गुरुवार, 13 जुलाई 2017

गौओं के दान की प्रथा

गौओं के दान की प्रथा

गायों के दान की प्रथा वैदिक समय से चली आ रही है। वैदिक काल में गाय का दान करने वाले को सम्मान की दृष्टि से देखा जाता था। दान का अवसर पाकर धनिक लोगों को आनन्द होता था। ‘मैं गाय का दान करूँगा’- इस प्रकार बोलना ही शिष्ट पुरुषों की परिपाटी थी। ‘मैं गाय का दान नहीं करूँगा’- इस प्रकार कोई नहीं बोलता था। गाय का दान करने वाले को रोकना बड़ा भारी पाप समझा जाता था।
राजा तथा देवता गौ का दान करते थे। घर पर आए हुए अतिथि को गौ का दूध पीने के लिए अवश्य दिया जाता था। यज्ञ आदि के अवसरों पर ब्राह्मणों को दक्षिणा के रूप में गौएँ दी जाती थीं। रोगी के उपयोग हेतु, जिससे उसका उपचार हो सके, गाय दान में दी जाती थी, ताकि वह गाय का दूध पीकर रोगमुक्त हो सके।
वैदिक काल में आशीर्वाद के रूप में भी ‘तुझे उत्तम गौ प्राप्त हो’, यह कहने की परम्परा थी। दान में उत्तम, दुधारू व तघ गौ के ही देने की विधान है। दाता को चाहिए कि वह तरूण गाय को बछड़े सहित दान दे। धनवान पुरुष का मापदण्ड उसके पास होने वाली गायों की संख्या थी। गायों की संख्या के अनुसार, गाय-पालकों को उपाधि दी जाती थी। वैदिक काल में गोधन को श्रेष्ठ धन माना गया था।
वैदिक काल में किसी भी प्रकार से गाय को कष्ट पहुँचाना, महापाप समझा जाता था। गायों की रक्षा के अनेक उदाहरण शास्त्रों में हैं। गाय का मान माँ से भी ऊँचा माना जाता था। सभी पुरुष गायों का आशीर्वाद प्राप्त करने की होड़ में लगे रहते थे। वास्तव में, गाय उनके जीवन का अभिन्न अंग होती थी। गाय के बिना जीवन की कल्पना भी नहीं की जाती थी। वैदिक काल में गाय जीवन का आधार थी।





साँड का गोधन वृद्धि में महत्व

साँड का गोधन वृद्धि में महत्व

हिन्दुस्थान की वर्तमान दयनीय स्थिति में तभी सुधार हो सकता है, जब गोधन का अपव्यय रोका जाए। गोधन का विकास साँड के विकास पर निर्भर है। गाय की अपेक्षा साँड का महत्व सौ गुणा है- ऐसा गोविज्ञान-विशारद एक स्वर से कह रहे हैं।
धर्मग्रंथों में साँड का दान सौ गाय के दान के समान श्रेष्ठ और उद्धार करने वाला बतलाया गया है। आज प्रश्न केवल गाय की रक्षा का ही नहीं, बल्कि गाय के उद्धार व सेवा का है। गली-गली भटकने वाले, भूखे और निर्बल साँडों से काम लेने के कारण ही आज गायों का ह्रास हो रहा है और बैल निर्बल पैदा हो रहे हैं। बलवान, वीर्यवान और बढि़या साँड बढ़ें, तभी हिन्दुस्थान का विकास हो सकता है। अमेरिका, जापान आदि उन्नत देशों में लाखों की कीमत के साँड पशु सृष्टि में युग परिवर्तन कर रहे हैं।
बढि़या साँड पर किया गया खर्च और मेहनत कई गुणा होकर बाहर आती है। वास्तव में, किसी भी कृषि प्रधान देश में साँड ही सच्चा धन है। इसलिए हमारे देश में गोधन की बढ़ोतरी के लिए गाँव-गाँव नन्दी का दान करने की सुन्दर प्रथा चली आ रही है।
कहने को तो हमारे देश में साँडों की कोई कमी नहीं है, किंतु उनमें ऐसे साँड बहुत थोड़े हैं, जिन्हें हम वास्तविक साँड कह सकें। उनमें से अधिकांश नपुंसक व भटकू हैं। एक सर्वोत्तम साँड 50 गायों का यूथपति हो सकता है, तो उसको न्यायोचित खान-पान भी मिलना चाहिए, परन्तु उसे मुश्किल से एक सामान्य जीव जितना खाना भी नहीं मिलता।
इस समय युगधर्म पुकार रहा है कि गाय का दान ना करके बढि़या-से-बढि़या साँड का दान करना चाहिए, जिससे उत्तम गोधन प्राप्त हो सके। जिससे गायों में अधिक दूध देने की शक्ति, स्नेह और लावण्य उत्पन्न होगा। संक्षेप में, साँड का विकास- राष्ट्र का विकास है।

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी (3)

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी

गो-रक्षा हिन्दू धर्म का एक प्रधान कार्य है। प्रायः प्रत्येक हिन्दू गौ को माता कहकर पुकारता है और माता के समान ही उसका आदर करता है। जिस प्रकार कोई भी पुत्र अपनी माता के प्रति किए गए अत्याचार को सहन नहीं करेगा, उसी प्रकार एक आस्तिक और सच्चा हिन्दू गोमाता के प्रति निर्दयता के व्यवहार को नहीं सहेगा। आज हिन्दू आपसी फूट एवं कलह के कारण छिन्न-भिन्न हो रहे हैं तथा अपनी जीवनी-शक्ति खो बैठे हैं। मूक पशुओं की भांति दूसरों के द्वारा हाँके जा रहे हैं। सबसे ज्यादा दुर्भाग्य की बात तो यह है कि आज हम सभी बातों पर पाश्चात्य दृष्टिकोण से ही विचार करने लगे हैं। यही कारण है कि हमारी इस पवित्र भूमि पर प्रतिवर्ष लाखों-करोड़ों की संख्या में गाय व बैल काटे जा रहे हैं और हम इसके विरोध में आवाज भी नहीं उठाते। रात-दिन गौ काटी जा रही हैं, सब कुछ चुपचाप देखना, यह नपुंसकता नहीं तो और क्या है?
गौ के लिए हमारी आदर बुद्धि केवल कहने भर के लिए रह गई है। दूसरे देशों में क्षेत्रफल के हिसाब से गौओं की संख्या भारत की अपेक्षा कहीं अधिक है और प्रति मनुष्य दूध की खपत भी अधिक है। वहाँ की गौएँ हमारी गौओं की अपेक्षा दूध भी अधिक देती हैं। इस प्रकार हम देखते हैं कि यद्यपि हम अपने को गो-पूजक और गोरक्षक कहते हैं, वस्तुतः आज हम गोरक्षा में बहुत पिछड़े हुए हैं। गो-जाति के प्रति हमारे इस अनादर एवं उपेक्षा का परिणाम भी प्रत्यक्ष ही है। अन्य देशों की अपेक्षा हम भारतीयों की आयु बहुत ही कम है और हमारे यहाँ के बच्चे बहुत अधिक संख्या में मरते हैं। वास्तव में, दूध और दूध से बने हुए पदार्थों की कमी ही हमारी शोचनीय अवस्था का मुख्य कारण है।
हमारे शास्त्र कहते हैं कि गाय से अर्थ, धर्म, काम और मोक्ष- चारों पुरूषार्थों की सिद्धि होती है। दूसरे शब्दों में, धार्मिक, आर्थिक, सांसारिक और आध्यात्मिक - सभी दृष्टियों से गाय हमारे लिए अत्यन्त उपयोगी है। अतः गाय की रक्षा करें, गाय के दुग्ध व इससे बने पदार्थों का सेवन करें। इससे हर व्यक्ति स्वस्थ होगा और देश का स्वास्थ्य अच्छा होगा और देश वास्तव में सही उन्नति करेगा।



गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी (2)

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी

वेदों में गाय को माता एवं पूजनीय कहा गया है। यह आदर उन विशेषताओं पर आधारित है जो भगवान ने एकमात्र इस जीव को प्रदान की हैं। गायों से भगवत् प्राप्ति होती है।
गव्य पदार्थों को ही धार्मिक अनुष्ठानों और आयुर्वेदिक उपचारों में स्वीकृत किया गया है। हमारा कोई धार्मिक कृत्य गोपूजन, गोदान और पंच-गव्य के बिना सम्पन्न नहीं हो सकता। गव्य पदार्थों- दुग्ध, दही, घी, मूत्र, गोबर- में रोगों के कीटाणुओं को दूर करने की अद्भुत शक्ति है। गाय का पंच गव्य एक महान औषधि है।
गाय का दूध अनेक असाध्य रोगों की अचूक औषधि है। गाय का दूध दुर्बलता और मोटापे को दूर करता है। गोदुग्ध बलिष्ठ बनाता है और टी.बी. बीमारी के कीटाणुओं को दूर करने की शक्ति रखता है। इसका ‘सेरीब्रोसाइड्स’ तत्व बौद्धिक क्षमता बढ़ाता है।
शिशु को अपनी माता के दूध न मिलने पर, गोदुग्ध ही उसका सर्वश्रेष्ठ विकल्प है। जले-कटे घाव, फोड़े-फुंसी, दाद-खाज के लिए गाय का घी चुपड़ना एक घरेलू उपचार माना जाता रहा है। यज्ञादि में गौ-घृत का प्रयोग उत्तम माना गया है। इससे प्रदूषण नष्ट करने में सहायता मिलती है।
आयुर्वेद का कथन है, ‘रात्रि को शयन से पूर्व गोदुग्ध, प्रातः काल उठकर जल और भोजन के बाद छाछ (मट्ठा) पीने से जीवन में डाॅक्टर की आवश्यकता नहीं पड़ती।

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी (1)

गौ सुखी तो राष्ट्र सुखी


निर्विवादित रूप से गाय को हिन्दू धर्म में विशिष्ट स्थान प्राप्त है। गोमाता मातृशक्ति की साक्षात् प्रतिमा है। विश्व मानव के स्वास्थ्य और धन की उन्नति तथा सम्पन्नता के लिए गोपालन व गोधन की सुरक्षा ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है। हमारे शास्त्रों, पुराणों व उपनिषदों ने गो की अपार महिमा गाई है। वेदव्यास जी के अनुसार गायों से सात्त्विक वातावरण का निर्माण होता है। गायों की प्रत्येक वस्तु पावन है और वह संसार के समस्त पदार्थों को पावन कर देती है। गाय का गोबर तथा गोमूत्र शरीर से मल, प्रकुपित दोष तथा दूषित पदार्थों को निकालकर शरीर को शुद्ध व स्वस्थ बना देते हैं। गाय के दूध, घी और गोबर से लेकर मूत्र तक में औषधीय गुण होते हैं।
‘विष्णुधर्मोत्तर पुराण’ के अनुसार गाय के गोबर से लीपा गया स्थान सभी प्रकार से पवित्र हो जाता है। गोबर पृथ्वी का सबसे बड़ा पोषक, दुर्गंधनाशक, कीटनाशक, जीवाणुनाशक व रोगनाशक है। गाय के गोबर में रेडियोएक्टिवत को कम करने का सामथ्र्य होता है। भोपाल गैस त्रासदी के समय भी एक परिवार सुरक्षित बच गया था जो दुर्घटना स्थल से बेहद करीब था। बाद में पता चला कि इस परिवार ने एक दिन पहले ही अपने घर को गाय के गोबर से लीपा था। गो दुग्ध और घी अमृत के तुल्य हैं। गाय एकमात्र पशु है जो सांस लेते समय 5% आॅक्सीजन अपने पास रखती है और 95% प्रकृति को लौटा देती है।


गौ - आस्था का प्रतीक

गौ - आस्था का प्रतीक

गोवंश का सम्बन्ध किसी भी धर्म से जोड़ना गलत है। गाय सबकी है और सबके लिए है। इस्लाम में कहीं इस बात का उल्लेख नहीं है कि मुसलमानों को गोमाँस खाना जरूरी है। कुरान-मशीद में कहा गया है कि गौ का दूध अमृत है, जबकि गौ का माँस बेशुमार बीमारियों का जन्मदाता है। मुसलमानों के अनेक धार्मिक संस्थानों द्वारा भी अनेक बार देश के मुसलमानों को यह निर्देश दिया जा चुका है कि वह ईद के अवसर पर गोवंश की कुर्बानी न दें। दुर्भाग्य यह है कि जिन राज्यों में गोवंश की हत्या निषेध है, वहाँ भी कानून में अनेक त्रुटियों का लाभ उठाकर माँस के व्यापारी अपना उल्लू सीधा कर रहे हैं। रक्षक ही भक्षक बने हुए हैं, सर्वत्र भ्रष्टाचार व्याप्त है।
1995 में महाराष्ट्र सरकार ने दोनों सदनों से सर्वसम्मति से पूर्ण गोहत्या निषेध कानून को पारित कर राष्ट्रपति की स्वीकृति के लिए भेज दिया था, दुर्भाग्यवश यह बिल 19 वर्ष तक यूँ ही लटका रहा। वर्तमान देवेन्द्र फडनवीस सरकार ने इस शुभ कार्य को आगे बढ़ाया और राष्ट्रपति जी ने भी मोहर लगाने में देर नहीं की। भारत के राष्ट्रपति और महाराष्ट्र की सरकार इसके लिए बधाई के पात्र हैं।
एक बात समझ नहीं आती, जब देश का बहुसंख्यक गाय के प्रति इतनी आस्था रखता है तो क्यों नहीं शेष भारतवासी भी गाय को सम्मान दें। ऐसा करने से आपसी भाईचारे और धार्मिक सौहार्द में भी वृद्धि होगी।


गोरक्षा अत्यन्त आवश्यक है

गोरक्षा अत्यन्त आवश्यक है

समस्त ग्रामीण बंधु तथा शहरों में रहने वाले वे व्यक्ति जो अपने घर पर गो-पालन की व्यवस्था कर सकते हैं, उन्हें अवश्य गो-पालन करना चाहिये, ताकि पौष्टिक आहार के साथ गोबर, गोमूत्र के रूप में खाद, कीटनाशक औषधि एवं ऊर्जा प्राप्त हो सके तथा गौ के सहज वात्सल्य एवं गो-सेवा के पुण्य से जीवन सार्थक हो सके। अन्य व्यक्तियों को भी निकटवर्ती गोशालाओं में जाकर समय-समय पर गो-सेवा करनी चाहिये। सभी को गो-वंश की तस्करी रोकने तथा गो-वध रोकने का पूर्ण प्रयास करना चाहिये।
गोवंश की स्वदेशी प्रजातियों का संरक्षण एवं विकास आज के सामाजिक तथा आर्थिक परिदृश्य में एक ऐसी अपरिहार्यता है, जिससे इनकी उपादेयता के प्रसार के साथ किसानों की उन्नति एवं स्वरोजगार के नये अवसर सृजित होंगे। विश्व मानव के स्वास्थ्य और धन की उन्नति तथा सम्पन्नता के लिये गोपालन व गोधन की सुरक्षा ही सर्वश्रेष्ठ उपाय है।
परमपूज्य ब्रह्मर्षि श्रीदेवरहा बाबा के अमृत वचन- ‘गाय के पृष्ठभाग में ब्रह्माजी का, गले में विष्णु भगवान का, मुख में शिवजी का और रोम-रोम में ऋषि-महर्षि, देवताओं का वास है तथा आठ ऐश्वर्यों को लेकर लक्ष्मी माता गाय के गोबर में बसती हैं। गाय की बहुत बड़ी महिमा है। जहाँ गाय के चरण पड़ते हैं, वहाँ देवताओं का वास रहता है। भारत की गरीबी दूर करने के लिये, भारत को समृद्धिशाली बनाने के लिये गोरक्षा अत्यन्त आवश्यक है। हिन्दू, मुसलमान, ईसाई, पारसी, यहूदी, अंग्रेज- कोई भी हों, यानि सबको गोरक्षा में तत्पर हो जाना चाहिये।’