मंगलवार, 29 नवंबर 2016

श्री भक्तमाल – गौ ब्राह्मण प्रतिपालक भगवान् श्री परशुराम SRI BHAKTAMAL – SRI PARSHURAM JI

एक बार महर्षि ऋचीक से उनकी पत्नी और सास दोनो ने ही पुत्र प्राप्ति के लिये प्रार्थना की। महर्षि ऋचीक ने उनकी प्रार्थना स्वीकार करके दोनो के लिये अलग अलग मंत्रो से चरु पकाया और स्नान करनेके लिये चले गये ।सत्यवती की मां ने यह समझकर कि ऋषिने अपनी पत्नी के लिये श्रेष्ठ चरु पकाया होगा अतः उसने बेटी से वह चरु मांग लिया । इसपर सत्यवती ने अपना चरु माँ को दे दिया और माँ का चरु वह स्वयं खा गयी । 
जब ऋचीक मुनिको इस बातका पता चला, तब उन्होंने अपनी पत्नी सत्यवती-से कहा कि तुमने बडा अनर्थ कर डाला। अब तुम्हारा पुत्र तो लोगो को दण्ड देनेवाला घोर प्रकृतिका होगा और तुम्हारा भाई होगा एक श्रेष्ठ ब्रह्मवेत्ता । (सत्यवती-ने ऋचीक मुनि को प्रसन्न किया और प्रार्थना की कि  स्वामी ! ऐसा नहीं होना चाहिये । तब उन्होंने कहा – अच्छी बात है । पुत्रके बदले तुम्हारा पौत्र वैसा घोर प्रकृतिका होगा । समयपर सत्यवतीके गर्भसै जमदग्निका जन्म हुआ ।(परंतु जमदग्नि की जगह उनके पुत्र परशुराम घोर प्रकृति के हुए) के  सत्यवती समस्त लोकों को पवित्र करनेवाली परम पुण्यमयी कौशिकी नदी बन गयी । 
महाभारत्तमें कहा गया है कि त्रेतायुग एवं द्वापरयुग के सन्धिकाल में वैशाख शुक्ल तृतीया ( अक्षय तृतीया) के शुभ दिन उत्तम नक्षत्र और उत्तम मुहूर्त में भृगुकुलोत्पन्न महर्षि जमदग्नि एवं काशिराज सुता भगवती रेणुका के माध्यमसे भगवान् विष्णुका भार्गवराम (परशुराम) के रूपमें पृथ्वीपर अवतार हुआ । 
महर्षि जमदग्नि का आश्रम रेवा-नर्मदानदी के तटपर था । वहांपर भगवान् परशुरामका आविर्भाव हुआ था । उनके पितामह महातपस्वी ऋचीक का विवाह क्षत्रिय गाधिराज की सुपुत्री (ऋषि विश्वामित्रकी बहिन) सत्यवती के साथ हुआ था । उन दिनों विशेष कारणों से कुछ ब्राह्मण ऋषियोंके विवाह क्षत्रिय राजकन्याओ के साथ हुए हैं । ऐसे विवाहोंमें संतति ब्राह्मण ही मानी जाती है । महर्षि जमदग्नि एवं भगवती रेणुका को पाँच पुत्र हुए
१ ) रुमण्वान् २) सुषेण ३ ) वसु ४) विश्वावसु तथा ५) भार्गवराम (परशुराम) । परशुराम सबसे छोटे थे तथापि सबसे वीर एवं वेदज्ञ थे ।
पाँच वर्षकी अवस्था में उनका सविधि यझोपवीत संस्काऱ हुआ, तत्पश्चात् माता पिता की सम्मति लेकर वे शालग्रामक्षेत्रमे जाकर गुरु महर्षि कश्यप के समक्ष उपस्थित हुए और शास्त्र तथा शस्त्रका ज्ञान प्रदान करनेके लिये उनसे प्रार्थना की ।
गुरु महर्षि कश्यपने परशुराम को सविधि दीक्षा दी और शास्त्र एवं शस्त्रविद्या सिखाना प्रारम्भ किया । क्रुशाग्रबुद्धि सम्पन्न एवं अदम्य उत्साही होनेसे परशुराम अल्प समयमें ही चारों वेद और धनुविद्यामें निपुण हो गये । गुरु की आज्ञा तथा आशीर्वाद लेकर परशुराम अपने माता पिताके पास आये और उनका भी आशीर्वाद प्राप्त किया । 
परशुराम अपने घरसे प्रस्थान कर गन्धमादन पर्वत पर गये और उत्कट तपस्याद्वारा उन्होंने भगवान् शंकर को प्रसन्न कर उनसे उच्चकोटिकी धनुर्विद्या प्राप्त की- परशुरामने भगवान् शंकरसे ४१ अस्त्र भी प्राप्त किये, जो भयंकर तथा महाविनाशक थे, जैसे कि ब्रह्मास्त्र, रौद्रास्त्र, आग्नेयास्त्र, वायत्वास्त्र इत्यादि। इन महान् अस्त्रों के प्रताप से परशुराम महाधनुर्धर एवं मन्त्रविशारद हुए ।
वाल्मीकी रामायण में वर्णन है कि परशुराम महापुरुष, भीमकाय, जटावल्कलधारी, अनाचारी पाण्याचारी राजाओ के विनाशक थे। उनके एक स्कन्धपर बडा भारी अतितीक्ष्य परशु (फरसा) रहता था और दूसरे स्कन्धपर विद्युत् सा अमोघ धनुष रहता था । वे त्रिपुरघ्न त्रिपुरके विध्वंसक महाबली शिवसदृश थे । ये रुरु नामक मृगका चर्म धारण करते।धनुर्वेद की विधिवत् शिक्षा इन्होंने अपने पिता से ही प्राप्त की।पिता के चरणों में परशुराम जी की अनन्य भक्ति थी।अत्यंत तीक्ष्ण धार वाला अमोघ परशु धारण करने के कारण भगवान् राम का परशु सहित नाम परशुराम पड़ा।यह परशु भगवान् शंकर के उसी महातेज से निर्मित हुआ था, जिससे श्रीविष्णु का सुदर्शन चक्र और देवराज इंद्र का वज्र बना था।
हरिवंश (२।३९।२१-२२) में उनके विषयमें वर्णन है कि एक बार जब बलराम और श्रीकृष्णने दक्षिणापथ की यात्रा की तो सह्याचलक्री पर्वतश्रेणियों के समीप वे वेणा नदीके तया पहुँचे, वहाँ एक विशाल बरगद का वृक्ष था, उसी वृक्षके नीचे विराजमान भूगुनन्दन परशुरामजी को उन्होंने देखा, जिनके एक कन्धे पर फरसा था और जो जटा और वल्कल धारण किये हुए थे । उनके शरीरका वर्ण गौर तथा अग्निशिखा के समान प्रकाशमान था । वे सूर्यके समान तेजस्वी दिखायी देते थे । क्षत्रियोंका अन्त करनेवाले परशुराम किसीसे क्षुब्ध होनेवाले नहीं थे । प्रणामनिवेदन एबं कुशलक्षेमके अनन्तर मगधराज ज़रासंध के साथ किस प्रकार युद्ध किया जाय और विजय मिले, इस विषय में श्रीकृष्णने महाबली परशुराम से मार्गदर्शन प्राप्त किया था । 
भगवान् दत्तात्रेय श्री विद्या के परम आचार्य है। इन्हीने परशुराम जी को अधिकारी जानकार श्री विद्या का उपदेश किया था। दत्तात्रेय भगवान् से परशुराम जी ने षोडशी मन्त्र की दीक्षा ग्रहण कर साधना हेतु महेंद्रपर्वत पर जाकर भगवती त्रिपुरसुंदरी की आराधना की और उनसे चिरंजीवी पद प्राप्त किया।भगवती की कृपा से वे सिद्ध पुरुष बन गए।
भीष्मपितामह ने परशुराम जी से अस्त्र विद्या सीखी थी । 
महाभारत में वर्णन है–  एक बार भीष्मपिततामह ने अपने भाई विचित्रवीर्य के लिये काशिराज की तीन कन्याओ ( १) अम्बा ( २) अम्बिका और (३) अम्बालिका का स्वयंवर से जाकर हरण किया था । उनमे से अम्बाने कहा कि उसे राजा शाल्व के साथ प्रेम है । ऐसा सुनकर भीषाने उसे मुक्त कर दिया । अम्बा जब शाल्व के यास गयी तो उसने भीष्मद्वारा अपहृत हुई जानकर उसका त्याग कर दिया । इससे वह क्रुद्ध हुई और भीष्म को पाठ सिंखाने के लिये महाबली परशुराम की सहायता प्राप्त करने हेतु जमदग्नि ऋषिके आश्रममें पहुंची । उसने सारा वृत्तान्त परशुरामजी को सुनाया और भीष्म उसे स्वीकार करें, ऐसा करने की विनती को । अम्बा काशिराज की पुत्री थी और परशुराम की माता रेणुका भी काशी से सम्बन्धित थी । इस घनिष्ट सम्बन्ध से परशुराम जी ने अम्बा को सहायता देनेका वचन दिया । फिर परशुरामने दूत भेजकर अपने शिष्य भीष्म को अपने यास बुलवाया और अम्बा को स्वीकार करनेको कहा । आजीवन ब्रह्मचर्यव्रतधारी भीष्मने गुरु परशुरामका प्रस्ताव अमान्य कर दिया । शिष्य की अवज्ञा  देखकर परशुराम क्रुद्ध हुए और युद्धके लिये आह्वान किया । 
परशुराम जी के पास रथ नहीं था । तब भीष्म ने कहा ब्रह्मन्! मैं रथपर बैठा हूँ और आप धरती पर खड़े है इस कारण मैं  आपसे युद्ध नहीं करूँगा । मुझसे युद्ध करने के लिये आप कवच पहनकर रथारूढ़ हो जायँ । तब युद्धभूमि में मुस्कराते हुए परशुराम जी ने भीष्म से कहा-  कुरुनन्दन भीष्म मेंरे लिये पृथ्वी ही रथ है, चारों वेद ही उत्तम अश्नोंके समान मेरे वहन हैं, वायुदेव ही सारथि हैं और वेदमाताएं (गायत्री, सावित्री और सरस्वती) ही कवच हैं । इन सबसे आवृत एवं सुरक्षित होकर मैं रणक्षेत्रमे युद्ध करूँगा । 
इतना कहकर पराक्रमी परशुरामजी ने भीष्म को अपने वीक्ष्य शरोंसे घेर लिया । उस समय भीष्म ने देखा -परशुरामजी एक नगरतुल्य विस्तृत, अद्भुत एवं दिव्य विमानमें बैठे हैं । उसमें दिव्य अश्व जुते थे । वह स्वर्णनिर्मित रथ प्रत्येक रीतिसे सजा हुआ था । उसमें सम्पूर्ण श्रेष्ठ आयुध रखे हुए थे । परशुराम जी ने सूर्य-चन्द्र-खचित कवच शरण कर रखा था और उनके प्रिय सखा वेदवेत्ता अकृतव्रण उनके सारथिका कार्यं कर रहे थे। परम पराक्रमी, परम तेजस्वी, परम तपस्वी, परम पितृभक्त भगवान् परशुराम जी के साथ भीष्म का भयानक संग्राम हुआ ।गुरु शिष्यका भीषण युद्ध तेईस दिनपर्यन्त चला । सुहृदोंके समझाने पर युद्ध बंद हुआ तो भीष्म ने परमर्षि परशुराम जी के समीप जाकर उनके चरणोंमें प्रणाम किया । परशुरामजीने मुस्कराकर भीष्म से कहा –
भीष्म ! इस जगत में भूतलपर विचरने वाला कोई भी क्षत्रिय तुम्हरे समान नहीं है । जाओ, इस युद्धमें तुमने मुझे बहुत संतुष्ट किया है ।
उन दिनों हैहयवंश का अधिपति था अर्जुन ( सहस्त्रबाहु नाम से भी जाने जाते है)। वह एक श्रेष्ठ क्षत्रिय था । उसने अनेकों प्रकार की सेवा शुश्रुषा करके भगवान् दत्तात्रेय जी को प्रसन्न कर लिया और उनसे एक हजार भुजाएँ तथा कोई भी शत्रु युद्धमें पराजित न कर सके ,यह वरदान प्राप्त कर लिया । साथ ही इंद्रियों का अबाध बल, अतुल सम्पत्ति, तेजस्विता, वीरता, कीर्ति और शारीरिक बल भी उसने उनके, कृपासे प्राप्त कर लिये थे । वह योगेश्वर हो गया था । उसमें ऐसा ऐश्वर्य था किं वह सूक्ष्म से सूक्ष्म, स्थूल से स्थूल रूप धारण कर लेता । सभी सिद्धियां उसे प्राप्त थीं । वह संसारमें वायु की तरह सब जगह बेरोक टोक विचरा करता । एक बार गले में वैजयन्ती माला पहने सहस्त्रबाहु अर्जुन बहुत भी सुन्दरी स्त्रियो के साथ नर्मदा नदीमें जल विहार कर रहा था । उस समय मदोन्मत्त सहस्त्रबाहु ने अपनी बांहो से नदीका प्रवाह रोक दिया । दशमुख रावणका शिविर भी वहीं कहीं पासमें ही था । नदीकी धारा उलटी बहने लगी, जिससे उसका शिविर डूबने लगा । रावण अपनेको बहुत बडा वीर तो मानता ही था, इसलिये सहस्त्रार्जुन का यह पराक्रम उससे सहन नहीं हुआ ।जब रावण सहस्त्रबाहु अर्जुनके पास जाकर बुरा भला कहने लगा, तब उसने स्त्रियो के सामने ही खेल खेलमें रावण को पकड़ लिया और अपनी राजधानी माहिष्मती ले जाकर बंदरके समान केद कर लिया । पीछे पुलस्त्य जी के कहने पर सहस्त्रबाहु ने रावण को छोड़ दिया ।
एक दिन सहस्त्रबाहु अर्जुन शिकार खेलने के लिये बड़े घोर जंगल मे निकल गया था । दैववश वह जमदग्नि मुनिके आश्रमपर जा पहुंचा । परम तपस्वी जमदग्नि मुनिके आश्रममें कामधेनु गाय रहती थी । उसके प्रताप से उन्होंने सेना,मंत्री और वाहनों के साथ हैहयाधिपति का खूब स्वागत सत्कार किया । वीर हैहयाधिपति ने देखा कि जमदग्नि मुनिका ऐश्वर्य तो मुझसे भी बढा चढा है । इसलिये उसने उनके स्वागत सत्कार को कुछ भी आदर न देकर कामधेनु को ही ले लेना चाहा ,परंतु महर्षि जमदग्नि ने कहा – राजन!यह कामधेनु तो मेरे समस्त धर्म-कर्मो की जननी है।यज्ञीय सामग्री,देवता,ऋषि,पितर और अतिथियों का सत्कार ही नहीं,इसी गौके द्वारा मेरे सारे इहलौकिक तथा पारलौकिक कर्म संपन्न होते है।मैं इसे देनेका विचार भी कैसे कर सकता हूँ। उसने अभिमानवश जमदग्नि मुनिसे माँगा भी नहीं, अपने सेवकों को आज्ञा दी कि कामधेनु को छीन ले चलो । उसकी आज्ञासे उसके सेवक बछड़े के साथ बां बां डकराती हुई कामधेनुको बलपूर्वक महिषातीपुरी ले गये । 
जब वे सब चले गये, तब परशुरा जी आश्रमपर आये और उसकी दुष्टता का वृत्तान्त सुनकर चोट खाये हुए साँप की तरह क्रोधसे तिलमिला उठे । उन्हीने राजा कार्तवीर (सहस्त्रबाहु) करने की भीषण प्रतिज्ञा कर ली।तब महर्षि जमदग्नि ने कहा की तुम ब्रह्मदेव के पास जाकर उनसे आज्ञा ले आओ। ब्रह्मदेव के पास जाने पर ब्रह्मदेव ने परशुराम को भगवान् शिव की आज्ञा लेने को कहा। परशुराम वहासे कैलाश पर्वतपर पहुचे और शिव जी को सारा वृत्तांत सुनाया ।शिव जी ने प्रसन्न होकर पापाचारी राजा कार्तवीर्य का वध करने की आज्ञा दी। परशराम जी अपना भयंकर फरसा, तरकस, ढाल एवं धनुष लेकर बड़े बेगसे उसके पीछे दौड़े जिसे कोई किसीसे न दबने वाला सिंह हाथीपर टूट पड़े।
सहस्त्रबाहु अर्जुन अभी अपने नगर में प्रवेश कर की रहा था कि उसने देखा परशुरामजी महाराज बड़े वेगसे उसीकी ओर झपटे आ रहे हैं । उनकी बडी विलक्षण झाँकी थी । वे हाथमें धनुष बाण और फरसा लिये हुए थे, शरीरपर काला मृगचर्म धारण किये हुए थे और उनकी जटाएँ सूर्य की किरणों के समान चमक रही थी । 
उन्हें देखते ही उसने गदा, खड्ग,बाण, ऋष्टि, शतघ्नी और शक्ति आदि आयुधो सेे सुसज्जित एवं हाथी, घोड़े, रथ तथा पदातियों से युक्त अत्यन्त भयंकर सत्रह अक्षोहिणी रोना भेजी । भगवान परशुराम ने बात ही बात में अकेले ही उस भारी सेना को नष्ट कर दिया ।भगवान् परशुरामजी की गति मन और वायुके समान थी । बस, वे शत्रु की सेना काटते ही जा रहे थे । जहाँ-जहाँ वे अपने फरसे का प्रहार करते, वहाँ वहाँ सारथि और वाहनोंके साथ बडे बडे वीरो की बाँहें, जाँघे और कंधे कट-कटकर पृथ्वीपर गिरते जति थे ।हैहयाधिपति अर्जुनने देखा कि मेरी सेनाके सैनिक, उनके धनुष, ध्वजाएँ और ढाल भगवान् परशुराम के फरसे और बाणोंसे कट-कटकर खूनसे लथपथ रणभूमि में गिर गये हैं, तब उसे बडा क्रोध आया और वह स्वयं भिड़नेके लिये आ धमका।
उसने एक साथ ही अपनी हजार भुजाओ से पाँच  धनुष्यो पर बाण चढाये और परशुराम जी पर छोड़े । परंतु परशुरामजी तो समस्त शस्त्र धारियों के शिरोमणि ठहरे । उन्होंने अपने एक धनुष पर छोड़े हुए बानो से ही एक साथ सबको काट डाला ।अब हैहयाधिपति अपने हाथों से पहाड़ और पेड़ उखाड़कर बड़े वेगसे युद्धधुतिमें परशुरामजी की ओर झपटा।
महाबली परशुराम भगवान् ने अपने सामर्थ्य के विषय में दुष्ट राजा कार्तवीर्य से गर्जना करते हुए कहा था- 
मेरे अग्रभाग में चारो वेदों का दिव्या महातेज है और मेरे पृष्ठभाग में मंत्रयुक्त शिवधनुष है,मई वेदमंत्रों के शाप से भी और अमोघ बाण से भी पृथ्वी को ध्वंस कर सकता हूं।
परशुरामजी ने अपनी तीखी धारवाले फरसे से बडी फुर्तीके साथ उसकी सांपो के समान भुजाओं को काट डाला ।जब उसकी बाहे कट गयी, तब उन्होंने पहाड़ की चोटीकी तरह उसका ऊँचा सिर धड़से अलग कर दिया । पिताके मर जानेपर उसके दस हजार लड़के डरकर भग गये ।
गौ भक्त परशुराम जी ने जैसे ही गौ माता को देखा तो जैसे महापाषाण द्रवित हो गया हो ,परशुराम जी के नेत्रो से अश्रु निकल पड़े। उन्होंने गौ माता के गले में अपनी लंबी बाहे दाल दी ।विपक्षी विरोंके नाशक परशुरामजी ने बछड़ेके साथ कामधेनु लौटा ली । वह बहुत ही दुखी हो रही थी। उन्होंने उसे अपने आश्रमपर लाकर पिताजी को सौंप दिया और महिष्मतीमें सहस्त्रबाहु ने तथा उन्होंने जो कुछ किया था, सब अपने पिताजी तथा भाइयों को कह सुनाया ।यद्यपि शिव जी ने आज्ञा दी थी राज के वध की परंतु फिर भी महर्षि जमदग्नि का मन परशुराम जी द्वारा किये भीषण हिंसा से अशांत हो गया। सब कुछ सुनकर जमदग्नि मुनिने कहा -हाय, हाय, परशुराम ! तुमने बड़ा पाप किया । राम, राम ! तुम बडे वीर हो, परंतु सर्वदेवमय नरदेवका तुमने व्यर्थ ही वध किया ।बेटा ! हमलोग ब्राह्मण हैं । क्षमाके प्रभाव सेे ही इम संसारमें पूजनीय हुए हैं । और तो क्या, सबके दादा ब्रह्माजी भी क्षमाके बलसे ही ब्रह्मपदक्रो प्राप्त हुए हैं । ब्राह्मणोंकी शोभा क्षमाके द्वारा ही सूर्यंकी प्रभाके समान चमक उठती है । सर्वशक्तिमान् भगवान् श्रीहरि भी क्षमावानोंपर ही शीघ्र प्रसन्न होते हैं ।  बस ! सार्वभौम राजाका वध ब्राह्मणक्री हत्यासे भी बढकर है । जाओ, भगवान् का स्मरण करते हुए तीर्थो का सेवन करके अपने पापों को धो डालो ।तुम्हारे लिए प्रायश्चित्त आवश्यक है।
परशुराम जी ने कहा – पिताजी, प्रेमपूर्वक स्वागत करनेवाले तपस्वी ब्राह्मण की गाय बलपूर्वक छीन लेने वाले नराधम और परम पातकी का वध पाप नहीं।परशुराम जी ने सर झुकाकर शांतिपूर्वक उत्तर दिया।पर आपके आदेश अनुसार मई प्रायश्चित्त अवश्य करूँगा।आपकी प्रत्येक आज्ञा मुझे शिरोधार्य है।
इसके बाद वे एक वर्षतक तीर्थयात्रा करके अपने आश्रमपर लौट आये । एक दिन की बात है ,परशुराम जी की माता रेणुका गंगातट पर गयी हुई थीं । वहां उन्होंने देखा कि गन्धर्वराज चित्ररथ कमलों की माला पहने अप्सराओ के साथ विहार कर रहा है । वे जल लानेके लिये नदीतट पर गयी थी, परंतु वहाँ जलक्रीडा करते हुए गन्धर्व को देखने लगों अंतर पतिदेव के हवनका समय हो गया है इस बातको भूल गयी । उनका मन कुछ कुछ चित्ररथ की ओर खिंच भी गया था । हवनका समय बीत गया, यह जानकर वे महर्षि जमदग्नि के शापसे भयभीत हो गयीं और तुरंत वहासे आश्रमपर चली आयी । वहां जलका कलश महर्षिके सामने रखकर हाथ छोड़ खडी हो गयीं ।  जमदग्नि मुनिने अपनी पत्नी का मानसिक व्यभिचार जान लिया और क्रोध करके कहा – मेरे पुत्रो ! इस पापिनी को मार डालो। परंतु चारो में से किसी भी पुत्र ने उनकी यह मातृवध की आज्ञा स्वीकार नहीं की । इसके बाद पिता की आज्ञासे परशुराम जी ने माताके साथ साथ चारो भाइयो का मस्तक काट दिया। अपने पिता जी के योग और तपस्याका प्रभाव वे भलीभांति जानते थे ।पशुरामजी के इस कार्य पर महर्षि जमदग्नि बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने कहा- बेटा ! तुम्हारी जो इच्छा हो, वा मांग लो । 
परशुरामजीने कहा -पिताश्री ! मेरी माता और सब भाई जीवित हो जायँ तथा उन्हें इस बात की याद न रहे कि मैंने उन्हें मारा था है । युद्ध में मेरा कोई सामना कर सके और मैं दीर्घायु प्राप्त करू। यही होगा इस प्रकार महर्षि बोले ,आगे उन्हीने कहा इन सब के सिर इनके धड़ से जिद दो। जैसे कोई सोकर उठे, सब के सब अनायास ही सकुशल उठ बैठे । उन्हीने समझा ,हमें गाढ़ निद्रा आ गयी थी। परशुराम जी ने अपने पिताजी का तपोबल जानकर ही तो अपने सुहृदों का वध किया था।
सहस्त्रबाहु के जो लड़के परशुराम जी सेे हारकर भाग आये थे, उन्हें अपने पिताके वध की याद निरन्तर बनी रहती थी । कही एक क्षणके लिये भी उन्हें चैन नहीं मिलता था । एक दिन की बात है, परशुरामजी अपने भाइयों के साथ आश्रम से बाहर वन में दूर चले गये हुए हैे। यह अवसर पाकर वैर साधने के लिये सहस्त्रबाहुके लड़के वहाँ आ पहुँचे ।उस समय महर्षि जमदग्नि अग्निशालामें बैठे हुए थे और अपनी समस्त वृत्तियों से पवित्रकीर्ति भगवान् के ही चिन्तनमें मग्न हो रहे थे । उन्हें बाहर की कोई सुध न थी । उसी समय उन पापियोंने जमदग्नि ऋषि को मार डाला। उन्होंने पहले से ही ऐसा पापपूर्ण निश्चय कर रखा था। परशुराम जी की माता रेणुका बड़ी दीनता से उनसे प्रार्थना कर रही थी परंतु उन सबो ने उनकी एक न सुनी। वे पापी महर्षि जमदग्नि का मस्तक काट कर अपने साथ ले गए। 
सती रेणुका दुःख और शोक से आतुर हो गयी और सिर पीट पीटकर जोर जोर से रोने लगी-  परशुराम ! बेटा परशुराम शीघ्र आओ । परशुरामजीने बहुत दूरसे माता का ‘हा राम ! हा राम!यह करुण क्रन्दन सुन लिया । वे बडी शीघ्रतासे आश्रमपर आये और वहां जाकर देखा कि पिताजी मार डाले गये हैं ।उस समय परशुरामजी को बडा दुख हुआ । साथ ही क्रोध, असहिष्णुता, मानसिक पीडा और शोकके वेगसे वे अत्यन्त मोहित हो गये । ‘हाय पिताजी ! आप तो बड़े महात्मा थे । पिताजी ! आप तो धर्मके सच्चे पुजारी थे । आप हमलोगों को छोड़कर स्वर्ग चले गये है । परशुराम जी ने अपने मृत पिता के शरीर पर इक्कीस घाव देखे। इस प्रकार विलापकर उन्होंने पिताका शरीर तो भाइयों को सौंप दिया और स्वयं हाथमे फरसा उठाकर क्षत्रियोंका संहार कर डालनेका निश्चय किया ।  परशुरामजीने माहिषाती नगरीमें जाकर सहस्त्रबाहु अर्जुनके पुत्रोंके सिरों से नगरके बीचो-बीच एक बड़ा भारी पर्वत खडा कर दिया । उस नगरक्री शोभा तो उन ब्रह्मधाती नीच क्षत्रियोंके कारण ही नष्ट हो चुकी थी ।उनके रक्त से एक बडी भयंकर नदी बह निकली, जिसे देखकर ब्राह्मणद्रोहियोंका ह्रदय भयसे कांप उठता था । भगवान् ने देखा कि वर्तमान क्षत्रिय अत्याचारी हो गये हैं । इसलिये उन्होंने अपने पिताके वध का निमित्त बनाकर इक्वदीस बार मृथ्वीको क्षत्रिय हीन कर दिया और कुरुक्षेत्रके समन्तपंचक में ऐसे पांच तालाब बना दिये, जो रक्तके जलसे भरे हुए थे ।
*विविध ग्रंथो में कल्प भेद के अनुसार विविध कथाये प्राप्त होती है।
रेणुका माहात्म्य नामक ग्रन्थ में लिखा है – परशुराम जी ने एक पलड़े में महर्षि जमदग्नि का धड़ रखा तथा दूसरे पलड़ेमे विधवा माता रेणुका को बैठाया, फिर कांवड़ को अपने कंधेपर उठाकर तीर्थाटन को चल पड़े और सह्याद्रिपर्वत पर माहुरगढ़ नामक तीर्थक्षेत्रमें पहुंचे । उस समय आकाशवाणी सुनायी पडी कि इस पवित्र क्षेत्रमें तुम अपने पिता महर्षि जमदग्नि के धड़का अग्नि संस्कार करो । तब परशुरामने वैसा ही किया । वहांपर रेणुका स्वपति के देहके साथ अग्नि में प्रविष्ट होकर सती हुई । 
महाभारत्तमें आया है कि भगत्रान् परशुरामने इस पृथ्वीको इक्सीस बार क्षत्रियो से सूनी करके उनके रक्तसे  समन्तपंचक में पांच रुधिर कुण्ड भर दिये और रक्ताञ्जलिके द्वारा उन कुंडो में पितरोंका तर्पण किया तर्पण के समय उन्होंने अपने पितामहका साक्षात् दर्शन किया । ऋचीक आदि पितृगण परशुराम जी के पास आकर बोले – राम ! तुम्हारी पितृभक्ति और पराक्रमसे हम बहुत प्रसन्न हैं, तुम्हें जिस वरकी अभिलाषा हो, माँग लो । इसपर परशुरामजीने कहा -पितृगणो ! मैंने जो क्रोधवश क्षत्रियवंश का विध्वंस किया है, इस पापसे मैं मुक्त हो जाऊँ और मेरे बनाये ये सरोवर पृथ्वी में प्रसिद्ध तीर्थ हो जायँ । ऐसा ही होगा-‘ एवं भविष्यति  ( महाभारत) यह कहकर पितरोंने उन्हें वरदान दिया और कहा- अब शेष क्षत्रिय वंश का संहार मत करना ,उन्हें क्षमा कर देना ।
स्कंदपुराण में वर्णन है-यद्यपि परशुराम जी के पाप पितरों के आशीर्वाद से ही भस्म हो गए थे परंतु भगवान् शिव का माहात्म्य प्रकट करने हेतु भगवान् ने एक लीला रची। 
परशुराम जी को क्षत्रियों के वध करने का जो पाप लगा । उस पाप के प्रयाश्चित्त के लिये उन्होंने अश्वमेध यज्ञ किया । उस यज्ञ में सारी पृथ्वी उन्होंने कश्यप ऋषि को दान में दे डाली और असंख्य ब्राह्मणों को हाथी, घोडा, रथ, पालकी, सोना, चांदी अदि दिये । यह सब करनेपर भी परशुराम जी को अनेक प्राणियों के वधज़नित पाप से मुक्ति नहीं मिली । इससे वे रैवतक पर्वत पर गये और वहां बहुत समय तक उग्र तप करते रहे । कठिन तप करनेपर भी हत्या से छुटकारा न मिलनेपर परशुराम ने महेन्द्र, मलय, सह्य, हिमालय आदि पवित्र पर्वतो की यात्रा की । तत्पमृचात् नर्मदा, यमुना, चन्द्रभागा, गंगा, इरावती, वितस्ता, चर्मण्वती, गोमती, गोदावरी आदि पुण्यसलिला नदियों में श्रद्धापूर्वक स्नान किया ।
इसीके साथ साथ गया, कुरुक्षेत्र, नैमिशारण्य, पुष्कर, प्रभास आदी सभी तीर्थो का सेवन किया, पर हत्याजनित पापसे मुक्ति नहीं मिली । अपने इस कठिन परिश्रम को निष्फल देखकर परशुराम जी अपने मनमें सोचने लगे कि मैने तीर्थो का सेवन क्रिया, पवित्र नदियो के जलसे अपने पापो को धोने का प्रयत्न किया, घोर तपस्या भी की, परंतु मुझे हत्या के पाप से छुटकारा नहीं मिला । इससे ज्ञात होता है कि आजकल ये लिब निसत्त्व हो गये है । अतएव इनका सेवन करना व्यर्थ है । मैने अपने शरीर को व्यर्थ ही कष्ट दिया । वे इस प्रकार दुखित हो ही रहे थे कि इतने में देवर्षि नारद वहाँ आ पहुंचे । उन्हें सादर अभिवादन कर परशुरामजी कहने लगे कि देवर्षे! पिताकी आज्ञासे मैंने अपनी माता का वध किया और पिताके वध करनेवालों से बदला लेनेके लिये भुमण्डल के समस्त क्षत्रियो का विनाश कर डाला । यह सब करनेपर मुझे हत्याजनित पाप का भय हुआ, उसके निवारण के लिये मैंने अनेक तप और तीर्थ किये, पर. अब तक किसीसे प्रायश्चित्त नहीं हुआ ।
नारदजी बोले कि महाकाल वन(उजैन अवंतिका) में ब्रह्महत्या-जनित पाप का निवारण करनेवाला सर्व सिद्धि दायक ज़टेश्वर नामक शिवजी का एक महालिङ्ग है । परशुराम ! तुम वहां शीघ्र जाओ और उनकी आराधना करो । उनके प्रसाद से तुम समस्त पापोंसे मुक्त हो जाओगे ।  नारदजी के उपदेशानुसार परशुराम जी उसी समय उनको
प्रणाम कर सर्वकामना परिपूरक पवित्र महाकालवन को चल दिये । वहां पहुंचकर चिरकाल तक श्री जटेश्वर महादेवजी की आराधना की। उनकी एकनिष्ठ आराधना से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने लिङ्गसे प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिये । उनके परमानन्दप्रद दर्शन पाकर परशुराम जी मुग्ध हो गये और स्तुति करने लगे कि ‘प्रभो ! आप शरणागतवत्सल हैं दीनजनोंके हित करने के लिये आप अनेक रूप धारण करते है । हे करुणावरुणालय ! मैं इस समय हत्याजनित पापसे दबा जा रहा हूं । इससे मेरा उद्धार कीजिये । यदि जाप मुझपर प्रसन्न है तो मुझे यही वर दीजिये कि आपके चरण कमलों में मेरा अविचल एवं प्रगाढ़ प्रेम बना रहे । उनकी स्तुति से भगवान् शंकर प्रसन्न होकर उन्हें हत्या के पाप-से मुक्त कर दिया और कहा कि आजसे इस लिङ्गका नाम तुम्हारे ही नामसे विख्यात होगा । इसे लोग अब ‘रामेश्वर’ कहेंगे (यह रामेश्वर शिवलिंग श्रीराम द्वारा स्थापित लिंग से पृथक है)। जो लोग भक्ति पूर्वक रामेश्वर की पूजा करेंगे, उनके जन्म भरके पाप जल जायेंगे । हजारों ब्रह्म हत्याओ के भी पाप श्रीरामेश्वरजी के दर्शन करने से विनष्ट हो जायेगे । स्कन्दपुराण के अवन्तिखंड (लिङ्गमाहाल्य २९ । ४७ ५० ) में इस शिवलिंग का बड़ा माहात्म्य लिखा है ।
श्रीमद्भागवत में लिखा है-परशुराम जी ने अपने पिताजीका सिर लाकर उनके धड़ से जोड़ा दिया और यज्ञोंद्वारा सर्वदेवमय आत्मस्वरुप भगवान का यजन किया । 
यज्ञोंमें उन्होंने पूर्व दिशा होता को, दक्षिण दिशा ब्रह्माक्रो, पश्चिम दिशा अध्वर्यु को और उत्तर दिशा सामगान करनेवाले उद् गाता को दे दी । इसी प्रकार अग्निकोण आदि दिशाएँ ऋत्विजो को दीं, कश्यपजी को मध्यधुति दी, उपद्रष्टा को आर्यावर्त दिया तथा दूसरे सदस्यों को अन्यान्य दिशाएं प्रदान कर दीं । इसके बाद अज्ञात स्नान करके वे समस्त पापोंसे मुक्त हो गये और ब्रह्मनदी सरस्वती के तटपर मेघरहित सूर्य के समान शोभायमान हुए । महर्षि जमदग्नि को स्मृतिरूप संकल्पमय शरीर की प्राप्ति हो गयी । परशुराम जी से सम्मानित होकर वे सप्तर्षियोंके मण्डलमें सातवें ऋषि हो गये ।  कमललोचन जमदग्नि नन्दन भगवान् परशुराम आगामी मन्वन्तरमें सप्तर्षिर्योक्रे मण्डलमें रहकर वेदों का विस्तार करेंगे ।  वे आज भी किसीको किसी प्रकारका दण्ड न देते हुए शान्त चित्तसे महेन्द्र पर्वतपर निवास करते हैं । वहां सिद्ध, गन्धर्व और चारण उनके चरित्रका मधुर गान करते रहते हैं । 
समस्त पृथ्वी का दान कर भगवान् परशुराम महेंद्र पर्वत पर निवास करने लगे तब एक समय महर्षि भरद्वाज के यशस्वी पुत्र द्रोण धनुर्वेद, दिव्यास्त्रों एवं नीतिशास्त्र के ज्ञान के लिए भगवान् परशुराम के पास पहुँचे। मैं आंगिरस कुलोत्पन्न महर्षि भरद्वाज का अयोनिज पुत्र द्रोण हूं।अपना परिचय देते हुए द्रोण ने परशुराम जी के चरणों में प्रणाम् किया और कहा- मै धन की इच्छासे आपके पास आया हूं, आप मुझपर दया करे। 
अब तो मैंने केवल अपने शारीर को ही बचा रखा है अन्य सब कुछ दान कर दिया। किसी एक को मांग लो । प्रभो! आप मुझे सम्पूर्ण अस्त्र उनके प्रयोग तथा उपसंहार विधि प्रदान करे । द्रोणने निवेदन किया । तब रेणुकानन्दन ने अपने सब अस्त्र द्रोण को दे दिये । आचार्य द्रोण परशुराम।जी से दुर्लभ ब्रह्मास्त्र का भी ज्ञान प्राप्तकर धरतीपर अत्यधिक शक्तिशाली हो गये । 
श्री परशुराम जी कल्पांत स्थायी है।अधिकारी व्यक्ति को आज भी भगवान् परशुराम के दर्शन होते है। ऐसे महान शिव भक्त, पितृभक्त, गौ भक्त ,महाबली ,गौ-ब्राह्मण रक्षक भगवान् परशुराम को कोटिशः वंदन है।

श्री भक्तमाल – गौ भक्त राजर्षि दिलीप) SRI BHAKTAMAL – SRI DILEEP JI

​शास्त्रो में राजा को भगवान् की विभूति माना गया है। साधारण व्यक्ति से श्रेष्ट राजा को माना जाता है, राजाओ में भी श्रेष्ट सप्तद्वीपवती पृथ्वी के चक्रवर्ती सम्राट को और अधिक श्रेष्ट माना गया है। ऐसे ही पृथ्वी के एकछत्र सम्राट सूर्यवंशी राजर्षि दिलीप एक महान गौ भक्त हुऐ। 
महाराज दिलीप और देवराज इन्द्रमें मित्रता थी । देवराज के बुलानेपर दिलीप एक बार स्वर्ग गये । देव असुर संग्राम में देवराज ने महाराज दिलीप से सहायता मांगी। युद्ध समाप्त होने पर स्वर्ग से लौटते समय मार्गमें कामधेनु मिली; किंतु दिलीप ने पृथ्वीपर आने की आतुरता के कारण उसे देखा नहीं । कामधेनु को उन्होंने प्रणाम नहीं किया , न ही प्रदक्षिणा की।  इस अपमान से रुष्ट होकर कामधेनु ने शाप दिया- मेरी संतान(नंदिनी गाय) यदि कृपा न करे तो यह पुत्रहीन ही रहेगा । 
महाराज दिलीप को शापका कुछ पता नहीं था । किंतु उनके कोई पुत्र न होने से वे स्वयं, महारानी तथा प्रजाके लोग भी चिन्तित एवं दुखी रहते थे । पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महाराज दिलीप रानीके साथ कुलगुरु महर्षि वसिष्ठ के आश्रमपर पहुंचे । महर्षि सब कुछ समझ गए। महर्षि ने कहा यह गौ माता के अपमान के पाप का फल है। सुरभि गौ की पुत्री नंदिनी गाय हमारे आश्रम पर विराजती है । महर्षि ने आदेश दिया- कुछ काल आश्रम में रहो और मेरी कामधेनु नन्दिनी की सेवा करो। 
महाराज ने गुरु की आज्ञा स्वीकार कर ली । महारानी सुदक्षिणा प्रात: काल उस गौ माता की भलीभाँति पूजा करती थी । आरती उतारकर नन्दिनी को पतिके संरक्षण-में वन में चरने के लिये विदा करती । सम्राट दिनभर छाया की भाँती उसका अनुगमन करते, उसके ठहरने पर ठहरते, चलनेपर चलते, बैठने पर बैठते और जल पीनेपर जल पीते । संध्या काल में जब सम्राट के आगे-आगे सद्य:प्रसूता, बालवत्सा (छोटे दुधमुँहे बछड़े वाली) नन्दिनी आश्रम को लौटती तो महारानी देवी सुदक्षिणा हाथमें अक्षत-पात्र लेकर उसकी प्रदक्षिणा करके उसे प्रणाम करतीं और अक्षतादिसे पुत्र प्राप्तिरूप अभीष्ट-सिद्धि देनेवाली उस नन्दिनी का विधिवत् पूजन करतीं ।
अपने बछड़े को यथेच्छ पय:पान(दूध पान) कराने के बाद दुह ली जानेपर नन्दिनी की रात्रिमें दम्पति पुन: परिचर्या करते, अपने हाथों से कोमल हरित शष्प-कवल खिलाकर उसकी परितृप्ति करते और उसके विश्राम करने पर शयन करते । इस तरह उसकी परिचर्या करते इक्कीस दिन बीत गये । एक दिन वन में नन्दिनी का अनुराग करते महाराज दिलीप की दृष्टि क्षणभर अरण्य (वन) की प्राकृतिक सुंदरता में अटक गयी कि तभी उन्हें नन्दिनी का आर्तनाद सुनायी दिया । यह एक भयानक सिंहके पंजों में फँसी छटपटा रही थी । उन्होंने आक्राम क सिंह को मारने के लिये अपने तरकश से तीर निकालना चाहा, किंतु उनका हाथ जडवत् निश्चेष्ट होकर वहीं अटक गया, वे चित्रलिखे से खड़े रह गये और भीतर ही भीतर छटपटाने लगे, तभी मनुष्य की वाणी में सिंह बोल उठा- राजन्! तुम्हारे शस्त्र संधान का श्रम उसी तरह व्यर्थ है जैसे वृक्षों को उखाड़ देनेवाला प्रभंजन पर्वत से टकराकर व्यर्थ हो जाता है । मैं भगवान् शिव के गण निकुम्भ मित्र कुम्भोदर है ।
भगवान् शिवने सिंहवृत्ति देकर मुझे हाथी आदिसे इस वनके देवदारुओ की रक्षाका भार सौंपा है । इस समय जो भी जीव सर्वप्रथम मेरे दृष्टि पथ में आता है वह मेरा भक्ष्य बन जाता है । इस गाय ने इस संरक्षित वनमें प्रवेश करने की अनधिकार चेष्टा की है और मेरे भोजन की वेलामे यह मेरे सम्मुख आयी है, अत: मैं इसे खाकर अपनी क्षुधा शान्त करूँगा । तुम लज्जा और ग्लानि छोड़कर वापस लौट जाओ । 
किंतु परदु:खकातर दिलीप भय और व्यथा से छटपटाती, नेत्रोंसे अविरल अश्रुधारा बहाती नन्दिनी को देखकर और उस संध्याकाल मे अपनी माँ की उत्कण्ठा से प्रतीक्षा करनेवा ले उसके दुधमुँहे बछड़े का स्मरण कर करुणा-विगलित हो
उठे । नन्दिनी का मातृत्व उन्हें अपने जीवन से कहीं अधिक मूल्यवान् जान पड़ा और उन्होंने सिंह से प्रार्थना की कि वह उनके शरीर को खाकर अपनी भूख मिटा हो और बालवत्सा नन्दिनी को छोड़ दे। 
सिंह ने राजा के इस अदभुत प्रस्ताव का उपहास करते हुए कहा- राजन्! तुम चक्रवर्ती सम्राट  हो । गुरु को नन्दिनी के बदले करोडों दुधार गौएँ देकर प्रसन्न कर सकते हो । अभी तुम युवा हो, इस तुच्छ प्राणीके लिये अपने स्वस्थ-सुन्दर शरीर और यौवन की अवहेलना कर जानकी बाजी लगाने वाले स्रम्राट! लगता है, तुम अपना विवेक खो बैठे हो ।यदि प्राणियों पर दया करने का तुम्हारा व्रत ही है तो भी आज यदि इस गायके बादले में मैं तुम्हें खा लूँगा तो तुम्हारे मर जानेपर केवल इसकी ही विपत्तियों से रक्षा हो सकेगी और यदि तुम जीवित रहे तो पिताकी भाँती सम्पूर्ण प्रजा की  निरन्तर विपत्तियों से रक्षा करते रहोगे । इसलिये तुम अपने सुखभोक्ता शरीर की रक्षा करो । स्वर्गप्राप्ति के लिये तप त्याग करके शरीर की कष्ट देना तुम जैसे अमित ऐश्वर्यशालियों के लिये निरर्थक है । स्वर्ग ?अरे वह तो इसी पृथ्वीपर है । जिसे सांसारिक वैभव-विलास के समग्र साधन उपलब्ध हैं, वह समझो कि स्वर्ग में ही रह रहा है । स्वर्गका काल्पनिक आकर्षण तो मात्र विपन्नो के लिए ही है,सम्पन्नो के लिए नहीं। इस तरह से सिंह ने राजा को भ्रमित करने का प्रयत्न किया। 
भगवान् शंकर के अनुचर सिंह की बात सुनकर अत्यंत दयालु महाराज दिलीप ने उसके द्वारा आक्रान्त नंदिनी को देखा जो अश्रुपूरित कातर नेत्रों से उनकी ओर देखती हुई प्राणरक्षाकी याचना कर रही थी । 
राजा ने क्षत्रियत्व के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए उत्तर दिया- नहीं सिह ! नहीं, मैं गौ माता को तुम्हारा भक्ष्य बनाकर नहीं लौट सकता । मैं अपने क्षत्रियत्व को क्यों कलंकित करूं ?क्षत्रिय संसार में इसलिये प्रसिद्ध हैं कि वे विपत्ति से औरों की रक्षा करते हैं । राज्य का भोग भी उनका लक्ष्य नहीं । उनका लक्ष्य तो है लोकरक्षासे कीर्ति अर्जित करना । निन्दा से मलिन प्राणों और राज्य को तो वे तुच्छ वस्तुओ की तरह त्याग देते हैं इसलिये तुम मेरे यश:शरीर पर दयालु होओ । 
मेरे भौतिक शरीर को खाकर उसकी रक्षा करो; क्योंकि यह शरीर तो नश्वर है, मरणधर्मा है । इसलिये इसपर हम जैसे विचारशील पुरुषों की ममता नहीं होती । हम तो यश: शरीरके पोषक हैं। यह मांस का शारीर न भी रहे परंतु गौरक्षा से मेरा यशः शारीर सुरक्षित रहेगा । संसार यही कहेगा की गौ माता की रक्षा के लिए एक सूर्यवंश के राजा ने प्राण की आहुति दे दी । एक चक्रवर्ती सम्राट के प्राणों से भी अधिक मूल्यवान एक गाय है।
सिंह ने कहा – अगर आप अपना शारीर मेरा आहार बनाना ही चाहते है तो ठीक है। सिंह के स्वीकृति दे देने पर राजर्षि दिलीप ने शास्त्रो को फेंक दिया और उसके आगे अपना शरीर मांसपिंड की तरह खाने के लिये डाल दिया और वे जाके सिर झुकाये आक्रमण की प्रतीक्षा करने लगे, तभी आकाश से
विद्याधर उनपर पुष्पवृष्टि करने लगे । नन्दिनी ने कहा हे पुत्र ! उठो ! यह मधुर दिव्य वाणी सुनकर राजा को महान् आश्चर्य हुआ और उन्होंने वात्सल्यमयी जननी की तरह अपने स्तनोंसे दूध बहाती हुई नन्दिनी गौ को देखा, किंतु सिंह दिखलायी नहीं दिया । आश्चर्यचकित दिलीप से नन्दिनी ने कहा- हे सत्युरुष ! तुम्हारी परीक्षा लेनेके लिये मैंने ही माया स्व सिंह की सृष्टि की थी ।
महर्षि वसिष्ठ के प्रभावसे यमराज भी मुझपर प्रहार नहीं कर सकता तो अन्य सिंहक सिंहादिकी क्या शक्ति है । मैं तुम्हारी गुरुभक्ति से और मेरे प्रति प्रदर्शित दयाभाव से अत्यन्त प्रसन्न हूं । वर माँगो ! तुम मुझे दूध देनेवाली मामूली गाय मत समझो, अपितु सम्पूर्ण कामनाएं पूरी करनेवाली कामधेनु जानो । 
राजा ने दोनों हाथ जोड़कर वंश चलानेवाले अनन्तकीर्ति पुत्रकी याचना की नन्दिनीने ‘तथास्तु’ कहा। उन्होंने कहा राजन् मै आपकी गौ भक्ति से अत्याधिक प्रसन्न हूं ,मेरे स्तनों से दूध निकल रहा है उसे पत्तेके दोने में दुहकर पी लेनेकी आज्ञा गौ माता ने दी और कहा तुम्हे अत्यंत प्रतापी पुत्र की प्राप्ति होगी।
राजाने निवेदन किया-‘ मां ! बछड़े के पीने तथा होमादि अनुष्ठान के बाद बचे हुए ही तुम्हारे दूध को मैं पी सकता हूं । दूध पर पहला अधिकार बछड़े का है और द्वितीय अधिकार गुरूजी का है। 
राजा के धैर्यने नन्दिनो के हृदय को जीत लिया । वह प्रसन्नमना कामधेनु राजा के आगे आगे आश्रम को लौट आयी । राजा ने बछड़े के पीने तथा अग्निहोत्र से बचे दूधका महर्षि की आज्ञा पाकर पान किया, फलत: वे रघु जैसे महान् यशस्वी पुत्र से पुत्रवान् हुए और इसी वंश में गौ भक्ति के प्रताप से स्वयं भगवान् श्रीराम ने अवतार ग्रहण किया। महाराज दिलीप की गोभक्ति तथा गोसेवा सभी के लिये एक महानतम आदर्श बन गयी । इसीलिये आज भी गो भक्तो के परिगणनामे महाराज दिलीप का नाम बड़े ही श्रद्धाभाव एवं आदर से सर्वप्रथम लिया जाता है । 
।।सर्वदेवमयी गौ माता की जय।।

राम कृष्ण की प्यारी गैया

 ॥श्रीसुरभ्यै नमः॥ 
॥राम कृष्ण की प्यारी गैया॥
राम कृष्ण की प्यारी गैया, सारे जग की माता है।
धर्म, अर्ध अरू काम, मोक्ष की दाता भाग्य विधाता है॥
नन्दगांव, गोकुल, वरसाना, गौ से शोभा पाता है।
भारत की शोभा गायों से, गौ ही भारत माता है॥
रोम रोम में बसे देवता, ऋषि मुनि हरि शिव धाता है।
गंगा मूत्र, लक्ष्मी गोमय, पंचगव्य सुखदाता है॥
दूध, दही, घृत, मक्खन से ही, सब जग पोषण पाता है।
विधवा सी धरती बंजर है, गोमय खाद न पाता है॥
अन्न नहीं, जल वायु नहीं, धन धर्म नहीं, संस्कार नहीं।
गाय बचैगी देश बचैगा, गाय बिना सब जाता है॥
नहीं भक्ति यदि गोमाता में, हिन्दु नहीं कहाता है।
शासक वर्ग कसाई समझो, यदि गोवध करवाता है॥
राम कृष्ण की प्यारी गैया, नन्दी शिव को भाता है।
श्रद्धा रूपा गाय नहीं तो, धर्म वृषभ नहीं आता है॥
हिन्दु नहीं, न देश हिन्द है, जहाँ नहीं गोमाता है।
गाय सुखी तो देश सुखी है, गाय बिना दुःख पाता है॥
धरती माता सी गोमाता, सब जग पोषण पाता है।
दूध दही की नदियेॅ बहती, यह इतिहास बताता है॥
है विनाश निश्चत विनाश है, समाधान नहीं पाता है।
गोपालन ही समाधान है, यह धर्म शास्त्र बतलाता है॥
॥गोमाता बचैगी तो देश बचैगा॥
   ॥वन्दे गौ मातरम्॥ 
जय गोमाता जय गोपाल

शनिवार, 26 नवंबर 2016

भक्तमाली श्री गणेशदास जी महाराज का गो सेवा से सम्बंधित महत्वपूर्ण उपदेश –

भक्तमाली श्री गणेशदास जी महाराज का गो सेवा से सम्बंधित महत्वपूर्ण उपदेश –

संपूर्ण भारतीय संस्कृति का मूल आधार गोमाता ही है । और भारतवर्ष का अस्तित्व भी गो पर ही आधारित है । गोवंश भारत की कृषि और अर्थव्यवस्था का मेरुदंड है, उसकी सेवा और रक्षा प्रत्येक नागरिक का परमधर्म है । आप विश्वास कीजिए – “गाय बचेगी तो देश बचेगा ” । आज इस समय पृथ्वी को सुशोभित करने में इन सात की मुख्य भूमिका है ।
गोभिर्विप्रैश्च वेदैश्च सतीभिः सत्यवादिभिः । अलुब्धैर्दानशीलैश्च सप्तभिर्धायते महीः ।।
यह महिमामंडित पृथ्वी गो, ब्राह्मण , वेद , सती साध्वी नारियों, सत्यवादी महानुभावों, लोभरहित सद्पुरुषों एवं सात्विक वृति से भगवत धर्मानुसार दान देने वाले मनुष्यों के द्वारा धारण की गयी है । शास्त्रानुसार प्रसिद्ध इन सात पृथ्वी के धारणकर्ता स्तंभो में गोमाता का सर्वप्रथम स्थान है । शेष सब इसके अनुगत है आश्रित हैं ।
इसी सिद्धांत का गोस्वामी श्री तुलसीदास जी ने अनुशीलन किया – गोद्विज धेनु देव हितकारी । कृपासिंधु मानव तनु धरी ।। (रा.च.मा. ५/३९/३) इस अर्धाली में गोस्वामी पाद ने गो व धेनु इन दो शब्दो का समानार्थक प्रयोग इसी अभिप्राय से किया है की जिससे प्रथम “गो” शब्द भले ही अनेकार्थक मान लिया जाय , किन्तु धेनु शब्द तो सम्यक प्रकारेण गोमाता का ही बोधक है , कारण की गो हमारी संस्कृति का अविभाज्य अंग है । अतः दृष्टि में मानव जीवन का सर्वोत्कृष्ठ फल गोवंश की रक्षा , संरक्षण – संवर्धन हेतु तन-मन-धन से लग जाने में ही है । इसी पवन संकल्प के साथ भारत के संत – महापुरुषों का स्नेह , सौहार्द व कृपा करुणा का बल लेकर व्रज चौरासी सीमान्तर्गत डीग राजस्थान में श्री व्रज कामद सुरभि वन एवं शोध संस्थान, श्री जड़खोर गोधाम की स्थापना की गयी है । यथाशीघ्र हम सबके श्रद्धा समन्वित संगठित प्रयासों से कुछ ही समय में यह एक विशाल दिव्य वैट वृक्ष का स्वरुप धारण कर व्रज चौरासी कोस में समग्र विश्व से पधारे आगन्तुक, दर्शनार्थी व प्रदिक्षणार्थी यहाँ से गो सेवा की प्रेरणा लेकर जायें ऐसा विनम्र प्रयास है।
संरक्षण एवं संवर्धन के साथ-साथ गोमाता के सम्पूर्ण देवत्व पर एक विशेष शोधकार्य – जिसे सुन समझकर लगे की हम त्रयताप ग्रसित प्राणियों ने गो सेवा में बहुत विलंब कर दिया । और अंत में आप सभी गोसेवी भगवच्चरणानुरागी सज्जनो से गो को अपने जीवन में अंगी बना ले , शेष अन्य व्यापारादि सम्पूर्ण व्यवहार जगत को अंग बना ले तो समष्टि जगत में प्राणी मात्र का सम्यक प्रकारेण मंगल हो जायेगा । ऐसी मेरी आप सब को शुभकामना है ।
गो, ब्राह्मण, साधू इन तीनो पर संकट है । घोर कलिकाल है । इन तीनो में सर्वाधिक संकट गाय पर है । गाय का वध किया जा रहा है । ऐसी अवस्था में अपनी सम्पूर्ण ऊर्जा गो सेवा में लगानी चाहिए । और कार्यो में भले ही कमी आ जायें पर गो सेवा में कमी नही आणि चाहिए । गो सेवा से बढ़कर पुण्य कर्म इस दुनिया में कोई नही है । यदि गो सेवा नही करोगे तो गो सेवा के सम्बन्ध में एक वाक्य भी कहने के अधिकारी नही रहोगे । अतः गो सेवा ही गोविन्द की प्रसन्नता का सर्वोपरि साधन है ।
महंत राजेंद्र दास

copied from http://jadkhorgodham.org

सांभार : श्री जड़खोर गोधाम
श्री वृज कामद सुरभि वन एवं शोध संस्थान

श्रीभाईजी-पदरत्नाकर

श्रीभाईजी-पदरत्नाकर ---
अब उन भाग्यवती गायों का,गोकुल का शुभ करिये ध्यान।
जिनकी अपने कर-कमलों से सेवा करते हैं भगवान।
थकी थनों के विपुल भार से मन्थर गति से जो चलती।
बचे तृणांकुर दाँतों में न चबाती नहीं जरा हिलती।
पूँछों को लटकाये देख रहीं श्रीहरि के मुख की ओर।
अपलक नेत्रों से घेरे श्री हरि को वे आनन्द-विभोर।
छोटे-छोटे बछड़े भी हैं घेरे श्री हरि को सानन्द।
मुरली से अति मीठे स्वर में गान कर रहे हरि स्वच्छन्द।
खड़े किये कानों से सुनते हैं हैं वे परम मधुर वह गान।
भरा दूध मुँह में, पर उसको वे हैं नहीं रहे कर पान।
फेनयुक्त वह दूध बह रहा उनके मुख से अपने-आप।
बड़े मनोहर दीख रहे हैं, हरते हैं मन का संताप।
अतिशय चिकनी देह सुगन्धित-युत वह गो-वत्सों का दल।
सुखदायक हो रहा सुशोभित जिनका भारी गल कम्बल।
दोनों कान उठाये सुनते मुरली का रव साँड़ विशाल।
महाभाग वे पशु, जो हरि का संग पा रहे हैँ सब काल।
प्रिय गौमाता प्रिय गोपाल
जय जय श्री राधे

शुक्रवार, 25 नवंबर 2016

गौ,गोपाल,पृथ्वी(गोधरा)

गो, गोपाल, गोधरा-पृथ्वी...

इस वैज्ञानिक युग में घोर अवैज्ञानिक मतिभ्रम फेेला हुआ है। तभी तो नास्तिकता, हिंसा स्वार्थ लोलुपता आदि अवगुणों को अधिकाधिक प्रश्रय मिल रहा है। मानवता पथभ्रष्ट हो गयी है। मनुष्य का मस्तिष्क और शरीर दोनों विकृत  से प्रतीत हो रहे है। यही कारण है कि विज्ञान के अंधभक्त प्राय: धर्म के नाम से चिढ़ते हैं और विज्ञान का नाम सुनकर धर्म के पैर उखड़ जाते हैं ऐसा कहते हुए भी सुने जाते हैं। यह तो धर्म का उपहास करने वालों का असंगत प्रलाप है। इस धर्मप्राण भारतभूमि में इस प्रकार की उक्ति का उच्चार और व्यवहार दोनों ही अनुचित हैं। इसमें भी संदेह नही किधर्म को प्राण मानने वाली आर्य जाति के कतिपय आचार विचार भी दम्भ में ही घुले प्रतीत होते हैं। उदाहरणार्थ गोभक्ति। परस्पर अभिवादन में जै गोपाल हरिकीर्तन मेंं गोपाल जय जय की ध्वनि हम लोग खूब करते हैं। पर गोपाल की परम प्रेयशी गोमाता की रक्षा तथा उसकी स्थिति में सुधार के लिए कुछ वास्तविक कार्य हमसे नही बन पड़ता। इसे दम्भ ही तो कहा जाएगा। वस्तुत:

धर्मो विश्वस्य जगत: प्रतिष्ठा, 
लोके धर्मिष्ठ पापमपनुदन्ति धर्मे,
 सर्व प्रतिष्ठित: तस्माद्घर्म परम वदन्ति।।
यह उपनिषद वाक्य सर्वथा वैज्ञानिक है। इसलिए प्राचीन ऋषियों ने धर्म की सुहढ़ आधार शिला पर ही सनातन आर्य जाति की नींव डाली थी। घोर अंधकारपूर्ण संसार सागर में मार्ग निश्चित करने के लिए धर्म का प्रकाश गृह ही सहायक है औरन् रहेगा।
सत्याधारस्त पस्पैल दयां वर्ति: क्षमा शिखा।
अंधकारे प्रवेष्टव्ये दीपो यत्रे न धार्यताम।।
महाभारत कार की यह उक्ति कितनी रहस्यपूर्ण है। किंतु , हाय हिंदू जाति का यह धर्मदीप अद्यावधि निर्वाणोन्मुख प्रतीत हो रहा है। उसके आधार में ही घुन लगा है। तैल, वर्ति और शिखा की तो कथा ही अलग है। गोजाति का भीषण पतन और उसकी रक्षा के प्रति गोभक्तों की किंकर्तव्य विमूढ़ता यहन्ी तो कर रही है।
वस्तुत: गोशब्द से संपूर्ण आर्य संस्कृति का इतिहास अंर्तनिहित है। परंतु इस रहस्य को समझने के लिए हमारा मस्तिष्क कहां समर्थ है? शरीर और मन को पुष्ट करने के लिए गो दुग्ध रसायन  तो भारतीयों के लिए दुर्लभ होने लग गया है। फिर आत्मा की पुष्टि की कल्पना कैसे करें। इसके लिए हमें अपने अतीत से शिक्षा ग्रहण करनी होगी। हमारे ऋषियों महऋषियों ने बार-बार यह प्रतिपादित किया है कि गाय इस सृष्टि के लिए परमात्मा द्वारा प्रदत्त अलौकिक प्रसाद है। यह हमें सीधे सीधे द्युलोक अंतरिक्ष से प्राप्त हुआ है। अत: इसका सीधा संबंध अंतरिक्ष स्थित उस परम अलौकिक अनंत लोक से जुड़ा हुआ है। यह उसी अनंक का अंश है। अंतरिक्ष लोक का नाम भीगो है तथा अंतरिक्षलोक में रहने पदार्थों को भी गो कहते हैं।
सोअपि गोरूच्यते। सुषुम्न: सूय्र्यरश्मि चंद्रमा गंधर्व:।
चंद्रमा का नाम गो है। सर्वेअपि गावउच्यन्ते। सब प्रकार की किरणें गो शब्द से बोधित होती हैं। चंद्रमा की किरणों को भी गो कहते हैं। बिजली भी गो-पद से बोधित होती है।
गोरिति पृथिव्या नाधेयं यदस्यां भूतानि गच्छन्ति।
अर्थात गो शब्द पृथ्वी का वाचक है, क्योंकि पृथ्वी स्वयं गातियुक्त है और सब प्राणी इस पृथ्वी पर चलते हैं। इस कारण भूमि को गो कहते हैं। इंद्रियों को नाम भी गो है। शरीर के बाल भी गो कहे जाते हैं। वाणी शब्द, वाक्य एवं वक्तृव्य भी गो पद से बोधित होते हैं, हीरा रजत, सुवर्ण आदि खनिज पदार्थों को भी ‘गो’ कहते हैं। वे गो नाम पृथ्वी से ही उत्पन्न होने के कारण घास, वृक्ष, ावनस्पति आदिद भी गो कहते हैं। दिशासूचक यंत्र भी इसी संबंधी से गो कहा जाता है। जिस तरह गो से उत्पन्न दूध, दही, छाछ, दही, मक्खन आदि सभी पदार्थ गो ही कहते जाते हैं, उसी तरह भूमि रूपी गौ से उत्पन्न सभी पदार्थ भी गो कहलाते हैं गो सब में निहित है, गाय में सब समाहित हैं। अत: वेद उनकी अभ्यर्थना करता है।
आ गावो अम्मत्रुत भद्रमकृन्स्सीदन्तु गोष्ठे रणयन्स्वस्मे
प्रजावती: पुरूरूपा इह स्युरिन्द्राय पूर्वी रूषसो दुकाना।।
गौएं आ गयी हैं और उन्होंने हमारा कल्याण किया है। वे गौएं गौशालाओं में बैठे तथा हमें सुख दें, यहां उत्तम बच्चों से युक्त एवं उनके रूपवाली हो।
वे इंद्र के लिए उष: काल के पूर्व दूध देने वाली बने। इसलिए तो इन्हेें माता कहा गया है व इन्हें सर्वथा अवध्य स्वीकार किया गया है। भारतीय संस्कृति एवं हिंदू धर्म में गौमाता का सर्वोच्च स्थान है। वह सर्वदेवमयी है। सर्व पूज्या है, उसका वध करना व उसे पीड़ा पहुंचाना भी अधर्म कहा गया है। यह हिंदुओं की एक मुख्य विशेषता है कि भले ही सारे संसार के दूसरे लोगों ने गो-मांस को एक खाद्य  पदार्थ माना है, हमने गो के शरीर को पवित्र घोषित किया है तथा गौवध को घोर पाप समझकर उसकी निंदा की है। हिंदुओं ने अधिक गहराई से विचार किया है। उनकी दृष्टि इस प्रश्न के आध्यात्मिक पहन्ले की ओर गयी है। यदि ईश्वर की यह इच्छा होती है कि गाय भोजन का अंग बने तो वह गाय के दूध को इतना अमूल्य भोजन विशेषकर बच्चों, बूढ़ों तथा अशक्तों के लिए क्यों बनाता। हमारे ऋषियों ने बहुत गंभीर और लंबे विचार के बाद यहन् पता लगाया कि ईश्वर की जो शक्ति मां के रूप में प्रकट होती है, वही गाय के रूप में भी अभिव्यक्त हुई है। मां का एकमात्र उद्देश्य बच्चे का हित करना है। वह अपने जीवन के प्रत्येक क्षण में यही सोचती रहती हन्ै कि किस प्रकार से बच्चा स्वस्थ, सुखी और भला बने। ऐसा प्रतीत होता है कि उसका अस्तित्व ही इसी कार्य के लिए है। इसी प्रकार गाय का अस्तित्व भी मानव जाति के हित के लिए ही है। दूध तथा उसकेे बने हुए पदार्थों द्वारा मनुष्य जाति का अनेक प्रकार से हित होता है, छोटे से छोटे और निर्बल से निर्बल रोगी से लेकर अत्यंत हृदय पुष्ट व्यक्ति तकको दूध के द्वारा बने हुए पदार्थों से सर्वोत्तम पोषण मिल सकता है। गाय अत्यंत सस्ती से सस्ती घास फूस खाकर सर्वोत्तम भोजन प्रदान करती है। उसका शरीर कैसा आश्चर्यजनक यंत्र है। उस परमपिता परमेश्वर की शक्ति कितनी महान तथा कल्याणकारी है। जो ऐसे विलक्षण यंत्र की रचना कर सकता है। क्या अपनी रसानेन्द्रियों की तृप्ति के लिए ऐसे जीवन को मारना अत्यंत घृणित कृतघनता नही है? क्या ईश्वरीय व्यवस्था के प्रति यह अत्यंत अनुचित विद्रोह नही है। अत: आज ही प्रबल आवश्यकता यह है कि वैज्ञानिकता के नाम पर पाश्चात्य की अधार्मिक विचारधारा का अंधानुकरण करन्ना त्याग करन् मानवता के वैश्विक सत्य को समझें और सत्य का ही अनुसरण करें।  यही हितकारी है। 

मंगलवार, 22 नवंबर 2016

गाय के संवर्धन की आवश्यकता

आज मानव के स्वयं के कल्याण हेतु, विश्व की रक्षा हेतु, पर्यावरण के बचाव के लिये तथा समग्र, अक्षय विकास के लिये गाय के संवर्धन की नितान्त आवश्यकता है ।

गाय को गोमाता के रूप में मानना भी अत्यन्त वैज्ञानिक है । मां के दूध के बाद सबसे पौष्टिक आहार देसी गाय का दूध ही है । इसमें जीव के लिये उपयोगी ऐसे संजीवन तत्व है कि इसका सेवन सभी विकारों को दूर रखता है । जिस प्रकार मां जीवन देती है उसी प्रकार गोमाता पूरे समाज का पोषण करने का सामर्थ्य रखती है ।

इसमें माता के समान ही संस्कार देने की भी क्षमता है । देशज वंशों की गाय स्नेह की प्रतिमूर्ति होती है । गाय जिस प्रकार अपने बछडे अर्थात वत्स को स्नेह देती है वह अनुपमेय है, इसलिये उस भाव को वात्सल्य कहा गया है । वत्स के प्रति जो भाव है वह वत्सलता है । मानव को स्वयं में परिपूर्ण होने के लिये आत्मीयता के इस संस्कार की बडी आवश्यकता है । परिवार, समाज, राष्ट्र व पूरी मानवता को ही धारण करने के लिये यह त्याग का संस्कार अत्यन्त आवश्यक है ।

पूरे विश्व का पोषण करने में सक्षम व्यवस्था के निर्माण के लिये अनिवार्य तत्व का संस्कार गोमाता मानव को देती है । शोषण मानव को दानव बनाता है । गोमाता संस्कार देती है दोहन का । दोहन अर्थात अपनी आवश्यकता के अनुरूप ही संसाधनों का प्रयोग । जिस प्रकार गाय का दूध निकालते समय बछडे की आवश्यकता को संवेदना के साथ देखा जाता है उसी प्रकार जीवन के सभी क्रिया-कलापों में भोग को नियंत्रित करने का संस्कार दोहन देता है ।

आज सारी व्यवस्था ही शोषण पर आधारित हो गई है । इस कारण सम्पन्न व विपन्न के बीच की खाई ब‹ढती जा रही है । गोमाता के मातृत्व को केन्द्र में रखकर बनी व्यवस्था से ही “सर्वे भवन्तु सुखिन:” को साकार करना सम्भव हो सकेगा । इसी आदर्श को प्रस्थापित करने हमारे ज्ञानी ॠषी पूर्वजों ने गाय की पूजा की ।

गौ-विज्ञान को पुन: जागृत कर जन -जन में प्रचारित करने की अनिवार्यता है । गोशालाओं के माध्यम से कटती गायों को बचाने के उपक्रम तो आपात्कालीन उपाय के रूप में करने ही होंगे किन्तु गो आधारित संस्कृति के विकास के लिये गो-केन्द्रित जीवन पद्धति को विकसित करना होगा ।