शनिवार, 7 अप्रैल 2018

सन्त वाणी - सन्त राजेन्द्रदासजी महाराज

"सन्त वाणी"
                "राजेन्द्रदासजी महाराज के मुख से"

    एक बात है जो बड़े विनोद की है, पर है अनुभव की। हमने तो साधुओं में यह देखा है कि जिसने गाय का गोबर उठाया, वह महन्त बन गया। कई उदहारण हमने ऐसे देखे हैं। अब महन्तों का नाम लेंगे तो उनको बुरा लगेगा कि देखो, महाराज मंच से हमको गोबर उठानेवाला कह रहे हैं, यद्यपि इसको सुनकर उनको अपने-आप में गौरव का अनुभव करना चाहिए।हमारे सामने के १०- २० उदाहरण ऐसे हैं, जो गौ का गोबर उठाते थे, अब बड़े-बड़े स्थानों के महन्त बन गये हैं। यद्यपि महन्त बनना कोई बड़ी उपलब्धि नहीं है तथापि गोसेवा की महिमा की दृष्टि से यहाँ एक सामान्य दृष्टान्त प्रस्तुत है।
      श्रीअयोध्याजी में बड़ी छावनी एक स्थान है, यहाँ एक महन्त ऐसे हुए श्रीकौशलकिशोरदासजी महाराज, जो बहुत प्रतापी सन्त थे। उनके जमाने में ढाई हजार गायें थीं, बहुत लम्बी-चौड़ी खेती थी।उनके समय में गौसेवा, सन्तसेवा बहुत अद्भुत हुई।
     उनके जो गुरुदेव थे, वे शिष्य को महन्त बनाना चाह रहे थे। जिनको महन्त बनाना था, उस दिन वे उबटन लगाकर बढ़िया से स्नान कर रहे थे।बढ़ियासे स्नान करके तिलक लगाकर अँचला पहनकर आनेकी तैयारी में ही लगे थे। जब समय अधिक हो गया तो गुरुजी ने कहा, भाई ! क्या बात है, देर हो रही है, मुहूर्त निकला जा रहा है, पूजन भी होना है। सब लोग आ गये। महन्त जिसको बनना है वह कहाँ है ? बुलाओ उसको, किसी ने कहा-वे तो तैयार हो रहे हैं। अरे ! राम-राम-राम ! अभी तो महन्त बना नहीं, अभी से सजावट में लग गया तो फिर महन्त बनने पर तो अपनी ही सजावट करेगा ; गोसेवा, ठाकुरसेवा और सन्तसेवा तो करेगा नहीं, तो फिर ठीक है उसको सजावट करने दो, उसको बुलाने मत जाना और खुद उठे वहाँ से और उठकर घुमने लगे तो उन्होंने देखा कि बाजे बज रहे थे, महन्त बननेके लिये बड़ा उत्सव का माहौल था, पर एक बालक, जिसकी आयु १०-१२ वर्ष की रही होगी, गोशाला में गोबर उठा रहा था, उसे उत्सव से कोई मतलब ही नहीं था,वह गोसेवा में लगा था। हाथ गोबर से सने हुए थे। उसे देखकर गुरुजी बड़े खुश हो गये और बोले- 'गोसेवा करता है, गोबर उठाता है, महन्त बनने लायक तो यही है।' विप्र बालक था ही, तुरन्त उसका हाथ पकड़ा बोले- चल-चल। बोला- कहाँ गुरुजी ? कहाँ- चल तुझे गद्दीपर बिठाना है। वह बोला- गुरुजी ! हम तो बालक हैं। बोले- बालक नहीं, तुम गोसेवक हो।तुमको गद्दीपर बिठायेंगे, चलो, उसने कहा- हाथ-पैर धो आयें।तो बोले- नहीं, हाथ-पैर धो लोगे तो पवित्रता नष्ट हो जायगी। अभी तुम्हारे पैर में गोबर लगा है, हाथ में गोबर लगा है। इस समय महन्त बनोगे तो खूब गोसेवा करोगे, फिर मुहूर्त निकल जायगा, गोबर से सने हाथों से ही तुरन्त ले जाकर स्वस्तिवाचन करके उसे महन्त बना दिया। ये बालक ही कौशलकिशोरदासजी के रूप में विख्यात हुए। तो जिनके हाथ गोबर से सने हुए थे, वे कौशलकिशोरजी जब गद्दीपर बैठे तो इतनी गोसेवा और सन्तसेवा का विस्तार हुआ कि सर्वत्र आनन्द छा गया। वे महान, उदार, दानी और परोपकारी थे, गोसेवा के प्रभाव से अपार समृद्धि और सम्पत्ति उनके पास थी तो गाय अपनी सेवा करनेवाले की दरिद्रता को दूर कर देती है। इसलिये निवेदन है कि जिसे महान बनने की इच्छा हो, धनाढय बननेकी इच्छा हो, सच्चे अर्थमें श्रीमान् बननेकी इच्छा हो तो उसे गौका गोबर उठाना चाहिये।
       श्रद्धापूर्वक सेवा करनेवालेको गाय अपरिमित सम्पत्ति प्रदान करती है और गायकी यदि कृपा भरी दृष्टि जीवको प्राप्त हो जाय तो वह निश्चित ही उत्तम गतिको प्राप्त होता है।स्मृतियों में लिखा है- गायकी समता करने वाला धन इस ब्रह्माण्ड में दूसरा कोई नहीं है। गोधश सर्वश्रेष्ठ धन है, इससे बढ़कर धन कोई नहीं है. सम्पूर्ण देवता इसमें निवास करते हैं। आप विचार कीजिये, जिसके गोबर में लक्ष्मी हो, जिसके मूत्र में साक्षात् भगवती गंगा हो, उसकी महिमा का क्या कहना ! उसकी तो अनन्त परिमित महिमा है।गाय सर्वदेवमयी है और सर्ववेदमयी है- यह वाराहपुराण में लिखा है। इसलिये विद्या की प्राप्ति भी गायकी सेवासे और देवताओं की कृपा भी गायकी सेवासे प्राप्त हो जायगी। भगवान् वाराह कह रहे हैं- हे पृथ्वीदेवि ! अमृतको धारण करने वाली यह गाय तीनों लोकों का मंगल करती हुई विचरण कर रही है। तीर्थों में भी यह महान तीर्थ है, इससे बड़ा कोई दूसरा तीर्थ नहीं है। पवित्रों में भी यह पवित्र है, पुष्टियों में भी यह श्रेष्ठ पुष्टि है।
                        -सन्त राजेन्द्रदासजी महाराज
                       पुस्तक:- गोरक्षा एवं गोसंवर्धन
                      (गीता प्रेस गोरखपुर)

बुधवार, 4 अप्रैल 2018

देसी गाय का दूध क्यों हैं अमृत समान

देसी गाय का दूध क्यों हैं अमृत समान

गाय का दूध पृथ्वी पर सर्वोत्तम आहार है। उसे मृत्युलोक का अमृत कहा गया है। मनुष्य की शक्ति एवं बल को बढ़ाने वाला गाय का दूध जैसा दूसरा कोई श्रेष्ठ पदार्थ इस त्रिलोकी में नहीं है। पंचामृत बनाने में इसका उपयोग होता है। गाय का दूध पीला होता है और सोने जैसे गुणों से युक्त होता है। केवल गाय के दूध में ही विटामिन ए होता है, किसी अन्य पशु के दूध में नहीं।

गाय का दूध अत्यंत स्वादिष्ट, स्निग्ध, मुलायम, चिकनाई से युक्त, मधुर, शीतल, रूचिकर, बुद्धिवर्धक, बलवर्धक, स्मृतिवर्धक, जीवनदायक, रक्तवर्धक, वाजीकारक, आयुष्यकारक एवं सर्वरोग को हरनेवाला है।

*कभी नहीं होगा कैंसर।*
देसी गाय की पीठ पर मोटा सा हम्प होता है ! जिसमे सूर्यकेतु नाड़ी होती हैं, जो सूर्य की किरणों के संपर्क में आते ही अपने दूध में स्वर्ण का प्रभाव छोड़ती हैं। जिस कारण गाय के दूध में स्वर्ण तत्व समा जाते हैं। देसी गाय का दूध पीने से कभी भी कैंसर का रोग नहीं होगा।

*दूध में अनेको खनिज और पौषक तत्व।*
वैज्ञानिकों के अनुसार गाय के दूध में 8 प्रकार के प्रोटीन, 6 प्रकार के विटामिन, 21 प्रकार के एमिनो एसिड, 11 प्रकार के चर्बीयुक्त एसिड, 25 प्रकार के खनिज तत्त्व, 16 प्रकार के नाइट्रोजन यौगिक, 4 प्रकार के फास्फोरस यौगिक, 2 प्रकार की शर्करा, इसके अलावा मुख्य खनिज सोना, ताँबा, लोहा, कैल्शियम, आयोडीन, फ्लोरिन, सिलिकॉन आदि भी पाये जाते हैं।

इन सब तत्त्वों के विद्यमान होने से गाय का दूध एक उत्कृष्ट प्रकार का रसायन (टॉनिक) है, जो शरीर में पहुँचकर रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और वीर्य को समुचित मात्रा में बढ़ाता है। यह पित्तशामक, बुद्धिवर्धक और सात्त्विकता को बढ़ाने वाला है। गाय के दूध से 1 ग्राम भी कोलोस्ट्रोल नहीं बढ़ता !

*ज़हर भी समा लेती हैं गाय।*
यदि गाय कोई विषैला पदार्थ खा जाती है तो उसका प्रभाव उसके दूध में नहीं आता। गाय के शरीर में सामान्य विषों को पचाने की अदभुत क्षमता है। ये ज़हर देसी गाय के गले के नीचे लटकने वाले मांस में ही रह जाता हैं। एक शोध किया गया जिस में हर रोज़ देसी गाय को और अमेरिकन गाय को भोजन में थोड़ा थोड़ा ज़हर दिया गया , और जब उनका दूध निकाला गया तो देशी गाय के दूध में कोई भी ज़हरीला तत्व नहीं मिला और अमेरिकन गाय में वही ज़हर पाया गया जो उसको खिलाया गया।

*अनेक बीमारियो में हैं इसके फायदे।*
गाय का दूध, जीर्णज्वर, मानसिक रोगों, मूर्च्छा, भ्रम, संग्रहणी, पांडुरोग, दाह, तृषा, हृदयरोग, शूल, गुल्म, रक्तपित्त, योनिरोग आदि में श्रेष्ठ है।

गाय को शतावरी खिलाकर उस गाय के दूध पर मरीज को रखने से क्षय रोग (T.B.) मिटता है।

कारनेल विश्वविद्यालय के पशुविज्ञान के विशेषज्ञ प्रोफेसर रोनाल्ड गोरायटे कहते हैं कि गाय के दूध से प्राप्त होने वाले MDGI प्रोटीन के कारण शरीर की कोशिकाएँ कैंसरयुक्त होने से बचती हैं।

गाय के दूध से कोलेस्टरोल नहीं बढ़ता बल्कि हृदय एवं रक्त की धमनियों के संकोचन का निवारण होता है। इस दूध में दूध की अपेक्षा आधा पानी डालकर, पानी जल जाये तब तक उबालकर पीने से कच्चे दूध की अपेक्षा पचने में अधिक हल्का होता है।

गाय के दूध में उसी गाय का घी मिलाकर पीने से और गाय के घी से बने हुए हलुए को, सहन हो सके उतने गर्म-गर्म कोड़े जीभ पर फटकारने से कैंसर मिटने की बात जानने में आयी है।

गाय के दूध में दैवी तत्त्वों का निवास है। गाय के दूध में अधिक से अधिक तेज तत्व एवं कम से कम पृथ्वी तत्व होने के कारण व्यक्ति प्रतिभा सम्पन्न होता है और उसकी ग्रहण शक्ति (Grasping Power) खिलती है। ओज-तेज बढ़ता है। इस दूध में विद्यमान ‘सेरीब्रोसाडस’ तत्व दिमाग एवं बुद्धि के विकास में सहायक है।

*रेडियोधर्मी विकिरणों के प्रभाव को भी कर देती हैं नष्ट।*
केवल गाय के दूध में ही Stronitan तत्व है जो कि अणुविकिरणों का प्रतिरोधक है। Russian वैज्ञानिक (प्रसिद्ध वैज्ञानिक शिरोविच) गाय के घी-दूध को एटम बम के अणु कणों के विष का शमन करने वाला मानते हैं और उसमें रासायनिक तत्व नहीं के बराबर होने के कारण उसके अधिक मात्रा में पीने से भी कोई ‘साइड इफेक्ट’ या नुकसान नहीं होता।

*तुरंत शक्ति देना वाला हैं इसका दूध।*
प्रतिदिन गाय के दूध के सेवन से तमाम प्रकार के रोग एवं वृद्धावस्था नष्ट होती है। उससे शरीर में तत्काल वीर्य उत्पन्न होता है।
एलोपैथी दवाओं, रासायनिक खादों, प्रदूषण आदि के कारण हवा, पानी एवं आहार के द्वारा शरीर में जो विष एकत्रित होता है उसको नष्ट करने की शक्ति गाय के दूध में है।
           

बुधवार, 21 मार्च 2018

दिव्य_धेनु_मानस

#दिव्य_धेनु_मानस


1)   गौसेवा रस लहै अपारा।
      रास रचाईं भाव की धारा।।
2)  अकथ अलोकिक सब रस माहिं।
      तिभुअन छाड़ि वृंदाबन आहि।।


#अर्थ:-


गौसेवा में बहुत अपार रस मिलता है। इसलिये भगवान ने रास रचाकर भाव की धारा बहाई। सब रसों में अलोकिक रस एवं अकथनीय है, यह रस जो वृंदावन छोड़कर त्रिभुवन में नहीं है।


3)  श्रीमुख लट लटके घुंघरारी।
      बेला गौधूरि अति पिआरी।।
4)  जे पद कमल गाय के पीछे।
      छाति परहि सकल दुख खींचे।।


#अर्थ:-


हे प्रभु आपके श्रीमुख पर घुंघरारे केश लटक रहे हैं, गौ धूलि की पवित्र प्यारी बेला है, जो पदकमल गाय माता के पीछे चलते हैं, हमारी छाती पर उन्हे रखे जो सारे दुखों को खींच लेते है।


5)  नित भगवंत चरावहि धेनु।
      बन बिचरन संग गौधन रेनु।।
6)  रिषि मुनि बन बसि साधहिं जोगु।
      जीवन सफल न भावय भोगु।।


#अर्थ:-


भगवान सदा गौ चराते है। वन-वन विचरण करते हुये गौ माता की चरण धूरि को प्राप्त करते हैं। ऋषि मुनि लोग वन मे रहकर योग साधना करते है। उन्हे भोग अच्छा नहि लगता है, अपना जीवन सफल बनाते हैं।



शनिवार, 17 मार्च 2018

गाय मरी तो मरता कौन? गाय बची तो बचता कौन?


गाय मरी तो मरता कौन? गाय बची तो बचता कौन?  

डॉ. मनमोहन बजाज, डॉ. इब्राहिम एवं डॉ. विजय राज ने अपने शोधों से यह साबित कर दिया है कि “पृथ्वी पर भूकंप अधिकांशत: ई.पी. वेव्स के कारण ही आते हैं | ये वेव्स गाय एवं अन्य प्राणियों को क़त्ल करते समय उत्पन्न दारुण वेदना एवं चीत्कार से निकलती है|” कटती गायों की चीत्कार से पृथ्वी की रक्षा कवच कही जानेवाली ओजोन परत में 2 करोड़ 70 लाख वर्ग किलोमीटर का छिन्द्र हो गया है| यदि गायों की हत्या इसी प्रकार चलती रही तो वर्ष 2020 तक प्रलय की सम्भावना निश्चित है|

क्या आप जानते है ? 
कोल्डड्रिंक्स, फास्टफूड, घी, बिस्किट आदि में गाय का मांस, रक्त और चर्बी मिलायी जाती है|

देश की आज़ादी के समय   – 90 करोड़ गोधन
सन् 2000 में रह गया        – 10 करोड़ गोधन
सन् 2010 में रह गया        – 3 करोड़ गोधन 


गौरक्षा - गाय की सुरक्षा : सर्वस्व की रक्षा

गौरक्षा - गाय की सुरक्षा : सर्वस्व की रक्षा  

“गावो विश्वस्य मातर |”

                   गौमाता जो आजीवन हमें अपने दूध- दही- घी आदि से पोषित करती है| अपने इन सुंदर उपहारों से जीवनभर हमारा हित करती है| ऐसी गौमाता की महानता से अनभिज्ञ होकर मात्र उसके पालन-पोषण का खर्च वहन ना कर पाने के बहाने उन्हें कत्लखानों के हवाले करना विकास का कौन सा मापदंड है ? क्या गौमाता के प्रति हमारा कोई कर्त्तव्य नहीं है ?
   
 पंडित मदन मोहन मालवीयजी ने कहा है: ’यदि हम गौओं की रक्षा करेंगे तो गौएँ भी हमारी रक्षा करेंगी |’
सदियों से अहिंसा का पुजारी भारतवर्ष आज हिंसक और मांस निर्यातक देश के रूप में उभरता जा रहा है| यह बड़ी विडम्बना है कि एशिया का सबसे बड़ा कत्लखाना अन्य इस्लामिक देशों में नहीं बल्कि भारत के महाराष्ट्र प्रान्त में है, जहाँ हजारों गायें रोज कटती है| दूसरी अल कबीर गोवधशाला आंध्रप्रदेश में है | यहाँ रोज 6 हजार गौएँ , इससे दुगुनी भैसें तथा पड़वे  काटे जाते है| इसका लगभग 30,000 टन मांस विदेशों में निर्यात होता है |


क्या आप जानते हैं जिस गौमाता की आप पूजा करते हैं, उसे किस प्रकार निर्दयतापूर्वक मारा जाता है ?

क्या आप जानते हैं जिस गौमाता की आप पूजा करते हैं, उसे किस प्रकार निर्दयतापूर्वक मारा जाता है ?
कत्लखाने में स्वस्थ गौओं को मौत के कुँए में 4 दिन तक भूखा रखा जाता है| अशक्त होकर गिरने पर घसीटते हुए मशीन के पास ले जाकर उन्हें पीट-पीटकर खड़ा किया जाता है| मशीन की एक पुली (मशीन का पकड़नेवाला एक हिस्सा) गाय के पिछले पैरों को जकड़ लेती है | तत्पश्चात खौलता हुआ पानी 5 मिनट तक उस पर गिराया जाता है| पुली पिछले पैरों को ऊपर उठा देती है| जिससे गायें उलटी लटक जाती हैं| फिर इन गायों की आधी गर्दन काट दी जाती है ताकि खून बाहर आ जाये लेकिन गाय मरे नहीं | तत्काल गाय के पेट में एक छेद करके हवा भरी जाती है, जिससे गाय का शरीर फूल जाता है | उसी समय चमड़ा उतारने का कार्य होता है | गर्भवाले पशु का पेट फाड़कर जिन्दा बच्चे को बाहर निकला जाता है | उसके नर्म चमड़े को (काफ-लेदर) को बहुत महंगे दामों में बेचा जाता है|

सोमवार, 12 मार्च 2018

गोपियुष अमृततुल्य ही है !

गोपियुष अमृततुल्य ही है !


        गोपियुष अर्थात प्रसूती पश्‍चात ४८ से ७२ घंटों में गाय द्वारा प्राप्त प्रथम दूध । गोपियुष और माता द्वारा प्राप्त पियुष में वैज्ञानिक दृष्टि से बहुत सी समानता पाई गई है । गोपियुष में रोगप्रतिकारक शक्ति और शरीर की सुदृढता के लिए आवश्यक ९० से अधिक पोषकतत्त्व हैं । गोपियुष सुदृढ मानवीय शरीर हेतु ईश्‍वरप्रदत्त अनमोल देन है । आयुर्वेद में इसे ‘अमृततुल्य’ कहा गया है । दस वर्षों से भी पहले विश्‍वविद्यालय तथा मेडिकल रिसर्च सेंटर द्वारा किए गए विविध चिकित्सकीय शोध द्वारा प्रमाणित हुआ है कि गोपियुष में मानवीय शरीर के लिए आवश्यक आण्विक संयोजन एवं विकास घटक समाविष्ट हैं । इसमें शरीर में रोगप्रतिकारक शक्ति विकसित करने की प्रचंड क्षमता भी है ।

प्राकृतिक ऊर्जा की अपेक्षा रासायनिक ऊर्जा की पूर्ति करनेवाला मानव !


        रोग का मूल कारण है, रोगप्रतिकारक शक्ति का अभाव । शरीर, प्रकृति द्वारा प्रदान एक अनमोल संपदा है; परंतु बाल्यावस्था से लेकर वृद्धावस्था तक इसकी उपेक्षा की जाती है । शरीर का प्रत्येक अवयव अत्यंत सावधानीपूर्वक अपना कार्य करता रहता है । इस समय उसे प्राकृतिक ऊर्जा की ही आवश्यकता होती है; परंतु हम रासायनिक ऊर्जा देकर शरीर की कार्यप्रणाली में बाधा लाते हैं । इससे अनेक प्रकार के रोग उत्पन्न होते हैं । शरीर प्रकृति द्वारा निर्मित व्यवस्था है, इसलिए वह प्रकृति के नियमों के अनुसार ही कार्य करेगा; परंतु हम इसकी उपेक्षा कर उसे सदैव अपनी सुविधानुसार चलाने का प्रयत्न करते हैं ।

        भाग-दौड भरी जीवनप्रणाली में प्रकृति द्वारा निर्मित संपदा को प्रकृति के विरुद्ध जाकर अपनी इच्छा अनुसार संभालने की भूल मनुष्य द्वारा सदैव होती रहने से गांव-गांव में चिकित्सालय फैले हुए हैं । अंत में अपने बलबूते पर प्रकृति को जीतने की दौड में हम सदैव पराभूत हो रहे हैं । प्रकृति द्वारा निर्मित अनमोल शरीरव्यवस्था को रोगयुक्त बनाकर हम दु:खी जीवन जी रहे हैं ।

शरीर निरोगी रखनेवाले ‘गोपियुष’ का सेवन करें !


        प्रतिदिन ‘गोपियुष’ का सेवन करने का अर्थ है, उत्तम रोगप्रतिकारक शक्ति निर्माण करना । गोपियुष अर्थात अवयवों के लिए नित्य आवश्यक ऊर्जास्रोत और रोगों को शरीर में प्रवेश न देने की प्रचंड शक्ति का भंडार । गोपियुष में इम्युनोग्लोब्युुलिन्स, एमिनो एसिड्स, ग्रोथ फैक्टर्स, एन्टी ऑक्सीडेंट, प्रोटीन्स, स्नायु बलवान बनाने के लिए आवश्यक घटक, रक्तपरिसंचार तंत्र, पाचन तंत्र, मानसिक संतुलन उत्तम रहने के लिए आवश्यक घटक, संप्रेरक, ग्रोथ हार्मोन्स आदि होते हैं । परिणामस्वरूप शरीर निरोगी रखने में यह बहुत सहायक होता है । मधुमेह, कर्करोग, अधसीसी, रोगप्रतिकारक शक्ति का अभाव, घुटनों की व्याधियां, थाइरॉईड, महिलाआें की विविध व्याधियां, बच्चों की व्याधियां, वायरल अस्थमा, अल्सर, रक्तचाप, अपच, एच.आइ.वी., फिट्स जैसे विविध भयानक रोगों से गोपियुष हमारी रक्षा करता है । पियुष अमृततुल्य है । गोपियुष के सेवन से एलोपैथी की भांति किसी भी प्रकार के दुष्परिणाम नहीं होते ।

        अनेक लोग गोपियुष से अनभिज्ञ होते हैं । इसलिए इसका वैज्ञानिक दृष्टि से प्रसार होना आवश्यक है । वर्तमान में गायों की संख्या अल्प होती जा रही है । इसलिए दूध का उत्पाद घट रहा है । अतः ‘जहां गांव वहां गोशाला’ इसे वास्तविकता में लाने के लिए शासन, सामाजिक संस्था तथा उद्यमियों को प्रयत्न करना आवश्यक है ।

चिकित्सालय के व्यय की तुलना में गोपियुष सस्ता !


        गोपियुष विशिष्ट स्थानों पर ही उपलब्ध होता है । उत्कृष्ट श्रेणी की गोपियुष पाऊडर बनानेवाले कारखाने अत्यल्प हैं । महाराष्ट्र में तो एक भी कारखाना नहीं है । अत्यल्प स्थानों पर मिलने के कारण उसका मूल्य भी अनियंत्रित रहता है । तत्पश्‍चात भी औषधियां, परीक्षण तथा चिकित्सालय के व्यय की तुलना में गोपियुष का मूल्य कई गुना अल्प है । साथ ही वह दुष्परिणामों से भी मुक्त है ।

आइए, प्रकृति द्वारा निर्मित आयुर्वेद का स्वीकार करें !