गुरुवार, 13 जुलाई 2017

गाय पूरे विश्व की माता है

गाय पूरे विश्व की माता है

    हमारी संस्कृति में गाय है, हमारे धर्म में गाय है। गाय का और मनुष्य के प्राणों का बहुत ही घनिष्ठ सम्बन्ध है। गाय मानवीय प्रकृति से जितनी मिल-जुल जाती है, उतना और कोई पशु नहीं मिल पाता।
    गाय जितनी प्रसन्न होती है, उतने ही उसके दूध में विटामिन्स उत्पन्न होते हैं और गाय जितनी ही दुःखी होती है, उतना ही दूध कमजोर होता है।
    गाय हमारी ही नहीं, सम्पूर्ण मानव समाज की माँ है और सारे विश्व की माँ है। गाय की रक्षा होती है तभी प्रकृति भी अनुकूल होती है, भूमि भी अनुकूल होती है। गाय की सेवा होने से भूमि की सेवा होती है और भूमि स्वयं रत्न देने लगती है।
    जैसे-जैसे आप गोसेवा करते जायेंगे, वैसे-वैसे आपको यह मालूम होता जायेगा कि गाय आपकी सेवा कर रही है। आपको यह लगेगा कि आप गाय की सेवा कर रहे हैं तो गाय हर तरह से स्वास्थ्य की दृष्टि से, बौद्धिक दृष्टि से, धार्मिक दृष्टि से आपकी सेवा कर रही है।


गौएँ प्राणियों का आधार तथा कल्याण की निधि है ।

गौएँ प्राणियों का आधार तथा कल्याण की निधि है ।
 भूत और भविष्य गौओं के ही हाथ में है । 

वे ही सदा रहने वाली पुष्टिका कारण तथा लक्ष्मी की जड़ हैं । गौओं की सेवा में जो कुछ दिया जाता हैउसका फल अक्षय होता है । अन्न गौओं से उत्पन्न होता है,देवताओं को उत्तम हविष्य (घृत) गौएँ देती हैं तथा स्वाहाकार (देवयज्ञ) और वषटकार (इन्द्रयाग) भी सदा गौओं पर ही अवलंबित है । गौएँ ही यज्ञ का फल देने वाली हैं । उन्हीं में यज्ञों की प्रतिष्ठा है । ऋषियों को प्रात:काल और सांयकाल में होम के समय गौएँ ही हवन के योग्य घृत आदि पदार्थ देती है । जो लोग दूध देने वाली गौ का दान करते हैंवे अपने समस्त संकटों और पाप से पार हो जाते हैं ।

जिनके पास दस गायें हो वह एक गौ का दान करे,जो सौ गायें रखता होवह दस गौ का दान करे और जिसके पास हज़ार गौएँ मौजूद होवह सौ गाये दान करे तो इन सबको बराबर ही फल मिलता है ।
 
जो सौ गौओं का स्वामी होकर भी अग्निहोत्र नहीं करताया हज़ार गौएँ रखकर भी यज्ञ नहीं करता तथा जो धनी होकर भी कंजूसी नहीं छोड़ता-ये तीनो मनुष्य अर्घ्य (सम्मान) पाने के अधिकारी नहीं हैं ।
 
प्रात:काल और सांयकाल में प्रतिदिन गौओं को प्रणाम करना चाहिये । इससे मनुष्य के शरीर और बल की पुष्टि होती है । गोमूत्र और गोबर देखर कभी घृणा न करे । गौओं के गुणों का कीर्तन करे । कभी उसका अपमान न करे । यदि बुरे स्वप्न दिखायी दे तो गोमाता का नाम ले । प्रतिदिन शरीर में गोबर लगा के स्नान करे । सूखे हुए गोबर पर बैठे । उस पर थूक न फेकें । मल-मूत्र न त्यागे । गौओं के तिरस्कार से बचता रहे । अग्नि में गाय के घृत का हवन करेउसीसे स्वस्तिवाचन करावे । गो-घृत का दान और स्वयं भी उसका भक्षण करे तो गौओं की वृद्धि होती हैं । (महा० अनु० ७८ ।५-२१) 



 


भारत में गौ महिमा की वास्तविकता

भारत में गौ महिमा की वास्तविकता

गौ के विषय में हमारा सारा वैदिक साहित्य श्रद्घा और सम्मान से भरा पड़ा है। कई बार तो इस सम्मान व श्रद्घा के भाव को देखकर ऐसा लगता है कि जैसे कुछ अति हो गयी है पर एक विवेकशील व्यक्ति को अपनी आंखें और अपना मस्तिष्क खोलकर ही कुछ पढऩा या समझना चाहिए। किसी व्यक्ति, संस्था, प्राणी, वस्तु या स्थान आदि के विषय में लेखक किस भाव से क्या और क्यों लिख रहा है? पाठक को यह भी ध्यान रखना चाहिए। कहने का अभिप्राय है कि हम यंत्रवत या अंधश्रद्घा के वशीभूत होकर न कुछ पढ़ें और न कुछ समझें। यदि इस भाव से हम कुछ पढ़ेंगे या समझेंगे तो गौमाता को सही संदर्भों और सही अर्थों में समझ सकेंगे।

गौमाता को सही संदर्भों और सही अर्थों में समझने के लिए उसके गुणों और उसकी उपयोगिता को सर्वप्रथम समझना अपेक्षित है। जितना ही हम गाय के गुणों और उसकी उपयोगिता को समझते जाएंगे उतना ही हम यह समझते जाएंगे कि आर्य ग्रंथों में गौ की इतनी अधिक महिमा क्यों वर्णित की गयी है? गौ की महिमा को समझकर ही उसे अवध्या कहा गया है। इस आलेख में हम गौ की महिमा को स्थापित किये गये कुछ ऐसे ही विशेषणों पर चर्चा करना चाहेंगे।

अनाद्या अवध्या गौमाता


ऋग्वेद में गाय को ‘मा गामनागामदितिं वधिष्ट’ कहा गया है। इसका अभिप्राय है कि गाय अदिति अर्थात अविनाशी अमृतत्व का अंश है। मनुष्य को स्वस्थ, हृष्ट पुष्ट और नीरोग रखना, ईश्वरीय प्रेरणा का कार्य है। जिसके लिए ईश्वर ने अनेकों वनस्पतियों व औषधियों की रचना की है, परंतु यदि कोई व्यक्ति अज्ञान से, आलस्य या प्रमाद से उन वनस्पतियों को या औषधियों को अपने प्रयोग में ना ला सके, तो वह गौमाता का पालन-पोषण कर उसके पंचगव्य से भी अपना  काम चला सकता है। जिससे वह निरोग रहेगा। ईश्वर का यह अमृतमयी स्वरूप या तो वनस्पतियों या औषधियों में समाया है या फिर गाय माता में समाया है। इसलिए वह ईश्वर के अमृतत्व का प्रतीक होने से अवध्या है, अदिति है। अमृतत्व स्वयं अमृत होकर औरों को भी अमृत होने का मार्ग दिखाता है। इसकी रक्षा से मनुष्य ही नही सभी प्राणियों की रक्षा की जानी संभव है। क्योंकि मनुष्य गाय के पंचगव्य के प्रयोग से अहिंसक बनता है और उसका विवेक जागृत होता है। जिससे वह गाय के प्रति ही नही अपितु समस्त प्राणियों के प्रति भी अहिंसा भाव से भरा रहता है। गाय अवध्या है, इसीलिए उसे अनागा कहा गया है। अघ्न्या का भी यही अर्थ है कि गौमाता अवध्या है। अन्यत्र कहा गया है-

यत्वगस्थितम् पापं देहे तिष्ठति मामके।
प्राशनात् पंचगव्यस्य दहत्वग्नि रिवेन्धनम्।।

अर्थात जो मेरे शरीर की हड्डियों में पाप प्रविष्ट हो गया है, वह सब पंचगव्य के पान करने से उसी प्रकार नष्ट हो जाए जैसे अग्नि सूखी लकडिय़ों को जलाकर भस्म कर देती है।
गायों को तृण खिलाने से पुण्य मिलता है


हमारे देश में लोग धार्मिक रहें और किसी भी स्थिति में उनका नैतिक पतन ना होने पाये, इसके लिए मनुष्य के लिए वर्जित कर्मों को करने से उसे पाप का लगना तथा न करने से पुण्य का मिलना होना बताया जाता है। पाप-पुण्य पर विचार करने से मनुष्य अपने कार्यों पर ध्यान देता है और अपनी भूमिका को भी संतुलित बनाये रखता है।

गाय की सेवा करने को भी लोगों ने पुण्य के साथ जोड़ा है। पुराने समय में कई लोग गांवों में जंगल से किसी न किसी वनस्पति के तृण लाकर गाय को खिलाया करते थे, यह परंपरा अब धीरे-धीरे लुप्त होती जा रही है। वास्तव में यह परंपरा बड़ी ही उपयोगी और परहितकारी थी। घर के खूंटे पर बंधी गाय को जंगल से विभिन्न स्थानों की घास लाकर खिलायी जाती थी, वह भी इसी परंपरा के कारण थी कि गाय को तृण लाकर खिलाने चाहिए, उससे पुण्य मिलता है। इस परंपरा से गाय को विभिन्न वनस्पतियां खाने को मिलती थीं जिनका अंश औषधीय तत्वों के साथ गाय के दूध में जाता था। इन औषधीय तत्वों से गाय का दूध अमृत और नीरोगता प्रदान करने वाला बनता था। इसलिए परंपरा थी कि जंगल से जो कोई भी गांव की ओर आए वह गाय के लिए किसी न किसी जंगली वनस्पति के तृण अपने हाथ में लाये और लाकर किसी के भी घर में बंधी गाय को उन्हें खिला दे।




यह परंपरा भारत के गांव देहात में पिछले 30-35 वर्ष से लुप्त सी होने लगी है। इस परंपरा के चलते गाय के लिए महिलाएं जंगल से घास लाती थीं, जिसे एक स्थान से न लेकर झोली बनाकर विभिन्न स्थानों से लिया जाता था। जिससे एक नही, अपितु कई प्रकार की वनस्पतियां घास के साथ आ जाती थीं। जिसे गाय खाती थी तो उसके दूध में उस वनस्पति का औषधीय गुण आ जाता था। जो कि सभी के लिए उपयोगी होता था। उससे न जाने किस व्यक्ति का भला हो जाता था। इस प्रकार गाय की सेवा से मनुष्य की सेवा अपने आप ही हो जाती थी। यही कारण था कि लोग गाय को तृण खिलाना पुण्य मानते थे। देखिए तो सही कि भारत की गाय को तृण खिलाने की यह परंपरा कितनी दिव्य थी कि व्यक्ति के घर में कोई गाय नही है तो वह पड़ोसी की गाय के लिए ही जंगल से तृण ला रहा है, जबकि उसे पता है कि उस गाय का दूध उसे तो पीना नही है, पर उसे यह पता है कि न जाने  इस गाय का दूध पीने से किसका भला हो जाएगा? इसी को कहते हैं-‘नेकी कर दरिया में डाल।’ तब हमारा संपूर्ण समाज ही ऐसा था कि वह नेकी कर दरिया डालने में विश्वास करता था। लोकोपकार करने का हमारे पूर्वजों का कितना उत्तम और पवित्र ढंग था यह।
गौग्रास की परंपरा


गौग्रास खिलाने से भी बताया जाता है कि व्यक्ति को पुण्य लाभ मिलता है। महाभारत में आया है कि जो व्यक्ति एक वर्ष तक स्वयं भोजन करने से पूर्व प्रतिदिन दूसरे की गाय को मुट्ठी भर घास (इसी से अंग्रेजी का ग्रास शब्द बन गया है।) ग्रास केवल गाय के लिए ही प्रयोग होता है। यह किसी अन्य पशु के लिए प्रयोग नही किया जाता। कुछ लोग अपने घर से गाय के आटे को गूंथकर ले आते हैं और उसके लड्डू से बनाकर गाय को देते हैं। गौ का यौगिक अर्थ गतिशील है। कहा गया है कि-गच्छति इति गौ-अर्थात जो चलती है, गतिशील है-वह गौ है। संपूर्ण संसार गति कर रहा है। इसलिए वह गौ रूप है। हमारे विद्वानों की यह निराली प्रवृत्ति रही है कि वह जिस गुण को जिस वस्तु में देखते हैं उस जैसे गुण से विभूषित किसी अन्य वस्तु, व्यक्ति, पदार्थ , प्राणि या विभूति से उसकी तुरंत तुलना कर देते हैं। इससे जहां उनके ज्ञान-गाम्भीर्य का पता चलता है, वहीं ऐसा करने से उनके लेखन में दिव्यता आ जाती है और पाठकों को किसी वस्तु या पदार्थादि का किसी अन्य वस्तु या पदार्थादि से तुलना करने का ढंग आ जाता है।

गाय और संसार की परस्पर तुलना करने से भी ऐसा ही हुआ है। इससे संसार की गतिशीलता को गौ की भांति नमनीय, वंदनीय बनाया गया है। इसका अभिप्राय है कि हम निष्क्रिय ना रहें, जीवन में निरंतर प्रवाहमान और गतिशील रहें। जैसे गाय चौबीस घंटे क्रियाशील रहती है और संसार भी क्षण-क्षण, पल-पल गतिशील है-वैसे ही हम भी गतिशील रहें। इस प्रकार संसार को गौ का प्रतिबिम्ब बताकर विद्वानों ने हमारा ही उपकार किया है। हमसे कहा है कि इस संसार में आकर तुम निष्क्रिय मत हो जाना। ‘चरेवैति-चरेवैति’ इसी से उदभूत होकर हमारा मार्गदर्शन कर रहा है। हमारा आचरण (चरैवेति का ‘चर’ ध्यान देने योग्य है) और चाल चलन, खान-पान (चर=चरना अर्थात भोजन करना) सब ऐसे हों जो हमें ‘चलते रहो-चलते रहो’ का संकेत करते रहें। ऐसा करने से गाय, विश्व और व्यक्ति सभी एक दूसरे के पूरक बनकर उन्नति की ओर बढ़ते चले जाएंगे।


बुधवार, 12 जुलाई 2017

गौपालन में सावधानियाँ

गौपालन में सावधानियाँ

गौपालन में लगे हुए उद्यमियों को निम्न बिंदूओं का ध्यान रखना आवश्यक है, अन्यथा लाभ में निरंतर कमी आती जाएगी|
क. प्रजनन
(अ) अपनी आय को अधिक दूध वाले सांड के बीज से फलावें ताकि आने वाली संतान अपनी माँ से अधिक दूध देने वाली हो| एक गाय सामान्यत: अपनी जिन्दगी में 8 से 10 बयात दूध देती हैं आने वाले दस वर्षों तक उस गाय से अधिक दूध प्राप्त होता रहेगा अन्यथा आपकी इस लापरवाही से बढ़े हुए दूध से तो आप वंचित रहेंगे ही बल्कि आने वाली पीढ़ी भी कम दूध उत्पादन वाली होगी| अत: दुधारू गायों के बछड़ों को ही सांड बनाएँ|
(आ) गाय के बच्चा देने से 60 से 90 दिन में गाय पुन: गर्भित हो जाना चाहिए| इससे गाय से अधिक दूध, एवं आधिक बच्चे मिलते हैं तथा सूखे दिन भी कम होते है|
(इ) गाय के फलने के 60 से 90 दिन बाद किसी जानकार पशु चिकित्सा से गर्भ परिक्षण करवा लेना चाहिए| इससे वर्ष भर का दूध उत्पादन कार्यक्रम तय करने में सुविधा होती है|
(ई) गर्भावस्था के अंतिम दो माह में दूध नहीं दूहना चाहिए तथा गाय को विशेष आहार देना चाहिए| इससे गाय को बच्चा जनते वक्त आसानी होती है तथा अगले बयात में गाय पूर्ण क्षमता से दूध देती है|
ख. आहार
(अ) दूध उत्पादन बढ़ाने तथा उसकी उत्पादन लागत कम करने के लिए गाय की सन्तुलित आहार देना चाहिए| संतुलित आहार में गाय की आवश्यकता के अनुसार समस्त पोषक तत्व होते हैं, वह सुस्वाद, आसानी से पचने वाला तथा सस्ता होता है|
(आ) दूध उत्पादन से अधिकतम लाभ प्राप्त करने के लिए, पशु को बारह मास पेट भर हरा चारा खिलाएं| इससे दाने का खर्च भी घटेगा तथा गाय का नियमित प्रजनन भी होगा|
(इ) गाय को आवश्यक खनिज लवण नियमित देंवे|
(ई) गाय को आवश्यक चारा- दाना- पानी नियत समय के अनुसार देवे| समय के हेर-फेर से भी उत्पादन प्रभावित होता है|
ग. रोग नियंत्रण
(अ) संक्रामक रोगों से बचने के लिए नियमित टिके लगवाएं|
(आ) बाह्य परिजीवियों पर नियंत्रण रखे| संकर पशुओं में तो यह अत्यंत आवश्यक है|
(इ) आन्तरिक परजीवियों पर नियंत्रण रखने के लिए हर मौसम परिवर्तन पर आन्तरिक परजिविनाशक दवाएँ दें|
(ई) संकर गौ पशु, यदि चारा कम खा रहा है या उसने कम दूध दिया तो उस पर ध्यान देवें| संकर गाय देशी गाय की आदतों के विपरीत बीमारी में भी चारा खाती तथा जुगाली भी करती है|

(उ) थनैला रोग पर नियंत्रण रखने के लिए पशु कोठा साफ और हवादार होना चाहिए| उसमें कीचड़, गंदगी न हो तथा बदबू नहीं आना चाहिए| पशु के बैठने का स्थान समतल होना चाहिए तथा वहाँ गड्ढे, पत्थर आदि नुकीले पदार्थ नहीं होना चाहिए| थनैला रोग की चिकित्सा में लापरवाही नहीं बरतें|


गौधन की अवनति के कारण

गौधन की अवनति के कारण

1. भैंस का ढूढ़ गाढ़ा व अधिक चिकनाई वाला होने से दूध व्यवसाय में भैंस के दूध को गाय के दूध पर वरीयता दी जाने लगी|
2. आवागमन के साधन बढ़ने से बैलों की उपयोगिता इस क्षेत्र में सीमित रह गई है|
3. ट्रेक्टरों के बढ़ते उपयोग से बैलों की उपयोगिता कृषि कार्यों में शनैः – शनै: घटती जा रही है|
4. रासायनिक खादों एवं कीटनाशक से गोबर, गोमूत्र के उपयोग में कमी आई है| इन सबका प्रभाव स्पष्ट दिखाई दे रहा है| गाँव अब गौ आधारित स्वावलंबी नहीं रहे| उन्हें अपने समस्त कार्यों एवं कृषि आदानों के लिए शहर की ओर देखने पड़ रहा है|
गाँव में रोजगार के अवसर बढ़ाने के लिए तथा कृषकों की आय में वृद्धि के लिए हमें पुन: गौ आधारित स्वावलंबी कृषि की ओर वापस जाना होगा| बदले हुए हालात में आज कम से कम गाय के दूध का उत्पादन बढ़ाकर तथा गोबर व गौमूत्र की प्रयोग से रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर होने वाले खर्च व गौमूत्र के प्रयोग से रासायनिक खाद व कीटनाशकों पर होने वाले खर्च को बचाकर ग्राम लक्ष्मी का पुन: आह्वान किया जा सकता है|
विभिन्न देशों की गायों के दूध उत्पादन के आंकड़ों को देखकर ऐसा लगा कि विकसित राष्ट्रों के गायों का प्रति व्यात दूध उत्पादन विकासशील देशों की गायों के प्रति बयात दूध उत्पादन से कई गुना अधिक है| उदाहरण के लिए इजरायल में 9000 लीटर, अमेरिका में 7000 लीटर, हॉलैंड एवं जर्मनी में 6000 लीटर, जापान में 3000 लिटर दूध एक गाय एक व्यात में देती है जबकि भारत की एक गाय का औसत दूध उत्पदान विकास का पैमाना है| पंजाब, गुजरात, की गायें अधिक दुधारू हैं, ये प्रदेश भी विकसित हैं| म. प्र. में मालवा, निमाड़, मुरैना का गौधन दुधारू है अत: इन क्षेत्रों का किसान भी सम्पन्न है| इससे स्पष्ट है कि एक ब्यात में गाय का दूध जितना अधिक होगा, उतना ही सम्पन्न किसान, प्रदेश और राष्ट्र होगा| कृषि क्षेत्र में अब यह स्थिति आ गई है कि उत्पादन अब लगभग स्थिर हो गया है| उतनी ही उपज प्राप्त करने के लिए अब आदानों पर अधिक व्यय करना पड़ता है| परिवार के आकार बढ़ने से अब जोत के आकार भी छोटे होते जा रहे हैं| ऐसी स्थिति में अब गौपालन ही एक ऐसा व्यवसाय बचा है जिसमें उत्पादन बढ़ाने की अपार संभावना है| अनुभव यह बतलाता है कि एक संकर गाय, औसत देखभाल में एक ब्यात्त में 1500 से 1800 लिटर दूध देती हैं जिसका मूल्य साधारण तथा एक एकड़ दो फसली क्षेत्र से प्राप्त उत्पादन के बराबर होता है|  अत: किसान की आर्थिक हालत पता करने का यह भी एक पैमाना हो सकता है कि जिस किसा के पास जितनी दुधारू संकर गायें हैं, उसकी आमदनी उतनी ही एकड़ों में प्राप्त हो फसली क्षेत्र से प्राप्त आमदनी से होगी| गाय बढ़ाने के लिए गौपालन सर्वोत्तम साधन है|
जहाँ तक भैंस से प्रतियोगिता का प्रश्न है, विश्व में सबसे अच्छी भैंस केवल भारत में ही है| उनका एक ब्यात का दूध उत्पादन 1200 से 1500 लिटर रही है| भैंस के दूध को बढ़ाने की क्षमता सीमित है, उसमें सूखे के दिन अधिक होते हैं तथा उसका प्रजनन मौसमी होता है, उसके रख्राव का खर्च भी अधिक होता है, इसलिए भैंस एक अच्छी दुधारू गाय की तुलना में लम्बे समय तक नहीं टिक पायगी| अत: दूर दृष्टि से सोच कर गाय पालना ही लाभप्रद होगा|

गाय (परिचय)

प्राचीन भारत के विचारकों ने गाय के महत्व को पहचाना था| उन्होंने पाया कि गाय की दूध स्वस्थ शरीर के लिए आवश्यक है,बैलों से खेती, आवागमन के साधन, एवं माल वाहन, गोमूत्र से खाद, कीटनाशक एवं औषिधिय उपयोग तथा भूमि की उत्पादकता बढ़ाने हेतु गोबर खाद ही उत्तम है|
जो आधारित कृषि की ग्राम स्वालंबन के लिए सर्वश्रेष्ठ मानी जाती है| उन्होंने गौ की महिमा मंडित करते हुए गाय को माता का स्थान दिया| गाय को धर्म में इस तरह गूंथ दिया की भारत के उत्तर, दक्षिण, पूर्व और पश्चिम क्षेत्र में अनेक धार्मिक मत-मतोतरों के होते हुए भी गाय को सभी ने पूज्यनीय माना|
भगवान श्रीकृष्ण भी गाय की सेवा करके गोपाल, गोविन्द आदि नामों से पुकारे गये| जब तक गौ आधारित स्वावलंबी खेती होती रही तब तक भारत विकसित धनवान राष्ट्र रहा, यहाँ की सम्पदा के लालच में दिया देशों को लोग भारत पर आक्रमण करते रहे|

गो सेवा का धार्मिक महत्व क्यों!

गो सेवा का धार्मिक महत्व क्यों!

हिंदू धर्म में गाय को देवता और माता के समान मानकर उसकी सेवा शुश्रूषा करना मनुष्य का मुख्य धर्म माना गया है, क्योंकि उसके शरी में सभी देवता निवास करते हैँ। कोई भी धार्मिककृत्य ऎसा नहीं है, जिसमें गौ की आवश्यकता न हो। फिर चाहे वह यज्ञ हो, षोडश संस्कार हों या कोई अन्य आयोजन हो। महर्षि वसिष्ठ का कामधेनु के लिए प्राणों की बाजी लगाना, महर्षि च्यवन का अपने शरीर के बदले नहुष का चक्रवर्ती राज्य ठुकरा कर एक गाय का मूल्य निश्चित करना, जैसे प्रसंग यही दर्शाते हैं कि गाय से बढकर उपकार करने वाली अन्य कोई वस्तु संसार में नहीं है। यह माता के समान मानव जाति का उपकार करने वाली, दीर्घायु और निरोगता प्रदान करने वाली है। इसीलिए शास्त्र में कहा गया है-गावो विश्वस्य मातर:। अर्थात गाय विश्व की माता ही है। अग्निपुराण में कहा गया है कि गायें परम पवित्र और मांगलिक हैं। गाय का गोबर और मूत्र दरिद्रता दूर करता हैं। उन्हें खुजलाना, नहलाना, पानी पिलाना, पुण्यदायक है। गाय और उसकी बछिया के पीठ पर सहलाने से मधुमेह आदि में भी लाभ मिलता है। गोमूत्र, गोबर, गो दुग्ध, गो दधि, गोघृत, कुशौदक-इनका मिश्रण पंचगव्य सभी अशुभ अनिष्टों को दूर करता है। गो ग्रास देने वाला सदगति प्राप्त करता है। गोदान करने से समस्त कुल का उद्धार होता है। गो के श्वास से भूमि पवित्र होती है। गाय के स्पर्श से पाप नष्ट होते हैं। पंचगव्य पीने से पतित का भी उद्धार होता है। पारस्कर गृह्यसूत्र (113127) में कहा गया है-पारस्कर गृह्यसूत्र (113127) में कहा गया है- माता रूद्राणां दुहिता वसूनाम्। स्वसाआदित्यानाम्अमृतस्य नाभि:।। -अथर्ववेद अर्थात गाय रूद्रों की माता है, वसुओं की पुत्री है, सूर्य की बहन है और घृतरूप अमृत का केंद्र है।मार्कण्डेयपुराण में कहा गया है कि विश्व का कल्याण गाय पर आधारित है। गाय की पीठ-ऋग्वेद, धड-यजुर्वेद, मुख-सामदेव, ग्रीवा-इष्टापूर्ति व सत्कर्म, रोम साधु तथा सूक्त हैं। गोबर और गोमूत्र में शांति और पुष्टि है। जहां गाय रहती है, वहां पुण्य क्षीण नहीं होते। वह जीवन को धारण कराती है। स्वाहा, स्वधा, वषट् और हंतकार-गाय के ये चार धन हैं। इस गाय से सबकी तृप्ति होती है। विष्णुस्मृति में कहा गया है कि गौओं के निवास से भूमि पवित्र होती है। गोएं पवित्र व मंगलमय हैं। उनसे समस्त लोक का कल्याण है। गायों से यज्ञ सफल होते हैं। उनकी सेवा से पाप नष्ट होते हैं। गौओं के बाडे में तीर्थो का निवास है। उनकी रज से बुद्धि और संपदा बढती है। उन्हें प्रणाम करने से पुण्य मिलता है। स्कंदपुराण में कहा गया है कि गौओं के गोबर से घर आंगन और देव मंदिर भी पवित्र हो जाते है। अथर्ववेद में कहा गया है कि गौओं के दूध से निर्बल मनुष्य बलवान और हष्ट-पुष्ट होता है तथा फीका और निस्तेज मनुष्य तेजस्वी बनता है।
गीता में श्रीकृष्ण ने स्वयं कहा है कि गायों में कामधेनु मैं ही हूं। महाभारत, आश्वमेधिक पर्व में कहा गया है कि दान में दी हुई गौ अपने विभिन्न गुणों के कारण कामधेनु बन कर परलोक में दाता के पास पहुंचती है। वह अपने कर्मो से बंधकर घोर अंधकारपूर्ण नरक में गिरते हुए मनुष्य का उसी प्रकार उद्धार कर देती है, जैसे वायु के सहारे से चलती हुई नाव मनुष्य को महासागर में डूबने से बचाती है। जैसे मंत्र के साथ दी हुई औषधि प्रयोग करते ही मनुष्य के रोगों का नाश कर देती है, उसी प्रकार सुपात्र को दी हुई कपिला गौ मनुष्य के सब पापों का तत्काल नष्ट कर डालती है।
गोदान क्यों!

महाभारत, कूर्मपुराण, याज्ञवल्क्य स्मृति आदि अनेक ग्रंथों में कहा गया है कि गोदान करने वाले मनुष्य सब पापों से मुक्त होकर सुखपूर्वक जीवन जीते हैं और मृत्यु के बाद स्वर्ग जाते हैं।ब्र्हामण को गाय देने के पीछे मान्यता यही है कि जब प्राणी मरकर स्वर्ग जाता है, तब उसकी राह में वैतरणी नदी पडती है। दान में दी हुई गाय की पूंछ पकडकर प्राणी वैतरणी को पारकर स्वर्ग पहुंच जाता है।