गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ
गुरुवार, 28 अगस्त 2014
गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनाएँ
स्वप्र में गौ दर्शन का फल
स्वप्र में गौ दर्शन का फल
स्वप्र में गौ अथवा सांड के दर्शन से कल्याण-लाभ एवं व्याधि-नाश होता है इसी प्रकार स्वप्र में गौ के थन को चूसना भी श्रेष्ठ माना गया हैस्वप्र में गौ का घर में ब्याना,बैल अथवा सांड की सवारी करना, तालाब के बीच में घृत-मिश्रित खीर का भोजन भीं उत्तम माना गया है
इनमें से घी सहित खीर का भोजन तो राज्य-प्राप्ति का सूचक माना गया है इसी प्रकार स्वप्र में ताजे दुहे हुए फेन सहित दुग्ध का पान करने वाले को अनेक भोगों की तथा दही के देखने से प्रसन्नता की प्राप्ति होती है
जो बैल अथवा सांड से युक्त रथ पर स्वप्र में अकेला सवार होता है और उसी अवस्था में जाग जाता है, उसे शीघ्र धन मिलता है
स्वप्र में दही मिलने से धन की, घी मिलने से यश की और और दही खाने से यश की प्राप्ति निश्चित है
इसी प्रकार यात्रा आरम्भ करते समय दही और दूध का दीखना शुभ माना जाता है
स्वप्र में सभी काली वस्तुओं का दर्शन निन्ध माना गया है, केवल कृष्णा गो का ही दर्शन शुभ होता है
गौ के प्रति हमारा कर्तव्य
गौ के प्रति हमारा कर्तव्य
देव की कैसी विचित्र गति है कि जिस देश का तीन-चौथाई जन समाज गौ को माता कहकर पूजता है, वहां तो गोवंश का दिन-प्रतिदिन ह्रास हो और जहाँ लोग गो का मांस खाते हैं, वहां वह फले फूले, यह बात बहुत प्रसिद्ध है कि इंग्लैंड, हॉलैंड तथा जर्मनी जैसे देशों में गोएं हिन्दुस्तान की गायों की अपेक्षा औसत हिसाब से तिगुना-चौगुना दूध देती हैंहिन्दुओं के पतन के साथ गौ के भी बुरे आये गौ के लिए जो प्रगाढ़ आदर और स्नेह हिन्दुओं का अपना विशेष गुण था,वह नष्टप्राय हो गया
हम हिन्दुओं के पूर्व पुरुषों का गौ के प्रति कैसा भाव था यह महाराजा दिलीप और उनकी महारानी की प्रगाढ़ गोभक्ति तथा आदर और प्रेमयुक्त सेवा देखने से पता लगता है, पर जो आदर्श हमारे लिए पूर्वपुरुष हमारे सामने रख गए, उसका हमने क्या आदर किया
अगर इस प्रश्न पर हमविचार से सोचकर अमल करें तो शायद ही गौ माता की रक्षा हो पायेगी अन्यथा वही =ढाक के तीन पात=
बैलों को कब और कैसे हांकें
बैलों को कब और कैसे हांकें
गाड़ी में जुते हुए बैलों को हुंकार की आवाज से या पत्ते वाली पेड़ की डाली से हांके, डंडे,छड़ी या रस्सी से मारकर न हांकेंभूख प्यास और परिश्रम से घबड़ाये हुए बैलों को गाड़ी में न जोतें
जिनकी इन्द्रियां विकल हो रही हों या जो आँख इत्यादि से हीन हों उनको भी न जोते
जब तक भूखे प्यासे बैलों को पूरा खिला-पिला ना दिया जाये तब तक मालिक आप न खाए
दुपहर में बैलों को आराम देना चाहिए
संध्या के समय अपनी रूचि के अनुसार यथावश्यक उनसे काम लें
जो विश्राम के समय बैलों को जोतता है उसे भ्रूण हत्या जैसा पाप लगता है
जो मनुष्य मूर्खता से बैलों के शरीर से खून निकाल देता है वह पापी इस पाप के फलस्वरूप निस्चय ही नरक में जाता है और वहां क्रम से १००-१०० वर्ष तक एक-एक नरक में रहकर फिर इस मनुष्य लोक में बैल का जन्म पाता है
मुख्य बात यह है कि गौ की दुर्दशा के लिए हम हिन्दू स्वयं ही जिम्मेदार हैं
मुख्य बात यह है कि गौ की दुर्दशा के लिए हम हिन्दू स्वयं ही जिम्मेदार हैं
इस समय हम लोगों की जो दुर्दशा हो रही है, वह इसी पाप का प्रायश्चित हो रहा है जगत का सारा व्यवहार इसी नियम पर चलता है कि जहाँ जिस चीज की मांग होगी, वहीँ उसकी पूर्ति भी होगी, हम लोग भैंस का दूध अधिक पसंद करते हैं और यह नहीं जानते कि भैंस गौ का काल हैगांधी जी चिल्ला - चिल्ला के लोगों से यह कह चुके हैं कि केवल गौ के दूध का सेवन करो
यदि हम लोग हिन्दू होकर गौ का इतना आदर और उसके लिए इतना त्याग न कर सकें कि अधिक दाम देकर भी गौ का दूध ही लें और भैंस के दूध के स्वाद की इच्छा न करें तो हम लोग गौ को गोमाता कहकर पूजने के अधिकारी नहीं हैं, इसमें स्वाद की इच्छा का त्याग भी नहीं है
वैज्ञानिक रीति से यह बात साबित हो चुकी है कि गाय का दूध भैंस से कहीं ज्यादा उत्तम है
जब तक कोई चीज कीमती नहीं होती तब तक उसकी बर्बादी नहीं रोकी जा सकती है
गोओं को हम बचा सकते हैं, यदि हम गाय के ही दूध का सेवन और गाय के दूध से बने पदार्थों का सेवन करें तो अवश्य ही गाय माता की रक्षा होगी
जय गऊ माता की
गोओं के दान की प्रथा
गोओं के दान की प्रथा
गायों के दान की प्रथा वैदिक समय से चली आ रही है
वैदिक कल में गाय का दान करने से कोई नहीं रोक सकता था, दान का समय आने पर धनिकों को आनन्द होता था
राजा गौ का दान करता है; इन्द्र,अग्नि,सो म,विश्वेदेव,भूम ि आदि देवता भी गोओं का दान करते हैं इसलिए मनुष्य को भी उचित है कि वह भी गोओं का दान करे
रोगी के उपयोग के लिए भी गाय के दान की प्रथा थी जिससे वह गाय का दूध पीकर रोग मुक्त हो जाये
वैदिक काल में आशीर्वाद के रूप में भी 'तुझे उत्तम गौ प्राप्त हो' यह कहने की प्रथा थी, दान में उत्तम दुधारू तरुण गौ के ही देने का विधान है
दाता को चाहिए कि वह दान में दी गयी गौ के चरने के लिए गोचरभूमि का भी प्रबंध करे
राजा लोग गोओं पर कर भी इसलिए देते थे कि जिससे वे अपने राष्ट्र में गोधन की अभिवृद्धि कर सकें
गोओं के साथ उत्तम बछड़ों के दान का भी विधान पाया जाता है
जिस देश में हजारों की संख्या में गोओं के दान का उल्लेख मिलता हो, उस देश में गो धन की कितनी प्रचुरता थी इसका अनुमान सहज में ही लगाया जा सकता है
गायों के दान की प्रथा वैदिक समय से चली आ रही है
वैदिक कल में गाय का दान करने से कोई नहीं रोक सकता था, दान का समय आने पर धनिकों को आनन्द होता था
राजा गौ का दान करता है; इन्द्र,अग्नि,सो
रोगी के उपयोग के लिए भी गाय के दान की प्रथा थी जिससे वह गाय का दूध पीकर रोग मुक्त हो जाये
वैदिक काल में आशीर्वाद के रूप में भी 'तुझे उत्तम गौ प्राप्त हो' यह कहने की प्रथा थी, दान में उत्तम दुधारू तरुण गौ के ही देने का विधान है
दाता को चाहिए कि वह दान में दी गयी गौ के चरने के लिए गोचरभूमि का भी प्रबंध करे
राजा लोग गोओं पर कर भी इसलिए देते थे कि जिससे वे अपने राष्ट्र में गोधन की अभिवृद्धि कर सकें
गोओं के साथ उत्तम बछड़ों के दान का भी विधान पाया जाता है
जिस देश में हजारों की संख्या में गोओं के दान का उल्लेख मिलता हो, उस देश में गो धन की कितनी प्रचुरता थी इसका अनुमान सहज में ही लगाया जा सकता है
गो-मन्त्र जाप से पापनाश [हिन्दीउच्चारण]
गो-मन्त्र जाप से पापनाश [हिन्दीउच्चारण] गाय घृत और दूध देने वाली हैं घृत की उत्पत्ति स्थान, घृत को प्रकट करने वाली घृत की नदी और घृत की भँवर रूप हैं।
वे सदा मेरे घर में निवास करें घृत सदा मेरे हृदय में रहे और मेरी नाभि में रहे तथा मेरे सारे अंगों में रहे और मेरे मन में स्थित रहें
गाय सदा मेरे आगे रहें, गाय सदा मेरे पीछे रहें गाय मेरे चारों ओर रहें तथा मैं गायों के बीच में निवास करूँ ।
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सांयकाल आचमन करके उपर्युक्त मन्त्र का जप है, उसके दिनभर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
वे सदा मेरे घर में निवास करें घृत सदा मेरे हृदय में रहे और मेरी नाभि में रहे तथा मेरे सारे अंगों में रहे और मेरे मन में स्थित रहें
गाय सदा मेरे आगे रहें, गाय सदा मेरे पीछे रहें गाय मेरे चारों ओर रहें तथा मैं गायों के बीच में निवास करूँ ।
जो मनुष्य प्रतिदिन प्रातःकाल और सांयकाल आचमन करके उपर्युक्त मन्त्र का जप है, उसके दिनभर के पाप नष्ट हो जाते हैं।
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