मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

गाय के सींग

गाय के सींग

पौराणिक तथ्यों के अनुसार गाय के सींग में
ब्रह्मा विष्णु महेश का वास होता है।
हिन्दू धर्म के प्रसिद्ध धार्मिक ग्रंथों में से एक
भविष्य पुराण में कहा गया है
- शृंगमूले गवां नित्यं ब्रह्मा विष्णुष्च संस्थितौ ।
श्रंरग्राग्रे सर्व तीर्थानि स्थावराणि चराणि च।।
षिवो मघ्ये महादेवः सर्वकारण कारणम।
ललाटे संस्थिता गौरी नाषावंषे च शणमुखः।।
तात्पर्य है कि गौओं के सींग की जड़ में सदा
ब्रह्मा और विष्णु प्रतिष्ठित हैं।
सींग के अग्र भाग में चराचर समस्त तीर्थ प्रतिष्ठित हैं,
मध्य भाग में ब्रह्मा जी हैं।
गौ के ललाट में गौरी तथा नासिका के अस्ति
भाग मे भगवान कार्तिकेय प्रतिष्ठित हैं।
इसके अलावा गौ माता में तीर्थों का निवास भी माना जाता है।
कहते हैं कि 68 करोड़ तीर्थ एवं 33 करोड़
देवी-देवताओं का चलता-फिरता विग्रह गाय ही है।

सोमवार, 10 सितंबर 2018

इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान-7

इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान-7
मुजफ्फर हुसैन
गतांक से आगे...
शेड में स्वचलित परदे लगाए गये हैं। जिधर धूप होती है, परदे उसी दिशा में तन जाते हैं। धूप के न आने से इन गायों को बड़ी राहत मिलती है। इस शेड के बाहर औसतन 46 डिग्री सेल्सियस गरमी होती है। 800 मीटर लंबे शेड में दर्जनों डेजर्ट कूलर लगे हुए हैं। उक्त फार्म सऊदी अरब की राजधानी रियाद से 100 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व में स्थित है। इस फार्म को अल शफीअ नाम दिया गया है, जिसका साधारण भाषा में अर्थ होता है-मेहरबान, यानी कृपालु। गाय के गुण के अनुसार ही उसका नाम है। वास्तव में यह पशु मानव जाति के लिए कृपावंत है। गाय की सेवा के लिए यहां रात दिन लगभग 1400 आदमी काम करते हैं।
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अल शफीअ फार्म अरबस्तान की शुष्क और बंजर जमीन पर बीस साल पूर्व स्थापित किया गया था। रेगिस्तान में जो भी कठिनाईयां होती हैं, उनका सामना करते हुए यह फार्म तैयार किया गया, जो आज विश्व के अच्छे फार्मों में गिरा जाता है। इस फार्म के मैनेजर जेनुल मजरम का कहना है कि यह क्षेत्र अत्यंत गरम और शुष्क है, इसलिए पानी की उपलब्धता हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हमने इस रेगिस्तान में छह कुएं बनवाए हैं। प्रत्येक कुआं औसतन 1850 मीटर की गहराई तक बोर किया गया है। जमीन से निकलने वाला पानी बहुत गरम होता है। इसे ठंडा और स्वच्छ करने के लिए अलग से संयंत्र लगाये गये हैं। एक गाय प्रतिदिन 120 लीटर पानी पीती है। पूरे फार्म में लगभग एक करोड़ लीटर पानी का उपयोग किया जाता है। मैनेजर जेनुल का कहना है कि पानी के मामले में हम आत्मनिर्भर हैं। हमें बाहर कहीं से पानी लाने की आवश्यकता नही पड़ती है। गायों के चारे के लिए इस फार्म के पास ही दो किलोमीटर का घास उगाने का एक फार्म तैयार किया गया है। मैनेजर जेनुल मजरम का कहना है कि सभी सुविधाओं के गायें गरमी से थक जाती हैं। लेकिन इस पशु में कुदरत ने गजब का धैर्य और संतोष दिया है। वह अपने आपको इस प्रकार के कठोर जलवायु का अभ्यस्त बना लेती है और और अपने मालिक की भरपूर सेवा करती है।
अल शफीअ फार्म में इस समय कुल 36 हजार गायें हैं। इनमें पांच हजार भारतीय नस्ल की हैं। भारतीय गायों का दूध सेवन करने वाला एक विशेष वर्ग है। रियाद स्थित शाही परिवार में 400 लीटर भारतीय गायों का दूध जाता है। शेष मात्रा ऊंट के दूध की होती है। अल शफीअ फार्म की गायों का रंग या तो सफेद होता है या फिर काला। फार्म में जो भी अधिकारी काम करते हैं, उन्हें या कोपेनहेगन अथवा न्यूजीलैंड की किसी डेयरी का पांच साल का अनुभव होना अनिवार्य है। रेगिस्तान में जहां ढेरें कठिनाइयां हैं, वहीं एक सकारात्मक पहलू यह है कि यहां गायों की बीमारियां यूरोप और अमेरिका की तुलना में कम फेेलती हैं। अल शफीअ फार्म ने लोगों के मन में यह विश्वास पैदा कर दिया है कि डेयरी का उद्योग भी एक लाभदायी उद्योग है। इस समय अल शफीअ फार्म की गायों से प्रतिवर्ष 16 करोड़ 50 लाख लीटर दूध निकाला जाता है। यहां दूध निकालने के लिए कमरे बने हुए हैं। हर कमरे में 120 गायों का दूध मशीनों से निकाला जाता है। एक गाय के दूध निकालने में दस मिनट का समय लगता है। हर गाय औसतन 45 लीटर दूध देती है। जो गाय दूध देना बंद कर देती है उसका अलग से विभाग है। उसे सलाटर हाउस में नही बेचा जाता है, बल्कि उसके मूत्र और गोबर का खाद के रूप में उपयोग होता है। मर जाने के बाद उसका चमड़ा निकाल लिया जाता है, लेकिन उसके मांस और अन्य अवयवों को फार्म में दफन कर दिया जाता है। मृत शरीर जल्दी से खाद बन जाए, इसके लिए कुछ रसायनों का उपयोग किया जाता है। उक्त खाद बाजार में मिलने वाले मांस की तुलना में बहुत महंगा होता है। गायों को नहलाने से लेकर चराने तक में फार्म के कर्मचारी इस तरह से तल्लीन हो जाते हैं जैसा कि भारत के गोपाल कभी इन गायों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते थे।
अरबस्तान के लोग गाय का पालन करते हैं, लेकिन भारत में अधिकांश गायों के क्रय विक्रय से लगाकर उसे सलाटर हाउस तक में पहुंचाने का धंधा होता है। अरबों का गायों से कोई सांस्कृतिक अथवा भावुक संबंध नही है, लेकिन भारतीय मुसलमान इस दिशा में कभी विचार करता है? यहां तो वह उसका रखवाला बनकर जंगल में उसे चराता है, उसके दूध का व्यापार करता है, लेकिन जब वह दूध देना बंद कर देती है, उस समय उसे किसी कसाई के हाथों बेच दिया जाता है। मात्र इसके लिए मुसलिम ही दोषी नही हैं, वे भी जिम्मेदार हैं जो गाय को माता कहकर पुकारते हैं।
क्रमश:



इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान-6

इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान-6
मुजफ्फर हुसैन
गतांक से आगे...
जिस कृत्य से अपने पड़ोसी का दिल दुखता हो और जिस वस्तु के खाने से अपने साथ रहने वाले के मन में खटास पैदा होती है, उसे इसलाम ने वर्जित किया है। इसलिए आम धारणा यही रही कि सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए भारत गौ-वध पर प्रतिबंध अनिवार्य है। भिन्न भिन्न इसलामी विद्वानों ने अब तक 117 बार फतवे जारी करके गाय के न काटने के लिए मुसलिम बंधुओं से अपील की है। जमीअतुल ओलेमा के अध्यक्ष असद मदनी ने एनडीए सरकार के समय में उर्दू समाचार पत्रों में अपना बयान जारी करके मुसलमानों से आग्रह किया था कि वे बकरी ईद के दिन गाय की कुरबानी न करें।
एक सामान्य बात यह है कि जब अन्य हालात पशु भारत में उपलब्ध हैं तो फिर गाय अथवाा बैल का कुरबानी के लिए चयन करना उचित नही है। यदि हजरत इब्राहीम अपने पुत्र इस्माइल की कुरबानी का संकल्प करके ईश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं तो यहां के अल्पसंख्यक मुसलिम बंधु भी गाय और बैल की रक्षा करके अपने देशवासियों का दिल जीत सकते हैं। कुरबानी नाम तो त्याग का है। क्या मुसलिम बंधु देश में शांति स्थापित करने के लिए इतना त्याग नही कर सकते? कोई यह कह सकता है कि सरकार यदि गौ-वध पर पाबंदी के लिए कड़े कानून नही बनाती है तो इसमें कुरबानी करने वाले का क्या दोष है? लेकिन क्या सारे काम कानून के भय से ही होने चाहिए? अपनी आत्मा की आवाज पर हम स्वयं किसी वस्तु के वध पर नैतिक दायित्व के रूप में प्रतिबंध क्यों नही लगा सकते? भारत में गाय और बैल का जो उपयोग होता है, उसे देखते हुए स्वयं मुसलिम ऐसा निर्णय लेंगे तो वह अधिक सुखद और स्थायी होगा।
मुसलमान अपने गौ-पालन के लिए मशहूर है। वह कई स्थानों पर गौशाला स्थापित करने में सहयोग देता है। सूफी संतों ने गायों को पाला है और गौभक्त होने का संदेश दिया है। नागपवुर में एक ऐसे ही मुसलिम संत और उनकी पत्नी गऊशाला चलाया करते थे। ताजुद्दीन बाबा प्रसिद्घ गौभक्त थे। अनेक उर्दू कवियों ने गाय के गुणगान करते हुए कविताएं लिखी है। हिंदी में रसखान इसके लिए मशहूर है तो उर्दू में मेरठ के स्व. कवि मोहम्मद इस्माइल साहब प्रख्यात हैं। उनकी सरल और मधुर कविता को याद करके उर्दू कक्षाओं के विद्यार्थी गौ माता का यशोगान करते हैं।
भारतीय उपखंड का मुसलमान हर मामले में सऊदी अरब को अपना आदर्श मानता है। क्या गाय के पालन के संबंध में भी वह ऐसा करना चाहेगा? यदि नही चाहता है तो फिर उसे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उसका मापदंड दोहरा है। वास्तव में देखा जाए तो सऊदी अरब को गाय के प्रति कोई प्रेम नही होना चाहिए, क्योंकि वह उसके देश का प्राणी नही है। भारत में गाय के प्रति एक विशेष प्रेम का कारण यह है कि गाय इस देश की माटी से जुड़ा हुआ प्राणी है। कृषि प्रधान देश में गाय का वही महत्व है जो अरबस्तान के लिए ऊंट का है। इसके बावजूद अरबी लोग गाय को कितना चाहते हैं और उसके लालन पालन से कितना लाभ उठा रहे हैं, यह भारतीय मुसलमानों को जानने की आवश्यकता है। अरबस्थान जैसे रेगिस्तानी देश में गाय के प्रति इतना ममत्व रखना एक आश्चर्य की बात है। इसलिए हम यहां सऊदी अरब के अल शफीअ फार्म नही बल्कि गऊ-सेवा का आंदोलन है। सऊदी अरब का अल शफीअ फार्म-
अरबस्तान के तेलिया राज हमेशा एक कथन दोहराते रहते हैं। मेरा बाप का बाप यानी परदादा ऊंट पर बैठा करता था। समय बदला तो दादा कार में घूमने लगा। पिता ने विमान को अपना लिया। मैं सुपर सॉनिक विमान में घूमतमा हूं। मेरा बेटा अपोलो जैसे किसी यान में बैठकर यात्रा करना पसंद करेगा। लेकिन उसका बेटा फिर से ऊंट पर बैठ जाएगा। दुनिया के चक्र में सब चीजें समाप्त हो जाती हैँ लेकिन कुदरत की पैदा की हुई चीज नष्ट नही होती। उसका महत्व भी समाप्त नही होता। जिस वस्तु को एक विशेष स्थान के लिए पैदा किया, वहां उसकी जरूरत हमेशा बनी रहती है। इसलिए ऊंट कल जितना अरबस्तान के लिए उपयोगी था उतना ही आने वाले समय में भी रहेगा।
सऊदी अरब के अल खिराज नामक नगर से प्राप्त एक रपट को देखिए जो मश्रेकुल वस्ता नाम के दैनिक ने प्रकाशित की है। सऊदी अरब के अल खिराज नामक स्थान पर जब सूर्य उदय होता है तो हजारों गायें एक विशाल शेड की छाया तले आकर शरण लेती है। यहां कंप्यूटर के द्वारा बढ़ते तापक्रम पर नजर रखी जाती है। उसके अनुसार गायों पर पानीकी बौछारें बरसाई जाती हैं।
क्रमश:


इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान-5

इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान-5
मुजफ्फर हुसैन
गतांक से आगे...
गाय के वध के मामले में इस प्रकार के अनेक फतवे समय समय पर आए हैं, जिनमें गाय के मांस को वर्जित घोषित किया है। परिस्थितिवश न तो उसे काटा जाए और न ही उसके मांस का भक्षण किया जाए। भारत में देवबंद, बरेलवी, फुलेरी शरीफ, लखनऊ और हैदराबाद जैसे अनेक दारूल फतवा में गाय को लेकर बहस उठती रही है, जिसमें जो परिणाम सामने आए हैं वे गाय को नही काटने के ही पक्ष में आए हैं। बकरा ईद के अवसर पर भी समझदार मुसलमानों ने यही रूख अपनाया है। उनका कहना है कि जब अन्य हलालन पशु उपलब्ध हैं तो फिर गाय या बैल को नही काटना कोई अधार्मिक कार्य नही होगा। लेकिन हम देखते हैं कि मुट्ठी भर सांप्रदायिक तत्व अपने धर्म जुनून में इस प्रकार की आज्ञा को नकार देते हैं। गाय की सुरक्षा का पक्षधर जब इसलाम है तो फिर भारतीय मुसलमानों को यह सवाल उठाना ही क्यों चाहिए? मुसलमान स्वयं किसान हैं और गौपालन का व्यवसाय करते हैं, इसलिए समझदारी का तकाजा यह है कि इस विवादास्पद मुद्दे को हमेशा हमेशा के लिए समाप्त कर दें। भारत सरकार यदि संपूर्ण देश में गौ-वध पर पाबंदी लगा देगी तो मुसलमान निश्चित ही उसका स्वागत करेगा। देश के कानून की अवहेलना करने की सीख इसलाम नही देता है।
चूंकि भारत में गऊ वंश का धार्मिक, सामाजिक और वैज्ञानिक महत्व है, इसलिए यहां की जनता का टकराव हमेशा उन लोगों से रहा है जिन्होंने गौ वंश को समाप्त करने के लिए धर्म जुनून और कठमुल्लापन का सहारा लिया है। इसलाम के नाम पर जब गऊ की हत्या का षडयंत्र रचा जाता है, उस समय धार्मिक भावना को ठेस पहुंचती है। जब मुट्ठी भर लोग अधर्म के नाम पर गाय के कत्ल को जायज ठहराते हैं तो फिर देश का बहुसंख्यक यदि उसे बचाने के लिए आंदोलन करता है तो यह उसका मानवीय अधिकार है। मारने के स्थान पर बचाना ईश्वरीय कार्य है। इसलिए गऊ की रक्षा के लिए कोई आगे आता है तो वह स्वागत करने योग्य है। लेकिन इस अहिंसक काम में हिंसा न हो जाए, यह भी आंदोलन के सूत्रधारों को समझने की आवश्यकता है। गऊ की रक्षा के मामले में जितना दोषी मुसलमान है, उससे भी अधिक दोषी भारत सरकार है, क्योंकि उसके लूले लंगड़े कानून और वोट बैंक की खुशामद इस मार्ग में सबसे बड़ा रोड़ा है।
भारत में यदि सांप्रदायिक दंगों के कारणों का इतिहास खोजा जाए तो पता चलेगा कि हर गांव दंगों में से दो दंगों में गऊ हत्या कारण रहा है। अंग्रेजों ने इसे भुनाने में कोई कसर नही रखी। लेकिन 1857 के स्वतंत्रता संग्राम आंदोलन में मुसलिम बादशाहों और उलेमाओं द्वारा फरमान जारी कर इस विवादास्पद मुद्दे को समाप्त करने का भरसक प्रयत्न किया गया।
सम्राट बहादुरशाह जफर का आदेश-
सन 1857 में दिल्ली केवल चार मोह आजाद रही। भारत के वीर सपूतों ने अंग्रेज सरकार को पदभ्रष्टï कर मुगल साम्राज्य के अंतिम बादशाह बहादुरशाह जफर को दिल्ली का पुन: सम्राट घोषित कर दिया। ऐसा लगने लगा कि ब्रिटिश सत्ता भारत से विदा हो जाएगी। लेकिन आजादी की यह प्रथम लड़ाई निश्चित किये गये यम से पहले ही प्रारंभ हो गयी। इसलिए उसे सफलता नही मिल सकी। मंगल पांडे जैसे अनेक राष्टï्रभक्तों को फांसी पर चढ़ जाना पड़ा। लेकिन इस बीच हिंदू मुसलिम एकता के लिए बहादुरवशाह जफर ने जो काम किया, वह इतिहास में अमर हो गया। गऊ माता का सम्मान करने के लिए अंतिम मुगल सम्राट ने जो आदेश प्रसारित किया, वह इतिहास का एक महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गया। 28 जुलाई 1857 को गौ-वध पर प्रतिबंध लगाकर जो शाही फरमान जारी किया था, वह इस प्रकार था-
खल्क खुदा का मुल्म बादशाह का हुक्म फौज के बड़े सरदार का जो कोई इस मौसम बकरी ईद में या उसके आगे पीछे गाय बैल या बछड़ा जुकाकर या छिपाकर अपने घर में जबह हलाल या कुरबान करेगा, वह आदमी हुजूर जहांपनाह का दुश्मन समझा जाएगा और उसे सजाए मौत दी जाएगी। और इतिहास साक्षी है कि 1 अगस्त 1857 को संपन्न बकरी ईद पर एक भी गाय बैल अथवा बछड़े की हत्या नही हुई। न केवल मुगल साम्राज्य बल्कि भारत की हर छोटी बड़ी मुसलित रियासत में गाय संबंधी आदेश जारी होते रहे हैं। तत्कालीन राजा और नवाब इस दूषण से बचने के लिए समय समय पर सरकारी फरमान भी जारी करते रहे हैं और जहां कहीं आवश्यकता पड़ी वहां पर फतवे भी जारी करवाते रहे।
क्रमश:

इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान-4

इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान-4
मुजफ्फर हुसैन

गतांक से आगे...
पवित्र कुरान कहता है-किसी छोटी चिड़िया को भी सताओगे तो उसका जवाब भी तुम्हें देना होगा। जो कोई छोटे जीव पर दया करेगा, अल्लाह उसका बदला भी तुम्हें दुनिया में और दुनिया के बाद आखिरत में देने वाला है।
इसलाम ने जिन पशुओं के मांस को खाने में हलाल घोषित किया है, उनमें गाय और बैल का भी समावेश है। धर्म में कही गयी बात आदर्श हो सकती है, लेकिन उसका व्यावहारिक पहलू क्या है, इसे भी समझना अनिवार्य है। गाय की विशेषताएं क्या हैं, इसके संबंध में कुरान और इसलामी विद्वानों ने अपना जो मत व्यक्त किया है, इससे एक ही बात सामने उभरकर आती है कि इस उपयोगी पशु को काटकर मनुष्य अपने पांव पर ही कुल्हाड़ी मारेगा। गाय हिंदू धर्म में कितनी पवित्र है और उसमें देवताओं का किस प्रकार वास है, यदि इस पहलू पर कोई धर्मांध होकर अपनी आंखें बंद कर लेना चाहता है तो यह उसका अपना निर्णय हो सकता है, लेकिन विवेक के आधार पर समाज उसे कभी स्वीकार नही कर सकता। जैन दर्शन में प्रथम तीर्थकर आदिनाथ को वृषभ कहा गया है, जिसका अर्थ होता है-बैल। बैल कृषि संस्कृति का प्रतीक है। खेती के लिए वह वरदान है। गाय मां के रूप में हमें जो कुछ देती है उसे यहां दोहराने की आवश्यकता नही है, क्योंकि मां की ममता और महत्ता का वर्णन जितना किया जाए कम है।
कृषि प्रधान देशों में गाय और बैल सुख संपदा के प्रतीक हैं। मनुष्य ने अपना प्रारंभिक जीवन पशुओं के सहारे ही शुरू किया। मध्य एशिया में असंख्य पैगंबरों का व्यवसाय पशु पालन ही रहा। इसलाम के प्रणेता पैगंबर मोहम्मद साहब ने भी पशु पालन से अपनी जीविका जुटाई। पशु उनके यातायात के साधन भी थे और उनके जीवन निर्वाह के साथी भी। इसलिए हरा सभ्यता में पशुओं का अपना महत्व रहा है। विज्ञान के युग में भी विद्युत के नापने का पैमाना हॉर्स पावर ही है।
भारत कृषि प्रधान देश होने के कारण यहां की सभ्यता पशु पक्षियों के माध्यम से ही विकसित हुई। इसलिए चाहे चौपाए जानवर हों या फिर आकाश में उड़ने वाली चिड़ियां, सभी हमारी सभ्यता के प्रतीक रहे हैं। इसलाम जब भारत में आया तो आक्रांताओं ने यहां के किसी पशु को नही छोड़ा। इसलिए गाय बच जाती-यह असंभव था। लेकिन वे अक्रांता जो यहां आकर बस गये और राज करने लगे, उन्होंने महसूस किया कि भारत के लोगों का गाय के प्रति विशेष प्रेम और आदर है। इसलिए उनकी भावनाओं का सम्मान करने के लिए उन्होंने गाय के वध पर प्रतिबंध लगा दिया।
बार ने तुजुक-ए-बाबरी में अपने पुत्र हुमायूं को वसीयत करते हुए कहा कि भारत की जनता बड़ी धर्मालु है। तू उनकी भावनाओं का सम्मान करना। वे गाय के प्रति अत्यंत संवेदनशील हैं। इसलिए मुगल साम्राज्य की सीमा में उसका वध न होने देना। जिस दिन इस फरमान को मुगल बादशाह ठुकरा देंगे, उन्हों यहां की जनता भी ठुकरा देगी। औरंगजेब ने इसे ठुकरा दिया तो मुगल साम्राज्य की धज्जियां उड़ते देर नही लगी।
इसलाम में किसी वस्तु को समझने के लिए चार बातें मुख्य हैं। सर्वप्रथम उस समस्या का समाधान कुरान में ढूंढ़ो, यदि वहां उत्तर नही मिलता है तो फिर पैगंबर साहब के जीवन में उसकी तलाश करो। इसे हदीस का नाम दिया जाता है। पैगंबर साहब ने समय समय पर जो कुछ कहा और जो कुछ किया उसको आदर्श मानकर मार्ग अपनाया जाए।
यदि हदीस में भी कोई स्पष्ट जानकारी नही मिलती है तो फिर कयास यानी विवेक की कसौटी पर कसकर उसके बारे में फेेसला किया जाए। यदि इस बार भी स्पष्ट मार्ग नही सुझाई दे तो फिर इजतिहाद यानी जनमत संग्रह का मार्ग अपनाया जाए। सवाल है जनमत संग्रह कौन करवाए? क्योंकि अनेक पंथ हैं जो दूसरों के निर्णय को स्वीकार नही करेंगे। इसलामी राज में तो वहां का शासक उस मुद्दे पर जनमत संग्रह करवा सकता है, लेकिन जहां मुसलिम अल्पसंख्यक होंगे, वहां क्या होगा? ऐसी स्थिति में फतवा एकमात्र विकल्प रह जाता है। विद्वानों की राय धर्मग्रंथों के आधार पर क्या है, यह फतवे का आधार होता है। फतवा दिया नही जाता है बल्कि मांगा जाता है। कोई भी व्यक्ति दारूल फतवा के सम्मुख अपनी समस्या को लिखित रूप में प्रस्तुत कर सकता है।

इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान - 3

इस्लाम और शाकाहार: गाय और कुरान - 3
 मुजफ्फर हुसैन

गतांक से आगे...
28 वर्ष की आयु में बगदाद की विख्यात इसलामी अकादमी अलगजाली के नेतृत्व में स्थापित की गयी। उनकी प्रसिद्घ पुस्तक 'अहयाउल दीन' (रिवाइवल ऑफ रिलीजियस साइंस) अत्यंत सम्मानित और विश्वसनीय पुस्तक मानी जाती है। उक्त पुस्तक के दूसरे भाग के पृष्ठ 23 पर 17 से 19 पंक्ति के बीच अपने ऐतिहासिक कथन में लिखता है-गाय का मांस मर्ज यानी बीमारी है, उसका दूध सफा शिफा यानी स्वास्थ्य के लिए लाभप्रद है और उसका घी दवा है।

गाय का संरक्षण केवल उसके दूध और घी के लिए ही करना पर्याप्त नही है, बल्कि गाय तो मनुष्य जाति की मां है। क्योंकि उसकी दी हुई हर चीज इनसानों के लिए वरदान है। एक मां अपने स्तन से जिस प्रकार अपने बच्चे को दूध पिलाती है उसी प्रकार गाय अपने आंचल से समस्त मानव जाति को दूध पिलाती है। वैज्ञानिक दृष्टिï से यह बात सिद्घ हो चुकी है कि गाय का दूध पीने से मस्तिष्क बलवान बनता है, जिससे उसकी स्मरणशक्ति अधिक मजबूत बनती है। जिससे मन और मस्तिष्क मजबूत बनेगा वह हमेशा अल्लाह को याद करेगा। इसलिए मनुष्य समाज के विकास के लिए गाय का दूध एक बुनियादी जरूरत है। ऐसे लाभदायी पशु को जो साक्षात माता है, उसे मारना दुनिया का सबसे बड़ा पाप है। जिन्हें मांस का ही भक्षण करना है तो वे किसी अन्य पशु को काटने की स्वतंत्रता रखते हैं। लेकिन इनसानियत की खातिर वे गाय जैसे उपयोगी पशु को काटने के बारे में अपना विचार त्याग दें। गाय का संरक्षण मनुष्य जाति का पवित्र कर्म ही नही बल्कि उसका धर्म भी है।
लंदन स्थित शाहजहां मसजिद के इमाम अल हाफिजत बीएस मसरी कहते हैं कि कुरान पशुओं के साथ क्रू रता की घोर विरोधी है। कुरान में कई जगह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि दुनिया में पशु और जीव जंतुओं के प्रति दया दिखाओ। उन्हें कष्ट पहुंचाने से दूर रहो। दुनिया की आबादी में एक तिहाई मुसलमान हैं, इसलिए यह उनका दायित्व है कि वे प्राणियों के प्रति दया दिखाएं और उन्हें बचाने के लिए विश्वव्यापी आंदोलन चलाएं। अब समय आ गया है कि जब दुनिया के मुसलमान कुरान में लिखित उन आदेशों का प्रचार प्रसार करें जो प्राणियों की रक्षा के लिए उन पर दायित्व समान हैं। इसलिए मसरी का कहना है कि उनकी इच्छा है कि वे दुनिया में प्राणियों की रक्षा हेतु इसलामी नियमों पर आधारित संगठन बनाएं और उसे आंदोलन के रूप में सारी दुनिया में प्रचारित करें। पशुओं के कल्याण की पहली शर्त यह है कि दुनिया में शाकाहार का प्रचार हो। इसलामी दुनिया में प्राणियों की रक्षा नामक पुस्तक में हल अफीज मसरी लिखते हैं कि धर्म के नाम पर मुसलमान जिस तरह से पशुओं का कत्लेआम करते हैं, यह धर्म के नाम पर बड़ा कलंक है। कुरान एवं अन्य इसलामी विद्वानों की अनेक पुस्तकों को उद्धृत करते हुए वे लिखते हैं कि न केवल जानवर को जान से मारना बल्कि उसे अन्य प्रकार की यातनाएं देना भी घोर पाप है। किसी पक्षी के पर काटना, उसे पिंजरे में बंद करना और सर्कस आदि खेल के लिए उन पशु पक्षियों का शोषण करना भी अमानवीय है। इसलाम ने इन सभी बातों से घृणा की है। उसके पैगंबर और खलीफाओं ने ऐसा करने से बार बार इनकार किया है। यहां तक कि वृक्षों को काटना भी महापाप है। कुदरत के कारखाने में जो है वह उसका है तुम कौन होते हैं जो उसका दुरूपयोग करके उसकी सृष्टिï को चुनौती देते हो?