बुधवार, 14 फ़रवरी 2024

शिक्षक कैसे गौ सेवा कर सकते है

शिक्षक व शिक्षालय


शिक्षालय (विद्यालय) वे कारखाने हैं जहाँ राष्ट्रीय चरित्र को दिग्दर्शित करने वाले उपकरण (विद्यार्थी) गढे जाते हैं। यहाँ का मुख्य अभियांत्रिक शिक्षक है। शिक्षक राष्ट्र निर्माता है। शिक्षालयों को गौ संवर्धन व गौरक्षण का प्रेरणा केन्द्र निम्नांकित निश्चयों से बनाया जा सकता है :-


१. विद्यार्थियों को बाल्यकाल से ही गोवंश की महिमा व अनिवार्यता का बोध कराया जाना चाहिए। शास्त्रों, पुराणों इत्यादि भारतीय वांङ्गमय में उद्‌धृत गौ माता सम्बंधी उध्दरणों को कक्षाओं में पढ़ाया जाना चाहिए।


२. प्रत्येक विद्यालय में गाय रखी जावें और शिक्षक विद्यार्थी मिलकर गो सेवा करें जिससे अल्पायु से ही गो भक्त नागरिक तैयार हों।


३. शिक्षक कक्षाओं में पंचगव्य का महत्व बतावें।


४. पाठ्यक्रमों में गो सेवा व गो महिमा के अध्याय सम्मिलित किये जावें।


५. शिक्षक पंचगव्य से निर्मित मंजन, साबुन, शैम्पू, औषधियों का उपयोग करें व विद्यार्थियों से इनका प्रयोग करने का आग्रह करे।


६. जैविक खाद के उपयोग से पैदा अन्न, फल, सब्जी का उपयोग करने का आग्रह विद्यालयों में किया जावें।


७. विद्यार्थियों को भारतीय नस्त की गाय के गौदुग्ध पान के महत्व का व्यापक प्रचार किया जावे। विद्यालयों में गौ दुग्ध उपलब्ध हो।


८. स्वास्थ्य व पर्यावरण के हित में गौ वंश के महत्त्व को प्रचारित कर विद्यार्थियों को सुशिक्षित किया जाए।


९. विद्यालयों में पंचगव्य औषधि व जैविक कृषि, गो रक्षा का महत्व, जैसे विषयों पर निबंध, वाद-विवाद, भाषण, पोस्टर प्रतियोगिताएँ आयोजित की जाएँ।


१०. विद्यालयों में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, गोपाष्टमी, बलराम जयंती इत्यादि गोपौँ व गो उत्सवों को मनाया जाए।


११. रासायनिक कृषि के भुमी, स्वास्थ्य व पर्यावरण पर पडनेवाले दुष्प्रभावों की विद्यार्थियों को जानकारी देनी चाहिये।


१२. गौशाला, पंचगव्य औषधि व कृषि उत्पाद तथा पंचगव्य से निर्मित उर्जा केन्द्रों में विद्यार्थियों की शैक्षणिक का आयोजन करें।

शनिवार, 21 अक्टूबर 2023

कृषक (किसान) कैसे गौ सेवा कर सकते है

कृषक (किसान)

भारतीय अर्थव्यवस्था का मूल आधार कृषि है। वस्तुतः कृषि भारत की जीवन शैली है और इस जीवन का पोषक बिंदू कृषक है। सही मायने में तो राष्ट्र की सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक काया की रीढ कृषक है। रीढ़ विहीन राष्ट्रीय शरीर की परिकल्पना असम्भव है। कृषक के लिए गोवंश प्राण शक्ति है। उसके अहर्निश जीवन शैली में गोवंश की अभिरक्षा और संवर्धन आप्लावित है। कृषि व पर्यावरण के क्षेत्र में गोवंश का महत्व बताते हुए सर अलबर्ट हावर्ड ने ने लिखा है - "घोडे और बैल के बदले बिजली की मोटर और तेल वाले इंजनों से खेती करने में एक हानि यह है कि इन मशीनों से गोबर और मूत्र नहीं मिलता, फलतः यह मिट्टी की उर्वरकता बनाये रखने में किसी काम के नहीं है।" (एग्रीकल्चर टेस्टामेंट) कृषक अपनी माँ, इस प्राण शक्ति को सुदृढता और सुदीर्घता प्रदान करने के लिए निम्न बिंदुओं का पालन कर सकते है:-

1. रासायनिक कृषि का विरोध करना चाहिए क्योंकि रासायनिक कीटनाशक व रासायनिक उर्वरकों के उपयोग से भूमि की उर्वरा शक्ति एवं उत्पादन • क्षमता को भारी क्षति पहुँचती है।

2. कृषि कार्य हेतु उपयोग किए गए रासायनिक उर्वरक खाद्यान्न को विषाक्त बना देते हैं जिनको खाने से जन सामान्य के स्वास्थ्य पर विपरीत प्रभाव पड़ता है और वे रक्तचाप, हृदय विकार, उदर विकार, कर्क रोग (कैंसर) जैसी बिमारीयों से पीड़ित हो जाते हैं।

3. रासायनिक कृषि के बजाय गोवंश आधारित जैविक कृषि को शत् प्रतिशत अपनाना चाहिए।

4. जैविक खाद, जैविक कीटनाशक और खरपतवार नाशक के उपयोग में रसायनों की तुलना में 75% कम लागत आती है। साथ ही भूमि की उत्पादन क्षमता बढ़ती है।

5. जैविक कृषि से लाभान्वित होने हेतु अधिक से अधिक गो वंश पालना चाहिए।

6. गो वंश आधारित कृषि से होनेवाले लाभकारी अनुभवों को अन्य किसान वर्ग तक प्रचारित प्रसारित कर उन्हें भी इस दिशा में अग्रसर होने हेतु प्रेरित करना चाहिए।

7. पंचगव्य निर्मित कीटनाशक, फसल रक्षक और उर्वरकों के उपयोगों को प्रधानना दी जानी चाहिए और उनके निर्माण का प्रशिक्षण लेना चाहिए।

8. फसल का एक भाग गोवंश के लिये निकालकर गो सेवा करना चाहिए। गो सेवा, गाय की पूजा और गो उत्सवों की महत्ता से परिचित होकर उन्हें अत्याधिक आनंद एवं उत्साह से मनाने की परम्परा डालना चाहिए। भारतीय परम्परा के गो पर्व उत्सव जैसे - गो वत्स द्वादशी, बलराम जयंती (हलधर षष्ठी), श्री कृष्ण जन्माष्टमी, गोपाष्टमी, मकर संक्रांति आदि उत्सवों को किसानों के अपने उत्सव के रूप में उल्लास के साथ मनाना चाहिए।

9. गोवंश से अधिकाधिक लाभ प्राप्त करने हेतु पंचगव्य निर्मित मंजन, टिकिया, उबटन, धूप बत्ती, मच्छर प्रतिबंधक व अन्य औषधि निर्माण कार्य कर गोवंश आधारित समग्र ग्राम विकास की कल्पना को साकार करने का प्रयत्न करना चाहिए।

10. जुताई, फसल कटाई इत्यादि कृषि कार्यों के लिए ट्रॅक्टर एवं अन्य मशीनों की बजाए बैल तथा बैल चालित अन्य यत्रों का उपयोग कर राष्ट्रीय ईंधन व मूल्यवान बिजली की बचन करनी चाहिए।

11. भारतीय गोवंश के नस्लसुधार हेतु विदेशी संकरण का विरोध व देशी गोवंश में ही परस्पर संकरण करवाना चाहिये।

मंगलवार, 10 अक्टूबर 2023

गाय के गोबर की महिमा


🦚गाय के गोबर की  महिमा🦚

🦩हालिया कई अलग अलग अध्ययनों से पता चला है कि रेत, सीमेंट, सरिया, प्लास्टिक आदि से निर्मित मकानों में रहने, अधिक समय व्यतीत करने से व्यक्ति की इम्यून शक्ति तेजी से कमजोर पडती है, मन बेचैन बना रहता है, नींद कम आती है, उच्चाटन, झल्लाहट सा बना रहता है ब्लडप्रेशर में बार बार बदलाव बना रहता है, जबकि गोबर से लिपे और मिट्टी से बने मकानों में तो अनेक प्रकार के  तीव्र संक्रामक रोग जैसे प्लेग, हैजा, निमोनिया, दस्त के जीवाणु भी शीघ्र शांत पड जाते हैं! 

🦩मिट्टी के कच्चे किंतु गोबर से सने मकानों में मन शांत रहता है, गहरी और तनाव घटाने वाली गहरी नींद आती है! ऐसे मकानों में अधिक समय व्यतीत करने से ह्दय रोगों से भी शीघ्र मुक्ति मिल जाती है, क्योंकि गोबर मिट्टी की भीनी भीनी गंध मस्तिष्क के विशेष केन्द्रौ पर प्रभाव डाल कर ह्रदय की अनियमित धड़कन, उच्च रक्तचाप और ह्रदय की कमजोरी को समाप्त करने काम करते हैं? इसलिए गाय के गोबर को अति पवित्र मानते हुए गंगा जी का निवास स्थान माना हैं! 

🦩गोबर और गोमूत्र में जहर खींचने की भी विशेष शक्ति रहती है! यह तो सर्प विष को भी समाप्त करने काम करता है! 

👍अध्ययन परीक्षणों में देखा गया है कि वर्तमान में जिस तीव्र गति से साग सब्जियों फलफूल और अनाज आदि को दवाओं के निरंतर छिडकाव से विषाक्त बनाया जा रहा है और उसका दुष्प्रभाव मानव स्वास्थ्य के ऊपर दिखाई पड रहा है, विभिन्न रोगों के साथ आयु घट रही है, कैंसर जैसे भयंकर रोग सताने लगे हैं! इन सबके केवल गौमाता ही मुक्ति दिला सकती है! गोबर और गोमूत्र ही इस विषाक्तता का समाधान दे सकते हैं! 

👍वैसे भी सदियों से संखिया, भिलावा, जैसे अनेक विषों को विषहीन करने, इनके जहरीलेपन को शुद्ध करने के लिए गौमूत्र और गोबर काम में आते रहे हैं! 

🌷यदि आप गाय के गोबर का पूरा सदुपयोग करना, सही प्रयोग करना जान ले, तो आप गो पालन के कार्य को सहजता से कर सकते हैं, फिर आपके लिए गौसेवा बोझ बन कर नहीं रहता, गौरक्षा के कार्य को सहजता से जारी रख सकते हैं! 

🌷गाय के गोबर का 60℅ भाग तो ठोस रूप में रहता है! यह भाग मुख्यतः सैल्युलोज के रूप में रहता है! खाद के रूप में, भूमि संवर्धन के लिए मृदा में उपस्थित रहने वाले करोड़ों जीवाणुओं के लिए कोई ज्यादा महत्व नहीं रखता! क्योंकि जब तक यह ठोस सैल्युलोज भाग ह्यूमस के रूप में बदल नहीं जाता, तब तक इसका कोई लाभ नहीं मिलता! 

🌷जबकि गोबर का शेष तरल भाग में सैकड़ों प्रकार के सूक्ष्म जीवाणु, माइक्रोआर्गेनिज्म, एंजाइम और बायो कैमिकल्स रहते हैं! ये सभी बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं! 
अगर गोबर तरल के साथ गौमूत्र घनसत्व का मिश्रण भी कर लिया जाए, तो यह मिश्रण बहुत ही प्रभावशाली बन जाता है! गोबर और गोमूत्र का यह मिश्रण खेती के लिए, मृदा के लिए अमृत रस से बढ़कर सिद्ध होता है! यह मिश्रण अद्वितीय रूप में मृदा की पौषकता को सैकड़ों गुना तक बढा देता है! गोबर और गोमूत्र का मिश्रण में बायोहेन्सर सक्रिय रूप में मृदा में विद्यमान जरा सूक्ष्म जीवाणुओं को अचानक सक्रिय बना देते हैं! इस तरह मृदा में अनेक प्रकार के सकारात्मक परिवर्तन होते हैं, खेत की पौषकता में वृद्धि होती है! इस मिश्रण के बाद किसी भी तरह फर्टिलाइजर, कीटनाशकों और खनिजों की आवश्यकता नहीं रह जाती है! 
इस मिश्रण के बाद भरपूर फसल की पैदा होती है! इसके साथ भूमि की उर्वरता भी यथावत बनी रहती है! 
विस्तार से समझने के लिए आगे पढ़े ----


शनिवार, 30 सितंबर 2023

गौ परिक्रमा से मिलते हैं ढेरों लाभ,


गौ परिक्रमा से मिलते हैं ढेरों लाभ,

 
विष्णुपुराण के अनुसार व्यक्ति के किसी भी अनिष्ट की निवृत्ति के लिए गौमाता के पूजन का विधान किया गया है। 
अनेक तरह के अरिष्टकारी भूचर, खेचर और जलचर आदि दुर्योग उस व्यक्ति को छू भी नहीं सकते जो नित्य गौमाता की सेवा करता है या फिर रोज गौमाता के लिए चारे या रोटी का दान करता है। 
तिल, जौ व गुड़ का बना लड्डू नौ गायों को खिलाने से व परिक्रमा करने से संतान प्राप्ति एवं मनोवांछित फल मिलता है। 
पति-पत्नी में आपसी मनमुटाव या क्लेश रहता हो तो दोनों गठजोड़े से गऊमाता की परिक्रमा करें एवं घर से रोटी बनाकर तिल के तेल से चुपड़ कर गुड़ के साथ नौ गायों को खिलाएं। 
घर में सुख-शांति बनी रहेगी। 

 
गर्भवती महिलाएं नौ माह में प्रत्येक अमावस्या व पूर्णिमा पर परिक्रमा कर लें तो सामान्य डिलीवरी से संतान होगी। 
प्रतिदिन भोजन करने से पहले एक रोटी व गुड़ अपने हाथ से देसी गाय को खिलाने से एवं गाय के मुंह से लेकर पूंछ तक हाथ फेर कर अपने शरीर पर हाथ फेरने से शरीर का संतुलन बना रहता है।

 
गाय को जौ खिलाएं और उसके गोबर में से जौ निकले, उसे धोकर खीर बना कर एक चम्मच गाय का घी डालकर गर्भवती महिलाएं अंतिम माह में खाएं। यह साधारण डिलीवरी में सहायक है। 
जिन बच्चों की शादी में अनावश्यक विलम्ब हो रहा हो, वे स्वयं विधिपूर्वक गाय की पूजा करके नौ रोटी व गुड़ खिलाएं जिससे मनवांछित फल प्राप्त होगा।

गुरुवार, 28 सितंबर 2023

इस्कॉन गौशालाओं का मुद्दा गर्म है।


इस्कॉन गौशालाओं का मुद्दा गर्म है। धन्यवाद मेनका गांधी जी का ! भारत में गौशाला एक पुण्य स्थान की तरह देखा जाता है। माना जाता है कि गौ सेवा भगवान का दिया हुआ कार्य है। और इसे करने वाले को पुण्य मिलता है। ऐतिहासिक आधार पर ऐसा विवरण मिलता है कि शहरों में स्थापित पहली गौशाला हरियाणा के रेवाड़ी शहर के नारनौल रोड़ स्थित कुतुबपुर रामपुरा में बनाई गई। श्री दयानन्द गौशाला का निर्माण वर्ष 1879 में कराया गया था. उस वक्त रेवाड़ी के शासक राव युधिष्ठिर सिंह थे. कहा जाता है कि वर्ष 1879 में स्वामी दयानन्द सरस्वती महाराज ने 17 दिनों के लिए रेवाड़ी में प्रवास किया था. प्रवास के बाद जयपुर जाते समय उन्होंने रेवाड़ी के इस स्थान पर छड़ी मारकर जमीन की निशानदेही की थी कि यहां गौशाला बनाई जाए। वैसे पहली गौरक्षिणी सभा का निर्माण 1882 में पंजाब में हुआ था। इसका उद्देश्य वृद्ध गायों और छोड़ दी गई बीमार गायों को शरण देना था। ये आंदोलन उत्तर भारत, बंगाल, बंबई, मद्रास प्रेसीडेंसी और सेंट्रल प्रॉविंस में ऐसा फैला कि उस समय साढ़े तीन लाख लोगों ने इसमें जुड़कर हस्ताक्षर किए। इसके बाद 1893 तक देश में गौ रक्षा (छोड़ी गई गायों) के लए बहुत सारी गौशालाएं खुली। आज की बात करें तो राजस्थान के सांचौर जिले में देश की बड़ी गौशाला है जहां करीब 150,000 गाय और बैल रहते हैं। 

गाय को लेकर केंद्र सरकार से राज्य सरकार तक कई नीतियां है। दूध, दही, घी, पनीर, गौमूत्र के अलावा उनकी स्थानीय प्रजातियों के संरक्षण और संवर्धन के लिए भी कई संस्थान है। राज्यों में गौरक्षा के लिए भी संगठन है। हिंदू-जैन-सिख धर्म में धार्मिक मान्यता से गौशालाएं संचालित हैं। हिंदूओं के हर आश्रम-मठ-मंदिर के प्रांगण में गौ सेवा एक धर्म है। NITI Aayog की “गौशाला” की आर्थिक व्यवहार्यता में सुधार पर जारी इस साल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1962 के पशु कल्याण बोर्ड (AWBI) के तहत 5000 से ज्यादा गौशालाओं को मान्यता प्राप्त है। AWBI में वैसे 3678 पशु कल्याण संगठन रजिस्टर्ड है, जिनमें से अधिकतर गौशालाएं हैं। इन 3678 में से 1755 गौशाला और पंजरापोल्स हैं। पंजरापोल्स मतलब गायों को आश्रय वाले पशुघर हैं। पंजरापोल्स का जैन धर्म से गहरा नाता है। 

हरियाणा सरकार ने काऊ टास्क फोर्स बनाकर गौरक्षा को एक अमली जामा पहनाया। मध्यप्रदेश गौवंश संरक्षण और रक्षा के लिए कड़े कानून लागू करने वाले देश के अग्रणी राज्यों में एक हैं। गौवंश वध प्रतिशेध अधिनियम में गाय का वध करने पर 7 साल की सजा का प्रावधान है। प्रदेश में 1762 गौशालाओं में 2 लाख 87 हजार गौवंश का पालन हो रहा है। वर्ष 2022-23 में इनके चारे के लिए 202 करोड़ 34 लाख का अनुदान वितरित किया गया। वहीं उत्तर प्रदेश गो-सेवा आयोग अधिनियम 1999 के उत्तर प्रदेश में गो-सेवा आयोग की स्थापना की गयी थी। इसके हिसाब से उत्तर प्रदेश में 525 पंजीकृत गौशालाएं है और 92 सक्रिय। कोई भी गो-सेवा आयोग को दान भी दे सकता है। वैसे प्रदेश के 12 कारागारो मे गोशालाये संचालित है। प्रदेश में संचालित 6719 बेसहारा गोवंश संरक्षण स्थलों में 11.33 लाख से ज्यादा गोवंश जानवर रखे गए हैं. इसके लिए सरकार प्रति गाय 900 रूपए देती है। सरकार का दावा है कि गोवंश के संरक्षण हेतु चलाए गए आक्रामक अभियान के सकारात्मक परिणामस्वरूप 11.5 लाख गोवंश को संरक्षण दिया जा सका है। 

अब बात करते हैं इस्कॉन की। भारत में इस्कॉन 60 गौशालाएं चलाती है। भगवान कृष्ण के भक्त इस्कॉन के साधु नि:संदेह गायों के प्रति भाव रखते हैं। उनकी गौशालाएं साफ सुथरी और दूध देने वाली गाएं भारतीय प्रजाति की होती हैं। समय समय पर इनकी गौशालाओं में छोड़ी गई गायों को भी शरण दी जाती है, पर हां वो गौ आश्रय के स्थान नहीं है। इन गौशालाओं में गायों के दूध को इस़्कॉन अपने मंदिर-आश्रम को चलाने के लिए उपयोग करता है। गायों को भारतीय संस्कृति के अनुसार नाम दिया जाता है और उनके बच्चों को सही से पाला जाता है। ये आरोप गलत है कि वे कसाई खाने को सौपें जाते हैं। आप इस वीडियो को देखकर कुछ समझ सकते हैं कि इस्कॉन कैसे वृद्ध गायों और बछियों की सेवा करता है। (https://www.youtube.com/watch?v=M0c4pz3HIhE)

भारत की सभी गौशालाों के हाल बहुत अच्छे नहीं है, इसीलिए वे गौ-धन और पंचामृत के कार्य में लगे हैं। मेरी अपनी जानकारी में देश की बड़ी बड़ी गौैशालाओं आर्थिक संकट में है। 

धार्मिक आधार पर गौ सेवा करने वाले संंत और कथा वाचक आज भी गायों को लेकर संवेदनशील हैं। वे सरकारी मदद से ज्यादा दान और भक्तों को सीधे संदेश देकर गायों की सेवा में लगे रहते हैं। इससे देश में भावना, सेवा और सामर्थ्य के बीच सामंजस्य नहीं बना है। गाय के दूध की सभी को जरूरत है। लेकिन ये कोआपरेटिव और किसान स्तर पर प्रोफेशनली विकसित हुआ है। धार्मिक आधार पर गौ-सेवा अभी भी कई स्तरों पर अविकसित है। 

सोमवार, 5 जून 2023

गोसेवा कई प्रकार की हो सकती है,

गोसेवा कई प्रकार की हो सकती है, यहां कुछ प्रमुख गोसेवा के प्रकार दिए जा रहे हैं:

1. गौशाला संचालन: यह एक गोसेवा का प्रमुख रूप है, जिसमें गौशालाओं की स्थापना की जाती है और गोमाताओं की देखभाल, आहार, इलाज, आवास, और दूध उत्पादन के लिए संगठित रूप से काम किया जाता है।

2. गौवंश पालन: यह एक व्यक्तिगत स्तर पर गोसेवा है, जहां व्यक्ति एक या एक से अधिक गायों को अपने घर पर पालता है और उनकी देखभाल करता है। यह उन लोगों के लिए अच्छा होता है जो अपने घर के पास गोशाला स्थापित करने की संभावना नहीं रखते हैं।

3. गोवंश शाला दान: इस प्रकार की गोसेवा में व्यक्ति गोशाला या गोवंश शाला का निर्माण करता है और उसे दान करता है। इससे उन्हें गोमाताओं की सेवा करने और उनके लिए एक सामुदायिक संसाधन प्रदान करने का अवसर मिलता है।

4. गौवंश शिक्षा: इस प्रकार की गोसेवा में गोवंशों के संरक्षण, देखभाल,