सोमवार, 25 जनवरी 2016

क्या भगवान शिवजी हमे माफ कर पायेगें ?

विश्व में ऐसा कोई शिवालय नही होगा की जीसमे नंदी महाराज विराजमान न हो । हमे शिवालयो मे प्रवेश करते ही पहले नंदी महाराज ही मीलेगें। हमे शिवजी के दर्शन करना है। तो पहले नंदी महाराज के दर्शन करके नंदी महाराज से आशिर्वाद लेना पडता है। क्योंकी भगवान भक्त के वशीभुत होते है।
हम शिवजी को तो मानते है। पर शिवजी के वाहन नंदी महाराज को भुलते जा रहे है।आज नंदी महाराज सडको पर कचरा खाने को मजबुर है। क्या भगवान शिवजी हमे माफ कर पायेगें ?
धर्म को बचाना चाहते हो तो नंदी महाराज गौ वंशो को बचाना होगा क्योकीं नंदी महाराज गौ वंश ही धर्म का रूप है।
गौ सेवा ही गोपाल सेवा है।

गुरुवार, 21 जनवरी 2016

28 फ़रवरी 2016 दिल्ली चलो

उठो भारत के नर नारियो हुंकार भरो।
गौमाता को राष्ट्र माता स्वीकार करो।।

  गौहत्या का कलंक भारत के माथे से मिटाना हैं ,
          पुनः राष्ट्र को विश्व गुरु बनाना है।

  1966 में धर्म सम्राट करपात्रीजी महाराज के नेतृत्व में गौहत्या बंदी आंदोलन को 2016 में 50 वर्ष पुरे हो रहे हैं।उस आंदोलन में हजारो गौभक्तो ने प्राणों की आहुति दि थी ।उन शहीदों को सच्ची श्रद्धांजलि देने के लिये गौमाता को राष्ट्र माता के पद पर सुशोभित करवाने हेतु ।
।। महा जन आंदोलन ।।
दिनाँक 28 फरवरी 2016 रविवार को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में पूज्य गोपाल मणि जी महाराज एंव देश के पूज्य सन्तों के सानिध्ये में।
जिसमे देश के सभी राज्यो से हजारो गौभक्तो ने हिश्सा लेंगे ।
     भारत के ऋिषयों ने पूरे देश और दुनिया को एक परिवार या घर के रूप में देखा है। घर बनता ही माँ से है। इस देश में राष्ट्र गीत भी है राष्ट्र गान भी है राष्ट्र पक्षी भी है राष्ट्र पशु भी है राष्ट्रपिता भी हैै। लेकिन हमारे राष्ट्र रूपी घर में राष्ट्र माता नही है
इसलिए गो माता को राष्ट्र माता बनाओ। वेदों में लिखा है
गोस्तु मात्रा न विद्यते
गाय की बराबरी कोई नही कर सकता।  उस गो माता के लिए हमे किसी मंदिर बनाने की जरूरत नही है गो माता के घर पहुंचते ही वह घर मंदिर बन जाता है
गो माता को वो सम्मान दो जो हम भगवान को देते हैं ।

आप एक दिन आकर गो रक्षा के लिए खडे हो जाओ ।

भारत सरकार एंव राज्य सरकार से हमारी निम्न पांच मांगे है।

1. गौ माता को राष्ट्रमाता के पद पर सुशोभित करे एंव गौ मंत्रालयों का अलग से गठन हो।
2. रासायनिक खादो पर प्रतिबंध लगे,गोबर की खाद का उपयोग हो,गोबर गैस का चूल्हा जलाने एंव गोबर गैस को सी.न.जी गैस में परिवर्तन कर मोटर गाड़ी चलाने में उपयोग हो।
4 . 10 वर्ष तक के बालक-बालिकाओ को सरकार की और से भारतीय गाय का दूध नि:शुल्क उपलब्ध हो,किसानो को गाय अनुदान में दी जाये,प्रत्येक गाँव में भारतीय नंदी(सांड)की व्यवस्था हो।
4. जर्सी आदि विदेशी गायों पर पूर्ण प्रतिबंध उसके दूध की विकृति को सार्वजनिक किया जाये,गोचरान  भूमि गौवंश के लिये ही मुक्त हो।
5.गौ-हत्यारों को मृत्यु दण्ड दिया जायें।

ये जानकारी भारतीय गोक्रांति मंच तमिलनाडु चेन्नई के गोवत्स राधेश्याम रावोरिया ने दी।

गौमाता राष्ट्रमाता के चरणों में,हमारा कोटी-कोटी वंदन।


बुधवार, 13 जनवरी 2016

किसने शुरु करवाया था कसाईखानों में गौवध…

किसने शुरु करवाया था कसाईखानों में गौवध…
 मुस्लिम काल में गौवध नाममात्र था : श्री
धर्मपाल द्वारा लिखित साहित्य में दिए गए प्रमाणों के अनुसार मुस्लिम
शासन के समय गौवध अपवादस्वरूप ही होता था। अधिकांश शासकों ने अपने शासन को
मजबूत बनाने और हिन्दुओं में लोकप्रिय होने के लिए गौवध पर प्रतिबंध लगाए।
यह तो वे अंग्रेज और ईसाई आक्रमणकारी थे जिन्होंने भारत में गौवध को
बढ़ावा दिया। अपने इस कुकर्म पर पर्दा डालने के लिए उन्होंने मुस्लिम
कसाइयों की नियुक्ति बूचड़खानों में की।धर्मपालजी
द्वारा दिए प्रमाणों से पता चलता है कि ‍ब्रिटेन की रानी के निर्देशन पर
मुस्लिम कसाइयों को नियुक्त करने की नीति अपनाई गई थी। आज भी देश में वही
अंग्रेजकालीन नीतियां जारी हैं। इनके चलते देश में गौवधबंदी असंभव है।
स्मरणीय है कि भारत आज भी इंग्लैंड की डौमिन स्टेट हैं तथा अभी तक हम
स्वतंत्र देश नहीं है। यही कारण है कि पूरी संसद द्वारा गौवध बंदी करने का
समर्थन करने पर भी प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने कहा था कि यदि यह
प्रस्ताव पास होता है तो मैं प्रधानमंत्री पद से त्यागपत्र पद से
त्यागपत्र दे दूंगा। अनुमान यह है कि गौवध बंदी न करने का इंग्लैंड सरकार
का आदेश नेहरू को मिला था।

भारतीय गौवंश विशेष क्यों…

भारतीय गौवंश विशेष क्यों…
भारतीय गौवंश विशेष क्यों : करनाल
स्थित भारत सरकार के करनाल स्थित ब्यूरो के द्वारा किए गए शोध के अनुसार
भारत की 98 प्रतिशत नस्लें ‘ए2’ प्रकार के प्रोटीन वाली अर्थात विषरहित
हैं। इनके दूध की प्रोटीन की एमीनो एसिड चेन (बीटा कैसीन ए2) में 67वें
स्थान पर ‘प्रोलीन’ है और यह अपने साथ की 66वीं कड़ी के साथ मजबूती के साथ
जुड़ी रहती है तथा पाचन के समय टूटती नहीं।66वीं
कड़ी में एमीनो एसिड आइसोसोल्यूसीन होता है। वैज्ञानिकों का अनुमान है कि
भारत की 2 प्रतिशत नस्लों में ‘ए1’ नामक एलिल (विषैला प्रोटीन) विदेशी
गौवंश के साथ हुए ‘म्युटेशन के कारण’ आया हो सकता है।
एनबीएजीआर-
करनाल द्वारा भारत की 25 नस्लों की गऊओं के 900 सैंपल लिए गए। उनमें से
97-98 प्रतिशत ‘ए2ए2’ पाए गए तथा एक भी ‘ए1ए1’ नहीं निकला। कुछ सैंपल
‘ए1ए2’ थे जिसका कारण ‍विदेशी गौवंश का संपर्क होने की संभावना प्रकट की
जा रही है।
गुणसूत्र विज्ञान : गुणसूत्र
जोड़ों में होते हैं अत: स्वदेशी-विदेशी गौवंश की डीएनए जांच करने पर ‘ए1,
ए2’, ‘ए1, ए2’ तथा ‘ए2ए2’ के रूप में गुणसूत्रों की पहचान होती है।
स्पष्ट है कि विदेशी गौवंश ‘ए1ए1’ गुणसूत्र वाला तथा भारतीय ‘ए2ए2’ है।
केवल
दूध के प्रोटीन के आधार पर ही भारतीय गौवंश की श्रेष्ठता बतलाना अपर्याप्त
होगा, क्योंकि बकरी, भैंस, ऊंटनी आदि सभी प्राणियों का दूध विषरहित ‘ए2’
प्रकार का है। भारतीय गौवंश में इसके अतिरिक्त भी अनेक गुण पाए गए हैं।
भैंस के दूध के ग्लोब्यूल अपेक्षाकृत अधिक बड़े होते हैं तथा मस्तिष्क पर
बुरा प्रभाव करने वाले हैं। आयुर्वेद के ग्रंथों के अनुसार भी भैंस का दूध
मस्तिष्क के लिए अच्छा नहीं, वातकारक (गठिया जैसे रोग पैदा करने वाला),
गरिष्ठ व कब्जकारक है जबकि गौदुग्ध बुद्धि, आयु व स्वास्थ्य, सौंदर्यवर्धक
बतलाया गया है।
भारतीय गौवंश अनेक गुणों वाला है : 1. खोजों
के अनुसार भारतीय गऊओं के दूध में ‘सैरिब्रोसाइट’ नामक तत्व पाया गया है,
जो मस्तिष्क के ‘सैरिब्रम’ को स्वस्‍थ-सबल बनाता है। यह स्नायु कोषों को
बल देने वाला व बुद्धिवर्धक है।
केवल
भारतीय देसी नस्ल की गाय का दूध ही पौष्टिक : करनाल के ‘नेशनल ब्यूरो ऑफ
एनिमल जैनिटिक रिसोर्सेज’ (एनबीएजीआर) संस्था ने अध्ययन कर पाया कि भारतीय
गायों में प्रचुर मात्रा में ए-2 एलील जीन पाया जाता है, जो उन्हें
स्वास्थ्यवर्धक दूध उत्पन्न करने में मदद करता है। भारतीय नस्लों में इस
जीन की फ्रिक्वेंसी 100 प्रतिशत तक पाई जाती है।
स्वदेशी-विदेशी गौवंश की पहचान : न्यूजीलैंड
में विषयुक्त और विषरहित (ए1 और ए2) गाय की पहचान उसकी पूंछ के बाल की
डीएनए जांच से हो जाती है। इसके लिए एक 22 डॉलर की किट बनाई गई थी। भारत
में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। केंद्र सरकार के शोध संस्थानों में यह जांच
होती है, पर किसानों को तो यह सेवा उपलब्ध ही नहीं है। वास्तव में हमें इस
जांच की जरूरत भी नहीं है। हम अपने देसी तरीकों से यह जांच सरलता से कर
सकते हैं।

विदेशी गायों का दूध और अन्य कितना हानीकारक

विदेशी गायों का दूध और अन्य कितना हानीकारक,
विषाक्त है विदेशी गऊओं का दूध : मथुरा
के ‘पशु चिकित्सा विश्वविद्यालय एवं गौपाल अनुसंधान संस्थान’ में नेशनल
ब्यूरो ऑफ जैनेटिक रिसोर्सिज, करनाल (नेशनल काउंसिल ऑफ एग्रीकल्चर रिसर्च,
भारत सरकार) के वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. देवेन्द्र कुमार सदाना द्वारा एक
प्रस्तुति 4 सितंबर को दी गई।मथुरा विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के सामने दी गई प्रस्तुति में डॉ. सदाना ने जानकारी दी कि:-
अधिकांश विदेशी गौवंश (हॉलस्टीन,
जर्सी, एचएफ आदि) के दूध में ‘बीटा कैसीन ए 1’ नामक प्रोटीन पाया जाता है
जिससे अनेक असाध्य रोग पैदा होते हैं। पांच रोग होने के स्पष्ट प्रमाण
वैज्ञानिकों को मिल चुके हैं-
1. इस्चीमिया हार्ट डिजीज (रक्तवाहिका नाड़ियों का अवरुद्ध होना)।
2. मधुमेह-मिलाइटिस या डायबिटीज टाइप-1 पैंक्रियाज का खराब होना जिसमें इंसुलिन बनना बंद हो जाता है।)
3. आटिज्म (मानसिक रूप से विकलांग बच्चों का जन्म होना)।
4. सीजोफ्रेनिया (स्नायु कोषों का नष्ट होना तथा अन्य मानसिक रोग)।
5. सडन इनफैण्ट डेथ सिंड्रोम (बच्चे किसी ज्ञात कारण के बिना अचानक मरने लगते हैं)।
टिप्पणी : विचारणीय
यह है कि हानिकारक ‘ए1’ प्रोटीन के कारण यदि उपरोक्त पांच असाध्य रोग होते
हैं तो और भी अनेक रोग भी तो होते होंगे। यदि इस दूध के कारण मनुष्य का
सुरक्षा तंत्र नष्ट हो जाता है तो फिर न जाने कितने ही और रोग भी हो रहे
होंगे जिन पर अभी खोज नहीं हुई।

हिन्दू धर्म में गाय को क्यों पवित्र माना जाता है?

 Hindu dharam mein cow ko kyon pavitar mana jata hai

हिन्दू धर्म में गाय को क्यों पवित्र माना जाता है?
गाय हिन्दु्ओं के लिए सबसे पवित्र पशु है। इस धरती पर पहले गायों की कुछ ही प्रजातियां होती थीं। उससे भी प्रारंभिक काल में एक ही प्रजाति थी। आज से लगभग 9,500 वर्ष पूर्व गुरु वशिष्ठ ने गाय के कुल का विस्तार किया और उन्होंने गाय की नई प्रजातियों को भी बनाया, तब गाय की 8 या 10 नस्लें ही थीं जिनका नाम कामधेनु, कपिला, देवनी, नंदनी, भौमा आदि था। कामधेनु के लिए गुरु वशिष्ठ से विश्वामित्र सहित कई अन्य राजाओं ने कई बार युद्ध किया, लेकिन उन्होंने कामधेनु गाय को किसी को भी नहीं दिया। गाय के इस झगड़े में गुरु वशिष्ठ के 100 पुत्र मारे गए थे।
दरअसल, भारत एक कृषि-प्रधान देश है। कृषि ही भारत की आय का मुख्य स्रोत है। ऐसी अवस्था में किसान को ही भारत की रीढ़ की हड्डी समझा जाना चाहिए और गाय किसान की सबसे अच्छी साथी है। गाय के बिना किसान व भारतीय कृषि अधूरी है। प्राचीन भारत में गाय समृद्धि का प्रतीक मानी जाती थी। युद्ध के दौरान स्वर्ण, आभूषणों के साथ गायों को भी लूट लिया जाता था। जिस राज्य में जितनी गाएं होती थीं उसको उतना ही संपन्न माना जाता है। किंतु वर्तमान परिस्थितियों में किसान व गाय दोनों की स्थिति हमारे भारतीय समाज में दयनीय है। इसके दुष्परिणाम भी झेलने पड़ रहे हैं।
एक समय वह भी था, जब भारतीय किसान कृषि के क्षेत्र में पूरे विश्व में सर्वोपरि था। इसका कारण केवल गाय थी। भारतीय गाय के गोबर से बनी खाद ही कृषि के लिए सबसे उपयुक्त साधन थे। खेती के लिए भारतीय गाय का गोबर अमृत समान माना जाता था। इसी अमृत के कारण भारत भूमि सहस्रों वर्षों से सोना उगलती आ रही है। किंतु हरित क्रांति के नाम पर सन् 1960 से 1985 तक रासायनिक खेती द्वारा भारतीय कृषि को नष्ट कर दिया गया। अब खेत उर्वरा नहीं रहे।
अब खेतों से कैंसर जैसी ‍बीमारियों की उत्पत्ति होती है। रासायनिक खेती ने धरती की उर्वरा शक्ति को घटाकर इसे बांझ बना दिया। गाय के गोबर में गौमूत्र, नीम, धतूरा, आक आदि के पत्तों को मिलाकर बनाए गए कीटनाशक द्वारा खेतों को किसी भी प्रकार के कीड़ों से बचाया जा सकता है। वर्षों से हमारे भारतीय किसान यही करते आए हैं। आधुनिक विकास के नाम पर अमेरिकी और यूरोपीय लोगों ने हमारी सभ्यता, संस्कृति के साथ ही हमारी धरती को भी नष्ट कर दिया। आम भारतीय तो समझदार होता है लेकिन जिसने विदेशों में पढ़ाई की है उसके भारतीय होने की कोई गारंटी नहीं। खैर…

33 कोटि देवता :

33 कोटि देवता : 
हिन्दू धर्म अनुसार गाय में 33 कोटि के देवी-देवता निवास करते हैं। कोटि का अर्थ करोड़ नहीं, प्रकार होता है। इसका मतलब गाय में 33 प्रकार के देवता निवास करते हैं। ये देवता हैं- 12 आदित्य, 8 वसु, 11 रुद्र और 2 अश्‍विन कुमार। ये मिलकर कुल 33 होते हैं। यही कारण है कि दिवाली के दूसरे दिन गोवर्धन पूजा के अवसर पर गायों की विशेष पूजा की जाती है और उनका मोर पंखों आदि से श्रृंगार किया जाता है। हिन्दुओं के हर धार्मिक कार्यों में सर्वप्रथम पूज्य गणेश व उनकी माता पार्वती को गाय के गोबर से बने पूजा स्थल में रखा जाता है।