शनिवार, 27 अगस्त 2016

महाभारत अनुशासनपर्व अध्याय 81 श्लोक 21-47


महाभारत: अनुशासनपर्व: एकाशीतितमो अध्याय: श्लोक 21-47 का हिन्दी अनुवाद
वहां के जलाशय लाल कमल वनों से तथा प्रातःकालीन सूर्य के समान प्रकाशमान मणिजनित सुवर्णमय सोपानों से सुशोभित होते हैं। वहां की भूमि कितने ही सरावरों से शोभा पाती है। उन सरावरों में नीलोत्पल मिश्रित बहुत से कमल खिले रहते हैं। उन कमलों के दल बहुमूल्य मणि में होते हैं और उनके केसर अपनी सुवर्णमयी प्रभा से प्रकाशित होते हैं। उस लोक में बहुत-सी नदियां हैं, जिनके तटों पर खिले हुए कनेरों के वन तथा विकसित संतानक (कल्पवृक्ष विशेष) के वन एवं अनान्य वृक्ष उनकी शोभा वढाते हैं। वे वृक्ष और वन अपने मूल भाग में सहस्त्रों आवर्तों से घिरे हुए हैं। उन नदियों के तटों पर निर्मल मोती, अत्यन्त प्रकाशमान मणिरत्न तथा सुवर्ण प्रकट होते हैं । कितने ही उत्तम वृक्ष अपने मूलभाग के द्वारा उन नदियों के जल में प्रविष्‍ट दिखाई देते हैं। वे सर्वरत्नमय विचित्र देखे जाते हैं। कितने ही सुवर्णमय होते हैं और दूसरे बहुत से वृक्ष प्रज्वलित अग्नि के समान प्रकाशित होते हैं। वहां सोने पर्वत तथा मणि और रत्नों के शैल समूह हैं, जो अपने मनोहर, ऊंचे तथा सर्व रत्नमय शिखरों से सुशोभित होते हैं। भरतश्रेष्ठ। वहां के वृक्षों में सदा ही फूल और फल लगे रहते हैं। वे वृक्ष पक्षियों से भरे होते हैं तथा उनके फूलों और फलों में दिव्य सुगंध और दिव्य रस होते हैं। युधिष्ठिर। वहां पुण्यात्मा पुरुष ही सदा निवास करते हैं। गोलोकवासी शोक और क्रोध से रहित, पूर्ण काम एवं सफल मनोरथ होते हैं । भरतनन्दन ! वहां के यशस्‍वी एवं पुण्यकर्मा मनुष्य विचित्र एवं रमणीय विमानों में बैठकर यथेष्ठ विहार करते हुए आनन्द का अनुभव करते हैं। राजन ! उनके साथ सुन्दर अप्सराऐं क्रीड़ा करती हैं। युधिष्ठिर ! गोदान करके मनुष्य इन्हीं लोकों में जाते हैं। नरेन्द्र! शक्तिशाली सूर्य और वलवान वायु जिन लोकों के अधिपति हैं, एवं राजा वरुण जिन लोकों के एश्‍वर्य पर प्रतिष्ठित हैं, मनुष्य गोदान करके उन्हीं लोकों में जाता है। गौऐं युगन्धरा एवं स्वरूपा, बहुरूपा, विश्‍वरूपा तथा सबकी माताऐं हैं। शुकदेव। मनुष्य संयम-नियम के साथ रहकर गौओं के इन प्रजापति कथित नामों का प्रतिदिन जप करे। जो पुरुष गौओं की सेवा और सब प्रकार से उनका अनुगमन करता है, उस पर संतुष्ट होकर गौऐं उसे अत्यन्त दुर्लभ वर प्रदान करती हैं। गौओं के साथ मन से कभी द्रोह न करें, उन्हें सदा सुख पहुंचाऐं उनका यथोचित सत्कार करें और नमस्कार आदि के द्वारा उनका पूजन करते रहें। जो मनुष्य जितेन्द्रिय और प्रसन्नचित्त्त होकर नित्य गौओं की सेवा करता है, वह समृद्वि का भागी होता है। मनुष्य तीन दिनों तक गरम गोमूत्र पीकर रहे, फिर तीन दिनों तक गरम गोदुग्ध पीकर रहे । गरम गोदुग्ध पीने के पश्चात तीन दिनों तक गरम-गरम गोघृत पीयें। तीन दिन तक गरम घी पीकर फिर तीन दिनों तक वह वायु पीकर रहे। देवगण भी जिस पवित्र घृत के प्रभाव से उत्तम-उत्तम लोक का पालन करते हैं तथा जो पवित्र वस्तुओं में सबसे बढ़कर पवित्र है, उससे घृत को शिरोधार्य करें। गाय के घी के द्वारा अग्नि में आहुति दें। घृत की दक्षिणा देकर ब्राह्माणों द्वारा स्वस्तिवाचन करायें। घृत भोजन करें तथा गौघृत का ही दान करें। ऐसा करने से मनुष्य गौओं की समृद्वि एवं अपनी पुष्टि का अनुभव करता है। गौओं के गोबर से निकाले हुए जौ की लप्सी का एक मास तक भक्षण करें। इससे मनुष्य ब्रह्म हत्या जैसे पाप से भी छुटकारा पा जाता है। जब दैत्यों ने देवताओं को पराजित कर दिया, तब देवताओं ने इसी प्रायश्चित का अनुष्ठान किया। इससे उन्हें पुनः (नष्ट हुए) देवत्व की प्राप्ति हुई तथा वे महाबलवान और परम सिद्ध हो गये। गौऐं परम पावन, पवित्र और पुण्य स्वरूपा हैं। वे महान देवता हैं। उन्हें ब्राह्माणों को देकर मनुष्य स्वर्ग का सुख भोगता है। पवित्र जल से आचरण करके पवित्र होकर गौओं के बीच में गोमती मंत्र (गोमां अग्नेविमां अश्वि इत्यादि) का मन-ही-मन जप करें। ऐसा करने से वह अत्यन्त शुद्व एवं निर्मल (पापमुक्त) हो जाता है। विद्या और वेदव्रत में निष्णात पुण्यात्मा ब्राह्माणों को चाहिये के वे अग्नियों और गौओं के बीच में तथा ब्राह्माणों की सभा में शिष्‍यों को यज्ञ तुल्य गोमती विद्या की शिक्षा दें। जो तीन रात तक उपवास करके गोमती मंत्र का जप करता है, उसे गौओं का वरदान प्राप्त होता है। पुत्र की इच्छा वाला पुत्र और धन चाहने वाला धन पाता है। पति की इच्छा रखने वाली स्त्री को मन के अनुकूल पति मिलता है। सारांश यह है कि गौओं की आराधना करके मनुष्य सम्पूर्ण कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। गौऐं मनुष्यों द्वारा सेवित और संतुष्ट होकर उन्हें सबकुछ देती हैं, इसमें संशय नहीं है। इस प्रकार ये महाभाग्यशालिनी गौऐं यज्ञ का प्रधान अंग हैं और सबको सम्पूर्ण कामनाऐं देने वाली हैं। तुम इन्हें रोहिणी समझो। इनसे बढ़कर दूसरा कुछ नहीं है। युधिष्ठिर। अपने महात्मा पिता व्यासजी के ऐसा कहने पर महातेजस्वी शुकदेवजी प्रतिदिन गौ की सेवा-पूजा करने लगे; इसलिये तुम भी गौओं की सेवा-पूजा करो।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व के अन्‍तगर्त दानधर्मपर्वमें गौओं की उत्पत्ति का गोदान विषयक इक्यासीवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

महाभारत अनुशासनपर्व अध्याय 81 श्लोक 1-20

महाभारत: अनुशासनपर्व: एकाशीतितम अध्याय: श्लोक 1-20 का हिन्दी अनुवाद
गौओं का माहात्म्‍य तथा व्‍यासजी के द्वारा शुकदेव से गौओं की, गोलोक की और गोदान की महत्‍ता का वर्णन
युधिष्ठिर ने कहा- पितामह। संसार में जो वस्तु पवित्रों में भी पवित्र तथा लोक में पवित्र कहकर अनुमोदित एवं परम पावन हो, उसका मुझसे वर्णन कीजिये। भीष्म जी नें कहा- राजन। गौऐं महान प्रयोजन सिद्ध करने वाली तथा परम पवित्र हैं। ये मनुष्यों को तारने वाली हैं और अपने दूध-घी से प्रजावर्ग के जीवन की रक्षा करती हैं। भरतश्रेष्ठ। गौओ से बढ़कर परम पवित्र दूसरी कोई वस्तु नहीं है। ये पुण्यजनक, पवित्र तथा तीनों लोकों में सर्वश्रेष्ठ है। गौऐं देवताओ से भी ऊपर के लोकों में निवास करती हैं। जो मनीषी पुरुष इनका दान करते हैं, वे अपने-आपको तारते हैं और स्वर्ग में जाते हैं। युवनाश्‍व के पुत्र राजा मानधाता, (सोमवंशी) नहुष और ययाति- ये सदा लाखों गौओं का दान किया करते थे; इससे वह उन उत्तम स्थानों को प्राप्त हुऐ हैं, जो देवताओं के लिये भी अत्यन्त दुर्लभ हैं। निष्पाप नरेश। इस विषय में तुम्हें एक पुराना वृतान्त सुना रहा हूं। एक समय की बात है, परम बुद्विमान शुकदेवजी ने नित्य- कर्म का अनुष्ठान करके पवित्र एवं शुद्धचित्त होकर अपने पिता-ऋषियों में उत्तम श्रीकृष्ण दैपायन व्यास को, जो लोक के भूत और भविष्य को प्रत्यक्ष देखने वाले हैं, प्रणाम करके पूछा- पिताजी। सम्पूर्ण यज्ञों में कौन-सा यज्ञ सबसे श्रेष्ठ देखा जाता है? प्रभो ! मनीषी पुरुष कौन-सा कर्म करके उत्तम स्थान को प्राप्त होते हैं तथा किस पवित्र कार्य के द्वारा देवता स्वर्गलोक का उपभोग करते हैं? ‘यज्ञ का यज्ञत्व क्या है? यज्ञ किसमें प्रतिष्ठित है? देवताओं के लिये कौन-सी वस्तु उत्तम है? इससे श्रेष्ठ यज्ञ क्या है? ‘पिताजी। पवित्रों में पवित्र वस्तु क्या है? इन सारी बातों का मुझसे वर्णन कीजिये।'भरतश्रेष्ठ ! पुत्र शुकदेव का यह वचन सुनकर परम धर्मज्ञ व्यास ने उससे सब बातें ठीक-ठीक बतायीं। व्यासजी बोले- बेटा। गौऐं सम्पूर्ण भूतों की प्रतिष्ठा हैं। गौऐं परम आश्रय हैं। गौऐं पुण्यमयी एवं पवित्र होती हैं तथा गोधन सबको पवित्र करने वाला है।हमने सुना है कि गौऐं पहले बिना सींगों की ही थीं। उन्होंने सींग के लिये अविनाशी भगवान ब्रम्हा की उपासना की । भगवान ब्रह्माजी ने गौओं को प्रायोपवेशन (आमरण उपवास) करते देख उन गौओं में से प्रत्येक को उनकी अभीष्ट वस्तु दी । बेटा ! वरदान मिलने के पश्चात गौओं के सींग प्रकट हो गये। जिसके मन में जैसे सींग की इच्छा थी उसके वैसे ही हो गये। नाना प्रकार के रूप-रंग और सींग से उत्पन्न हुई उन गौओं की बड़ी शोभा होने लगी।।ब्रह्माजी का वरदान पाकर गौऐं मंगलमयी, हव्य-कव्य प्रदान करने वाली, पुण्यजनक, पवित्र, सौभाग्यवती तथा दिव्य अंगों एवं लक्षणों से सम्पन्न हुईं । गौऐं दिव्य एवं महान तेज हैं। उनके दान की प्रशंसा की जाती है। जो सत्पुरुष मात्सर्य का त्याग करके गौओं का दान करते हैं, वे पुण्यात्मा कहे गये हैं। वे सम्पूर्ण दानों के दाता माने गये हैं। निष्पाप शुकदेव। उन्हें पुण्यमय गोलोक की प्राप्ति होती है। द्विजश्रेष्ठ ! गोलोक के सभी वृक्ष मधुर एवं सुस्वादु फल देने वाले हैं। वे दिव्य फल-फूलों से सम्पन्न होते हैं। उन वृक्षों के पुष्प दिव्य एवं मनोहर गंध से युक्त होते हैं । वहां की भूमि मणिमयी है। वहां बालू का कांचनचूर्ण रूप है। उस भूमि का स्पर्श सभी ऋतुओं में सुखद होता है। वहां धूल और कीचड़ नाम भी नहीं है। वह भूमि सवर्था मंगलमयी है ।

महाभारत अनुशासनपर्व अध्याय 80 श्लोक 1-17

महाभारत: अनुशासनपर्व: अशीतितमो अध्याय: श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद
गौओं तथा गोदान की महिमा
वसिष्ठ जी कहते है- राजन। मनुष्य को चाहिए कि सदा सबेरे और सांयकाल आचमन करके इस प्रकार जप करें- ‘घी और दूध देने वाली, घी की उत्पत्ति का स्थान, घी को प्रकट करनें वाली, घी की नदी तथा घी की भवंर रुप गौएं मेरे घर में सदा निवास करें। गौ का घी मेरे हृदय में सदा स्थित रहें। घी मेंरी नाभि में प्रतिष्ठित हो। घी मेंरे सम्पूर्ण अंगो में व्याप्त रहे और घी मेरे मन में स्थित हो। गौएं मेरे आगे रहें। गौएं मेरे पीछे रहें। गौएं मेरे चारो और रहें और में गौओ के बीच में निवास करु। इस प्रकार प्रतिदिन तप करनें वाला मनुष्य दिन भर में जो पाप करता है, उससे छुटकारा पा जाता है।सहस्त्र गौओ का दान करने वाले मनुष्य जहां सोने के महल है, जहां स्वर्ग गंगा बहती है तथा जहां गन्धर्व और अप्सराएं निवास करती है, उस स्वर्ग लोक में जाते है।।सहस्त्र गौओं का दान करने वाले पुरुष जहां दूध के जल से भरी हुइ, दही के सेबार से व्याप्त हुई तथा मक्खन रुपी कीचड़ से युक्त हुई नदियां बहती है, वहीं जाते हैं। जो विधि पूर्वक एक लाख गौओ का दान करता है, वह अत्यन्त अभ्युदय को पाकर स्वर्ग लोक में सम्मानित होेता है । वह मनुष्य अपने माता और पिता की दस-दस पीढ़ीयों को पवित्र करके उन्हें पुण्यमय लोकों में भेजता है। जो गाय के तिल के बराबर तिल की गाय बनाकर उसका दान करता है, अथवा जो जनधेनु का दान करता है, उसे यमलोक में जाकर वहां की कोइ यातना नहीं भोगनी पड़ती है। गौ सबसे अधिक पवित्र, जगत का आधार और देवताओं की माता है। उसकी महिमा अप्रमेय है। उसका सादर स्पर्श करें और उसे दाहिनें रखकर चलें तथा उत्तम समय देखकर उसका सुपात्र ब्राह्माण को दान करें। जो बड़े- बड़े सींगो वाली कपिला धेनु को वस्त्र ओढ़ाकार उसे बछड़े और कांसी की दोहिनी सहित ब्राह्माण को दान करता है, वह मनुष्य यमराज की दुर्गम सभा में निर्भय होकर प्रवेश करता है। प्रतिदिन यह प्रार्थना करनी चाहिये कि सुन्दर एवं अनेक प्रकार के रुप-रंग वाली विश्‍वरुपिणि गो माताएं सदा मेरे निकट आयें । गोदान से बढ़कर कोई पवित्र दान नहीं है। गोदान के फल से श्रेष्ठ दूसरा कोइ फल नही है तथा संसार में गौ रस से बढ़कर कोइ उत्कृष्ट प्राणी नहीं है। त्वचा, रोम, सींग, पूंछ के बाल, दूध और मेदा आदि के साथ मिलकर गौ (दूध, दही, घी आदि के द्धारा) यज्ञ का निर्वाह करती है; अतः उससे श्रेष्ठ दूसरी कौन-सी वस्तु है । जिसने समस्त चराचर जगत् को व्याप्त कर रखा है, उस भूत और भविष्य की जननी गौ को में मस्तक झुकाकर प्रणाम करता हूं। नरश्रेष्ठ। यह मैनें तुमसे गौओ के गुण वर्णन सम्बन्धी साहित्य का एक लघु अंश मात्र बताया है- दिग्दर्शन मात्र कराया है। गौओ के दान से बढ़कर इस संसार में दूसरा कोइ दान नहीं है, तथा उनके समान दूसरा कोइ आश्रय भी नहीं है। भीष्म जी कहते है- महर्षि वसिष्ठ के ये वचन सुनकर भूमिदान करने वाले संयतात्मा महात्मना राजा सौदास नें ‘यह बहुत उत्तम पुण्य कार्य है’ ऐसा सोचकर ब्राम्हणो को बहुत सी गौऐं दान दी। इससे उन्हें उत्तम लोकों की प्राप्ति हुई ।

इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व के अन्‍तगर्त दानधर्मपर्वमें गोदान विषयक असीवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 79 श्लोक 18-27

महाभारत: अनुशासन पर्व: एकोनाशीतितम अध्याय: श्लोक 18-27 का हिन्दी अनुवाद
जो लटकते हुए गल कंबल से युक्त मोटी ताजी सवसा गौ को अलंकृत करके ब्राह्माण को दान देता है, जब वह बिना किसी वाधा के विश्‍वेदेवों के श्रेष्ठ लोकों में पहुंच जाता है। जो गौर वर्ण वाली और दूध देने वाली शुभलक्षिणा गौओं को वस्त्र ओढ़ाकर समान रंग वाले बछड़े सहित दान करता है, वह बसुओं के लोक में जाता है। जो श्‍वेत कंबल के समान रंग सवत्सा गौ को वस्त्र से आच्छादित करके कांस्य के दुग्ध पात्र सहित दान करता है, वह साध्यों के लोक में जाता है। राजन। जो विशालविशाल पृष्ठ भाग को बैल को सब प्रकार के रत्नों ने अलंकृत करके उसका दान करता है, वह मरुद् गणोंकेलोकों में जाता है। जो मनुष्य यौवन से सम्पन्न और सुन्दर अंग वाले बैल को सम्पूर्ण रत्नों से विभूषित करके उसका दान करता है, वह गन्धर्बों और अप्सराओं के लोकों को प्राप्त करता है। जो लटकते हुए गल कंबल वाले तथा गाड़ी का बोझ ढ़ोने में समर्थ बैल को सम्पूर्ण रत्नों से अलंकृत करके ब्राह्माण को देता है, वह शोक रहित हो प्रजापति के लाकों में जाता है। राजन। गोदान में अनुराग पूर्वक तत्पर रहने वाला पुरूष सूर्य के समान देदीप्यमान विमान में बैठकर मेंघमंडल को भेदता हुआ स्वर्ग में जाकर सुशोभित होता है। उस गोदान परायण श्रेष्ठ मनुष्य को मनोहर वेष और सुन्दर नितम्ब वाली सहस्त्रों देवांगनाएं (अपनी सेवा से) रमण करती है। वह वीणा और वल्ल्लकी के मधुर गुंजन, मृगनयनी युवतियों के नुपुरों की मनोहर झनकारों तथा हास-परिहास के शब्दों को श्रवण करके नींद से जागता है। गौ के शरीर में जितने रोंए होते है, उतनें वर्षो तक वह स्वर्ग लोक में सम्मानपूर्वक रहता है। फिर पुण्य क्षीण होने पर जब वह स्वर्ग से नीचे उतरता है, तब इस मनुष्य लोंक में आकर सम्पन्न घर में जन्म लेता है।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व के अन्‍तगर्त दानधर्मपर्वमें गौओं की उत्पत्ति का गोदान विषयक उन्यासीवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 79 श्लोक 1-17

महाभारत: अनुशासन पर्व: एकोनाशीतितम अध्याय: श्लोक 1-17 का हिन्दी अनुवाद
गौओं को तपस्‍या द्वारा अभीष्‍ट वर की प्राप्ति तथा उनके दान की महिमा, विभिन्‍न प्रकार के गौओं के दान से विभिन्‍न उत्‍तम लोकों में गमन का कथन

वसिष्ठजी कहते हैं- मानद परंतप। प्राचीन काल में जब गौओं की सृष्टि हुई थी, तब उन गौओं ने एक लाख वर्षों तक बड़ी कठोर तपस्या की थी। उनकी तपस्या का उद्वेश्‍य यह था कि हम श्रेष्ठता प्राप्त करें। इस जगत में जितनी दक्षिणा देने योग्य वस्तुऐं हैं उन सब में हम उत्तम समझी जायें। किसी दोष से लिप्त न हों। हमारे गोबर से स्नान करने पर सदा सब लोग पवित्र हों। देवता और मनुष्‍य पवित्रता के लिये हमेशा हमारे गोवर का उपयोग करें। समस्त चराचर प्रणी भी हमारे गोबर से पवित्र हो जायें और हमारा दान करने वाले मनुष्य हमारे ही लोक (गोलोक धाम) में जायें। जब उनकी तपस्या समाप्त हुई, तब साक्षात् भगवान ब्रम्हा ने उन्हें वर दिया-‘गौ । ऐसा ही हो- तुम्हारे मन में जो संकल्प है, वह परिपूर्ण हो। तुम सम्पूर्ण जगत के जीवों का उद्वार करती रहो’। इस प्रकार अपनी समस्त कामनाऐं सिद्व हो जाने पर गौऐं तपस्या से उठी। वे भूत, भविष्य और वर्तमान- तीनों कालों की जननी हैं, अतः प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर गौओं को प्रणाम करना चाहिये इससे मनुष्यों का पुष्टि प्राप्त होती है। महराज। तपस्या समाप्त होने पर गौऐं सम्पूर्ण जगत का आश्रय बन गयी; इसलिये वे महान सौभाग्यशालिनी गौऐं परम पवित्र बताई जाती हैं। यह समस्त प्राणियों के मस्तक पर स्थित है। (अर्थात सबसे श्रेष्ठ एवं वंदनीय है)। जो मनुष्य दूध देने वाली सुलक्षिणा कपिला गौ को वस़्त्र ओढ़ाकर कपिल रंग के बछड़े सहित दान करता है, वह ब्रह्म लोक में सम्मानित होता है। जो मनुष्य दूध देने वाली सुलक्षिणा लाल रंग की गौ को वस्त्र ओढ़ाकर लाल रंग के बछड़े सहित दान करता है, वह सूर्य लोक में सम्मानित होता है। जो पुरूष दूध देने वाली सुलक्षिणा चितकबरी गौओं को वस्त्र ओढ़ाकर चितकबरे बछड़े सहित दान करता है, वह चन्द्रलोक में पूजित होता है। जो मानव दूध देने वाली सुलक्षिणा स्वेत वर्ण की गौओं को वस्त्र ओढ़ाकर स्वेत वर्ण के बछड़े सहित दान करता है, उसे इन्द्रलोक में सम्मान प्राप्त होता है। जो मनुष्य दूध देने वाली सुलक्षिणा कृष्णवर्ण गौओं को वस्त्र ओढ़ाकर कृष्णवर्ण के बछड़े सहित दान करता है, वह अग्निलोक में प्रतिष्ठित होता है। जो पुरूष दूध देने वाली सुलक्षिणा धूऐं- जैसे रंग की गौ को वस्त्र ओढ़ाकर धूऐं के समान रंग के बछड़े सहित दान करता है, वह यमलोक में सम्मानित होता है। जो जल के फेन के समान रंग वाली गौ को वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्य के दुग्ध सहित दान करता है, वह वरुण लोक को प्राप्त होता है। जो हवा से उड़ी हुई धूल के समान रंग वाली गौ को वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्य के दुग्ध पात्र सहित दान करता है, उसकी वायुलोक में पूजा होती है। जो सुवर्ण के समान रंग तथा पिंगल वर्ण के नेत्र वाली गौ को वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े और कांस्य के दुग्ध पात्र सहित दान करता है, वह कुबेर-लोक को प्राप्त होता है। जो पुआल के धूऐं के समान रंग वाली बछड़े सहित गौ को वस्त्र से आच्छादित करके कांस्य के दुग्ध पात्र सहित दान करता है, वह पितृ-लोक में प्रतिष्ठित होता है।

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 78 श्लोक 17-25

महाभारत: अनुशासन पर्व: अष्टसप्ततितम अध्याय: श्लोक 17-25 का हिन्दी अनुवाद
‘गौओं केमूत्र और गोबर से किसी प्रकार उद्विग्न न हो, घृणा न करें और उनका मांस न खाऐं। इससे मनुष्य को पुष्टि प्राप्त होती है। ‘प्रतिदिन गौओं का नाम लें। उनका कभी अपमान न करें। यदि बुरे स्वप्न दिखाई दे तो मनुष्य गौ माता का नाम लें। ‘प्रतिदिन शरीर में गोबर लगाकर स्नान करें। सूखे हुए गोबर पर बैठें। उस पर थूक न फैंकें, मल-मूत्र न छोड़ें तथा गौओं के तिरस्कार से बचता रहे। ‘भीगे हुए गौ चर्म पर बैठकर भोजन करें। पश्चिमदिशा की ओर देखें और मौन हो भूमि पर बैठकर घी का भक्षण करें। इससे सदा गौओं की वृद्वि एवं पुष्टि होती है। ‘अग्नि में घृत से हवन करें। घृत से ही स्वस्ति वाचन करायें। घृत का दान करें और स्‍वयं भी गौ का घृत खायें। इससे मनुष्य सदा गौओं की पुष्टि वृद्वि का अनुभव करता है। ‘ जो मनुष्य सब प्रकार के रत्नों से युक्त तिल की धेनु को ‘गोमां अग्नेविमां अश्वि’ इत्यादि गोमती मंत्र से अभिमंत्रित करके उसका ब्राह्माण को दान करता है, वह किये हुए शुभाशुभ कर्म के लिये शोक नहीं करता । ‘जैसे नदियां समुद्र के पास जाती हैं, उसी तरह सोने के मढ़ी हुई सींगों वाली, दूध देने वाली सुरभि और सौरभेयी गौऐं मेरे निकट आयें। ‘ मैं सदा गौओं का दर्शन करूं और गौऐं मुझ पर कृपा-दृष्टि करें। गौऐं हमारी हैं और हम गौओं के हैं। जहां गौऐं रहें, वहीं हम रहें। ‘जो मनुष्य इस प्रकार रात में या दिन में सम अवस्था में या विषम अवस्था में तथा बड़े-से-बड़े भय आने पर भी गौ माता का नाम कीर्तन करता है, वह भय से मुक्त हो जाता है।
इस प्रकार श्रीमहाभारत अनुशासनपर्व के अन्‍तगर्त दानधर्मपर्वमें गोदान विषयक अठहत्तरवाँ अध्‍याय पूरा हुआ।

महाभारत अनुशासन पर्व अध्याय 78 श्लोक 1-16

अष्टसप्ततितम (78) अध्‍याय: अनुशासन पर्व (दानधर्म पर्व)



महाभारत: अनुशासन पर्व: अष्टसप्ततितम अध्याय: श्लोक 1-16 का हिन्दी अनुवाद

वसिष्‍ठ का सौदास को गोदान की विधि एवं महिमा बताना


भीष्मजी कहते हैं- राजन। एक समय की बात है, वक्ताओं में श्रेष्ठ इक्ष्वाकुवंशी राजा सौदान ने सम्पूर्ण लोकों में विचरने वाले, वैदिक ज्ञान के भण्डार, सिद्व सनातन ऋषि श्रेष्ठ वषिष्ठजी से, जो उन्हीं के पुरोहित थे, प्रणाम करके इस प्रकार पूछना आरंभ किया। सौदास बोले- भगवन। निष्पाप महर्षे। तीनों लोकों में ऐसी पवित्र वस्तु कौन कही जाती है जिसका नाम लेने मात्र से मनुष्य को सदा उत्तम पुण्य की प्राप्ति हो सके? भीष्मजी कहते हैं- राजन। अपने चरणों में पड़े हुए राजा सौदास से गवोपनिषद् (गौओं की महिमा के गूढ रहस्य को प्रकट करने वाली विद्या) के विद्वान पवित्र महर्षि वषिष्ठ ने गौओं को नमस्कार करके इस प्रकार कहना आरंभ किया- ‘राजन। गौओं के शरीर से अनेक प्रकार की मनोरम सुगंध निकलती हरती है तथा बहुतेरी गौऐं गुग्गल के समान गंध वाली होती हैं। गौऐं समस्त प्राणियों की प्रतिष्ठा (आधार) हैं और गौऐं ही उनके लिये महान मंगल की निधि हैं। गौऐं ही भूत और भविष्य हैं। गौऐं ही सदा रहने वाली पुष्टि का कारण तथा लक्ष्मी की जड़ हैं। गौओं को जो कुछ दिया जाता है, उसका पुण्य कभी नष्ट नहीं होता। ‘गौऐं ही सर्वोत्तम अन्न की प्राप्ति में कारण हैं। वे ही देवताओं को उत्तम हविष्य प्रदान करती हैं। स्वाहाकार (देवयज्ञ) और वश ट्कार (इन्द्रयाग)- ये दोनो कर्म सदा गौओं पर अबलम्बित हैं। ‘गौऐं ही यज्ञ का फल देने वाली हैं। उन्हीं में यज्ञों की प्रतिष्ठा है। गौऐं ही भूत और भविष्य हैं। उन्हीं में यज्ञ प्रतिष्ठित हैं, अर्थात यज्ञ गौओं पर ही निर्भर हैं । ‘महातेजस्वी पुरूष प्रवर। प्रातःकाल और सायंकाल सदा होम के समय ऋषियों का गौऐं ही हवनीय पदार्थ (घृत आदि) देती हैं। ‘प्रभो। जो लोग (नव प्रसूति का दूध देने वाली) गौ का दान करते हैं वे जो कोई भी दुर्गम संकट आने वाले हैं, उन सबसे अपने किये हुए दुष्कर्मों से तथा समस्त पाप समूह से भी तर जाते हैं। ‘जिसके पास दा गौऐं हों, वह एक गौ का दान करे। जो सौ गाय रखता हो, वह दस गौओं का दान करे और जिसके पास एक हजार गौऐं मौजूद हों वह सौ गौऐं दान में दे तो इन सबको बरावर ही फल मिलता है । ‘जो सौ गौओं का स्वामी होकर भी अग्निहोत्र नहीं करता, जो हजार गौऐं रखकर भी यज्ञ नहीं करता तथा जो धनी होकर भी कृपणता नहीं छोड़ता- ये तीनों मनुष्य अर्ध्‍य (सम्मान) पाने के अधिकारी नहीं हैं । ‘जो उत्तम लक्षणों से युक्त कपिला गौ को वस्त्र ओढ़ाकर बछड़े सहित उसका दान करते हैं और उसके साथ दूध दोहने के लिये कांस्य का एक पात्र भी देते हैं वे इहलोक और परलोक दोनों पर विजय पाते हैं । ‘शत्रुओं को संताप देने वाले नरेश। जो लोग जवान, सभी इन्द्रियों से सम्पन्न, सौ गायों यूथपति, बड़ी-बड़ी सींगों वाले गवेन्द्र वृषभ (सांड़) को सुसज्जित करके सौ गायों सहित उसे श्रोत्रिय ब्राह्माण को दान करते हैं, वे जब-जब इस संसार में जन्म लेते हैं तब-तब महान ऐश्‍वर्य के भागी होते हैं। ‘गौओं का नाम- कीर्तन किये बिना न सोयें, उनका स्मरण करके ही उठें और सबेरे-शाम उन्हें नमस्कार करें। इससे मनुष्य को बल एवं पुष्टि प्राप्त होती है ।