मंगलवार, 5 जुलाई 2016

हिन्दू धर्म मे मनुष्य के जीवन मे सोलह संस्कारो मे जानीये -देशी गाय का महत्व

हिन्दू धर्म मे मनुष्य के जीवन मे सोलह संस्कारो मे जानीये -देशी गाय का महत्व

शास्त्रों के अनुसार मनुष्य जीवन के लिए कुछ आवश्यक नियम बनाए गए हैं जिनका पालन करना हमारे लिए आवश्यक माना गया है। मनुष्य जीवन में हर व्यक्ति को अनिवार्य रूप से सोलह संस्कारों का पालन करना चाहिए। यह संस्कार व्यक्ति के जन्म से मृत्यु तक अलग-अलग समय पर किए जाते हैं।

प्राचीन काल से इन सोलह संस्कारों के निर्वहन की परंपरा चली आ रही है। हर संस्कार का अपना अलग महत्व है। जो व्यक्ति इन सोलह संस्कारों का निर्वहन नहीं करता है उसका जीवन अधूरा ही माना जाता है।

      "सोलह संस्कार "

1▪गर्भाधान संस्कार  – यह ऐसा संस्कार है जिससे हमें योग्य, गुणवान और आदर्श संतान प्राप्त होती है। मनचाही संतान प्राप्त के लिए गौ माता को साक्षी मान ,गौ माता की पुजा कर, गौमाता से प्रार्थना कर गर्भधारण संस्कार किया जाता है। इसी संस्कार से वंश वृद्धि होती है।
2▪पुंसवन संस्कार  – गर्भस्थ शिशु के बौद्धिक और मानसिक विकास के लिए यह संस्कार किया जाता है।जब बच्चा मां के गर्भ मे होता है। तो बच्चे की मां को गाय का घी दुध दही पंचगंतव्य का सेवन करने से बच्चे का मानसिक बोध्दिकता का विकाश होता है।इस संस्कार के प्रमुख लाभ ये है कि इससे स्वस्थ, सुंदर गुणवान संतान की प्राप्ति होती है।
3▪सीमन्तोन्नयन संस्कार  – यह संस्कार गर्भ के चौथे, छठवें और आठवें महीने में किया जाता है। इस समय गर्भ में पल रहा बच्चा सीखने के काबिल हो जाता है। उसमें अच्छे गुण, स्वभाव और कर्म का ज्ञान आए, इसके लिए मां को गौ कथा , गौ माता से जुडी अच्छी बाते कहनी तथा सुननी चाहिये, उसी प्रकार आचार-विचार, रहन-सहन और व्यवहार करती है।
4▪जातकर्म संस्कार  – बालक का जन्म होते ही इस संस्कार को करने से शिशु के कई प्रकार के दोष दूर होते हैं। इसके अंतर्गत शिशु को गाय के दुध की बुंद शहद और घी चटाया जाता है साथ ही वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया जाता है ताकि बच्चा स्वस्थ और दीर्घायु हो।
5▪नामकरण संस्कार - शिशु के जन्म के बाद 11वें दिन नामकरण संस्कार किया जाता है। ब्राह्मण द्वारा ज्योतिष शास्त्र के अनुसार गाय की गौष्ठ मे गाय के सामने बेठकर बच्चे का नाम तय किया जाता है।
6▪निष्क्रमण संस्कार   – निष्क्रमण का अर्थ है बाहर निकालना। जन्म के चौथे महीने में यह संस्कार किया जाता है। बच्चे को बाहर निकालने के समय प्रथम गौ पुजा कर गौचरणो की रज बालक को तिलक के रूप मे लगाई जाती है। जीससे बालक तेजस्वी बन जीवन मे विजयश्री पाता है।साथ ही कामना करते हैं कि शिशु दीर्घायु रहे और स्वस्थ रहे।
7▪अन्नप्राशन संस्कार  – यह संस्कार बच्चे के दांत निकलने के समय अर्थात 6-7 महीने की उम्र में किया जाता इस संस्कार मे बच्चे को गाय के घी दुध से बना पंचामृत खिलाया जाता है। जीससे दात जल्दी है। इस संस्कार के बाद बच्चे को अन्न खिलाने की शुरुआत हो जाती है।
8▪मुंडन संस्कार - जब शिशु की आयु एक वर्ष हो जाती है तब या तीन वर्ष की आयु में या पांचवे या सातवे वर्ष की आयु में बच्चे के बाल उतारकर बालक के सर पर गाय के गोबर का लेप लगाया जाता है। जीससे बाल जल्दी आते है।ओर सर मे होने वाले रोगो को बचाता है इस संस्कार से बच्चे का सिर मजबूत होता है तथा बुद्धि तेज होती है। साथ ही शिशु के बालों में चिपके कीटाणु नष्ट होते हैं जिससे शिशु को स्वास्थ्य लाभ प्राप्त होता है।
9▪विद्या आरंभ संस्कार- इस के आरंभ से बालक को गाय के गोबर से लीपे आगंन पर बिठा कर पंच गौ द्रव्य खीलाकर गौ सेवा संस्कार के माध्यम से शिशु को उचित शिक्षा दी जाती है। शिशु को शिक्षा के प्रारंभिक स्तर से परिचित कराया जाता है।
10▪कर्णवेध संस्कार –   इस संस्कार में कान की बुटो पर गाय का गोबर लगाकर  कान छेदे जाते है । इसके दो कारण हैं, एक- आभूषण पहनने के लिए। दूसरा- कान छेदने से एक्यूपंक्चर होता है। इससे मस्तिष्क तक जाने वाली नसों में रक्त का प्रवाह ठीक होता है। इससे श्रवण शक्ति बढ़ती है और कई रोगों की रोकथाम हो जाती है।ओर कान छेदने के बाद भी नित्य बुटो पर गाय का गोबर लगाने से कान पकने से रोकता है।
11▪उपनयन यज्ञोपवित संस्कार (– इस संस्कार मे बालक को गौ माता को साक्षी मानकर, गौमाता के दुध घी से बने गौद्रव्यो का सेवन कर   उप याने ओर नयन याने आख तीसरी आख या विद्याअर्जन , उप यानी पास और नयन यानी ले जाना। गुरु के पास ले जाने का अर्थ है उपनयन संस्कार। आज भी यह परंपरा है। जनेऊ यानि यज्ञोपवित में तीन सूत्र होते हैं। ये तीन देवता- ब्रह्मा, विष्णु, महेश के प्रतीक हैं। इस संस्कार से शिशु को बल, ऊर्जा और तेज प्राप्त होता है।
12▪वेदारंभ संस्कार  – इसके अंतर्गत व्यक्ति को वेदों का ज्ञान दिया जाता है।गौ सेवा ही सभी वैदो का सार है
13▪केशांत संस्कार  – केशांत संस्कार अर्थ है केश यानी बालों का अंत करना, उन्हें समाप्त करना। विद्या अध्ययन से पूर्व भी केशांत किया जाता है। मान्यता है गर्भ से बाहर आने के बाद बालक के सिर पर माता-पिता के दिए बाल ही रहते हैं। इन्हें काटने से शुद्धि होती है। शिक्षा प्राप्ति के पहले शुद्धि जरूरी है, ताकि मस्तिष्क ठीक दिशा में काम करें। पुराने में गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद केशांत संस्कार कर सर पर मोठी शिखा रखी जाती है। ओर सर पर गौमाता के पेरो की मीट्टी का लेप लगाया जाता है।
14▪समावर्तन संस्कार   - समावर्तन संस्कार अर्थ है फिर से लौटना। आश्रम या गुरुकुल से शिक्षा प्राप्ति के बाद व्यक्ति को फिर से समाज में लाने के लिए यह संस्कार किया जाता था। इसका आशय है ब्रह्मचारी व्यक्ति को मनोवैज्ञानिक रूप से जीवन के संघर्षों के लिए तैयार किया जाना।जीसमे विद्धयाअर्जन कर बालक को अपने गुरू को दक्षिणा मे  गौदान करना आवश्यक होता है।ओर जीवन भर गौवंशो की सेवा का संकल्प दिया जाता है।
15▪विवाह संस्कार  – यह धर्म का साधन है। विवाह संस्कार सर्वाधिक महत्वपूर्ण संस्कार माना जाता है। इसके अंतर्गत वर और वधू दोनों साथ रहकर धर्म के पालन का संकल्प लेते हुए विवाह करते हैं। विवाह के द्वारा सृष्टि के विकास में योगदान दिया जाता है। इसी संस्कार से व्यक्ति पितृऋण से मुक्त होता है।इस संस्कार मे विवाह के पुर्व हल्दी रस्म पर ब्रह्रामण द्वारा गाय के गोबर का चोका लगाकर वर वधु को पाट पर बिठाया जाता है। ओर गौदुध का प्रक्षालन किया जाता है।ओर प्ररीण्य सुत्र मे बधने पश्चात ब्रह्रामण को भुरसी के रूप मे गौ दान कीया जाता है।
16▪अंत्येष्टी संस्कार - अंत्येष्टि संस्कार इसका अर्थ है अंतिम संस्कार। शास्त्रों के अनुसार इंसान की मृत्यु यानि देह त्याग के बाद मृत शरीर अग्नि को समर्पित किया शव यात्रा मे शव को उठाकर उस जगह को गाय के गोबर से लीपा जाता है। आज भी शवयात्रा के आगे घर से गाय के गोबर से बने उपले मे अग्नि जलाकर ले जाई जाती है। इसी से चिता जलाई जाती है।ओर शमशान मे चिता पर गाय के घी की आहुती दी जाती है।दसक्रिया मे गौदान कीया जाता है। जीसने जीवन मे गौ सेवा की हो वो गाय की पुछ पकड कर वैतरणी पार की जाती है।

  गौ सेवा ही गोपाल सेवा है।

सोमवार, 4 जुलाई 2016

जानते है कैसे ये दूध आपके स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन रहा है।


आज हम सब लोग सुबह उठते ही चाय की चुस्की लगाते है। हमने पैकेजिंग दूध की सच्चाई अपने दूध के बारे में नहीं सोचा। १ बार अपनी दूध की थैली भी देख लीजिए। आज हम में से ज्यादातर लोग डेयरी का दूध या फिर उसके समकक्ष कोई और दूध पीते होगे। ये दूध खून में कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढाता है जिससे हमारे शरीर में हृदय सम्बंधित बीमारी बढती है। कम आयु में भी हार्ट एटेक होना आज कल हम देख ही रहे है ना। कही ये हमारी लापरवाही का परिणाम तो नहीं है ना? चलो अब जानते है कैसे ये दूध आपके स्वास्थ्य के लिए चुनौती बन रहा है।

जरा ध्यान से अपनी दूध की थैली देखना। उसके ऊपर कुछ इस तरह लिखा मिलेगा।
Fat 6.0 % minimum
SNF 9.0 % minimum

500 ml का 9% के हिसाब से १ थैली में SNF की मात्रा 45 gm होगी। चलो अब जानते है ये SNF किस बला का नाम है।

SNF मतलब Saturated natural fat. हमारे शरीर में कई तरह की चर्बी या फेट पायी जाती है जिसमे से कोई शरीर के लिए लाभदायी है तो कोई शरीर के लिए नुकसानदेह। ये SNF हमारे शरीर को बहोत नुकसान पहुचाता है। American Heart Association की गाईडलाइन के अनुसार स्वस्थ रहने के लिए हमारे आहार में SNF की दैनिक मात्रा १६ ग्राम से ज्यादा नहीं होनी चाहिए। इससे ज्यादा मात्रा में SNF का सेवन करने से कोलेस्ट्रोल की मात्रा बढती है और ब्लडप्रेशर डायाबिटीस जैसी भयानक बीमारियाँ भी होती है। यही बात WHO ने भी अपनी रिपोर्ट में बताई है। इस बात की पुष्टि के लिए आप निचे दी गई लिंक देख सकते है| Read More

आज पूरी दुनियाभर में कम SNF वाले आहार के लिए जागरूकता बढती जा रही है और हम सब लोग अँधेरे में जी रहे है। ज्यादा SNF वाला दूध ज्यादा पैसा देकर खरीद रहे है और बीमारी को पैसो से आमंत्रित कर रहे है। इसके उपरांत पैकेजिंग वाले दूध में जर्सी, भैंस, बकरी, भेड़ सभी का दूध मिलके हमारे पास पहूचता है। कभी ज्यादा गाढ़ा दिखाने के लिए उसमे विदेशी नस्ल के प्राणी के  दूध का पाउदर भी मिलाके उसे और खतरनाक बना देते है। कभी यूरिया भी डाल तो भी हमे कहा पता चलेगा। क्या यही हमारी अक्लमंदी है की हम ज्यादा पैसा खर्च करके हार्ट एटेक जैसी बीमारी को बुलाये और फिर उसको ठीक करने के लिए और तगड़े पैसे खर्च करके हार्ट की सर्जरी करवाए? क्या इससे अच्छा ये नहीं होगा की हम पहेले से ही पैसा हमारी गायमाता के दूध के पीछे खर्च करे और हमारे स्वास्थ्य को तरोताजा रखे?

आपको ये जानकार हैरानी होगी तो आज अमेरिका के वैज्ञानिको ने हमारी गौ माता पर पुस्तक लिख डाली है ओर आस्ट्रेलिया वाले वाले बोल रहे है की ये एड्स का उपचार भी करता है| आख़िर हमारी देशी गाय माता के दूध मे ऐसा क्या है? इसको जानने के लिए आपको हमारी माता के दूध की संरचना जाननी होगी| हमे भरोसा है की इतनी सच्चाई जानने के बाद आप कभी अपने परिवार ओर बच्चों के लिए थैली वाला पैकड दूध तो नही ख़रीदेंगे|

आज ना जाने कहा से गोल्ड के नाम पे ज्यादा पैसा खर्च करके हम ज्यादा महँगा दूध पिने की बात गर्व से करते है लेकिन गोल्ड सही माइने में हमे बहुत महँगा पड सकता है। अगर “गोल्ड” ही खाना हे तो गौमाता का दूध पिए। इसमें खरा सोना है जिसकी वजह से तो गायमाता का दूध हल्का पिला रहता है। वैज्ञानिको ने संशोधन में ये बात सिद्ध की है की हमारी गायमाता के दूध में molecule of auram यानी की सुवर्णक्षार पाया जाता है जो की खरा सोना है। अगर हमारे बच्चों की बुद्धिशक्ति बढ़ानी है तो हमें बूस्ट बोर्नविटा हॉर्लिक्स छोडके गाय का दूध पिलाना शुरू करना पड़ेगा। गायमाता का दूध के तो अनगिनत फायदे है जो हम   समय समय पर देखते रहेंगे।

आओ हम सब मिलके इस बात को लोगो तक पहुचाये। स्वस्थ बुद्धिसंपन्न समाज के निर्माण की शुरुआत हमे अपने आप से ही करनी होगी। चलो हम सब निर्धार करे के हमारे भोजन में से पैकेजिंग दूध को छोडकर गायमाता हा दूध ही इस्तेमाल करे। दूध की जरूरत पड़ेगी तो गायमाता की भी जरुरत पड़ेगी और कतलखाने जाती हुई हमारी माँ बचेगी और दूध के रूप में हम सबके घर पहुचेगी।

जानिएं समुद्र मंथन से उत्पन्न हुई कामधेनु गाय की कहानी

हिन्दू धर्म में हमेशा से ही ‘गाय’ को एक पवित्र पशु माना गया है, ना केवल एक जीव, वरन् हिन्दू मान्यताओं ने गाय को ‘मां’ की उपाधि दी है। गाय को मनुष्य का पालनहार माना गया और इससे मिलने वाले दूध को अमृत के समान माना जाता है। लेकिन यह मान्यता कुछ महीनों, वर्षों या दशकों की नहीं...



युगों से ही गाय को पूजनीय माना गया है। यदि आप हिन्दू धर्म को समझते हैं या फिर हिन्दू मान्यताओं की जानकारी रखते हैं तो शायद आपने कामधेनु गाय के बारे में भी सुना होगा। हिन्दू धर्म के अनेक धार्मिक ग्रंथों में कामधेनु गाय का जिक्र किया गया है। कहते हैं कामधेनु गाय में दैवीय शक्तियां थीं, जिसके बल पर वह अपने भक्तों की हर मनोकामना पूरी करती थी।

कामधेनु

यह गाय जिसके भी पास होती थी उसे हर तरह से चमत्कारिक लाभ होता था। लेकिन इस गाय के दर्शन मात्र से भी मनुष्य के हर कार्य सफल हो जाते थे। दैवीय शक्तियां प्राप्त कर चुकी कामधेनु गाय का दूध भी अमृत एवं चमत्कारी शक्तियों से भरपूर माना जाता था।

यह गाय जिसके भी पास होती थी उसे हर तरह से चमत्कारिक लाभ होता था। लेकिन इस गाय के दर्शन मात्र से भी मनुष्य के हर कार्य सफल हो जाते थे। दैवीय शक्तियां प्राप्त कर चुकी कामधेनु गाय का दूध भी अमृत एवं चमत्कारी शक्तियों से भरपूर माना जाता था।

इसके चमत्कारी गुण

यही कारण है कि कामधेनु गाय को मात्र एक पशु मानने की बजाय ‘माता’ की उपाधि दी गई थी। एक ऐसी मां जो अपने बच्चों की हर इच्छा पूर्ण करती है, उन्हें पेट भरने के लिए आहार देती है और उनका पालान-पोषण करती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि कामधेनु गाय की उत्पत्ति कहां से हुई?

पौराणिक कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार समुद्र मंथन के समय देवता और दैत्यों को समुद्र में से कई वस्तुएं प्राप्त हुईं। जैसे कि मूल्यवान रत्न, अप्सराएं, शंख, पवित्र वृक्ष, चंद्रमा, पवित्र अमृत, कुछ अन्य देवी-देवता और हलाहल नामक अत्यंत घातक विष भी। इसी समुद्र मंथन के दौरान क्षीर सागर में से कामधेनु गाय की उत्पत्ति भी हुई थी।

समुद्र मंथन


पुराणों में कामधेनु गाय को नंदा, सुनंदा, सुरभी, सुशीला और सुमन भी कहा गया है। कामधेनु गाय से संबंधित पुराणों में कई सारी कथाएं प्रचलित हैं... कृष्ण कथा में अंकित सभी पात्र किसी न किसी कारणवश शापग्रस्त होकर जन्में थे। कश्यप ने वरुण से कामधेनु मांगी थी, लेकिन बाद में लौटाई नहीं। अत: वरुण के शाप से वे ग्वाले हुए।

भगवान परशुराम

कामधेनु गाय से संबंधित एक और कथा विष्णु के मानवरूपी अवतार भगवान परशुराम से जुड़ी है जिसके अनुसार एक बार सहस्त्रार्जुन अपनी पूरी सेना के साथ जंगलों को पार करता हुआ जमदग्नि ऋषि (भगवान परशुराम के पिता) के आश्रम में विश्राम करने के लिए पहुंचा।

जमदग्नि ऋषि

महर्षि ने राजा को अपने आश्रम का मेहमान समझकर स्वागत सत्कार किया और उन्हें आसरा दिया। उन्होंने सहस्त्रार्जुन की सेवा में किसी भी प्रकार की कोई कसर नहीं छोड़ी। यह तब की बात है जब ऋषि जमदग्रि के पास देवराज इन्द्र से प्राप्त दिव्य गुणों वाली कामधेनु नामक अद्भुत गाय थी।

दैवीय गुणों वाली कामधेनु

राजा नहीं जानते थे कि यह गाय कोई साधारण पशु नहीं, वरन् दैवीय गुणों वाली कामधेनु गाय है, लेकिन कुछ समय के पश्चात जब राजा ने गाय के चमत्कार देखे तो वे दंग रह गए। महर्षि का आश्रम काफी साधारण था, ना अधिक सुविधाएं थीं और ना ही काम में हाथ बंटाने लायक कोई सेवक।

राजा ने देखे चमत्कार

लेकिन महर्षि ने कामधेनु गाय की मदद से कुछ ही पलों में देखते ही देखते राजा और उनकी पूरी सेना के लिए भोजन का प्रबंध कर दिया। कामधेनु के ऐसे विलक्षण गुणों को देखकर सहस्त्रार्जुन को ऋषि के आगे अपना राजसी सुख कम लगने लगा।

ऋषि से मांगी कामधेनु

अब उनके मन में महर्षि के प्रति ईर्ष्या उत्पन्न होने लगी और साथ ही वे महर्षि से उस गाय को ले जाने की तरकीब भी बनाने लगे। लेकिन सबसे पहले राजा ने सीधे ही ऋषि जमदग्नि से कामधेनु को मांगा। किंतु जब ऋषि जमदग्नि ने कामधेनु को आश्रम के प्रबंधन और जीवन के भरण-पोषण का एकमात्र जरिया बताकर उसे देने से इंकार कर दिया, तो राजा ने बुराई का मार्ग चुनना सही समझा।

जबरन ले ली

राजा ने क्रोधित होकर ऋषि जमदग्नि के आश्रम को उजाड़ दिया, सब तहस-नहस हो गया। लेकिन यह सब करने के बाद जैसे ही राजा सहस्त्रार्जुन अपने साथ कामधेनु को ले जाने लगा तो तभी वह गाय उसके हाथों से छूट कर स्वर्ग की ओर चली गई। और आखिरकार दुष्ट राजा को वह गाय नसीब नहीं हुई, लेकिन वहीं दूसरी ओर महर्षि जमदग्नि दोहरे नुकसान को झेल रहे थे।

स्वर्ग की ओर चली गई कामधेनु

एक ओर वे अपनी कामधेनु गाय को खो चुके थे और दूसरी ओर आश्रम भी ना रहा। कुछ समय के पश्चात महर्षि के पुत्र भगवान परशुराम आश्रम लौटे और जब उन्होंने यह दृश्य देखा तो हैरान रह गए। इस हालात का कारण पूछने पर उनकी माता रेणुका ने उन्हें सारी बातें विस्तारपूर्वक बताई।

परशुराम हुए क्रोधित

परशुराम माता-पिता के अपमान और आश्रम को तहस नहस देखकर आवेश में आ गए। पराक्रमी परशुराम ने उसी वक्त दुराचारी सहस्त्रार्जुन और उसकी सेना का नाश करने का संकल्प लिया। परशुराम अपने परशु अस्त्र को साथ लेकर सहस्त्रार्जुन के नगर महिष्मतिपुरी पहुंचे।

पिता के अपमान का बदला

यहां पहुंचने पर राजा सहस्त्रार्जुन और उनके बीच भीषण युद्ध हुआ। किंतु परशुराम के प्रचण्ड बल के आगे सहस्त्रार्जुन बौना साबित हुआ। भगवान परशुराम ने दुष्ट सहस्त्रार्जुन की हजारों भुजाएं और धड़, परशु से काटकर कर उसका वध कर दिया।

फिर गए तीर्थ

कहते हैं सहस्त्रार्जुन के वध के बाद जैसे ही परशुराम अपने पिता के पास वापस आश्रम पहुंचे तो उनके पिता ने उन्हें आदेश दिया के वे इस वध का प्रायश्चित करने के लिए तीर्थ यात्रा पर जाएं, तभी उनके ऊपर से राजा की हत्या का पाप खत्म होगा। लेकिन ना जाने कहां से परशुराम के तीर्थ पर जाने की खबर सहस्त्रार्जुन के पुत्रों को मिल गई।

गोपाल संग कजरी गाय ,,,,,1,,,,,,

गोपाल संग कजरी गाय...!! (1)

दूर वन में कदम्ब के नीचे नंदकिशोर खड़े बांसुरी बजा रहे हैं, सुबह से वो बालसखाओं के साथ गईयाँ चराने आए हैं।

ऐसा सम्मोहन है श्यामसुंदर में कि हर एक बालसखा उन्हें अपने संग पाता है।
हर एक को यही प्रतीत होता है कि कन्हैया उस संग वन में उसी की गईयाँ चराने आया है।

सभी सखागण विशेष योग में हैं और कान्हा को अपने अपने भाव से बतियाते खेलते हुए उसे रिझा रहे हैं।

कन्हैया भी यही मानते हैं कि वे हैं सबसे छोटे व सबके लाडले, तो कभी किसी से तो कभी किसी से रूठ बैठते हैं और फिर खुद ही मान भी जाते हैं।

समग्र विश्व के कर्ताधर्ता बालपन में मित्रों संग कई नादानियां, अठकेलियां करते नाचते-गाते फिरते हैं और नाना प्रकार के प्रलोभनों से रीझ भी जाते हैं।

छोटे से नंदनंदन सभी के लाडले जो ठहरे, हरेक पर जैसे कोई जादू टोना ही कर रखा हो।

वो वंशी की धुन पर या अपने सौंदर्य के बल पर या सम्मोहन विद्या से या नंदबाबा के सुपुत्र होने के कारण या यशोदा मईया के इकलौते लाल होने से या दाऊ भैया के लाड़ से ना जाने कैसे अपना प्रभुत्व जमाए रखते हैं।

लाख ताने मिलने और यशोदा मईया से लाख शिकायतें करने के बावजूद भी सारी की सारी गोपियों को भी कन्हैया ने अपने इशारों पर नचा रखा है।

गोपियों के शिकवे शिकायत सुन लेने के बाद जैसा जादू मईया पर उनका चलता है ऐसा ही कुछ गोपियों पर भी चल ही जाता है।

जिस भी गोपी के घर कान्हा माखन चुराने नहीं जाते उसी गोपी के घर में व मन में सन्नाटा सा रहता है और कभी किवाड़ पर तो कभी द्वार पर खड़ी इंतजार करती रहती है कि आज तो लल्ला उसकी कुटिया में पधारेंगे।

यही सोच वो अपनी माखन की मटकियों को छींकों से उतारती नहीं और श्यामसुंदर को रंगे हाथ पकड़ उसे निहारते हुए खुद को भूल जाना चाहती हैं।

अब ये कोई जादू नहीं तो क्या है...

जहाँ देखो वहीं हर कोई इस नंदकिशोर के स्नेह-नेह को पाने के लिए तन्मयता से उसकी राह तकता रहता है।

गोकुल के गोपगण भी कन्हैया का ही पक्ष लेते हैं, यही नहीं आस पास के गाँव की सखियों पर तो ऐसा जादू छाया है इनका कि बिन देखे ही सब इन पर अपना सर्वस्व न्यौच्छावर कर बैठी हैं।

किसी ने इन्हें अपना पति ही मान लिया है और कई इनका संग पाने के लिए अपना घरबार छोड़ देने को तैयार बैठी हैं।

अरे बिन देखे भी ऐसा असर....

यही नहीं इनके जादू का असर तो वन्य जीवों पर भी गहरा है।
आते तो हैं गईयां चराने पर वंशी की धुन से समस्त वन्य जीवों व पक्षियों को भी नाच नचा देते हैं।

नंगे पांव चलते मोहन के कदमों तले धरा तो जैसे पुष्प ही बिछा देती है और यमुना जी अपनी शीतलता से सूर्य की किरणों को भी शीतल कर देती हैं।

पुरवाई भी पूरे वातावरण को महका देती है, मयूर, कोकिल आदि पक्षी नाच-नाच कर व गा कर मोहन के आगमन का समाचार चहुं दिशाओं में फैला देते हैं।

वंशी की धुन पर सभी वन्यजीव झूम-झूम कर कान्हा का स्वागत करते हैं।

सभी पेड़ पौधे इनके आगमन पर नतमस्तक हो जाते हैं।

अहा ऐसा अद्भुत सम्मोहन....

ऐसी ठकुराई है इनकी ब्रज गोकुल की गलियों में कि हर कोई यहाँ निर्भय होकर विचरता है।
टेढ़ी चाल ढाल व टेढ़ी चितवन वाले की टेढ़ी ही नगरिया।

ठाकुर के नाम बल पर तो कोई भी किसी से सीधे मुँह बात ही ना करता है, सब पर इनकी संगत का गहरा प्रभाव जो पड़ा है।

और तो और टेढ़े ठाकुर की टेढ़ी मुस्कन का तो हर कोई पक्षधर हो लेता है।

अब इनकी टेढ़ी ठकुराई की सरकार भी टेढ़ी.. सर्वगुणसम्पन्न।

और नहीं तो क्या? मान करने में भी।

एक यही तो हैं जहाँ ये टेढ़ी चितवन के धनी श्यामसुंदर सीधे नतमस्तक हो जाते हैं।

सबको अपनी उंगलियों पर नचाने वाले इनके इश्क में ऐसे फंसे हैं कि सारी ठकुराई भूल कर इनके इशारों पर नाचते हैं।

बहरूपिया बन सखियों को ठगने वाले इनकी रूपराशि पर खुद ही ठगे से रह जाते हैं।

लाख वेश बदलें पर अपनी सरकार के समक्ष आते ही बेनकाब हो जाते हैं, यहाँ इनका नहीं इन पर ही जैसे कोई जादू हो जाता है।

टेढ़े ठाकुर की सिरमौर ठकुराईन जादूगरनी।

अहा... सब पर जादू होना मतलब सब पर।

देखो मैं भी कहां बच पाई, उतरी तो थी कजरी की भाव दशा में लेकिन चतुर के संग संगिनी हो गई।

इनकी बात करने बैठो तो बात कहाँ की कहाँ पहुँच जाती है।

ठगी सी रह जाती हूँ और मन शरारत पर उतर आता है इनकी निर्ल्लज आँखों में आँखें डालने से और इनकी मधुर मुस्कन चित्त और लफ्ज़ दोनों को ही चुरा लेती है।

अब देखो एक दिन बोले मुझसे, सखी एक दिन आऊंगा पलम्बर का वेश धरकर तेरे घर, मिलकर नल ठीक करेंगे।

अब कैसे धीर धरूं भला, क्या तुम्हारे इस जग में अकेली ही रहती हूँ मैं?
किसी ने आते देख लिया अगर, कहीं अगर मैं ही बुद्धिहीन तुम्हें पहचान ना पाई तो...!

और इस पर भी क्या आकर लौट पाओगे तुम मुझे छोड़, क्या यूँ ही जाने दूँगी क्या मैं तुम्हें?

तुम तो लौट ही जाओगे क्या फिर मैं जी पाऊंगी कभी?

अरे सच कहूँ तो संग ही चल दूँगी सब हार कर, फिर क्या करोगे।

भेजा ही क्यों इस जग में, अपराधिन ही सही क्या कमी थी तुम्हारे पास जो थोड़ी सी जगह दे देते अपने चरणों में।

हे राम.. क्या-क्या कह जाती हूँ मैं भी, पर सच ही तो कहती हूँ।

मिलन की तड़प, तड़प कर मिलना, ये प्रेम और फिर विरह, तुम्हारी पूरी और मेरी तुम बिन अधूरी सी प्रीत, अंतर्मन के गीत संगीत, मेरी रूह के नृत्य मेरे मनमीत सब तुम ही तुम ही तुम ही हो मेरे।

मधुर पुष्प सुगन्धित विटप प्रेम पंखुड़ी हो तुम,
घोर तिमिर में जो चमका करें पूनम चांदनी हो तुम....

कुंचित कुंतल, विपलित अधर प्रेमांगनि हो तुम,
विचलित कर दे जो हिम शिखर को वो दावानल हो तुम....

रिक्त मन में जो आशा भर दे, वो स्वप्न सुंदरतम हो तुम........!!"

गोपाल संग कजरी गाय .....2

गोपाल संग कजरी गाय.....!! (2)

गौरवर्ण नन्ही सी एक गइया जिसे मोहन सब गइयों के साथ ही चराने वन ले जाते हैं।

यूँ तो सब कन्हैया की मदमस्त चाल पर आसक्त गइयां उन्हें करूणामयी निगाहों से निहारती जाती हैं, पर ना जाने कजरी में ऐसा क्या खास है जो वो तो कान्हा की मधुर वंशी ध्वनि और टेढ़ी चाल पर प्रेमनिमलित अश्रुपात ही कर देती है।

घर से निकलने से लेकर वन विहार तक और वन विहार से लौटने तक वो तो एकटक श्यामसुंदर को निहारती ही जाती है।

ना वो रम्भाती है कि कहीं वंशी की धुन उसकी कर्कश ध्वनि से खराब ना हो जाए, और उसकी सुनने की लय भी ना टूट जाए और ना ही दृष्टि ही हटाती है कि कहीं श्यामसुंदर जब उसकी ओर देखें तो वो खुद उनकी नजरों में देखने से चुक जाए।

ऐसा विचित्र स्नेह एक गइया का कन्हैया से...

या यूँ कहूँ कि ये भी एक तरह का सम्मोहन ही है, मनमोहक, मोहिनी मोहन की सब मोह को हर लेने वाली छवि का।

कजरी सुबह ही संग-संग चल देती है श्याम जु के।

ऐसा नहीं है कि श्यामसुंदर जानते नहीं हैं इस नन्ही गईया के हृदयद्गार को।

पर उन्हें तो सबका ध्यान है ना, तब भी वे कजरी को बार-बार चरने के लिए ना कहें तो ये भूखी ही लौट आए।

जो जैसा भजे कन्हैया भी वैसे ही तो उसे भजते हैं।

अब वे जानते हैं कि कजरी का पूरा मन उनमें ही लगा है तो वे भी कजरी पर सबसे अधिक ध्यान देते हैं।

ये पास हो या दूर कजरी की निगाह इन पर ही अटकी रहती है, दूर खड़ी श्यामसुंदर को कदम्ब तले खड़े देखती है नख से शिख तक।

कन्हैया का पीताम्बर पवन के साथ उड़ता झिलमिलाता कजरी की नयनों की पुतलियों को नचाता रहता है।

वनमाल और कानों के कुण्डल हिलते-डुलते कजरी की नासिका को महक व आँखों को चमक प्रदान करते हैं।

कन्हैया के पैरों की पायल व नूपुर की रूनझुन-रूनझुन धरा में कम्पन पैदा करती उसके कानों को पल-पल सचेत करती है कि अब वे कजरी की तरफ बढ़ चलेंगे।

उनके कटि के कमरबंध की रूनक-झुनक कजरी के भावों को हवा देते हैं।

यूँ ही मूक बनी कजरी गौधुली के समय तक श्यामसुंदर को एक टक्कर देखती और ज़रा सी हलचल पर ही सतर्क हो जाती।

शाम को गईयों के संग लौटते समय उसे कन्हैया का मुख व देह धुंधले से प्रतीत होते, वो कान्हा के उस समय के रूप का भी मधुर पान करती रहती।

नंद भवन आ जाने पर वो जानती कि मोहन अब भोजन कर विश्राम करेंगे इसलिए वह भी कान्हा संग बिताए पलों को स्मरण करती रहती।

मोहन जब बालसखाओं के साथ लुक्का-छिप्पी खेलते तो वे इसके पीछे छुप जाते और पकड़न पकड़ाई में भी कृष्ण को कोई ना पकड़ पाए तो ढाल बन खड़ी रहती।

कभी-कभी कृष्ण मस्ती में खूब दौड़ाते कजरी को।

मईया जब खाना परोसती तो चुपके से आकर कजरी को ही खिला जाते जब खुद खाने की इच्छा ना होती।

इस तरह से कजरी बालकृष्ण की अठकेलियों को भीतर बचपन से ही सहेजे हुए थी और अपने हृदय मंदिर में सदा उन्हें पूजती रहती।

कान्हा के अधिकतर मधुर पलों में उसने खुद को साथ ही पाया और खुद को बड़ा भाग्यशाली भी मानती।

कई बार तो जब कुछ क्षण कान्हा को ना देखकर व्याकुल होती तो रम्भाकर उन्हें पुकारती और वे भी कजरी की बोली को भलीभाँति जान जाते दौड़कर आते और फिर ओझल हो जाते, यही दिनचर्या और रात्रिशयन हुआ करता सदा।

कुछ यूँ कजरी और मोहन दोनों ही बड़े हुए और समय के साथ साथ भावों में भी बड़प्पन आने लगा।

कजरी को स्मरण रहते कि मोहन उसे चराते समय अक्सर कहते कि:- एक दिन जब तू बड़ी होगी ना अपनी मईया जैसी, तब मैं भी तेरा दूध पीकर तुमसे भी बड़ा हो जाऊँगा, इसलिए तुम अच्छे से भरपेट भोजन किया करो।

कजरी में अब कान्हा के प्रति वात्सल्य भाव उमड़ने लगा था।

वन में अब कजरी श्यामसुंदर के साथ श्यामा जु को भी निहारने लगी।
दोनों जब विचरते वहाँ तो कजरी उन पलो को भी संजोने लगी अपने भीतर।

कृष्ण ने उसे कई बार छुआ है, वन में घूमते-फिरते, बालसखाओं संग खेलते समय कन्हैया ने अक्सर ही कजरी के दूध की धार से खेल खेला है।

कभी मुख से लगाकर तो कभी सखाओं के मुख को भिगोकर।

अब कजरी राधे जु के स्पर्श से भी वंचित नहीं रहना चाहती।

अपने लड़कपन में तो मोहन राधे के ऐसे भोले से दीवाने हैं कि उन्हें राधे की सखियों से भी चिड़ रहती कि क्यों ना मैं ही ये सब सखियां ही होता।

वो कजरी से राधे के बारे में बातें तो करते लेकिन कभी उसे भी मिलवाते नहीं।

अपने बालसखाओं के साथ राधे की सखियों को उलझा कर खुद राधे के साथ कहीं छिपकर समय बिताने की ताक में रहते।

क्रमशः