बुधवार, 5 अगस्त 2015

Flexibility of Desi Milk

Flexibility of Desi Milk

Desi cow milk can be used to make high quality desi products; desi ghee, dahi, shreekhand, chaach, chhena, malai and khoa. Sweets made of organic desi milk products have nutritional value.
Some of the Benefits of Desi Cow Milk and its different products are:
  • As per Ayurvedic treatment, Cow Ghee helps in the growth and development of Children’s brain
  • Regular consumption increases good (HDL) cholesterol (and not bad LDL cholestrol)
  • Stimulates digestion and aids absorption of fat soluble vitamins
  • An excellent all round anti-ageing vegetarian food & external applicant on the skin
The components in Desi Cow milk are so flexible and rich in Vitamins that simply drinking milk can easily compensate nutritional component of a missed balance diet.
  • It has amino acids which make its protein easily digestible
  • It is good for kidney
  • It is a rich source of Vitamins like A, B2 and B3  which help increasing immunity
  • Desi Cow Milk helps in reducing acidity
  • Reduces chances of peptic ulcer
  • Helps in reducing chances of colon, breast and skin cancer
  • Desi Cow milk prevents the formation of serum cholesterol
Desi_Milk_Products

Scalability of Cattle Farming and Profits

A living Cow makes you millionaire while a dead Cow in the form of meat help in weakening the economy and rise in the number of patients. Beef eating give rise to several diseases, ailments – cardiovascular diseases, alzheimer’s disease, indigestion, acidity, liver failure, colon cancer, heart strokes, and highly possible epidemic like mad cow.
To consider cattle business as profitable source of income, we have to factor in other benefits associated with desi cattle; dung, urine and labor.
Common pathogens of beef: salmonella, serovars, shigella, staphylococcus, aureus, listeria and monocytogenes. Every year in the United States, 6.5 million to 33 million cases of illness are diagnosed due to microbial pathogens which occur due to just raw meat (imagine the deteriorating impact when the same meat is intake in the form of food), with about 900,000 deaths occurring annually as well. According to a multi-state study published in the America Journal of Preventative Medicine, the annual cost of disease caused by meat food borne pathogens is estimated to be anywhere from 9.3 to 12.9 billion dollars in medical costs and productivity losses. Most of these diseases come from contact with contaminated raw meat (which include beef), although other “vehicles of transmission” are becoming more and more frequent due to global travel. However, the main source of disease caused by microbial pathogens is usually raw meat (beef, etc). The type of pathogen present varies depending on the type of meat eaten.

POI

बुधवार, 29 जुलाई 2015

आओ गाय से प्रेम करे... आज की आवश्यकता गोपालन-गोसंरक्षण

आओ गाय से प्रेम करे... आज की आवश्यकता गोपालन-गोसंरक्षण   

धर्म,अर्थ काम और मोक्ष एंव इनसे भी आगे ईश्वरीय प्रेम को प्राप्त करने हेतु गौ सेवा सर्व सुलभ साधन है। गौमाता की महिमा अपार है। इस संसार में गौ एक अदभुत प्राणी है। जो वास्तव में सबके लिये कल्याणकारी है। अपने शास्त्रो के अनुसार गाय में तैतीस कोटि देवताओ का निवास है। केवल गौमाता के सेवा से अपने सम्पूर्ण देवी देवताओ की सेवा सम्पन हो जाती है। इसीलिए गौमाता को सर्वदेवमहि कहा जाता है। गौ के दर्शन से समस्त देवताओ के दर्शन एंव समस्त तीर्थो की यात्रा का पुण्य प्राप्त होता है तथा गौ-दर्शन,गौ स्पर्श ,गौ पूजन ,गौ स्मरण एंव गोदान करने से मनुष्य सभी पापो से मुक्त हो जाता है। इस प्रकार गौ भारतवासियो की परम आराध्या है। इस लिए भारत सरकार से हमारा निवेदन है कि गौमाता को राष्ट्र माता घोषित करे। प्राचीन काल सभी गौ-सेवापरायण थे,और गाये भी बहुत अधिक थी,जिससे हमारे देश में अन्न -धन  ,सुख शांति एंव समृद्धि थी।  बड़े बुजुर्ग कहते है देश में दूध दही की नदियां बहती थी। 
वर्तमान समय में दुर्भाग्यवश आधुनिक सभ्यता की चक्काचोंद में भारतीय गौवंश की भारी उपेक्षा हो रही है एंव गौ-हत्याये हो रही है और गायों के संख्या भी बहुत कम हो गयी। 
परिणामत:देश में दुःख दारिद्रय का विस्तार हो रहा है,और लोगो में हिंसा,क्रोध लोभ एंव विलासिता बढ़ती जा रही है। 
आज के परिवेश में गौवंश के प्रति-धार्मिक एंव आध्यात्मिक चिंतन के साथ-साथ आर्थिक,सामाजिक तथा विज्ञानिक एंव स्वास्थ्य संबंधी चिंतन की आवश्यकता है। 
गौमाता द्वारा प्रदत पंचगव्य मानवीय स्वास्थ्य के लिये अमृत तुल्य ओषधि है कई प्रकार की असाध्य व्याधियों के समन हेतु पंचगव्य आयुर्वेदिक ओषधियों के प्रयोग भारतीय चिकित्सा शास्त्रो में है। 
संत महात्मा,आचार्यो के श्री मुख से बहुत कुछ सुना था उन्ही में से गौ-गोविन्द की कृपा से लिखने का दुष्साहस किया।भगवान से प्रार्थना है की प्रत्येक भारतीय गौमाता के प्रति अपना दायित्वे समजे और जीवन में उतारे। आशा है आप इसे पढ़कर गौ सेवा के प्रति प्रेरणा प्राप्त करेंगे। आप सेवा में लगकर दुसरो को भी प्रेरित करेंगे। धन्येवाद ,जय गौमाता जय गोपाल ,माँआआआ 
आपका मित्र 
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया 
www.gokranti.com 

गो माताओं को घास (गो त्रृण दान)करते हैं उसका महात्म आप गो भक्तो के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ

!!जय गो माता - जय गोपाल !! 
आदरणीय गो भक्त मित्रों गो माताओं को घास (गो त्रृण दान)करते हैं उसका महात्म आप गो भक्तो के समक्ष प्रस्तुत करने का प्रयास करता हूँ -- 
!!गो माता को चारा प्रदान करने की महिमा !!
घासमुष्टिं परगवे दद्यात् संवत्सरं तु यः!
अकृत्वा स्वयमाहारं व्रतं तत् सार्वकामिकम् !! (महाभारत अनु.69/12)
अर्थात- जो एक वर्ष तक प्रतिदिन स्वयं भोजन से पहले दूसरे की गाय को एक मुट्ठी घास खिलता है, उसका वह व्रत संपूर्ण कामनाओं को पूर्ण करने वाला होता है । 
तृणोदकादिसंयुक्तं यः प्रदद्यात् गवाह्निकम् !!
सोऽश्मेधसमं पुण्यं लभते नात्र संशयः ! (बृहत्पाराशरस्मृति 5/26-27)
अर्थात- जो गौओं को प्रतिदिन जल और तृणसहित भोजन प्रदान करता है, उसे अश्वमेधयज्ञ के समान पुण्य प्राप्त होता है, इसमें किंचिन्मात्र भी संदेह नहीं है ।
तीर्थस्थानेषु यत्पुण्यं यत्पुण्यं विप्रभोजने!
सर्वव्रतोपवासेषु सर्वेष्वेव तपःसु च!!
यत्पुण्यं च महादाने यत्पुण्यं हरिसेवने!
भुवः पर्यटने यत्तु वेदवाक्येषु सर्वदा!!
यत्पुण्यं सर्वयज्ञेषु दीक्षया च लभेन्नरः!
तत्पुण्यं लभते सद्यो गोभ्यो दत्वा तृणानि च !!
तीर्थस्थानों में जाने से, ब्राह्मणों को भोजन कराने से जो पुण्य प्राप्त होता है,सभी व्रत- उपवासों एवं तपस्याओं में जो पुण्य है, महादान करने में जो पुण्यं है, श्रीहरि के पूजन मेँ जो पुण्य है, वेदवाक्यों के पठन-पाठन में जो पुण्य है और समस्त यज्ञों की दीक्षा ग्रहण करने में जो पुण्य है, वे सभी पुण्य मनुष्य को केवल गायों को तृण(घास)खिलानेमात्र से तत्काल मिल जाते हैं ।

शुक्रवार, 24 जुलाई 2015

गौ सेवा का महत्व

गौ सेवा का महत्व


भारतीय परंपरा के मत से गाय के शरीर में ३३ करोड़ देवता वास होता हैं, एवं गौ-सेवा से एक ही साथ 33 करोड देवता प्रसन्न होते हैं। 

हिन्दू संस्कृति जिस घर में गाय माता का निवास करती हैं एवं जहां गौ सेवा होती है, उस घर से समस्त परेशानीयां कोसों दूर रहती हैं। भारतीय संस्कृति में गाय को माता का संम्मान दिय जाता हैं इस लिये उसे गौ-माता केहते है।

गाय प्राप्त गाय का दूध, दूध ही नहीं अमृत तुल्य हैं। गाय से प्राप्त दूध, घी, मक्खन से मानव शरीर पुष्ट बनता हैं । एवं गाय का गोबर चुल्हें, हवन इत्यादि मे उप्युक्त होता हैं और यहां तक की उसका मूत्र भी विभिन्न दवाइयां बनाने के काम आता हैं। 

गाय ही ऐसा पशुजीव हैं जो अन्य पशुओं में सर्वश्रेष्ठ और बुद्धिमान माना हैं। 

कहाजाता हैं भगवान श्री कृष्ण छह वर्ष के गोपाल बने क्योंकि उन्होंने गौ सेवा का संकल्प लिया था। भगवान श्री कृष्ण ने गौ सेवा करके गौ का महत्व बढाया हैं।

गाय के मूत्र में कैंसर, टीवी जैसे गंभीर रोगों से लड़ने की क्षमता होती हैं, जिसे वैज्ञानिक भी मान चुके हैं।गौ-मूत्र के सेवन करने से पेट के सभी विकार दूर होते हैं।ज्योतिष शास्त्र मे भी नव ग्रहो के अशुभ प्रभाव से मुक्ति के लिये गाय को विभिन्न प्रकार के अन्न का वर्णन किया गया हैं।यदि बच्चे को बचपन से गाय के दूध पिलाया जाए तो बच्चे की बुद्धि कुशाग्र होती हैं।गाय के गोबर को आंगन लिपने एवं मंगल कार्यो मे लिया जाता हैं।गोबर, गौ मूत्र, गौ-दही, गौ-दूध, गौधृत ये पंचगव्य हैं।गाय की सेवा से भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं।
इस संसार मे आज हर व्यक्ति किसी न किसी कारण दुखी हैं। कोई अपने कर्मों या अपने पर आई विपदाओं से दुखी हैं अर्थात वह अपने दुखों के कारण दुखी हैं मगर कोई दूसरे के सुख से दुखी हैं अर्थात ईर्षा के कारण भी दुखी हैं। यानी यहां दुखी हर कोई हैं कारण भले ही भिन्न-भिन्न हो सकते हैं। इन समस्त परेशानीओ का निदान  है गौ सेवा।
 
 

शनिवार, 18 जुलाई 2015

कुछ मित्र हमें ईद की मुबारकबाद दे रहे हैं.

"आज ईद है"
कुछ मित्र हमें ईद की मुबारकबाद दे रहे हैं. कृपया करके हमें कोई भी व्यक्ति यह मुबारकबाद देने का कष्ट ना करे.
हम एक गौ सेवक हैं. सिर्फ़ सनातन धर्म को मानते हैं,अपने देवी देवताओं को और आदि शक्ति को मानते हैं. और गौ सेवा भी सनातन धर्म का ही एक महत्वपूर्ण भाग है.
हमारे शास्त्रों में या किसी भी पौराणिक कथा में इस "ईद" नामक त्योहार का कोई वर्णन नहीं मिलता है और ना ही यह त्योहार हमारे किसी देवी देवता को समर्पित है.
तब हम इसे क्यूँ मनाएँ? और क्यूँ बधाई लें.
जिसको बुरा लगा हो वो हमें मित्र मानना बंद कर सकता है. हमें कोई आपत्ति नहीं होगी.
आपको यह त्योहार मनाना हो तो मनाइए हमें आपत्ति नहीं है.
अगर किसी मित्र को भाई चारे पर भाषण देना हो तो पहले ईद मानने वाले वर्ग से कहिए की वो नवरात्रि भी मनाएँ और भाई चारे को मजबूत करें. आपको जो जवाब वहाँ से प्राप्त होगा वह आपकी खुजली आसानी से मिटा देगा.
जय श्री राम..

बुधवार, 15 जुलाई 2015

गाय और भैंस की तुलना

गाय और भैंस की तुलना
गाय
भैंस
गाय के दूध, घी, छाछ, गोमूत्र व गोबर के 100 से भी अधिक गुण हैं और ये 150 से भी अधिक रोग मिटाते हैं।
भैंस के दूध, घी, छाछ के अनेक अवगुण हैं।
गाय के दूध-घी में रोग-प्रतिकारक शक्ति, बुद्धि-शक्ति, ओज-तेज बढ़ाने वाले सुवर्णक्षार व सेरिब्रोसाइड तत्त्व हैं।
भैंस के दूध में ये तत्त्व नहीं हैं।
गोमूत्र पृथ्वी की श्रेष्ठ संजीवनी (औषधि) है। अनेक रोगों की एक दवा माने ʹगोमूत्रʹ।
भैंस के मूत्र का कोई प्रचलित उपचार नहीं है।
गाय के दूध-घी में आँखों की रोशनी बढ़ाने वाला, अंधत्व मिटाने वाला केरोटिन व विटामिन ए भरपूर है।
भैंस के दूध-घी में ये पोषक तत्त्व नहीं हैं।
आयुर्वेद के ग्रंथों, विज्ञान व मानव-समाज के अभ्यास के आधार पर गाय का दूध वात, पित्त हरने वाला है।
आयुर्वेद एवं मानव-समाज के अभ्यास के आधार पर भैंस का दूध कफ बढ़ाने वाला है। भैंस का दूध-घी पचने में भारी तथा बालक, प्रसूता, वृद्ध व बीमारों के लिए अहितकर। इसका दूध हृदयरोग करने वाला तथा कोलेस्ट्रॉल, चर्बी, जड़ता व आलस्य बढ़ाने वाला है।
गाय का दूध-घी शरीर के भीतरी रोग जैसे – हृदयरोग, डायबिटीज, दुर्बलता, वृद्धत्व, श्वास, वात, आँखों की कमजोरी, जातीय दुर्बलता, मानसिक रोगों को मिटाने वाला है।
भैंस का दूध-घी शरीर के भीतरी रोगों को उत्पन्न करता है।
गाय के दूध की मात्रा बारह मास समतोल रहती है।
भैंस गर्मी में कम दूध देती है अथवा सूख जाती है।
गाय की छाछ अति स्वादिष्ट होती है तथा यह संग्रहणी रोग को मिटाने वाला अमृत है।
भैंस की छाछ फीकी, कफ बढ़ाने वाली व पचने में भारी होती है।
गाय का दूध-घी महँगा मिले तो भी सेवन करना चाहिए।
भैंस का दूध-घी सस्ता मिले तो भी सेवन नहीं करना चाहिए।
गाय अपने पालक को अनन्य प्रेम, मैत्री, करूणा व प्रसन्नता प्रदान करती है।
भैंस में यह सब देने की क्षमता नहीं है।
गाय पालक की प्रायः सारी आज्ञाओं का पालन करती है।
भैंस में ऐसी बुद्धि ही नहीं होती।