राज्य में सब प्रकार का वैभव प्राप्त करना है तो गौ माता की प्रमुख रूप से सेवा करें। यहाँ प्रश्न पैदा होता है कि गौ की महिमा का शास्त्रों में जो वर्णन है, क्या उसे सत्य माना जा सकता है ?

इस प्रश्न का समाधान है कि शास्त्र कभी झूठ नहीं बोलते। निश्चय ही गाय से सब प्रकार के वैभव प्राप्त होते हैं। जो एक गाय न्यून से न्यून दो सेर दूध देती हैं और दूसरी बीस सेर तो प्रत्येक गाय के ग्यारह सेर दूध होने में कोई शंका नहीं। इस हिसाब से एक मास में सवा आठ मन दूध होता है। एक गाय कम से कम छह महीने और दूसरी गाय अधिक से अधिक 18 महीने तक दूध देती है, तो दोनों का मध्य भाग प्रत्येक गाय का दूध देने में बारह महीने होते हैं। इस हिसाब से 12 महीनों का दूध 99 मन होता है। इतने दूध को औटकर प्रति सेर में एक छटाँक चावल और डेढ़ छटाँक चीनी डालकर खीर बनाकर खाये तो प्रत्येक पुरुष के लिये दो सेर दूध की खीर पुष्कल होती है, क्योंकि यह भी एक मध्य भाग की गिनती होती है। अर्थात् कोई भी 2 सेर दूध की खीर से अधिक खाये और कोई न्यून। इस हिसाब से एक प्रसूता गाय के दूध से एक हजार 980 मनुष्य एक बार तृप्त हो सकते हैं। गाय न्यून से न्यून आठ और अधिक से अधिक 18 बार ब्याती है, इसका मध्य भाग 13 बार आया तो 25740 मनुष्य एक गाय के जन्म भर के दूध मात्र के एक बार तृप्त हो सकते हैं। इस गाय की छ: पीढ़ी में छ: बछिया और सात बछड़े हुए इनमें से एक की मृत्यु रोगादि से होना संभव है तो भी बारह रहे। उन छह बछियों के दूध मात्र से उक्त प्रकार एक लाख चौवन हजार 440 मनुष्यों का पालन हो सकता है। अब रहे छ: बैल, उनमें से एक जोड़ी दोनों साख में 200 मन अन्न उत्पन्न कर सकती हैं। इस प्रकार तीन जोड़ी बैलों की 600 मन अन्न उत्पन्न कर सकती हैं और उनके कार्य का मध्य भाग आठ वर्ष है। इस हिसाब से 4800 मन अन्न उत्पन्न करने की शक्ति एक जन्म में तीनों की है। इतने (4800 मन) अन्न से प्रत्येक मनुष्य को 3 पाव अन्न भोजन मिले तो 2,56,000 मनुष्यों का एक बार का भोजन होता है। दूध और अन्न को मिलाकर देखने से निश्चय है कि 4,10,440 मनुष्यों का पालन एक बार के भोजन से होता है। अब छ: गाय की पीढ़ी-दर-पीढ़ियों का हिसाब लगाकर देखा जाये तो असंख्य मनुष्यों का पालन हो सकता है

अर्थ व्यवस्था में गाय की भूमिका

indian-currency हमारे ८०% लोग कृषि पर निर्भर है । इनमें से ९५% पशु आधारित खेती पर निर्भर हैं ।
भारत में सर्वाधिक दूध होता है ।
बैलगाड़ियों द्वारा ढोया जाने वाले सामान रेलगाड़ियों से ४-५ गुणा अधिक होता है । इससे विदेशी मुद्रा की उल्लेखनीय बचत होती है । उदाहरणार्थ वर्ष २००५ में ५०,००० करोड़ रू. का परिवहन बैलगाड़ियों द्वारा हुआ ।
गो आधारित उद्योगों के विस्तार से हमारी अर्थ व्यवस्था में गाय की महत्वपूर्ण भूमिका हो जायेगी । यह दुःख का विषय है कि इसका पहले से ही महत्वपूर्ण स्थान हमारे लोग नहीं पहचानते ।

हिन्दू संस्कृति में गौमाता


गाय निर्बल दीन हीन जीवों का प्रतिनिधित्व करती है, सरलता, शुद्धता, और सात्विकता की मूर्ति है। गौ माता की पीठ में ब्रह्मा, गले में विष्णु और मुख में रुद्र निवास करते हैं, मध्य भाग में सभी देवगण और रोम रोम में सभी 'महर्षि' बसते हैं। श्रीकृष्ण को हम गोपाल कृष्ण, गोविंद कहते हैं। गाय पृथ्वी, ब्राह्मण और देव की प्रतीक है। गौ रक्षा और गौ संवर्धन हिंदुओं के आवश्यक कर्तव्य माने जाते हैं। सभी दानों में 'गोदान' का महत्त्व सर्वाधिक माना जाता है।
हिन्दू संस्कृति के अनुसार जिस घर में गाय निवास करती हैं एवं जहाँ गौ सेवा होती है, उस घर से समस्त समस्याएँ कोसों दूर रहती हैं। भारतीय संस्कृति के अनुसार गाय को अपनी माता के समान संम्मान दिया जाता हैं इस लिये गाय को गौ-माता कहकर पुकारते हैं।

गौमाता --औषधीय गुणकारी


गाय का दूध अमृत के समान है, गाय से प्राप्त दूध, घी, मक्खन से मानव शरीर पुष्ट बनता है।
गाय के गोबर का प्रयोग चुल्हें बनाने, आंगन लिपने एवं मंगल कार्यो में लिया जाता है, और यहाँ तक की गाय के मूत्र से भी विभिन्न प्रकार की दवाइयाँ बनाई जाती है, गाय के मूत्र में कैंसर, टीवी जैसे गंभीर रोगों से लड़ने की क्षमता होती हैं, जिसे वैज्ञानिक भी मान चुके है, तथा गौ-मूत्र के सेवन करने से पेट के सभी विकार दूर होते हैं।
भारतीय संस्कृति के अनुसार गाय ही ऐसा प्राणी है, जो सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान है।
ज्योतिष शास्त्र में भी नव ग्रहों के अशुभ प्रभाव से मुक्ति पाने के लिये गाय का ही वर्णन किया गया हैं।
यदि बच्चे को बचपन में गाय का दूध पिलाया जाए तो बच्चे की बुद्धि कुशाग्र होती है।
गाय की सेवा से भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं।
हाथ-पांव में जलन होने पर गाय के घी से मालिश करने पर आराम मिलेगा।
शराब, गांजे या भांग का नशा ज़्यादा हो जाय तो गाय का घी में दो तोला चीनी मिलाकर देने में 15 मिनट में नशा कम हो जायेगा।
जल जाने वाले स्थान या घाव को पानी से धोकर गाय का घी लगाने से फफोले कम हो जाते हैं और जलन कम हो जाती है।
बच्चों को सर्दी या कफ की शिकायत हो जाये तो गाय के घी से छाती और पीठ पर मालिश करने से तुरन्त आराम मिलता है
किसी मनुष्य को अगर हिचकी आये तो उसे रोकने के लिये आधा चम्मच गाय का घी पिलाने से हिचकी रुक जाती है।
यदि किसी मनुष्य को सर्प काट जाये तो उसे 70 या 150 ग्राम गाय का ताजा घी पिलाकर 40-50 मिनट बाद जितना गर्म पानी पी सकें, पिलायें। इसके बाद उल्टी-दस्त होंगे, इसके बाद विष का प्रभाव कम होने लगेगा।[1]

गौमाता --- वैज्ञानिक महत्त्व

गाय एकमात्र ऐसा प्राणी है, जो ऑक्सीजन ग्रहण करता है और ऑक्सीजन ही छोड़ता है।
गाय के मूत्र में पोटेशियम, सोडियम, नाइट्रोजन, फास्फेट, यूरिया, यूरिक एसिड होता है, दूध देते समय गाय के मूत्र में लेक्टोज की वृद्धि होती है। जो हृदय रोगों के लिए लाभकारी है।
गाय का दूध फैट रहित परंतु शक्तिशाली होता है उसे पीने से मोटापा नहीं बढ़ता तथा स्त्रियों के प्रदर रोग आदि में लाभ होता है। गाय के गोबर के कंडे से धुआं करने पर कीटाणु, मच्छर आदि भाग जाते हैं तथा दुर्गंध का नाश होता है।
गाय के समीप जाने से ही संक्रामक रोग कफ सर्दी, खांसी, जुकाम का नाश हो जाता है। गौमूत्र रोज़ सुबह ख़ाली पेट सेवन करने से कैंसर जैसा रोग भी नष्ट हो जाता है।
गाय के सींग गाय के रक्षा कवच होते हैं। गाय को इसके द्वारा सीधे तौर पर प्राकृतिक ऊर्जा मिलती है। यह एक प्रकार से गाय को ईश्वर द्वारा प्रदत्त एंटीना उपकरण है।
गाय की मृत्यु के 45 साल बाद तक भी यह सुरक्षित बने रहते हैं। गाय की मृत्यु के बाद उसके सींग का उपयोग श्रेठ गुणवत्ता की खाद बनाने के लिए प्राचीन समय से होता आ रहा है।
गाय के गोबर में विटामिन बी-12 प्रचुर मात्रा में पाया जाता है। यह रेडियोधर्मिता को भी सोख लेता है। हिंदुओं के हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश उनकी माता पार्वती को गाय के गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है।

गौमाता ------ पर्यावरण


गाय की उपस्थिति का पर्यावरण के लिए एक महत्त्वपूर्ण योगदान है, प्राचीन ग्रंथ बताते हैं कि गाय की पीठ पर के सूर्यकेतु स्नायु हानिकारक विकिरण को रोक कर वातावरण को स्वच्छ बनाते हैं।

गौमाता ----- कृषि


कृषि में गाय के गोबर की खाद्य, औषधि और उद्योगों से पर्यावरण में काफ़ी सुधार है। जुताई करते समय गिरने वाले गोबर और गौमूत्र से भूमि में स्वतः खाद डलती जाती है। प्रकृति के 99% कीट प्रणाली के लिये लाभ दायक है, गौमूत्र या खमीर हुए छाछ से बने कीटनाशक इन सहायक कीटों को प्रभावित नहीं करते एक गाय का गोबर 7 एकड़ भूमि को खाद और मूत्र 100 एकड़ भूमि की फसल को कीटों से बचा सकता है।