गुरुवार, 20 अप्रैल 2023

जन सामान्य कैसे गौसेवा कर सकता है?

जन सामान्य

आपके आचरण व व्यवहार से विश्व में राष्ट्र की छबि बनती हैं, आपके विचारों से, आपके कार्यों से राष्ट्र को परिचय मिलता है, आपकी कर्मठता व लगन से यह राष्ट्र प्रगतिपथ पर हैं, आप इस राष्ट्र के निर्माता है. आप ही के हाथों में इस राष्ट्र का वर्तमान व भविष्य सुरक्षित हैं। धर्म, अध्यात्म के प्रति आपके रुझान से ही यह राष्ट्र विश्व को संदेश दे रहा हैं, संस्कृति से आपके गहरे प्रेम के बदौलत ही आज विश्वपटल पर यह राष्ट्र अपना वजूद बचाने में सफल रहा हैं। आईये, गोवंश और मातृभूमि की करुण पुकार को सुने और कुछ अधोलिखित पुनीत कार्य कर इस संस्कृति का पोषण करें एवम् स्वास्थ्य, खाद्यान्न, प्रदूषण व उर्जा के संकटो से इस राष्ट्र को मुक्त कर एकबार फिर इसे अपना खोया वैभव व सम्मान दिलाकर विश्व का सिरमौर बनायें।

१. चूँकी गायों में समस्त देवी-देवताओं का वास होता हैं, इसलिये सदैव प्रातः उठकर गोदर्शन करें।

२. स्वास्थलाभ हेतु प्रतिदिन गोतीर्थ, गोदुग्ध गोमूत्रपान करना चाहिये। 

3. गौओं का नाम-कीर्तन किये बिना न सोवे और प्रातः उनका स्मरण करके ही उठे शास्त्रानुसार इससे मनुष्य को बल एवं पुष्टि प्राप्त होती हैं।

४. अपने इहलोक व परलोक उध्दार हेतु गार्यो को गोग्रास प्रदान करने के पश्चात ही भोजन करें।

५. अपने समस्त दोष पापों के शमन व मनःशांति हेतु गायों के शरीर को खुजलायें, सहलायें।

६. संभव हो तो घर में कम से कम एक गाय अवश्य पालें, स्थान की कमी परंतु आर्थिक शक्ति हो तो गोशाला की कम से कम १ गाय के पालन- पोषण का खर्च वहन कर गोसेवा करें।

७. गोलोकप्राप्ति हेतु गोदान अवश्य करें ।

८. प्रतिदिन गोदानापात्र में कम से कम एक रुपया डालकर गोसेवा का पूण्य प्राप्त करें।

९. दैनिक जीवन की आवश्यकताओं में पंचगव्य निर्मित स्वस्त व लाभप्रद मंजन, टिकिया (साबुन), शॅम्पू, उबटन, धूप, मच्छर निरोधक अगरबती जैसे उत्पादों का ही उपयोग कर गौसंवर्धन कार्य में योगदान दें।

१०. घर में देशी गाय का दूध, दही, तक्र, घृत का ही उपयोग करें।

 ११. बीमारीयों में ऍलोपॅथी औषधियों की तुलना में स्वस्त सुलभ व अपायरहित होने के कारण पंचगव्य औषधियों का ही उपयोग करें। 

१२. किसी न किसी गोशाला से जुड़कर अपनी शैक्षणिक व शारीरिक योग्यता के अनुसार गौरक्षा, गोसंवर्धन के कार्यों में हाथ बँटायें। 

१३. १५ दिन या महिने में एक बार मित्र परिवार सहित गोशाला में श्रमदान अवश्य करें। 


१४. गोरक्षा, गोसंवर्धन हेतु समय-समय पर होनेवाले आन्दोलनो में सक्रिय सहयोग दें।

१५. सर्वदेवमयी गोमाता का चित्र घर में अवश्य लगाना चाहीये।

१६. दैनंदिन पूजा-पाठ, भोग, हवन में देसी गाय से प्राप्त पंचगव्यों व उनसेप्राप्त उत्पादों का ही उपयोग करें।

१७. व्यक्तिगत गोशाला या समाज में जनजागरण कर सार्वजनिक गोशाला बनवायें: शास्त्रानुसार इससे सात कुल का उध्दार होता है। 

१८.  लाखों गोवंश के मृत्यु का कारण बनी प्लास्टिक थैलियों के उपयोग का विरोध व इस विषय में जनजागरण करें। 

१९. विपत्ति में पड़े व कत्लखानों में जा रहे गोवंश को छुड़ाने में सहयोग करें: इससे अश्वमेघ यज्ञ का फल प्राप्त होता हैं। 

२०. चाँदी के वर्क लगी मिठाइयों का विरोध करें।

२१. पीडित व रुग्ण गोवंश का औषधोपचार करें: इससे निरोगी देह का आशीर्वाद प्राप्त होता हैं।

२२. शास्त्रानुसार ब्रम्ह हत्या के पाप से बचने के लिये भूख प्यास से व्याकुल गोवंश को भोजन जल ग्रहण करते समये, मल-मूत्र परित्याग करते समय बाधा पहुँचाकर उन्हें उद्विग्न न करें।

२३. जूता या खड़ाऊँ पहन कर गायों के बीच न जायें। 

२४. अज्ञानता व अनभिज्ञता के कारण हम गोवंश हत्या से प्रेरित हिसंक उत्पादों का उपयोग कर रहे हैं। जैसे खाल व चमड़े से बने जूते, चप्पल, चांदी वर्क, कोट, पर्स, सूटकेस, बिस्तरबंद, बेल्ट, गलीचा, फर्नीचर कवर, ढोलक, वाद्ययंत्र क्रिकेट बॉल, फुटबॉल, कलात्मक मूर्तियाँ, टोपी, हाथपोस, बेबीसूट, गोमांस व चर्बी से बने नकली घी, बेकरी उत्पाद, आईस्क्रीम, चॉकलेट, टुथपेस्ट व पावडर, कुछ साबुन, सौंदर्य प्रसाधन जैसे कोल्ड क्रीम, वेनेशिंग क्रीम, लिपिस्टीक, परफ्युम, नेलपॉलीश, डाई, लोशन, शॅम्पू, सिंथेटिक दूध, खिलौने इत्यादी सैकड़ों वस्तुओं के उपयोग का व बिक्री का विरोध करें तथा समाज में इस विषय पर जनजागरण करें।

२५. औषधियों के साहित्य में बोवाईन (Bovine) लिखे होने का मतलब औषधि में गोवंश के माँस का उपयोग समझना चाहिये। उदाहरणार्थ गोवंश के पॅनक्रिआज से प्राप्त इंसुलिन गाय के रक्त से बनी डेक्सोरेंज सीरप, जिलेटीनवाली कॅपसुल हड्डी से बनी Heamaccel औषधि (Hoechst Marion Roussel Co.) व कई कॅलशियम पूरक औषधियाँ ऐसी औषधियों के उपयोग, बिक्री का विरोध व इस विषय पर जन जागरण करें।

२६. आजकल बछड़ों के पॅनक्रीआज से प्राप्त रेनेट का उपयोग पनीर बनाने मे होता हैं, ऐसे पनीर के उपयोग, बिक्री का विरोध व इस विषय पर जनजागरण करें।

२७. पंचगव्य आधारित जैविक कृषि से उत्पन्न खाद्यान्नों के उपयोग पर बल देना चाहिये।


बुधवार, 29 मार्च 2023

स्थानीय नस्ल का गोवंश है, उसी का संरक्षण, संवर्धन, सेवा करें।

हम जिस क्षेत्र में रहते हैं, उस क्षेत्र में जिस नस्ल का गोवंश है, उसी का संरक्षण, संवर्धन, सेवा करें। अन्य क्षेत्र के गोवंश के रूप, दूध, स्वभाव आदि को देखकर अपने यहां के गोवंश की उपेक्षा कर उसका त्याग कर अन्य नस्ल के गोवंश को रखते हैं तो उचित नहीं हैं। क्योंकि प्रकृति ने क्षेत्र विषश के अनुरूप ही वहां सभी प्राणियों को व्यवस्थित किया हैं। स्थान विशेष का गोवंश वहां की भौगोलिक स्थिति से पूर्ण परिचित होता हैं, उसका चारा वहां उत्पन्न होने वाली फसल और घास होती हैं। उसका शरीर कद काठी सींग आदि वहां की धरती के अनुरूप होते हैं। जैसे हिमालय पहाड़ों की बद्री गोमाता छोटी पहाड़ों पर घूम फिरने योग्य, रंग की काली या गहरे रंग की, शरीर पर बाल ताकि ठंड से बचाव हो आदि लक्षणों से युक्त होती हैं, उसे अगर राजस्थान की गर्म जलवायु में रखेंगे तो उचित नहीं होगा, गोमाता कष्ट में रहेगी।
इसलिए समय आ गया हैं कि अपने क्षेत्र की गोमाता का संरक्षण करें, उसका संवर्धन कर उसकी नस्लों को उन्नत बनावे ताकि कुछ वर्ष बाद हमें उसी नस्ल से अनुरूप दूध भी मिलने लग जायेगा तथा नस्लें समाप्त भी नहीं होगी।
अपने घर में मां की उपेक्षा कर अन्य महिला के कपड़े, गहने, रूप अच्छा देखकर मां के स्थान पर घर में रख लेंगे तो क्या होगा? यही बात गोवंश की नस्लों के संबंध में हैं

रविवार, 12 फ़रवरी 2023

नन्दीशालाओं की स्थापना एवं संचालन में तन-मन-धन से सहयोग करे

आदरणीय सज्जनों 
सादर सप्रेम हरिस्मरण जय शिवशंकर जय नन्दीश्वर ।

गोभक्त धर्मात्माओं आप सभी नित्य देखते होंगे कि प्रत्येक नगर, गली, गाँव तथा सड़कों पर सर्वत्र गोवंश विशेषकर नन्दीदेवता निराश्रित विचरण करते व कचरे के ढेर में मुख मारते हुए मिलेंगे, यह गोवंश भूख से व्यथित कृषि वाले खेतों में जाने पर किसान के क्रोध का शिकार बनता है, अखाद्य पदार्थ खाकर असाध्य रोगग्रस्त हो जाता है, गतिशील वाहन से दुर्घटनाग्रस्त होता है और इस गोवंश से भयंकर नस्लक्षरण भी हो रहा है, गोवंश के असहनीय दुखों का अभिशाप जाने अनजाने पूरे समाज को लग रहा है, इसके परिणाम स्वरूप प्राकृतिक आपदाओं का संकट मानवजाति को भोगना पड़ेगा।

अतः मानवजाति को गोअपराधों से मुक्त करने के लिए आगामी महाशिवरात्रि पर्व के दिन शिववाहन वृषभ देवता का प्रत्येक शिवमन्दिर में पूजन-अर्चन करते हुए निराश्रित गोवंश के आश्रय और आहार का प्रबंध करने के लिए घर-घर गाय गाँव- गाँव गोशाला और खण्ड खण्ड नन्दीशालाओं की स्थापना एवं संचालन में तन-मन-धन से सहयोग करने का संकल्प लेकर महाशिवजी का मंगल आशीर्वाद प्राप्त करें ।

।। जय श्री कामधेनु कृष्ण ।।

आपका अपना आस्था केन्द्र 
श्री गोधाम महातीर्थ पथमेड़ा

सोमवार, 12 दिसंबर 2022

गाय का दूध बढ़ानेके उपाय

गायका दूध बढ़ानेके उपाय

१. प्रतिदिन हरी ताजी घास पेटभर खिलाना।

२. दूध दुहकर उसीको पिला देना।

३. गुड़ एक भाग और जी तीन भाग एक साथ पकाकर रोज खिलाना। ४. गोभी और पत्ता गोभीको पत्तियाँ खिलाना।

५. पपीते के कच्चे फल और पपीतेको पत्ती पोसकर गुड़ मिलाकर खिलाना। खिलाना।

६. सनके फूल, महुआके फूल, पास और गुड़ जलमें उबालकर
 ७. ऊखकी गंदेरी या ऊखका रस निकाल लेनेपर बचा हुआ कूचा खिलाना।

८. तोसीकी खल और उबाला हुआ मटर खिलाना। 
९. किसारीकी दालके साथ गेहूँ उबालकर खिलाना।

१०. गुबार खूब पकाकर या रातभर जलमें भिगोकर खिलाना। 
११. गुड और काँजी मिलाकर खिलाना।

१२. घी, मैदा और गुड़ मिलाकर पकाकर खिलाना। इससे खूब दूध बढ़ता है। 
१३. बोजवाले केलेको चावलके साथ उबालकर खिलाना।

१४. पके या कच्चे बेलको उबालकर खिलाना।

१५. पलास और सेमलके फूल खिलाना।

१६. प्रसवके तीसरे दिन उड़दका दलिया आधा सेर, नमक एक सटीक, हल्दी आधी छटाँक और पीपलका चूर्ण एक छटाँक इन सब चीजोंको मिलाकर पानी में पका लेना चाहिये और फिर उसमें पावभर गुड़ मिलाकर कुछ गरम-गरम ही संध्याके समय गायको खिलाना चाहिये।
इससे दूध बहुत बढ़ता है। 
१७. गिलोयको पत्ती और उसको बेल खिलानेसे भी दूध बढ़ता है।

१८. जीरा १० भाग, नमक १० भाग, सौफ १० भाग, लौंग ५ भाग, सफेद चन्दन २ भाग, फिटकिरी

१ भाग और नाइट्रेट आफ पोटाशियम १ भाग-इन सब चीजोंकी कूटकर रखे और सुबह- शाम दोनों वक्त एक-एक मुट्ठी गायके दानेके साथ मिला दे तो खूब दूध बढ़ता है।

 १९. बाँसकी पत्ती आधी छटाँक उबालकर उसमें थोड़ी-सी अजवाइन और गुड़ मिलाकर खिलाने से दूध बढ़ता है।

२०. प्रसवके बाद दूध बंद होकर यदि धन कड़ा हो जाय तो रेड़ोंके पत्तोंसे सेक करना चाहिये।

२१. गायके दूध बढ़नेका सर्वोत्तम तरीका यह है कि गायको उसी साँसे बया जाय जिसको माँ बहुत ज्यादा दूध देनेवाली रही हो।

रविवार, 11 दिसंबर 2022

गाय का दूध आश्चर्यजनक क्यों है !!!

गाय का दूध आश्चर्यजनक क्यों है !!!

गाय का दूध अच्छा होता है यह तो सभी जानते है लेकिन गाय के दूध में ऐसा क्या है जो उसे इतना लाभदायक और आश्चर्यजनक बनाता है। आइये जानें इसके बारे में –

गाय के दूध के अलावा भैस का दूध , बकरी का दूध और ऊंट का दूध सबसे ज्यादा उपयोग में आने वाले दूध हैं ।  इनमे से गाय और भैंस का दूध सबसे ज्यादा काम में लिया जाता है। ( इसे पढ़ें : दूध कब कैसे और कितना पीना चाहिए )

गाय का दूध विलक्षण क्यों 

गाय का दूध आयुर्वेद के अनुसार

आयुर्वेद के अनुसार गाय का दूध पाचन के लिए इतना अनुकूल होता है कि उसे अमृत कहा जाता है। यहाँ तक कि नवजात शिशु को माँ का दूध उपलब्ध ना हो तो उसे गाय का दूध दिया जा सकता है।

आयुर्वेद में गाय के दूध को रसायन की संज्ञा दी गई है। रसायन उस दवा या खाद्य पदार्थ को कहते हैं जो शरीर के लिए समान रूप से लाभकारी होता है जैसे च्यवनप्राश एक रसायन है। आयुर्वेद की कई दवा बनाने में गाय के ही दूध का उपयोग होता है जैसे – क्षीरबला तेल , पञ्चगव्य घृत , अमृतप्राश घृत आदि।

गाय का दूध वात दोष तथा पित्त दोष को मिटाता है। वात दोष के कारण दिमाग और नर्वस सिस्टम की कार्य क्षमता प्रभावित हो सकती है। गाय का दूध सप्त धातु की पुष्टि करके ओजस्व यानि कांति को बढ़ाने वाला माना जाता है।

गाय के दूध से फायदे

गाय का दूध प्रोटीन , कैल्शियम , पोटेशियम , फास्फोरस और तथा विटामिन D से भरपूर होता है। इसके अलावा इसमें अन्य कई खनिज , विटामिन और एंटी ऑक्सीडेंट भी होते हैं। गाय के दूध में फैट तथा कैलोरी कम होते हैं।

गाय का दूध पीने वाले व्यक्ति की प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है और उसे पेट की गड़बड़ी होने की संभावना कम होती है। यह दिमाग , त्वचा , आँखें , ह्रदय और रक्त आदि के लिए टोनिक का काम करता है। गाय का दूध और गाय का घी दिमाग के लिए सर्वश्रेष्ठ टोनिक साबित हो सकते हैं।

गाय का दूध मेधा शक्ति तथा स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।  गाय का दूध नियमित पीने वाले बच्चे परीक्षा में अच्छी सफलता पाते हैं।

गाय का दूध देसी नस्ल या विदेशी नस्ल

यहाँ उल्लेखनीय है कि आयुर्वेद में गाय का मतलब देसी नस्ल की गाय से है ना कि विदेशी नस्ल की गाय से। देसी गाय यहाँ के वातावरण के अनुसार ढली हुई होती है इसलिए बीमार कम होती हैं और इनकी प्रतिरोधक क्षमता अधिक होती है। इसके अलावा देसी गाय की गाय दूध कम भले ही दे परन्तु इनके दूध में लाभदायक पोषक तत्व अधिक होते हैं।

इन दिनों गाय का दूध अधिकतर विदेशी नस्ल की गायों जैसे जर्सी या होल्स्टीन आदि का उपलब्ध होता है क्योंकि ये अधिक दूध देती हैं लेकिन अधिक उत्पादन के कारण दूध की गुणवत्ता प्रभावित होती है।

विदेशी गायों के लिए यहाँ का मौसम अनूकुल नहीं होता है। इसलिए यहाँ की जलवायु में बचा कर रखने के लिए उन्हें कई प्रकार के हार्मोन तथा एंटी बायोटिक के टीके आदि लगाने पड़ते हैं जिसका असर दूध पर पड़ता है।
 
वर्तमान में A1 तथा A2 वाले दूध पर भी बहस जारी है। जर्सी तथा होलिस्टिन जैसी विदेशी गाय के दूध में A1 अधिक पाया जाया है। जब A1 नामक यह प्रोटीन पेट में जाकर पचता है तो BCM 7 ( bitacalso morfin  7 ) नामक तत्व बनाता है। यह तत्व टाइप 1 डायबिटीज , कोरोनरी हार्ट डिजीज , धमनियों में खून जमना , साइजोफ्रेनिया , ऑटिज्म आदि बीमारियों का कारण बन सकता है।

देसी गाय के दूध में A2 नामक प्रोटीन अधिक होता है जो लाभदायक होता है इसके अतिरिक्त CLA कोंजुगेटेड लिओनिक एसिड तथा ओमेगा 3 फैटी एसिड जैसे लाभदायक तत्व पाए जाते हैं।

गाय का दूध विलक्षण क्यों ?

देसी गाय में गुजरात की गीर गाय , राजस्थान की थारपारकर तथा आंध्रप्रदेश की ओंगोल नस्ल विशेष रूप से उल्लेखनीय है। इनके अलावा कांकरेज तथा साहिवाल आदि भी अच्छी नस्ल की भारतीय गाय हैं। इन गायों के विकास  पर अब वैज्ञानिक अधिक ध्यान दे रहे हैं। इसमें सरकार भी पूरा सहयोग कर रही है।

गाय के दूध की आश्चर्यजनक विशेषता

गाय में लगभग तीस हजार जींस पाए जाते हैं जो कि ऐसे एंजाइम का निर्माण करते हैं जो साधारण घास को पचा कर विलक्षण दूध का निर्माण करते हैं। इस पाचन प्रक्रिया में गाय के पेट में स्थित आमाशय के चारों हिस्से मदद करते हैं।

इसके अलावा ताजा वैज्ञानिक शोध से पता चला है कि गाय के मस्तिष्क में क्लेथरिन नामक प्रोटीन पाया जाता है जो सूरज की किरणों से वर्तमान में बनाये जाने वाले सोलर सेल से 10 गुना अधिक ऊर्जा पैदा कर सकता है।

गाय का मष्तिष्क और उसका पेट ( Ryuman ) एक नाड़ी मंडल से जुड़ा होता है जिसे सूर्य नाड़ी मंडल कहते हैं। इस सूर्य नाड़ी मंडल से गाय के दूध में एक अलग ही प्रभाव उत्पन्न होता है तथा इसके कारण ही गाय के दूध में विटामिन D भी पाया जाता है।

इसके अलावा गाय के पेट में पाया जाने वाला रूमन फ्लूड माइक्रोब रिच फ्लूड होता है। वैज्ञानिकों ने इस फ्लूड को एक सेल के लिए कन्वेंशनल हाइड्रोजन बेस्ड फ्लूड की जगह उपयोग किया , तो पाया कि यह उससे आठ गुना अधिक शक्तिशाली होता है।

इस प्रकार गाय खुद अपने आप में एक विलक्षण और अनूठा प्राणी है तो गाय का दूध तो विलक्षण होगा ही। अतः संभव हो तो शुद्ध देसी गाय के दूध का सेवन करके प्रकृति की इस अनमोल उपहार का लाभ अवश्य लेना चाहिए।

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

गोपाष्टमी

"गोपाष्टमी"

          गोपाष्टमी, ब्रज में भारतीय संस्कृति का एक प्रमुख पर्व है। गायों की रक्षा करने के कारण भगवान श्री कृष्ण जी का अतिप्रिय नाम 'गोविन्द' पड़ा। कार्तिक शुक्ल पक्ष, प्रतिपदा से सप्तमी तक गो-गोप-गोपियों की रक्षा के लिए गोवर्धन पर्वत को धारण किया था। इसी समय से अष्टमी को गोपाष्टमी का पर्व मनाया जाने लगा, जो कि अब तक चला आ रहा है।
          हिन्दू संस्कृति में गाय का विशेष स्थान हैं। माँ का दर्जा दिया जाता हैं क्योंकि जैसे एक माँ का ह्रदय कोमल होता हैं, वैसा ही गाय माता का होता हैं। जैसे एक माँ अपने बच्चो को हर स्थिति में सुख देती हैं, वैसे ही गाय भी मनुष्य जाति को लाभ प्रदान करती हैं।
          गोपाष्टमी के शुभ अवसर पर गौशाला में गो-संवर्धन हेतु गौ पूजन का आयोजन किया जाता है। गौमाता पूजन कार्यक्रम में सभी लोग परिवार सहित उपस्थित होकर पूजा अर्चना करते हैं। गोपाष्टमी की पूजा विधि पूर्वक विद्वान पंडितो द्वारा संपन्न की जाती है। बाद में सभी प्रसाद वितरण किया जाता है। सभी लोग गौ माता का पूजन कर उसके वैज्ञानिक तथा आध्यात्मिक महत्व को समझ गौ-रक्षा व गौ-संवर्धन का संकल्प करते हैं।
          शास्त्रों में गोपाष्टमी पर्व पर गायों की विशेष पूजा करने का विधान निर्मित किया गया है। इसलिए कार्तिक माह की शुक्लपक्ष की अष्टमी तिथि को प्रात:काल गौओं को स्नान कराकर, उन्हें सुसज्जित करके गन्ध पुष्पादि से उनका पूजन करना चाहिए। इसके पश्चात यदि संभव हो तो गायों के साथ कुछ दूर तक चलना चाहिए कहते हैं ऐसा करने से प्रगति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। गायों को भोजन कराना चाहिए तथा उनकी चरण को मस्तक पर लगाना चाहिए। ऐसा करने से सौभाग्य की वृद्धि होती है।
          एक पौराणिक कथा अनुसार बालक कृष्ण जी ने माँ यशोदा से गायों की सेवा करनी की इच्छा व्यक्त की कृष्ण कहते हैं कि माँ मुझे गाय चराने की अनुमति मिलनी चाहिए। उनके कहने पर शांडिल्य ऋषि द्वारा अच्छा समय देखकर उन्हें भी गाय चराने ले जाने दिया जो समय निकाला गया, वह गोपाष्टमी का शुभ दिन था। बालक कृष्ण ने गायों की पूजा करते हैं, प्रदक्षिणा करते हुए साष्टांग प्रणाम करते हैं।
         इस दिन गाय की पूजा की जाती हैं। सुबह जल्दी उठकर स्नान करके गाय के चरण-स्पर्श किये जाते हैं। सुबह  गाय और उसके बछड़े को नहलाकर तैयार किया जाता है। उसका श्रृंगार किया जाता हैं, पैरों में घुंघरू बांधे जाते हैं, अन्य आभूषण पहनायें जाते हैं। गो-माता की परिक्रमा भी की जाती हैं। सुबह गायों की परिक्रमा कर उन्हें चराने बाहर ले जाते हैं। गौ माता के अंगो में मेहँदी, रोली, हल्दी आदि के थापे लगाये जाते हैं। गायों को सजाया जाता है, प्रातःकाल ही धूप, दीप, पुष्प, अक्षत, रोली, गुड, जलेबी, वस्त्र और जल से गौ-माता की पूजा की जाती है, और आरती उतारी जाती है। पूजन के बाद गौ ग्रास निकाला जाता है, गौ-माता की परिक्रमा की जाती है, परिक्रमा के बाद गौओं के साथ कुछ दूर तक चला जाता है। कहते हैं ऎसा करने से प्रगति के मार्ग प्रशस्त होते हैं। इस दिन ग्वालों को भी दान दिया जाता है। कई लोग इन्हें नये कपड़े दे कर तिलक लगाते हैं। शाम को जब गाय घर लौटती है, तब फिर उनकी पूजा की जाती है, उन्हें अच्छा भोजन दिया जाता है।

                                "विशेष"

1. इस दिन गाय को हरा चारा खिलाएँ।
2. जिनके घरों में गाय नहीं है वे लोग गौशाला जाकर गाय की पूजा करें।
3. गंगा जल, फूल चढाये, दिया जलाकर गुड़ खिलाये।
4. गाय को तिलक लगायें, भजन करें, गोपाल (कृष्ण) की पूजा भी करें, कुछ लोग गौशाला में खाना और अन्य समान का दान भी करते हैं।

                       "जय जय श्री राधे"


सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

गोपाअष्टमी क्यों मनाई जाती है......?

जय हो गायों के गोपाल की.....
गोपअष्टमी क्यों मनाई जाती है......??????
आज ही के दिन भगवान श्री कृष्ण ने और उनके सखा गोप बालको ने पहली बार गौ माता को प्रातः उठकर चराना आरंभ किया था .... .....उनकी इस लीला के प्रथम दिवस को गोपष्टमी के रुप में मनाया जाता है........
शायद ही सभी को पता हो भगवान श्री कृष्ण जब तक ब्रज में रहे उन्होने कभी भी अपने चरणों मे पादुका अर्थात चप्पल नही धारण की........ पता है क्यों ????? ???? क्योकी ......
जब गौ को चराने के लिये ले जाते समय मैया यशोदा जी अपने नन्हे से लाला के चरणों में पादुका धारण करवाने लगी तो प्यारे से श्याम सुंदर ने मैया से कहा- " मैया मै अपनी गौ माता से बहोत प्रेम करता हुँ और मैया जब वो चप्पल नहीं धारण करती है तो मैं पादुका कैसे धारण कर लु...." मैया ने प्यारे लाला को बहोत समझना ने का प्रयास किया.... पंरतु प्यारे श्यामसुंदर अपनी ही बात से तनीक भी न हिले उन्होने ब्रज में कभी भी पादुका धारण नही की.... उनके गौ प्रेम के कारण ही उनका एक नाम गोपाल पडा.......
जय हो गायों के गोपाल की जय हो