मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

10 पञ्चगव्य चिकित्सा

पञ्चगव्य चिकित्सा 
१ - आक की छाल तथा आक की कोंपले या छोटी-छोटी कोमल पत्तियाँ ५०-५०ग्राम इन दोनों को २००ग्राम आक के दूध में पीसकर गोला बनाकर मिट्टी के पात्र में मुँह बंद करके गाय के गोबर से बने कण्डो की आँच मे फूँक कर भस्म बना ले । ठंडा होने पर भस्म को निकालकर मटर जैसी छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर एक दो गोली पानी के साथ लेने से भगन्दर व नासूर दूर होते है । 

२ - छुवारों के अन्दर की गुठली निकालकर उसमें आक का दूध भर दें ,फिर इनके उपर आटा लपेटकर पकावें ,उपर का आटा जब जल जाये तब उसमें से छुवारे निकाल कर उन्हें पीसकर मटर जैसी गोलियाँ बनाकर रात्रि मे१-२ गोली खाकर तथा गाय का दूध पीने से स्तम्भन होता है ( वीर्य देर से झड़ता है ) । 

३ - आक का दूध व असली मधु और गाय का घी ,सम्भाग चार पाँच घण्टे खरल कर शीशी में भरकर रख ले ,इन्द्री सीवन और सुपारी को बचाकर इसकी धीरे- धीरे मालिश करें और ऊपर से खाने का पान और एरण्ड का पत्ता बाँध दें ,इस प्रकार सात दिन मालिश करें ।फिर १५ दिन छोड़कर पुनः मालिश करने से शिश्न के समस्त रोगों में लाभ होता है । 

४ - आक की जड़ छाया में सुखाकर चूर्ण बना ले ,२० ग्राम चूर्ण आधा किलो दूध में उबालकर इसकी दही जमा दें, और घी तैयार कर लें , इसके सेवन से नामर्दी दूर होती है । 

५ - बाँझपन:- सफ़ेद आक की छाया में सूखी जड़ को महीन पीसकर १-२ ग्राम की मात्रा में २५० ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करावें ।शीतल पदार्थों का पथ्य देवें ।इससे बन्द ट्युब व नाड़ियाँ खुलती है व मासिक धर्म व गर्भाशय की गाँठों में भी लाभ होता है । 

६ - आक के २-४ पत्तों को कूटकर पोटली बना, घी लगाकर तवें पर गर्म कर सेंक करें ।सेंकने के पश्चात् आक के पत्तों पर घी चुपड़कर गरम कर बांध दें । 

७ - आक के दूध में सम्भाग शहद मिलाकर लगाने से दाद शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । 

८ - आक की जड़ २ ग्राम चूर्ण को २ चम्मच दही में पीसकर लगाते रहने से भी दाद में लाभ होता है । 

९ - आक के ताज़े पत्तों का रस १ कि० ग्राम गाय का दूध २ कि० ग्राम सफ़ेद चन्दन, लाल चन्दन ,हल्दी ,सोंठ और सफ़ेद ज़ीरा ६-६ ग्राम इनका कल्क कर १ कि० ग्राम घी में पकावें ,घी मात्र शेष रहने पर छानकर रख लें ।मालिश करने से खुजली - खाज आदि में लाभ होता है । 

१० - आक का दूध ताज़ा ,व सुखाया हुआ १ भाग १०० बार जल से धोया हुआ गाय का मक्खन ख़ूब खरल करके मालिश करें व २ घंटे तक शीत जल व शीत वायु से रोगी को बचाये रखें । 

9 पञ्चगव्य चिकित्सा

.............पञ्चगव्य चिकित्सा................ 

१. आक के भली प्रकार पीले पड़े पत्तों को थोड़ा सा गाय का घी चुपड़ कर आग पर रख दें ।जब वे झुलसने लगे ,झटपट निकाल कर निचोंड लें ।इस रस को गर्म अवस्था में ही कान में डालने से तीव्र तथा बहुविधि वेदनायुक्त कर्णशूल शीघ्र नष्ट हो जाता है । 

२. आँख का फुला जाला-- आंक के दूध में पुरानी रूई को तीन बार तर कर सुखा लें फिर गाय के घी में तर कर बड़ी सी बत्ती बनाकर जला लें । बत्ती जलकर सफ़ेद नहीं होनी चाहिए ,इसे थोड़ी मात्रा मे सलाई से रात्रि के समय आँखों में लगाने से २-३ दिन में लाभ होना प्रारम्भ हो जाता है । 

३. आक के दूध में रूई भिगोकर ,गाय के घी में मलकर दाढ़ में रखने से दाढ़ की पीड़ा मिटती है । 

४. जगंल में घूमती फिरती गाय जब गोबर करती है और वह गोबर सूख जाता है तो इन्हें जगंली कण्डे या आरने कहते है ।जगंली कण्डो की राख को आंक के दूध में तर कर के छाया में सुखा लेना चाहिए । इसमें से १२५ ग्राम सुँघाने से छींक आकर सिर का दर्द , आधा शीशी , ज़ुकाम ,बेहोशी इत्यादि रोगों में लाभ होता है ।गर्भवती स्त्री व बालक इसका प्रयोग ना करें । 

५. आक की कोमल शाखा और फूलों को पीसकर २-३ ग्राम की मात्रा में गाय के घी में सेंक ले ।फिर फिर इसमें गुड मिला ,पाक बना नित्य प्रात: सेवन करने से पुरानी खाँसी जिसमें हरा पीला दुर्गन्ध युक्त चिपचिपा कफ निकलता हो ,शीघ्र दूर होता है । 

६. अाक के पुष्पों की लौंग निकाल कर उसमें सम्भाग सैंधा नमक और पीपल मिलाकर ख़ुद महीन पीस लें ।और मटर जैसी गोली बना कर दो से चार गोली बड़ों और १-२ गोली बच्चों को गाय के दूध साथ देने से बच्चों की खाँसी दूर होती है । 

७. आक के एक पत्ते पर जल के साथ महीन पीसा हुआ कत्था और चूना लगाकर दूसरे पत्ते पर गाय का घी चुपड़कर दोनों पत्तों को परस्पर जोड़ ले ,इस प्रकार पत्तों को तैयार कर मटकी में रखकर जला लें । यह कष्ट दायक श्वास में अति उपयोगी है । छानकर काँच की शीशी में रख लें । १०-३० ग्राम तक गाय का घी ,गेंहू की रोटी या चावल में डालकर खाने से कफ प्रकृति के पुरूषों मे मैथुनशक्ति को पैदा करता है ।तथा कफजन्य व्याधियों को और आंत्रकृमि को नष्ट करता है । 

८. आंक के ताज़े फूलों का दो किलो रस निकाल लें । इसमें आंक का दूध २५० ग्राम और गाय का घी डेढ़ किलो मिलाकर मंद अग्नि पर पकायें । घी मात्र शेष रहने पर छानकर बोतल में भरकर रख लें । इस घी को १ से २ ग्राम की मात्रा में गाय के २५० ग्राम पकायें हुए दूध में मिला कर सेवन करने से आंत्रकृमि नष्ट होकर पाचन शक्ति तथा बवासीर में भी लाभ होता है । शरीर में व्याप्त किसी तरह का विष का प्रभाव हो तो इससे लाभ होता है ,परन्तु यह प्रयोग कोमल प्रकृति वालों को नहीं करना चाहिए । 

९. आंक के ताज़े हरे पत्ते २५० ग्राम और हल्दी २० ग्राम दोनों को महीन पीसकर उड़द के आकार की गोलियाँ बना लें । पहले ताज़े जल के साथ ४ गोली , फिर दूसरे दिन ५ और ६ गोली तक बढ़ाकर घटायें यदि लाभ हो तो पुन उसी प्रकार घटाते बढ़ाते है ,अवश्य लाभ होता है । पथ्य में दूध ,साबूदाना ,जौ का यक्ष देवें । 

१०. आंक के कोमल पत्रों के सम्भाग पाँचों नमक लेकर ,उसमें सबके वज़न से चौथाई तिल का तेल और इतना ही नींबू रस मिला पात्र के मुख को कपड़ मिट्टी से बंद कर आग पर चढ़ा दें । जब पत्र जल जाये तो सब चीज़ों को निकाल पीसकर रख लें । ५०० मिली ग्राम से ३ ग्राम तक आवश्यकतानुसार गर्म जल ,काँजी ,छाछ ,या शराब के साथ लेने से बादी बवासीर नष्ट होती है । 

8 पञ्चगव्य चिकित्सा

.................पञ्चगव्य चिकित्सा .................... १. आक की छाल तथा आक की कोंपले या छोटी-छोटी कोमल पत्तियाँ ५०-५० ग्राम इन दोनों को २०० ग्राम आक के दूध में पीसकर गोला बनाकर मिट्टी के पात्र मे मूंह बन्दकर रखकर ५ कि. ग्राम गाय के गोबर से बने कण्डों की आग में फूँक कर भस्म बनालें । फिर निकालकर मटर जैसी छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर एक दो गोली पानी के साथ लेने से भगन्दर व नासूर में लाभ होता है । 

२. नपुंसकता और ध्वजभंग मे छुवारों के अन्दर की गुठली निकालकर उनमें आक का दूध भर दें ,फिर इनकें उपर आटा लपेटकर पकावें, उप्र का आटा जल जाने पर छुवारों को पीसकर मटर जैसी गोलियाँ बना लें ,रात्रि के समय एक दो गोली खा कर गाय का दूध पीने से स्तम्भन होता है । 

३. आक की छाया शुष्क जड़ के २० ग्राम चूर्ण को आधा किलो गाय के दूध में उबालकर दही जमाकर घी तैयार करें , इसके सेवन से नामर्दी दूर होती है । 

४. आक का दूध और असली मधु और गाय का घी , सम्भाग ४-५ घण्टे खरल कर शीशी में भरकर रख लें इन्द्री की सीवन और सुपारी को बचाकर इसकी धीरे - धीरे मालिश करें और उपर से खाने का पान और अरण्ड कापत्ता बाँध दें ,इस प्रकार सात दिन मालिश करें । फिर १५ दिन छोड़कर पुनः मालिश करने से शिशन के समस्त रोगों में लाभ होता है । 

५. बांझपन -सफ़ेद आक की छाया में सूखी जड़ को महीन पीस , १-२ ग्राम की मात्रा से २५० ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करायें शीतल पदार्थ का पथ्य देवें । इससें बन्द ट्युब व नाड़ियाँ खुलती है व मासिकधर्म व गर्भाशय की गाँठों में लाभ होता है। 

६. आक के २-४ पत्तों को कूटकर पोटली बना , तवें पर गाय का घी लगाकर गर्म करके सेंक लें ।सेंकने के पश्चात् आक के पत्तों पर गाय का घी चुपड़कर गरम करकें बाँध दें । 

७. आक की जड़ २ ग्राम चूर्ण को २ चम्मच गाय के दूध की दही में पीसकर लगाते रहने से भी दाद में लाभ होता है । 

८. आक के ताज़े पत्तों का रस १ किलोग्राम , गाय का दूध २ किलोग्राम सफ़ेद चन्दन लाल चन्दन ,हल्दी , सोंठ , और सफ़ेद ज़ीरा ६-६ ग्राम इनका कल्क कर १ किलोग्राम गाय के घी में पकायें ।घी मात्र शेष रहने पर छान कर रख लें । मालिश करने से खुजली - खाज आदि में लाभ होता है । 

९. आक का दूध ताज़ा , व सुखाया हुआ १ भाग १०० बार जल से धोया हुआ गाय का मक्खन ख़ूब खरल करके मालिश करें व २ घंटे तक शीत जल व वायु से रोगी को बचाये रखें । 

१०. अर्कमूल की छाल १० ग्राम , त्रिफला चूर्ण १० ग्राम , एकसाथ आधा क़िलों जल मे अष्टमांस क्वाथ सिद्ध कर प्रतिदिन प्रात: उसमें एक ग्राम मधु और ३ ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करावें और साथ ही अर्कमूल को गाय की छाछ में पीसकर श्लीपद पर लेंप करे । ४० दिन में पूर्ण लाभ होगा । 

7 पञ्चगव्य चिकित्सा

............पञ्चगव्य चिकित्सा ................. 

१. गौदूग्ध मे शहद मिलाकर पीने से पेट के कीड़े बाहर आते है । 

२. सुन्दरता हेतु एक कप पानी में दो चम्मच दूध डालकर चेहरे पर मलें और अंगराग पावडर में भिगोकर लेप लगाये ।१० मिनट बाद स्नान कर लें । 

३. बल और वीर्य वृद्धि के लिए गर्म दूध में गौघृत और शक्कर मिलाकर पीएँ और गौमूत्र अर्क सुबह -शाम दो चम्मच पानी के साथ लें । 

४. सिरदर्द में गाय के दूध में सोंठ घीसकर सिर लेप लगाये । और ब्राह्मीघृत पाँच से १० मिली लीटर दिन में दो बार सेवन करें ।गौदूग्ध में एक इलायची उबालकर वह दूध पीयें लाभ होगा ही । 

५. अपस्मार ( epilepsy ) बचचूर्ण १ ग्राम मधु के साथ सेवन करें । तत्पश्चात् गौदूग्ध का सेवन करे ।

६. मूत्रकृच्छ ( Dysurea ) -गौदूग्ध और चूने का पानी का सेवन करने से ठीक होता है । 

७. शराब विष शान्ति हेतु -गौदूग्ध और फिटकरी घोलकर पीला देना चाहिए ,उल्टियाँ होकर ठीक हो जायेगा । 
८. मल विबन्ध (constipation ) एक कप गौदूग्ध मे २० मिली लीटर एरण्डतेल मिलाकर सेवन करें ।साधारण क़ब्ज़ मे १० मुन्नकाे को गौदूग्ध में पकाकर दूध सहित सेवन करें । 

९. धतुराविष शान्ति हेतु गौदूग्ध में मिश्री मिलाकर सेवन करने विष शान्त होता है । 

१०. गठिया रोग मे ५ ग्राम अश्वगन्धा चूर्ण समान मात्रा मे गुड मिलाकर ,गर्म गौदूग्ध के साथ सेवन करने से ठीक होगा । 

११. बवासीर मे नागकेशर गौदूग्ध में मिश्री मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है । 

१२. कर्णरोग -में कच्चा या पके हुए फल को गौमूत्र के साथ उबालने से कर्ण रोग के लिये चमत्कारी दवा तैयार होती है ।गौमूत्र आधा रह जाय इतना उबालना चाहिए । कि उबले अंश को छानकर कान में डालें। 

१३. गाय के कान के मैल को निकालकर उसकी चने के दाने के बराबर गोली बनाकर इस गोली को बच्चे की नाभि में रखकर उपर रूई रखकर टेप लगा दें ,और सुबह टेप हटाकर देखेंगे तो गोली ग़ायब हो जाती है और बालक का निमोनिया ठीक हो जायेगा । 

१४. गाय के खूर के नीचे की मिट्टी का तिलक करने से भूतबाधा भाग जाती है रोगी ठीक होता है ? 

१५. गाय के गलकम्बल में हाथ फिराने से नामर्द व्यक्ति के स्पर्म जीवित हो जाते है ।और धारोष्णदूध को पीने से अम्लपित ( एसीडिटी ) तुरन्त शान्त होती है ,और पेशाब की जलन में तो चमत्कारी लाभ होता है । 

१२. मलेरिया - में किशमिश और मुन्नका के ५-५ दाने गौदूग्ध मे औटाकर प्रात: खिलाऐ ।फिर दूध पिलाऐ । मलेरिया पुराना हो तो उसमें १० ग्राम सोंठ का चूर्ण मिला दे । लाभ होगा । 

6 पञ्चगव्य चिकित्सा.

...............पञ्चगव्य चिकित्सा.................. 

१. पञ्चगव्य निर्माण की वेदों में इस प्रकार वर्णन मिलता है । एक वर्णन के अनुसार ,गौदूग्ध ,गौदधि ,और गौघृत ,को समान मात्रा में मिला लें इसमें गौमूत्र दूध की कुछ मात्रा का चौथाई और गोबर का रस गोमूत्र कुल मात्रा का आधा मिला दें । इस प्रकार पंचगव्य तैयार कर लिया जाता है । उदाहरण के लिए २००ग्राम दूध ,२०० ग्राम दही ,२०० घी ,में ५० ग्राम गौमूत्र अर्क तथा २५ ग्राम ताज़े गोबर का रस मिलाने से पञ्चगव्य तैयार होता है । 

२. स्वर्ण क्षार बनाने की विधि -- गौमूत्र को तेज़ आँच पर पका लें ,जो झाग उबलते निकले ,उसे किसी पात्र की सहायता से तब तक निकालते रहे जब तक झाग निकलना बंद न हो । फिर आँच से गौमूत्र उतारकर उसे ठण्डा कर ले इसमे तलछट के रूप में यूरिया नीचे बैठ जाता है और झाग के रूप में अमोनिया बाहर हो जाता है ।अब शेष शोधित गौमूत्र ही स्वर्ण क्षार कहा जाता है । 

३. गोमूत्र सेवन विधि -- देशी गाय गौमूत्र ही सेवन योग्य होता है ।प्रतिदिन जंगल में चरने वाली गाय का मूत्र अच्छा होता है गाय गर्भवती न हो अथवा रोगी न हो ।एक वर्ष की बछिया का सर्वोत्तम होता है । गोमूत्र का पान करना, मालिश,पट्टी रखना,एनिमा और गर्म करके सेंक करना प्रमुख है । पीने हेतु ताज़ा और मालिश हेतु दो से सात दिन पुराना गोमुत्र अच्छा रहता है । बच्चों को पाँच तथा बड़ों को रोग के अनुसार १० से ३० ग्राम तक दिन में दो बार देना आवश्यक है । सेवनकाल में मिर्च -मसाले ,गरिष्ठ भोजन ,तम्बाकू तथा मादक पदार्थों का त्याग करना आवश्यक है ।सेवन करने हेतु सफ़ेद सुती कपड़े की आठ परत में छानना चाहिए । 

४. पित्तविकार में गाय का घी सिर पर मलने से लाभ होता है । तथा हरड़ चूर्ण एक चम्मच भोजन के बाद पानी के साथ लेने से तुरन्त लाभ होता है । 

५. सर्पदंश में १० से १०० ग्राम घी पिलाकर उपर से गर्म पानी पिलाये उल्टी,दस्त होने पर विषदोष दूर हो जायेगा । और गौमूत्र अर्क ,गाय के ताज़े गोबर का पिलाने से लाभ होता है । 

६. क़ब्ज़ में पेट साफ़ करने के लिए गौमूत्र छानकर पिलाए । गौमूत्र जितना अधिक छानेंगे उतना अधिक रेचक बनेगा ,हरड़ चूर्ण एक चम्मच ,भोजन के बाद पानी के साथ लें ।और क़ब्ज़ दूर हो जायेगा । 

७. पेशाब के रूकने पर यवक्षार में दो तोला गौमूत्र डालकर पिलाये । पुनर्नवा अर्क सुबह - शाम दो चम्मच पानी के साथ लेने से लाभ होता है । 

८. सफ़ेद दाग बाबरी के बीज को गौघृत मे घीसकर शाम को दाग पर लगाये ,और सुबह गौमूत्र से धो दे ।और किसी भी प्रकार के चर्म रोग मे काली जीरी को गौमूत्र मे गूथँ कर शरीर पर लगाये । 

९. क्षयरोग में शतावरी खाने वाली गाय का दूध पीयें ,और बछिया के मूत्र को पीने से टीबी रोग जड़ से समाप्त होता है । 

१०. बालों को सुन्दर रखने के लिए बालों को नियमित रूप से धोने से बाल चमकदार सुन्दर दिखने लगते है और यदि गौमूत्र से बने शैम्पु से बालों को धोने से बाल झड़ना बंद होते है तथा बाल काले घने होते है और बालों का टूटना बंद हो जाता है ।और बालों का दो मूहाँ होना बंद हो जाता है । 

5 पञ्चगव्य चिकित्सा.

.................पञ्चगव्य चिकित्सा.................... 

१. मोटापा शरीर के लिए अति कष्टदायक तथाबहुत से रोगों को आमन्त्रित करने वाला विकार है । स्थूलता से मुक्ति पाने के लिए आधा गिलास ताज़े पानी में चार चम्मच गौमूत्र दो चम्मच शहद तथा एक चम्मच नींबू का रस मिलाकर नित्य पीना चाहिए इससे शरीर की अतिरिक्त चर्बी कुछ ही दिनों में कम होने लगती है और धीरे-धीरे समाप्त होकर देह का सौन्दर्य बना रहता है । 

२. पेट में कीड़े होने पर आधा चम्मच अजवायन के चूर्ण के साथ चार चम्मच गौमूत्र का एक सप्ताह तक सेवन करना चाहिए ।बच्चों को इसकी आधी मात्रा पर्याप्त है । तथा गौमूत्र के साथ वायबिड़ग आधा चम्मच तीन बार देने हर प्रकार के कीड़े मरते है और घाव के कीड़े तथा सभी प्रकार की जूँओं का सर्वनाश होता है । 

३. चर्मरोग ,दाद,खाज,खुजली ,कुष्ठ ,आदि विभिन्न चर्म रोगों के निवारण हेतु गौमूत्र रामबाण आैषधि है ।नीम ,गिलोय क्वाथ के साथ दोनों समय गौमूत्र का सेवन करने से रक्तदोष जन्य चर्मरोग नष्ट हो जाता है ।जीके को महीन पीसकर गौमूत्र से संयुक्त कर लेप करने या गौमूत्र की माँलिश करने से चमड़ी सुवर्ण तथा रोगरहित हो जाती है । 

४. जोड़ों का दर्द ( सन्धिवात ) ,जोड़ो के नये पुराने दर्द में महारास्नादि क्वाथ के साथ गौमूत्र मिलाकर पीने से यह रोग नष्ट हो जाता है ।सर्दियों में सोंठ के १-१ ग्राम चूर्ण के सेवन से भी लाभ होता है ।तथा दर्द के स्थान पर गर्म गौमूत्र का सेंक करने से भी लाभ होता है । 

५. दाँत दर्द,पायरिया में गौमूत्र बहुत अच्छा कार्य करता है जब दर्द असहाय हो जाये तो गौमूत्र से कुल्ला करें ।गौमूत्र से प्रतिदिन कुल्ला करने से पायरिया नष्ट होता है । 

६. आँख के रोगों में गौमूत्र रामबाण का काम करता है ।इसके काली बछिया का गौमूत्र एकैत्र करके ताँबे के बर्तन में गर्म करें ।चौथाई भाग बचने पर उसे निथार कर पानी अलग कर लें ।नीचे जो लवण बचते है उन्हें फेंक दे उपर का स्वच्छ पानी किसी काँच की शीशी में भर ले नियमित रूप से सुबह-शाम आँख में डाले थोड़ा आँखों में लगता ज़रूर है पर आँखों की खुजली ,धुँधलापन ,रतौंधी ,तथा कमज़ोर नज़र वालों के लिए बहुत अच्छी औषधि सिद्ध हुई है और कुछ ही दिनों में चश्मा भी हट जायेगा नहीं तो नम्बर कम हो जायेगा । 

७. प्रसव पीड़ा के समय ५०मिली लीटर गौमूत्र को को गायत्री मंत्र से अभिमंत्रित करकें पिलाने से प्रसव पीड़ा कम होकर प्रसव आसान हो जाता है । प्रसव के बाद गौमूत्र को घर में छिड़कने से जच्चा-बच्चा सुरक्षित रहते है तथा घर के वायरस मर जाते है । तथा डिलिवरी के तुरन्त बाद काँसें की थाली को बजाना चाहीए जिसकी ध्वनितरंगों से जच्चा -बच्चा के आस-पास के वायरस कीटाणु तुरन्त मर जाते है क्योंकि जच्चा की बहुत अधिक सफ़ाई नहीं हो पाती है इसलिए बच्चा पैदा होने के बाद थाली बजाने का विधान है । 

८. गौमूत्र को प्रतिदिन सूती कपडेंकी आठ तह बनाकर ताज़ा मूत्र उसमें छानकर प्रात: ख़ाली पेट पीने के एक घण्टा बाद तक कुछ न खाये पीएँ इसके नियमित प्रयोग से पाइल्स ,लकवा ,पथरी ,दमा ,सफ़ेद दाग ,टाँसिल्स ,हार्ट अटैक ,कोलेस्ट्राल ,श्वेत प्रदर ,अनियमित महावारी ,गठिया ,मधुमेह ,किडनी के के रोग रक्तचाप ,सिरदर्द ,टीबी कैंसर आदि रोग ठीक होते है । 

९. बवासीर रोग में ५०मिली.औरआधा ग्राम हरड़ ( एरण्डतेल में भूनी हुई ) रात्रि में गौदूग्ध से यह रोग नष्ट होता है । 

१०. यकृत प्लीहा की सूजन में पाँच तौला गौमूत्र में समान भाग गौमूत्र मिलाकर नियमित पीने से यकृत व प्लीहा की सूजन उतर जाती है । 

4 पंञ्चगव्य चिकित्सा

पंञ्चगव्य चिकित्सा 
१. बालज्वर--निम्ब के सूखे पत्तों के साथ घी मिलाकर धूप देने से बच्चों का बू खार भाग जाता है । 

२. स्मरणशक्तिवर्धक -- १-२ बचचूर्ण,गौघृत एक चम्मच और एक गिलास गर्मगौदूग्ध के साथ सेवन करने वाले मनुष्य की कुछ ही दिनों में बुद्धि एंव स्मरणशक्ति अत्यन्त बढ़ जाती है । 

३. कास-- पीपल चूर्ण घी में भूनकर उसमें समान मात्रा में सेंधानमक मिलाकर ,एक चम्मच प्रतिदिन लेने से खाँसी ठीक होती है । 

४. दाद खाज खुजली -- तीन कालीमिर्च का चूर्ण,गौघृत एक चम्मच के साथ लेने से कुछ ही दिनों में सभी प्रकार की खुजली व विष का प्रभाव दूर होता है । 

५. बिच्छु के काटने पर -- ज़ीरा को पीस कर ,बराबर मात्रा में सेंधानमक और गौघृत आवश्यकतानुसार मिलाकर गर्म - गर्म लेप करें तुरन्त आराम आता है । 

६. कब्ज , पेट ,फूलना , खट्टी डकार आना-- आदि की समस्या उत्पन्न हो जाने पर ३ तोला स्वच्छ व ताज़ा गौमूत्र स्वच्छ कपड़े । में से छान कर उसमें आधा ग्राम सादा नमक मिलाकर पीना चाहिए,थोड़ी देर बाद ही पेट साफ़ हो जायेगा । 

७. पेट गैस-- जिन लोगों को उदर में अधिक गैस बनने की सिकायत है ।प्रात: काल आधा कप गौमूत्र में काला नमक तथा नींबू का रस मिलाकर पीने से रोग से कूछ ही दिनों में छुटकारा मिल जाता है । 

८. गौमूत्र का खोवा निकालकर उससे बनी ४ गोलियाँ या आधा चम्मच गौमूत्रक्षार के साथ एक चम्मच गौघृत मिलाकर भोजन से पूर्व लेने पर पेट में वायु नहीं बनती है । 

९. पुराना ज़ुकाम , श्वासरोग ,दमारोग ,उच्चरक्तचाप -- विजातीय तत्त्वों के प्रति असहिष्णुता से बार- बार ज़ुकाम होता है । नासारन्ध्रों में सूजन स्थायी हो जाने से पीनस बन जाता है ,नाक बहना बार - बार छींक आना नाक बंद हो जाना बाद में बाल गिरना या असमय सफ़ेद होना आदि लक्ष्ण भी उत्पन्न हो जाते है । इस अवस्था में गौमूत्र को मुख द्वारा सेवन तथा नस्य (नाक से )लेने से चमत्कारिक लाभ होता है ।रोगी को चौथाई प्याली साफ़ ,शुद्ध गौमूत्र लेकर उसमें एक-चौथाई चम्मच फिटकरी फुला मिलाकर सेवन करना चाहिए । 

१०. दमारोग ,क्षयरोग (टी बी )-- दमा के रोगी छोटी बछडी का एक तोला मूत्र नियमित पीने से रोग 
समूल नष्ट होता है । 
११. अम्लपित ( एसीडिटी ) -- अम्लपित के रोगी को सुबह उठते ही गाय का प्रथम मूत्र दो घूट से शुरू करें तथा धीरे-धीरे दस पन्द्रह दिन में छह घूट तक बढ़ा ले । शुरू के दिनों में दिन में दो तीन बार शौच के लिए जाना पड़ सकता है जो १०-१५ दिन में स्वत: ही ठीक हो जायेगा ।दो माह तक सेवन करने से रोग जड़ से ही ख़त्म हो जायेगा । 

१२. यकृत तथा प्लीहा बढ़ना -- जिगर का बढ़ना , यकृत की सूजन तथा तिल्ली के रोगों में गौमूत्र का का सेवन अमौघ औषधि है ।इस बिमारी में पेट बढ़ जाता है और भूख कम लगने लगती है ।अपच , क़ब्ज़ , एसीडिटी ,अशक्त्ता आदि लक्ष्ण प्रदर्शित होने लगते है ।५ तोला गौमूत्र में एक चुटकी नमक मिलाकर लेवे या पुनर्नवा के क्वाथ में समान भाग गौमूत्र मिलाकर या गर्म ईंट पर गौमूत्र में कपड़ा भिगोकर लपेटें और हल्की-हल्की सिकाई प्रभावित स्थान पर करे । 

१३. मधुमेह ( शुगर ) -- शुगर के रोग में रोगी को बिना ब्याही बछिया का मूत्र प्रतिदिन १०-१५ ग्राम सेवन करें तो बहुत लाभ होगा । 

१४. गले का कैंसर-- कैंसर रोगी को गौमूत्र १०० मिली एक चम्मच गोमय ( गोबर रस ) लेकर निहार मुख लेने से ३-४ महीने में आराम आने लगता है । 

१५. जलोदर के रोगी को ५०-५० ग्राम गौमूत्र में २-२ ग्राम यवक्षार मिलाकर पीते रहने से कुछ सप्ताह में पेट का पानी कम होने लगता है ।जलोदर के रोगी को गौदूग्ध भी पीना चाहिए अधिक आराम मिलेगा ।