उद्योगपति
वर्तमान युग उद्यमिता का युग है। उद्यमी ही उद्योगपति बनता है। उद्योगपति राष्ट्र के आर्थिक ढाँचे की नींव है। गोरक्षण व गोसंवर्धन के पुनीत कार्य की उर्जा उद्योगों के निबधि संचालन के लिए भारी लाभप्रद सिध्द हो सकती है। समाज से लेना ही नही अपिनु समाज को देना इस विचार को ध्यान में रखते हुए उद्योगपति गौमाता के प्रति अपितु कृतज्ञता इस प्रकार ज्ञापित कर सकते है :-
१. अपने कारखाने या उद्योग स्थान पर एक गोशाला अवश्य बनवाएँ ।
२. अपनी औद्योगिक उत्पादों के विज्ञापनों में कम से कम एक वाक्य गो सेवा सम्बंधी हो । जैसे अभी सरकारी विज्ञापनों में अंत में दहेज इत्यादि बुराईयों के खिलाफ एक वाक्य बडे अक्षरों में होता है।
३. गौरक्षा, गौसंवर्धन व पंचगव्य की उपयोगिता व महत्व पर आधारित परिचर्चा, चर्चासत्र, संगोष्ठियाँ, सम्मेलन इत्यादि को प्रायोजित करें। वर्ष में कम से कम एक ऐसा आयोजन करवाऐं ।
४. गोवंश आधारित उद्योग स्थापित करें। बड़े उद्योगपति कम से कम एक ऐसा उद्योग अवश्य स्थापित करें ।
५. गोशालाओं को स्वयं मुक्त हस्त से आर्थिक सहयोग प्रदान करें तथा अपने औद्योगिक स्थल पर गोग्रास दान पेटी लगवाकर उसमे दान डालने की प्रेरणा कर्मचारियों को देवें ।
६. अपनी औद्योगिक संस्थाओं में कार्यरत कर्मचारियों को गोपालन, पंचगव्य पदार्थ एवं औषधियों के उपयोग का आग्रह करें ।
७. माह में एक दिन अपने इष्ट मित्रों, कर्मचारियों सहित गोशाला जाकर गोसेवा का आनंद लें ।
८. गोपर्व तथा गो उत्सव यथा गोपाष्टमी, गोवत्सव्दादशी, बलराम जयंती (हलधर षष्ठी), श्री कृष्ण जन्माष्टमी, मकर संक्रांति इत्यादि का आयोजन अपने औद्योगिक स्थल पर करें व अन्य जगहों पर इनके आयोजन की प्रेरणा व सहयोग लोगों को देवें ।
९. गो संवर्धन सम्बंधी रिसर्च फाउण्डेशन की स्थापना करें ।
१०. गो सदन का निर्माण करें। (अनुसंधान संस्थान)
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