शुक्रवार, 30 जुलाई 2021

नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ? जानिए इसके पीछे का रहस्य . . .




नंदी के कान में क्यों बोली जाती है मनोकामना ? 

जानिए इसके पीछे का रहस्य . . .

जब भी हम किसी शिव मंदिर जाते हैं तो अक्सर देखते हैं कि कुछ लोग शिवलिंग के सामने बैठे नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहते हैं। ये एक परंपरा बन गई है। इस परंपरा के पीछे की वजह एक मान्यता है। आज हम आपको उसी के बारे में बता रहे हैं, जो इस प्रकार है..

इसलिए नंदी के कान में कहते हैं मनोकामना
मान्यता है जहां भी शिव मंदिर होता है, वहां नंदी की स्थापना भी जरूर की जाती है क्योंकि नंदी भगवान शिव के परम भक्त हैं। जब भी कोई व्यक्ति शिव मंदिर में आता है तो वह नंदी के कान में अपनी मनोकामना कहता है। इसके पीछे मान्यता है कि भगवान शिव तपस्वी हैं और वे हमेशा समाधि में रहते हैं। ऐसे में उनकी समाधि और तपस्या में कोई विघ्न ना आए। इसलिए नंदी ही हमारी मनोकामना शिवजी तक पहुंचाते हैं। इसी मान्यता के चलते लोग नंदी को लोग अपनी मनोकामना कहते हैं।

शिव के ही अवतार हैं नंदी
शिलाद नाम के एक मुनि थे, जो ब्रह्मचारी थे। वंश समाप्त होता देख उनके पितरों ने उनसे संतान उत्पन्न करने को कहा। शिलाद मुनि ने संतान भगवान शिव की प्रसन्न कर अयोनिज और मृत्युहीन पुत्र मांगा। भगवान शिव ने शिलाद मुनि को ये वरदान दे दिया। एक दिन जब शिलाद मुनि भूमि जोत रहे थे, उन्हें एक बालक मिला। शिलाद ने उसका नाम नंदी रखा। एक दिन मित्रा और वरुण नाम के दो मुनि शिलाद के आश्रम आए। उन्होंने बताया कि नंदी अल्पायु हैं। यह सुनकर नंदी महादेव की आराधना करने लगे। प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और कहा कि तुम मेरे ही अंश हो, इसलिए तुम्हें मृत्यु से भय कैसे हो सकता है? ऐसा कहकर भगवान शिव ने नंदी का अपना गणाध्यक्ष भी बनाया।

रविवार, 30 मई 2021

गौरक्षा के लिए कौन क्या कर रहा है इसके बारे में सोचने से अच्छा है कि हम यह सोचें कि हम गौरक्षा के लिए क्या कर रहे हैं

गौरक्षा के लिए कौन क्या कर रहा है इसके बारे में सोचने से अच्छा है कि हम यह सोचें कि हम गौरक्षा के लिए क्या कर रहे हैं -आज क्या किया और कल इससे भी बेहतर कैसे कर सकते हैं -
गौमाता के नाम पर अच्छा करने वालों के साथ बहुत अच्छा होता है और गलत करने वालों के तंबू भी उखड़ जाते हैं -
जो गौवंश सदियों से भारत का रक्षक रहा है  दुर्भाग्य से आज उसे आपके सहारे की जरूरत है - चंदा देने का मन नहीं है तो बिल्कुल मत दो पर किसी भी गौशाला के उत्पाद तो खरीदो ।
सच मानना मित्रो , गौमाता किसी का अहसान अपने सिर पर नहीं रखती - सौ गुना करके वापस लौटा देती है । बेशक आजमा कर देख लो - 


रविवार, 16 मई 2021

गाय अब सजावट की वस्तु बनती जा रही है !

समय बदल रहा है !
  गाय अब सजावट की वस्तु बनती जा रही है ! 
       मनुष्य को चाहिए कि जिस गाय को हम गौ माता मानते हैं और उसकी पूजा-अर्चना करते हैं, उस गौ माता को बचाने का संकल्प सभी को लेना चाहिए, खास कर बिच्छू के डंक से न डरते हुए भी जीव मात्र पर दया करने वाला, उसे डूबने से बचाने वाले सनातन हिन्दू समाज को जो मानव जीवन और प्रकृति तथा पर्यावरण की दृष्टि से भी अति महत्वपूर्ण है। 
   गाय बचेंगी तभी देश बचेगा, राष्ट्र बचेगा और हम सब भी जी पाएंगे। 
   अत: हम सब यह संकल्प लें कि हम हर हाल में गाय की रक्षा करेंगे और पर्यावरण को प्रदूषित करने वाली पॉलिथिन का उपयोग न करके गायों को जीवनदान देने के साथ-साथ हम अपना योगदान देकर हर प्राणिमात्र की रक्षा का संकल्प करेंगे। 
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गुरुवार, 11 मार्च 2021

शिवजी का वाहन


शिवजी का वाहन
यह उस समय की बात है, जब भगवान शिव के पास कोई वाहन न था। उन्हें पैदल ही जंगल-पर्वत की यात्रा करनी पड़ती थी। एक दिन माँ पार्वती उनसे बोलीं,‘आप तो संसार के स्वामी हैं। क्या आपको पैदल यात्रा करना शोभा देता है?’
शिव जी हँसकर बोले-‘देवी,हम तो रमते जोगी है। हमें वाहन से क्या लेना-देना? भला साधु भी कभी सवारी करते हैं?’
पार्वती ने आँखों में आँसू भरकर कहा,‘जब आप शरीर पर भस्म लगाकर, बालों की जटा बनाकर, नंगे-पाँव, काँटों-भरे पथ पर चलते हैं तो मुझे बहुत दुख होता है।’
शिव जी ने उन्हें बार-बार समझाया परंतु वह जिद पर अड़ी रही। बिना किसी सुविधा के जंगल में रहना पार्वती को स्वीकार था परंतु वह शिवजी के लिए सवारी चाहती थीं।अब भोले भंडारी चिंतित हुए। भला वाहन किसे बनाएँ। उन्होंने देवताओं को बुलवा भेजा। नारदमुनि ने सभी देवों तक उनका संदेश पहुँचाया।
सभी देवता घबरा गए। कहीं हमारे वाहन न ले लें। सभी कोई-न-कोई बहाना बनाकर अपने-अपने महलों में बैठे रहे। पार्वती उदास थीं। शिवजी ने देखा कि कोई देवता नहीं पहुँचा। उन्होंने एक हुंकार लगाई तो जंगल के सभी जंगली जानवर आ पहुँचे।
‘तुम्हारी माँ पार्वती चाहती है कि मेरे पास कोई वाहन होना चाहिए। बोलो कौन बनेगा मेरा वाहन?’
सभी जानवर खुशी से झूम उठे। छोटा-सा खरगोश फुदककर आगे बढ़ा- ‘भगवन्, मुझे अपना वाहन बना लें, मैं बहुत मुलायम हूँ।’
सभी खिलखिलाकर हँस पड़े। शेर गरजकर बोला-‘मूर्ख खरगोश,मेरे होते,तेरी जुर्रत कैसे हुई, सामने आकर बोलने की?’बेचारा खरगोश चुपचाप कोने में बैठकर गाजर खाने लगा। शेर हाथ जोड़कर बोला,‘प्रभु, मैं जंगल का राजा हूँ,शक्ति में मेरा कोई सामना नहीं कर सकता। मुझे अपनी सवारी बना लें।’
उसकी बात समाप्त होने से पहले ही हाथी बीच में बोल पड़ा-‘मेरे अलावा और कोई इस काम के लिए ठीक नहीं है। मैं गर्मी के मौसम में अपनी सूँड में पानी भरकर महादेव को नहलाऊँगा।’
जंगली सुअर कौन-सा कम था? अपनी थूथन हिलाते हुए कहने लगा-‘शिव जी, मुझे सवारी बना ले,मैं साफ-सुथरा रहने की कोशिश करूँगा।’ कहकर वह अपने शरीर की कीचड़ चाटने लगा। कस्तूरी हिरन ने नाक पर हाथ रखा और बोला-‘छिः, कितनी गंदी बदबू आ रही है, चल भाग यहाँ से, मेरी पीठ पर शिवजी सवारी करेंगे।’
उसी तरह सभी जानवर अपना-अपना दावा जताने लगे। शिवजी ने सबको शांत कराया और बोले‘कुछ ही दिनों बाद मैं सब जानवरों से एक चीज माँगूगा, जो मुझे वह ला देगा, वही मेरा वाहन होगा।’
नंदी बैल भी वहीं खड़ा था। उस दिन के बाद से वह छिप-छिपकर शिव-पार्वती की बातें सुनने लगा। घंटों भूख-प्यास की परवाह किए बिना वह छिपा रहता। एक दिन उसे पता चल गया कि शिवजी बरसात के मौसम में सूखी लकड़ियाँ माँगेंगे। उसने पहले ही सारी तैयारी कर ली। बरसात का मौसम आया। सारा जंगल पानी से भर गया। ऐसे में शिवजी ने सूखी लकड़ियों की मांग की तो सभी जानवर एक-दूसरे मुँह ताकने लगे। बैल गया और बहुत सी लकड़ियों के गट्ठर ले आया।
भगवान शिव बहुत प्रसन्न हुए। मन-ही-मन वे जानते थे कि बैल ने उनकी बातें सुनी हैं। फिर भी उन्होंने नंदी बैल को अपना वाहन चुन लिया। सारे जानवर उनकी और माँ पार्वती की जय-जयकार करते लौट गए।

शुक्रवार, 19 फ़रवरी 2021

शिवाजी महाराज ने गौ माता के लिए लड़ी थी एक लड़ाई !

हिन्दू सम्राट छत्रपति गौभक्त श्री शिवाजी महाराज जी की जयंती पर आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।

मात्र दस वर्ष की उम्र में शिवाजी महाराज ने गौ माता के लिए लड़ी थी एक लड़ाई !

अगर हिन्दू इतिहास के सबसे बड़े गौ-भक्तों के नाम के जगह लिखे जायें तो शिवाजी महाराज का नाम शुरूआती क्रम में रहेगा.
लेकिन जिस तरह से हमारे इतिहास से खिलवाड़ किया गया है उसका उदाहरण आज हम आपको पेश करने वाले हैं. हम अगर बोलते हैं कि हिन्दू इतिहास से खिलवाड़ किया गया है तो बुद्धिजीवी लोग इसका उदाहरण मांगते हैं. आज हम आपको शिवाजी महाराज की ऐसी कहानी बताने वाले हैं जो अब इतिहास से हटा दी गयी है.

गौ भक्त शिवाजी महाराज के लिए गाय सदैव पूजनीय रही थी. वह हमेशा बोलते थे कि गाय हिन्दू धर्म की शान है. जो भी इसको मात्र पशु समझ रहा है वह अज्ञानी है. खुद शिवाजी महाराज की दिनचर्या में गौ माता की सेवा शामिल थी. ऐसा ही एक किस्सा है, जो अब भूला दिया गया है. बचपन से ही शिवाजी गाय को आदरणीय और पूजनीय मानते थे और मात्र 10 वर्ष की आयु में ही शिवाजी ने यह सिद्ध कर दिया था कि उनका जन्म पापियों का नाश करने के लिए ही हुआ है.

जब शिवाजी महाराज ने गौ माता के लिए काट दिया था कसाई का सर।
हिन्दवी स्वराज्य के संस्थापक छत्रपति शिवाजी महाराज ने राज्याभिषेक के पश्चात् गो ब्राह्मण प्रतिपालक की उपाधि धारण करके स्वयं को गौरवान्वित किया था.

यह घटना शिवाजी महाराज के बाल्यकाल की है.

अपने पिता के साथ वे बादशाह के यहाँ जा रहे थे. यह बात बीजापुर की है. शिवाजी महाराज बचपन से हिन्दू लोगों के प्रिय भी थे. जब पिता और पुत्र दोनों रास्ते से गुजर रहे थे तो दोनों देखते हैं कि रास्ते में एक कसाई गाय को घसीटते हुए ले जा रहा था और वहां के बाजार के हिन्दू सर झुकाए बैठे हुए थे. मुग़ल शासन था, कौन क्या कर सकता था? उस समय शिवाजी की उम्र दस वर्ष की थी. कुछ इतिहास की पुस्तकें बताती हैं कि लोगों के मन में मुग़ल शासन का ऐसा डर था कि वह कुछ नहीं बोलते थे. हिन्दू मंदिर तोड़े जा रहे थे, गायों का क़त्ल हो रहा था और घर से बहू-बेटियां उठाई जा रही थीं. किन्तु कोई भी कुछ नहीं बोलता था.

जब बालक गौ भक्त शिवाजी यह देखते हैं कि कसाई गो-माता पर अत्याचार करते हुए, उनको काटने ले जा रहा है वह तभी अपनी तलवार निकालते हैं और पहले तो गाय की रस्सी काटकर उसे बंधन मुक्त करते हैं और वह कसाई कुछ कहता इससे पहले ही उसका सर धड़ से अलग कर देते हैं.

जब हिन्दुओं ने देखी बालक की बहादुरी

जब हिन्दू लोगों ने एक बालक गौ भक्त शिवाजी की इतनी बहादुरी देखी तो सबसे अन्दर जैसे नई ऊर्जा शक्ति का संचार हो गया था.

इस बात का जब बादशाह को पता चला तो वह कोई भी कार्यवाही इसलिए नहीं कर सका था क्योकि एक तो यह कार्य करने वाला एक बालक था और दूसरा कि उस समय सभी हिन्दुओं का साथ गौ भक्त शिवाजी को प्राप्त हो गया था.

लेकिन कुछ इतिहासकारों ने गौ भक्त शिवाजी की इस वीरतापूर्ण कहानी को किताबों से हटवा दिया ताकि हिन्दू इस कहानी को ना पढ़ सकें.

आज आवश्यकता है कि इस तरह की कहानियों को एक जगह एकत्रित किया जाये ताकि आने वाली पीढ़ियों तक सही इतिहास पहुँचाया जा सके. जय हिन्द जय गौमाता।

मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

श्री आनंदवन परिसर, गोधाम पथमेड़ा के गौसेवा सदन(गोष्ठ) के आवश्यक तत्व :

श्री आनंद वन परिसर, गोधाम पथमेड़ा के गौसेवा सदन(गोष्ठ) के आवश्यक तत्व :- 
1. गोष्ठ की साइज - 3 से 4 बीघा।
2. गोष्ठ में गोवंश की संख्या - 100 से 125
3. गोवंश का वर्गीकरण - प्रत्येक गोष्ठ में एक ही प्रकार का, एक ही उम्र का गोवंश रखा जाता है। नर व मादा गोवंश अलग अलग, बीमार, विकलांग, सूरदास, कमजोर, बूढ़ा, वत्स, गर्भवती, दूधारू, 1 वर्ष से कम, 1 से 2 वर्ष का, 2 वर्ष से 3 वर्ष का आदि आदि कई प्रकार से वर्गीकृत करके जगोवंश को अलग अलग गोष्ठ में रखा जाता है।
4 . गोष्ठ की दीवार - प्रत्येक गोष्ठ को पक्की दीवार या लोहे की जाली लगी हुई है। 
5. मुख्य गोष्ठ के अंदर छोटा गोष्ठ - प्रत्येक गोष्ठ के अंदर एक कोने में एक छोटा गोष्ठ होता है। जब चारा, दा ला या पोष्टिक आहार आदि देना होता है या सफाई करनी हो तो सभी गोवंश को उस छोटे गोष्ठ में भेजकर गेट बंद कर देते हैं। फिर कार्य पूर्ण होने पर सबको बड़े गोष्ठ में आने दिया जाता है।
6. गोष्ठ का प्रवेश द्वार - प्रत्येक गोष्ठ के एक बड़ा दरवाजा लगा होता है जिसमें बैलगाड़ी, ट्रैक्टर, बड़ी गाड़ी अंदर अा सके। ग्वालों व अन्य लोगों के आने जाने के लिए बड़े द्वार में एक छोटा दरवाजा लगा रहता है।
7. ग्वाला - प्रत्येक गोष्ठ में आवश्यकतानुसार कम से कम एक ग्वाला परिवार होता है। दूधारू या बीमार गोवंश में अधिक भी ग्वाल होते हैं। 10 से 12 ग्वालों के ऊपर एक व्यवस्थापक होता है।
8. चारा की व्यवस्था करना - गोवंश को चारा देने हेतु बैलगाड़ी की व्यवस्था होती है। प्रत्येक गोष्ठ में एक बैलगाड़ी बेलों की जोड़ी सहित होती है। चारा परोसने के लिए लंबी नाद होती है या वृत्ताकार फर्में होते हैं। जिनकी प्रतिदिन नियमित सफाई होती है।
9. पानी की व्यवस्था - प्रत्येक गोष्ठ में एक होद या फर्मा पानी के लिए होता है जिसमें बड़े टैंक से पाइप द्वारा कनेक्शन किया होता है। 24 घंटे अनवरत पानी सप्लाई चालू रहती है। प्रत्येक पानी के होद में सप्ताह में एक बार चूने की पुताई की जाती है। जिससे जल एकदम स्वच्छ रहता है।
10. सेंधा नमक - प्रत्येक गोष्ठ में गोवंश के सेवन हेतु प्रर्याप्त मात्रा में सेंधा नमक रखा जाता है। गोमाता प्रेम से नमक चाटती रहती है जिससे पोषक लवणीय तत्वों की पूर्ति होती है।
11. सर्दी, गर्मी, बरसात से बचाव - हरेक गोष्ठ में कई छायादार जाल के वृक्ष हैं तथा एक बड़ा शेड बना होता है।
12. गोबर धन - प्रत्येक गोष्ठ में नियमित रूप से दिन में कई बार गोमय लिया जाकर एक बड़ी ढेरी बनाई जाती है। इसे बाद में सेंद्रिय खाद बनाने में काम लेते हैं या सीधा गोबर खाद के रूप में बेचा जाता है।

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

पशुशाला और गौशाला में भेद


।।पशुशाला और गौशाला में भेद।।

भगवान् शिव ने लक्षणा-शब्द शक्ति के रूप में गौशाला की परिभाषा को परिभाषित करते हुए कहते हैं:-

स्वगां भोजित्वा तु  यत्फलं  लभेत  नर:।
द्विगुणं तस्य लभते परगां भोजयेद् यदि।
गुरोर्गां भोजयित्वा तु चतुर्गुणफलं लभेत्।। 
               संदर्भ:-श्री गौ तंत्र २.१४-१५

भावार्थ:- स्वयं की गौ की सेवा करने से उसके ग्रास देने से जो पुण्य प्राप्त होता हैं, उससे दुगुना पुण्य दूसरे द्वारा छोड़ी हुई गौ की सेवा करने से होता है। अगर गुरु द्वारा स्थापित गौशाला में गौओं की सेवा की जाए तो उसका चारगुणा ज्यादा पुण्य प्राप्त होता हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि गुरु द्वारा संचालित गौशाला में जो गौएं हैं उनकी महिमा का नित गान होता हैं, वे सब गौएं सबला हैं, प्रसन्न रहती हैं, वहां आने वाले भक्त गौ महिमा से परिचित होते हैं और वहां गाय पशु नहीं 'माता' कहलाती हैं इसलिए चारगुणा अधिक पुण्य है। जबकि अन्य जगह पे जो गौएं घूम रही हैं,उनको घर में लाकर पूजने से अधिक पुण्य है। अर्थात् जहां गौ महिमा नहीं हैं यदि गोग्रास देने वाला गौ महिमा से परिचित नहीं हैं तो गौ भी अवला रूप में रहती है और सेवा का उतना ही पुण्य प्राप्त होता हैं जितना किसी पशु पर दया करने का पुण्य है।
ॐ जगदम्बायै च विद्महे पशुरूपायै धीमहि सा नो धेनु: प्रचोदयात्।।
गाय पशु रूप में होते हुए भी जगदम्बा हैं और यह देवी हमें मोक्ष की राह पर ले जाएगी किन्तु यह तभी सम्भव है जब सेवक स्वयं को गोपुत्र मानकर और गौ को माता मानकर सेवा करें और गौ महिमा से परिचित हो!
                           ।।मां।।