गुरुवार, 19 नवंबर 2015

गौपाष्टमी पर्व की सभी गौ भक्तों (गोपालको) को गोक्रांति मंच की और से कोटि कोटि बधाईयाँ....

गौपाष्टमी पर्व की सभी गौ भक्तों (गोपालको) को गोक्रांति मंच की और से कोटि कोटि बधाईयाँ....

आज ही के दिन से भगवान श्रीकृष्ण गौवंश को गोवर्धन पर्वत पर.... संवर्धन हेतू विचरण के लिए ले गए थे....
   आज के पावन दिन मैया यशोदा ने  भगवान् श्रीकृष्ण का श्रृंगार करके उन्हें गौ चारण के लिए प्रथम बार भेजा था। जिस ब्रह्म की चरण रज के लिए ब्रह्मा-शंकर तक तरसते हैं वो चरण गौ माता की सेवा के लिए कंकड़ पत्थर और कुंज-निकुंजों में विचरण करते हैं।
        गाय भगवान् श्री कृष्ण को सबसे ज्यादा प्रिय हैं। गाय की सेवा सीधी श्रीकृष्ण तक पहुँचती है। गौ माता की सेवा के कारण ही प्रभु का नाम गोपाल पड़ा। गाय हमारे आराध्य की भी आराध्या है। गौ माता में समस्त देवी-देवता निवास करते हैं।
        आज के इस युग में भगवान् श्री कृष्ण को तो बड़े बड़े भोग लगाये जाते हैं पर उनकी प्राण प्यारी गाय भूखी-प्यासी इधर उधर भटकती रहती है। अपने घर पर गाय की सेवा नहीं कर सकते तो किसी गौशाला में गौ माता को दत्तक (गोद) जरुर ले लेना। आज से पवित्र दिन और कौन सा होगा ?

    गौ सेवा एंव गौ रक्षा का संकल्प लें।

जय गौमाता जय गोपाल

निवेदक आपका मित्र
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया

बुधवार, 11 नवंबर 2015

दीपावली की हार्दिक शुभकामनाये

आप सभी अति प्रिय स्नेहीजनो को दीपावली की हार्दिक शुभकामना । आज गौपूजन जरूर करे । क्योकि शास्त्रो में कहा गया है "गोमय वसते लक्ष्मी" गोबर में ही लक्ष्मी जी बिराजति है। गौमाता लक्ष्मी जी की बड़ी बहेन है समुन्द्र मंथन में लक्ष्मी माता से पहले गौमाता प्रकट हुई।
दीपोत्सव के ज्योतिर्मय पर्व पर पूज्या गोमाता आपके जीवन में नवीन सात्विक ऊर्जा, सकारात्मक समझ, निर्मल मन, विवेकवती बुद्धि, हृदय अनुरागी तथा उज्जवल भविष्य के साथ सरलता, विनम्रता, दया, करुणा, संस्कार, स्वास्थ्य, दीर्घायु, समृद्धि, दानशीलता, धैर्य, शौर्य, वीरता एवं पूज्या गोमाता के प्रति पूर्ण समर्पण व सेवा का भाव प्रदान करें यही मंगल कामना करता हूँ।
आपका मित्र
गोवत्स राधेश्याम रावोरिया

रविवार, 8 नवंबर 2015

गोवत्स द्वादशी

गोवत्स द्वादशी

सत्त्वगुणी, अपने सान्निध्यसे दूसरोंको पावन करनेवाली, अपने दूधसे समाजको पुष्ट करनेवाली, अपना अंग-प्रत्यंग समाजके लिए अर्पित करनेवाली, खेतोंमें अपने गोबरकी खादद्वारा उर्वराशक्ति बढानेवाली, ऐसी गौ सर्वत्र पूजनीय है । हिंदू  कृतज्ञतापूर्वक गौको माता कहते हैं । जहां गोमाताका संरक्षण-संवर्धन होता है, भक्तिभावसे उसका पूजन किया जाता है, वहां व्यक्ति, समाज एवं राष्ट्रका उत्कर्ष हुए बिना नहीं रहता। भारतीय संस्कृतिमें गौको अत्यंत महत्त्व दिया गया है । वसुबारस अर्थात गोवत्स द्वादशी दीपावलीके आरंभमें आती है । यह गोमाताका सवत्स अर्थात उसके बछडेके साथ पूजन करनेका दिन है ।

१. गोमाता काे सम्पूर्ण विश्‍वकी माता क्याें कहते हैं ?

गोमाताकी रीढमें सींगसे पूंछतक ‘सूर्यकेतु’ नामक एक विशेष नाडी होती है । गोमाता अपने सींगोंके माध्यमसे सूर्यकी ऊर्जा अवशोषित करती है तथा ‘सूर्यकेतु’ नाडीमें वाहित करती है । सूर्यसे मिलनेवाली ऊर्जा दो प्रकारकी होती है । क्रिया ऊर्जा एवं ज्ञा ऊर्जा । क्रिया ऊर्जा गति तथा ज्ञा ऊर्जा विचारशक्ति दान करती है । जुगालीकी क्रियाके समय सूर्यसे प्राप्त दोनों ऊर्जाआेंको चबाकर वह अन्नमें मिला देती है । औषधीय वनस्पतियोंके रस, क्रिया ऊर्जा एवं ज्ञा ऊर्जा का संयोग होकर एक अमृत गोमाताके उदरमें पहुंचता है । वहां सर्व पाचन पूर्ण होनेके पश्‍चात यह अमृत तीन भागोंमें बंटता है – पृथ्वीके पोषण हेतु गोमय, वायुमण्डलके पोषण हेतु गोमूत्र तथा प्राणिजगत, विशेषतः मानवके पोषणके लिए दूध । इस कार गोमाताके कारण सम्पूर्ण सृष्टिका पोषण होता है । इसलिए विष्णुधर्मोत्तर पुराणमें कहा गया है कि ‘गावो विश्‍वस्य मातरः ।’ अर्थात गाय सम्पूर्ण विश्‍वकी माता है ।

२. गौमें सभी देवताओंके तत्त्व आकर्षित होते हैं

गौ भगवान श्रीकृष्णको प्रिय हैं । दत्तात्रेय देवताके साथ भी गौ है । उनके साथ विद्यमान गौ पृथ्वीका प्रतीक है । प्रत्येक सात्त्विक वस्तुमें कोई-ना-कोई देवताका तत्त्व आकर्षितहोता है । परंतु गौकी  यह विशेषता है, कि उसमें सभी देवताओंके तत्त्व आकृष्ट होते हैं । इसीलिए कहते हैं, कि गौमें सर्व देवी-देवता वास करते हैं । गौसे प्राप्त सभी घटकोंमें, जैसे दूध, घी, गोबर अथवा गोमूत्रमें सभी देवताओंके तत्त्व संग्रहित रहते हैं ।

३. गोवत्स द्वादशी का अध्यात्मशास्त्रीय महत्त्व

ऐसी कथा है कि समुद्रमंथनसे पांच कामधेनु उत्पन्न हुर्इं । उनमेंसे नंदा नामक धेनुको उद्देशित कर यह व्रत मनाया जाता है । वर्तमान एवं भविष्यके अनेक जन्मोंकी कामनाएं पूर्ण हों एवं पूजित गौके शरीरपर जितने केश हैं, उतने वर्षोंका स्वर्गमें वास हो ।

शक संवत अनुसार आश्विन कृष्ण द्वादशी तथा विक्रम संवत अनुसार कार्तिक कृष्ण द्वादशी गोवत्स द्वादशीके नामसे जानी जाती है । यह दिन एक व्रतके रूपमें मनाया जाता है । गोवत्स द्वादशी के दिन श्री विष्णुकी आपतत्त्वात्मक तरंगें सक्रिय होकर ब्रह्मांडमें आती हैं । इन तरंगोंका विष्णुलोकसे ब्रह्मांडतकका  वहन विष्णुलोककी एक कामधेनु अविरत करती हैं । उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करनेके लिए कामधेनुके प्रतीकात्मक रूपमें इस दिन गौका पूजन किया जाता है ।

४. गोवत्स द्वादशी व्रतके अंतर्गत उपवास

इस दिन सौभाग्यवती स्त्रियां उपवास एक समय भोजन कर रखाती है । परंतु भोजनमें गायका दूध अथवा उससे बने पदार्थ, जैसे दही, घी, छाछ एवं खीर तथा तेलमें पके पदार्थ, जैसे भुजिया, पकौडी इत्यादि ग्रहण नहीं करते, साथ ही इस दिन तवेपर पकाया हुआ भोजन भी नहीं करते । प्रातः अथवा सायंकालमें सवत्स गौकी पूजा की जाती हैं ।

५. गोवत्स द्वादशी को गौपूजन प्रात अथवा सायंकालमें करनेका शास्त्रीय आधार

प्रातः अथवा सायंकालमें श्री विष्णुके प्रकट रूपकी तरंगें  गौमें अधिक मात्रामें आकर्षित होती हैं । ये तरंगें श्री विष्णुके अप्रकट रूपकी तरंगोंको १० प्रतिशत अधिक मात्रामें गतिमान करती है । इसलिए गोवत्स द्वादशीको गौपूजन सामान्यतः प्रातः अथवा सायंकालमें करनेके लिए कहा गया है ।

उपरांत ‘इस गौके शरीरपर जितने केश हैं, उतने वर्षोंतक मुझे स्वर्गसमान सुख की प्राप्ति हो, इसलिए मैं गौपूजन करता हूं ।  इस प्रकार संकल्प किया जाता है । प्रथम गौ पूजनका संकल्प किया जाता है । तत्पश्चात पाद्य, अर्घ्य, स्नान इत्यादि उपचार अर्पित किए जाते हैं। वस्त्र अर्पित किए जाते हैं । उपरांत गोमाताको चंदन, हलदी एवं कुमकुम अर्पित किया जाता है । उपरांत अलंकार अर्पित किए जाते हैं । पुष्पमाला अर्पित की जाती है ।

तदुपरांत गौके प्रत्येक अंगको स्पर्श कर न्यास किया जाता है । गौ पूजनके उपरांत बछडेको चंदन, हलदी, कुमकुम एवं पुष्पमाला अर्पित की जाती है । उपरांत गौ तथा उसके बछडेको धूपके रूपमें दो अगरबत्तियां दिखाई जाती हैं । उपरांत दीप दिखाया जाता है । दोनोंको नैवेद्य अर्पित किया जाता है । उपरांत गौकी परिक्रमा की जाती है ।

पूजनके उपरांत पुनः गोमाताको  भक्तिपूर्वक प्रणाम करना चाहिए । गौ प्राणी है । भयके कारण वह यदि पूजन करने न दें अथवा अन्य किसी कारणवश गौका षोडशोपचार पूजन करना संभव न हों, तो पंचोपचार पूजन भी कर सकते हैं । इस पूजनके लिए पुरोहितकी आवश्यकता नहीं होती ।

६. गोवत्सद्वादशीसे मिलनेवाले लाभ

गोवत्सद्वादशीको गौपूजनका कृत्य कर उसके प्रति कृतज्ञता व्यक्त की जाती है । इससे व्यक्तिमें लीनता बढती है । फलस्वरूप कुछ क्षण उसका आध्यात्मिक स्तर बढता है । गौपूजन व्यक्तिको चराचरमें ईश्वरीय तत्त्वका दर्शन करनेकी सीख देता है । व्रती सभी सुखोंको प्राप्त करता है ।

मंगलवार, 20 अक्टूबर 2015

10 पञ्चगव्य चिकित्सा

पञ्चगव्य चिकित्सा 
१ - आक की छाल तथा आक की कोंपले या छोटी-छोटी कोमल पत्तियाँ ५०-५०ग्राम इन दोनों को २००ग्राम आक के दूध में पीसकर गोला बनाकर मिट्टी के पात्र में मुँह बंद करके गाय के गोबर से बने कण्डो की आँच मे फूँक कर भस्म बना ले । ठंडा होने पर भस्म को निकालकर मटर जैसी छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर एक दो गोली पानी के साथ लेने से भगन्दर व नासूर दूर होते है । 

२ - छुवारों के अन्दर की गुठली निकालकर उसमें आक का दूध भर दें ,फिर इनके उपर आटा लपेटकर पकावें ,उपर का आटा जब जल जाये तब उसमें से छुवारे निकाल कर उन्हें पीसकर मटर जैसी गोलियाँ बनाकर रात्रि मे१-२ गोली खाकर तथा गाय का दूध पीने से स्तम्भन होता है ( वीर्य देर से झड़ता है ) । 

३ - आक का दूध व असली मधु और गाय का घी ,सम्भाग चार पाँच घण्टे खरल कर शीशी में भरकर रख ले ,इन्द्री सीवन और सुपारी को बचाकर इसकी धीरे- धीरे मालिश करें और ऊपर से खाने का पान और एरण्ड का पत्ता बाँध दें ,इस प्रकार सात दिन मालिश करें ।फिर १५ दिन छोड़कर पुनः मालिश करने से शिश्न के समस्त रोगों में लाभ होता है । 

४ - आक की जड़ छाया में सुखाकर चूर्ण बना ले ,२० ग्राम चूर्ण आधा किलो दूध में उबालकर इसकी दही जमा दें, और घी तैयार कर लें , इसके सेवन से नामर्दी दूर होती है । 

५ - बाँझपन:- सफ़ेद आक की छाया में सूखी जड़ को महीन पीसकर १-२ ग्राम की मात्रा में २५० ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करावें ।शीतल पदार्थों का पथ्य देवें ।इससे बन्द ट्युब व नाड़ियाँ खुलती है व मासिक धर्म व गर्भाशय की गाँठों में भी लाभ होता है । 

६ - आक के २-४ पत्तों को कूटकर पोटली बना, घी लगाकर तवें पर गर्म कर सेंक करें ।सेंकने के पश्चात् आक के पत्तों पर घी चुपड़कर गरम कर बांध दें । 

७ - आक के दूध में सम्भाग शहद मिलाकर लगाने से दाद शीघ्र ही नष्ट हो जाता है । 

८ - आक की जड़ २ ग्राम चूर्ण को २ चम्मच दही में पीसकर लगाते रहने से भी दाद में लाभ होता है । 

९ - आक के ताज़े पत्तों का रस १ कि० ग्राम गाय का दूध २ कि० ग्राम सफ़ेद चन्दन, लाल चन्दन ,हल्दी ,सोंठ और सफ़ेद ज़ीरा ६-६ ग्राम इनका कल्क कर १ कि० ग्राम घी में पकावें ,घी मात्र शेष रहने पर छानकर रख लें ।मालिश करने से खुजली - खाज आदि में लाभ होता है । 

१० - आक का दूध ताज़ा ,व सुखाया हुआ १ भाग १०० बार जल से धोया हुआ गाय का मक्खन ख़ूब खरल करके मालिश करें व २ घंटे तक शीत जल व शीत वायु से रोगी को बचाये रखें । 

9 पञ्चगव्य चिकित्सा

.............पञ्चगव्य चिकित्सा................ 

१. आक के भली प्रकार पीले पड़े पत्तों को थोड़ा सा गाय का घी चुपड़ कर आग पर रख दें ।जब वे झुलसने लगे ,झटपट निकाल कर निचोंड लें ।इस रस को गर्म अवस्था में ही कान में डालने से तीव्र तथा बहुविधि वेदनायुक्त कर्णशूल शीघ्र नष्ट हो जाता है । 

२. आँख का फुला जाला-- आंक के दूध में पुरानी रूई को तीन बार तर कर सुखा लें फिर गाय के घी में तर कर बड़ी सी बत्ती बनाकर जला लें । बत्ती जलकर सफ़ेद नहीं होनी चाहिए ,इसे थोड़ी मात्रा मे सलाई से रात्रि के समय आँखों में लगाने से २-३ दिन में लाभ होना प्रारम्भ हो जाता है । 

३. आक के दूध में रूई भिगोकर ,गाय के घी में मलकर दाढ़ में रखने से दाढ़ की पीड़ा मिटती है । 

४. जगंल में घूमती फिरती गाय जब गोबर करती है और वह गोबर सूख जाता है तो इन्हें जगंली कण्डे या आरने कहते है ।जगंली कण्डो की राख को आंक के दूध में तर कर के छाया में सुखा लेना चाहिए । इसमें से १२५ ग्राम सुँघाने से छींक आकर सिर का दर्द , आधा शीशी , ज़ुकाम ,बेहोशी इत्यादि रोगों में लाभ होता है ।गर्भवती स्त्री व बालक इसका प्रयोग ना करें । 

५. आक की कोमल शाखा और फूलों को पीसकर २-३ ग्राम की मात्रा में गाय के घी में सेंक ले ।फिर फिर इसमें गुड मिला ,पाक बना नित्य प्रात: सेवन करने से पुरानी खाँसी जिसमें हरा पीला दुर्गन्ध युक्त चिपचिपा कफ निकलता हो ,शीघ्र दूर होता है । 

६. अाक के पुष्पों की लौंग निकाल कर उसमें सम्भाग सैंधा नमक और पीपल मिलाकर ख़ुद महीन पीस लें ।और मटर जैसी गोली बना कर दो से चार गोली बड़ों और १-२ गोली बच्चों को गाय के दूध साथ देने से बच्चों की खाँसी दूर होती है । 

७. आक के एक पत्ते पर जल के साथ महीन पीसा हुआ कत्था और चूना लगाकर दूसरे पत्ते पर गाय का घी चुपड़कर दोनों पत्तों को परस्पर जोड़ ले ,इस प्रकार पत्तों को तैयार कर मटकी में रखकर जला लें । यह कष्ट दायक श्वास में अति उपयोगी है । छानकर काँच की शीशी में रख लें । १०-३० ग्राम तक गाय का घी ,गेंहू की रोटी या चावल में डालकर खाने से कफ प्रकृति के पुरूषों मे मैथुनशक्ति को पैदा करता है ।तथा कफजन्य व्याधियों को और आंत्रकृमि को नष्ट करता है । 

८. आंक के ताज़े फूलों का दो किलो रस निकाल लें । इसमें आंक का दूध २५० ग्राम और गाय का घी डेढ़ किलो मिलाकर मंद अग्नि पर पकायें । घी मात्र शेष रहने पर छानकर बोतल में भरकर रख लें । इस घी को १ से २ ग्राम की मात्रा में गाय के २५० ग्राम पकायें हुए दूध में मिला कर सेवन करने से आंत्रकृमि नष्ट होकर पाचन शक्ति तथा बवासीर में भी लाभ होता है । शरीर में व्याप्त किसी तरह का विष का प्रभाव हो तो इससे लाभ होता है ,परन्तु यह प्रयोग कोमल प्रकृति वालों को नहीं करना चाहिए । 

९. आंक के ताज़े हरे पत्ते २५० ग्राम और हल्दी २० ग्राम दोनों को महीन पीसकर उड़द के आकार की गोलियाँ बना लें । पहले ताज़े जल के साथ ४ गोली , फिर दूसरे दिन ५ और ६ गोली तक बढ़ाकर घटायें यदि लाभ हो तो पुन उसी प्रकार घटाते बढ़ाते है ,अवश्य लाभ होता है । पथ्य में दूध ,साबूदाना ,जौ का यक्ष देवें । 

१०. आंक के कोमल पत्रों के सम्भाग पाँचों नमक लेकर ,उसमें सबके वज़न से चौथाई तिल का तेल और इतना ही नींबू रस मिला पात्र के मुख को कपड़ मिट्टी से बंद कर आग पर चढ़ा दें । जब पत्र जल जाये तो सब चीज़ों को निकाल पीसकर रख लें । ५०० मिली ग्राम से ३ ग्राम तक आवश्यकतानुसार गर्म जल ,काँजी ,छाछ ,या शराब के साथ लेने से बादी बवासीर नष्ट होती है । 

8 पञ्चगव्य चिकित्सा

.................पञ्चगव्य चिकित्सा .................... १. आक की छाल तथा आक की कोंपले या छोटी-छोटी कोमल पत्तियाँ ५०-५० ग्राम इन दोनों को २०० ग्राम आक के दूध में पीसकर गोला बनाकर मिट्टी के पात्र मे मूंह बन्दकर रखकर ५ कि. ग्राम गाय के गोबर से बने कण्डों की आग में फूँक कर भस्म बनालें । फिर निकालकर मटर जैसी छोटी-छोटी गोलियाँ बनाकर एक दो गोली पानी के साथ लेने से भगन्दर व नासूर में लाभ होता है । 

२. नपुंसकता और ध्वजभंग मे छुवारों के अन्दर की गुठली निकालकर उनमें आक का दूध भर दें ,फिर इनकें उपर आटा लपेटकर पकावें, उप्र का आटा जल जाने पर छुवारों को पीसकर मटर जैसी गोलियाँ बना लें ,रात्रि के समय एक दो गोली खा कर गाय का दूध पीने से स्तम्भन होता है । 

३. आक की छाया शुष्क जड़ के २० ग्राम चूर्ण को आधा किलो गाय के दूध में उबालकर दही जमाकर घी तैयार करें , इसके सेवन से नामर्दी दूर होती है । 

४. आक का दूध और असली मधु और गाय का घी , सम्भाग ४-५ घण्टे खरल कर शीशी में भरकर रख लें इन्द्री की सीवन और सुपारी को बचाकर इसकी धीरे - धीरे मालिश करें और उपर से खाने का पान और अरण्ड कापत्ता बाँध दें ,इस प्रकार सात दिन मालिश करें । फिर १५ दिन छोड़कर पुनः मालिश करने से शिशन के समस्त रोगों में लाभ होता है । 

५. बांझपन -सफ़ेद आक की छाया में सूखी जड़ को महीन पीस , १-२ ग्राम की मात्रा से २५० ग्राम गाय के दूध के साथ सेवन करायें शीतल पदार्थ का पथ्य देवें । इससें बन्द ट्युब व नाड़ियाँ खुलती है व मासिकधर्म व गर्भाशय की गाँठों में लाभ होता है। 

६. आक के २-४ पत्तों को कूटकर पोटली बना , तवें पर गाय का घी लगाकर गर्म करके सेंक लें ।सेंकने के पश्चात् आक के पत्तों पर गाय का घी चुपड़कर गरम करकें बाँध दें । 

७. आक की जड़ २ ग्राम चूर्ण को २ चम्मच गाय के दूध की दही में पीसकर लगाते रहने से भी दाद में लाभ होता है । 

८. आक के ताज़े पत्तों का रस १ किलोग्राम , गाय का दूध २ किलोग्राम सफ़ेद चन्दन लाल चन्दन ,हल्दी , सोंठ , और सफ़ेद ज़ीरा ६-६ ग्राम इनका कल्क कर १ किलोग्राम गाय के घी में पकायें ।घी मात्र शेष रहने पर छान कर रख लें । मालिश करने से खुजली - खाज आदि में लाभ होता है । 

९. आक का दूध ताज़ा , व सुखाया हुआ १ भाग १०० बार जल से धोया हुआ गाय का मक्खन ख़ूब खरल करके मालिश करें व २ घंटे तक शीत जल व वायु से रोगी को बचाये रखें । 

१०. अर्कमूल की छाल १० ग्राम , त्रिफला चूर्ण १० ग्राम , एकसाथ आधा क़िलों जल मे अष्टमांस क्वाथ सिद्ध कर प्रतिदिन प्रात: उसमें एक ग्राम मधु और ३ ग्राम मिश्री मिलाकर सेवन करावें और साथ ही अर्कमूल को गाय की छाछ में पीसकर श्लीपद पर लेंप करे । ४० दिन में पूर्ण लाभ होगा । 

7 पञ्चगव्य चिकित्सा

............पञ्चगव्य चिकित्सा ................. 

१. गौदूग्ध मे शहद मिलाकर पीने से पेट के कीड़े बाहर आते है । 

२. सुन्दरता हेतु एक कप पानी में दो चम्मच दूध डालकर चेहरे पर मलें और अंगराग पावडर में भिगोकर लेप लगाये ।१० मिनट बाद स्नान कर लें । 

३. बल और वीर्य वृद्धि के लिए गर्म दूध में गौघृत और शक्कर मिलाकर पीएँ और गौमूत्र अर्क सुबह -शाम दो चम्मच पानी के साथ लें । 

४. सिरदर्द में गाय के दूध में सोंठ घीसकर सिर लेप लगाये । और ब्राह्मीघृत पाँच से १० मिली लीटर दिन में दो बार सेवन करें ।गौदूग्ध में एक इलायची उबालकर वह दूध पीयें लाभ होगा ही । 

५. अपस्मार ( epilepsy ) बचचूर्ण १ ग्राम मधु के साथ सेवन करें । तत्पश्चात् गौदूग्ध का सेवन करे ।

६. मूत्रकृच्छ ( Dysurea ) -गौदूग्ध और चूने का पानी का सेवन करने से ठीक होता है । 

७. शराब विष शान्ति हेतु -गौदूग्ध और फिटकरी घोलकर पीला देना चाहिए ,उल्टियाँ होकर ठीक हो जायेगा । 
८. मल विबन्ध (constipation ) एक कप गौदूग्ध मे २० मिली लीटर एरण्डतेल मिलाकर सेवन करें ।साधारण क़ब्ज़ मे १० मुन्नकाे को गौदूग्ध में पकाकर दूध सहित सेवन करें । 

९. धतुराविष शान्ति हेतु गौदूग्ध में मिश्री मिलाकर सेवन करने विष शान्त होता है । 

१०. गठिया रोग मे ५ ग्राम अश्वगन्धा चूर्ण समान मात्रा मे गुड मिलाकर ,गर्म गौदूग्ध के साथ सेवन करने से ठीक होगा । 

११. बवासीर मे नागकेशर गौदूग्ध में मिश्री मिलाकर सेवन करने से लाभ होता है । 

१२. कर्णरोग -में कच्चा या पके हुए फल को गौमूत्र के साथ उबालने से कर्ण रोग के लिये चमत्कारी दवा तैयार होती है ।गौमूत्र आधा रह जाय इतना उबालना चाहिए । कि उबले अंश को छानकर कान में डालें। 

१३. गाय के कान के मैल को निकालकर उसकी चने के दाने के बराबर गोली बनाकर इस गोली को बच्चे की नाभि में रखकर उपर रूई रखकर टेप लगा दें ,और सुबह टेप हटाकर देखेंगे तो गोली ग़ायब हो जाती है और बालक का निमोनिया ठीक हो जायेगा । 

१४. गाय के खूर के नीचे की मिट्टी का तिलक करने से भूतबाधा भाग जाती है रोगी ठीक होता है ? 

१५. गाय के गलकम्बल में हाथ फिराने से नामर्द व्यक्ति के स्पर्म जीवित हो जाते है ।और धारोष्णदूध को पीने से अम्लपित ( एसीडिटी ) तुरन्त शान्त होती है ,और पेशाब की जलन में तो चमत्कारी लाभ होता है । 

१२. मलेरिया - में किशमिश और मुन्नका के ५-५ दाने गौदूग्ध मे औटाकर प्रात: खिलाऐ ।फिर दूध पिलाऐ । मलेरिया पुराना हो तो उसमें १० ग्राम सोंठ का चूर्ण मिला दे । लाभ होगा ।