मंगलवार, 16 फ़रवरी 2021

श्री आनंदवन परिसर, गोधाम पथमेड़ा के गौसेवा सदन(गोष्ठ) के आवश्यक तत्व :

श्री आनंद वन परिसर, गोधाम पथमेड़ा के गौसेवा सदन(गोष्ठ) के आवश्यक तत्व :- 
1. गोष्ठ की साइज - 3 से 4 बीघा।
2. गोष्ठ में गोवंश की संख्या - 100 से 125
3. गोवंश का वर्गीकरण - प्रत्येक गोष्ठ में एक ही प्रकार का, एक ही उम्र का गोवंश रखा जाता है। नर व मादा गोवंश अलग अलग, बीमार, विकलांग, सूरदास, कमजोर, बूढ़ा, वत्स, गर्भवती, दूधारू, 1 वर्ष से कम, 1 से 2 वर्ष का, 2 वर्ष से 3 वर्ष का आदि आदि कई प्रकार से वर्गीकृत करके जगोवंश को अलग अलग गोष्ठ में रखा जाता है।
4 . गोष्ठ की दीवार - प्रत्येक गोष्ठ को पक्की दीवार या लोहे की जाली लगी हुई है। 
5. मुख्य गोष्ठ के अंदर छोटा गोष्ठ - प्रत्येक गोष्ठ के अंदर एक कोने में एक छोटा गोष्ठ होता है। जब चारा, दा ला या पोष्टिक आहार आदि देना होता है या सफाई करनी हो तो सभी गोवंश को उस छोटे गोष्ठ में भेजकर गेट बंद कर देते हैं। फिर कार्य पूर्ण होने पर सबको बड़े गोष्ठ में आने दिया जाता है।
6. गोष्ठ का प्रवेश द्वार - प्रत्येक गोष्ठ के एक बड़ा दरवाजा लगा होता है जिसमें बैलगाड़ी, ट्रैक्टर, बड़ी गाड़ी अंदर अा सके। ग्वालों व अन्य लोगों के आने जाने के लिए बड़े द्वार में एक छोटा दरवाजा लगा रहता है।
7. ग्वाला - प्रत्येक गोष्ठ में आवश्यकतानुसार कम से कम एक ग्वाला परिवार होता है। दूधारू या बीमार गोवंश में अधिक भी ग्वाल होते हैं। 10 से 12 ग्वालों के ऊपर एक व्यवस्थापक होता है।
8. चारा की व्यवस्था करना - गोवंश को चारा देने हेतु बैलगाड़ी की व्यवस्था होती है। प्रत्येक गोष्ठ में एक बैलगाड़ी बेलों की जोड़ी सहित होती है। चारा परोसने के लिए लंबी नाद होती है या वृत्ताकार फर्में होते हैं। जिनकी प्रतिदिन नियमित सफाई होती है।
9. पानी की व्यवस्था - प्रत्येक गोष्ठ में एक होद या फर्मा पानी के लिए होता है जिसमें बड़े टैंक से पाइप द्वारा कनेक्शन किया होता है। 24 घंटे अनवरत पानी सप्लाई चालू रहती है। प्रत्येक पानी के होद में सप्ताह में एक बार चूने की पुताई की जाती है। जिससे जल एकदम स्वच्छ रहता है।
10. सेंधा नमक - प्रत्येक गोष्ठ में गोवंश के सेवन हेतु प्रर्याप्त मात्रा में सेंधा नमक रखा जाता है। गोमाता प्रेम से नमक चाटती रहती है जिससे पोषक लवणीय तत्वों की पूर्ति होती है।
11. सर्दी, गर्मी, बरसात से बचाव - हरेक गोष्ठ में कई छायादार जाल के वृक्ष हैं तथा एक बड़ा शेड बना होता है।
12. गोबर धन - प्रत्येक गोष्ठ में नियमित रूप से दिन में कई बार गोमय लिया जाकर एक बड़ी ढेरी बनाई जाती है। इसे बाद में सेंद्रिय खाद बनाने में काम लेते हैं या सीधा गोबर खाद के रूप में बेचा जाता है।

रविवार, 7 फ़रवरी 2021

पशुशाला और गौशाला में भेद


।।पशुशाला और गौशाला में भेद।।

भगवान् शिव ने लक्षणा-शब्द शक्ति के रूप में गौशाला की परिभाषा को परिभाषित करते हुए कहते हैं:-

स्वगां भोजित्वा तु  यत्फलं  लभेत  नर:।
द्विगुणं तस्य लभते परगां भोजयेद् यदि।
गुरोर्गां भोजयित्वा तु चतुर्गुणफलं लभेत्।। 
               संदर्भ:-श्री गौ तंत्र २.१४-१५

भावार्थ:- स्वयं की गौ की सेवा करने से उसके ग्रास देने से जो पुण्य प्राप्त होता हैं, उससे दुगुना पुण्य दूसरे द्वारा छोड़ी हुई गौ की सेवा करने से होता है। अगर गुरु द्वारा स्थापित गौशाला में गौओं की सेवा की जाए तो उसका चारगुणा ज्यादा पुण्य प्राप्त होता हैं। ऐसा क्यों? क्योंकि गुरु द्वारा संचालित गौशाला में जो गौएं हैं उनकी महिमा का नित गान होता हैं, वे सब गौएं सबला हैं, प्रसन्न रहती हैं, वहां आने वाले भक्त गौ महिमा से परिचित होते हैं और वहां गाय पशु नहीं 'माता' कहलाती हैं इसलिए चारगुणा अधिक पुण्य है। जबकि अन्य जगह पे जो गौएं घूम रही हैं,उनको घर में लाकर पूजने से अधिक पुण्य है। अर्थात् जहां गौ महिमा नहीं हैं यदि गोग्रास देने वाला गौ महिमा से परिचित नहीं हैं तो गौ भी अवला रूप में रहती है और सेवा का उतना ही पुण्य प्राप्त होता हैं जितना किसी पशु पर दया करने का पुण्य है।
ॐ जगदम्बायै च विद्महे पशुरूपायै धीमहि सा नो धेनु: प्रचोदयात्।।
गाय पशु रूप में होते हुए भी जगदम्बा हैं और यह देवी हमें मोक्ष की राह पर ले जाएगी किन्तु यह तभी सम्भव है जब सेवक स्वयं को गोपुत्र मानकर और गौ को माता मानकर सेवा करें और गौ महिमा से परिचित हो!
                           ।।मां।।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2021

माँ की ममता

माँ की ममता

इस हिन्दोस्तां के माटी की महिमा अपरम्पार है
गौ गंगा गीता से निर्मित इसका श्यामल सार है
परम पूज्य व पाप हारिणी गौ गंगा और गीता हैं
तरण तारिणी मोक्ष दायिनी तीनो परम पुनीता हैं
रोम रोम में देव रमे हों ऐसी पवित्र गौ माता है
चार धाम का पुण्य भी गौ सेवा से मिल जाता है
जो जन इसकी सेवा करते भव सागर तर जाते हैं
वेद पुराण उपनिषद भी इसकी महिमा बतलाते हैं
सकल पदारथ दूध दही घी औषधि गुणकारक हैं
स्वस्थ प्रदायक मंगलकारक समूल रोग निवारक हैं
भगवान कृष्ण ग्वालों संग खुद भी गायें चराते थे
बछड़ों के संग क्रीड़ा करते दूध दही घी खाते थे
प्रेम पास में बंधी गायें कान्हा को देख रंभातीं थीं
मोहक बंसी ध्वनि सुनकर आप लौट आ जाती थीं
गौ सेवा का पुण्य प्रताप ऋषि मुनियों भी गाया है
गौ माता के आगे खुद भगवन ने शीश नवाया है
इसी मात के जीवन में अब गहरा संकट आया है
त्राहि त्राहि कर मात पुकारे कैसा कलियुग आया है
यह अपने ही पुत्रों के आगे दर दर आज भटकती है
पेट पालने को गौ माता त्रण को आज तरसती है
कुछ अधम नीच निशाचर हैं हमको आज लटा रहे
हैं सठ कामी पापी पिशाच गैया को आज कटा रहे
घनघोर पिशाच प्रवृत्ति अब यहाँ दिखाई जाती हैं
झुण्ड झुण्ड में गायें आज आरों से कटाई जाती हैं
गर ऐसी पिशाच प्रव्रत्ति पर अंकुश न लगाया जायेगा
दूर नही किंचित वह दिन जब यहाँ विनाश आ जायेगा
अपने ही पुत्रों के आगे गर कोई माता ऐसे तड़पेगी
तुम्ही बताओ अंतर्मन से सन्तान कैसे सुखी रहेगी
अब गौ माता की सेवा का प्रण हम सबको करना होगा
धर्म धर्म और धर्म की खातिर हम सबको लड़ना होगा
इस गोवंश की रक्षा खातिर कुछ ऐसा आज प्रबंध हो
होय वधिक को फांसी जब फिर फौरन गोवध बंद हो


शनिवार, 19 दिसंबर 2020

गायों के भरण पोषण का भार ठाकुर जी ने हम मनुष्यों को सौंपा है


गायों के भरण पोषण का भार ठाकुर जी ने हम मनुष्यों को सौंपा है इससे हम पल्ला नहीं झाड़ सकते

 🚣🏻‍♀️ एक मल्लाह नाविक नाव खेकर अपने एवं अपने परिवार का भरण पोषण करता था एक बार बारिश के मौसम में उसको कुछ परदेसी यात्रियों को नदिया के पार पहुंचाना था परदेसियों ने मौसम का रुख देखकर उस पार जाने में असमर्थता व्यक्त की लेकिन नाविक ने उन्हें कुशलतापूर्वक उस पार पहुंचाने का आश्वासन देकर अपनी नाव में बिठा लिया जैसे ही नाव बीच धार में पहुंची तेज हवाएं चलने लगी जिस से नाव में भय का वातावरण निर्मित हो गया नाविक को लग गया था कि आज नाव नहीं बच पाएगी इतने यात्रियों के जीवन का भार मेरे ऊपर है अब क्या करूं जब मेरे ही प्राण खतरे में है जैसे तैसे  मैं अपने प्राण तो बचाऊ यह सोचकर उसने यात्रियों से कहा कि अपने अपने प्राण बचाओ मैं तो चला और यह कह कर उसने नदी में छलांग लगा दी मल्लाह के नदी में कूदने से यात्री और ज्यादा भयभीत हो गए थोड़ी देर में तेज बारिश शुरू हो गई और मल्लाह सहित सारे के सारे यात्री नदी में डूब कर मर गए यह प्रकरण जब यमराज के पास पहुंचा तो यमराज ने इस घटना को संज्ञान में लेकर चित्रगुप्त से पूछा की बताओ चित्रगुप्त इतने जनों की मृत्यु का पाप किसके सिर पर मढ़ा जाए चित्रगुप्त ने न्यायोचित विचार कर उत्तर दिया कि यह पाप इस मल्लाह के सिर पर ही मढा जाना चाहिए इस पर मल्लाह ने  गिड़गिड़ा कर अनुनय विनय करते हुए कहा कि महाराज मेरे लाख प्रयत्न करने पर भी नाव को मैं बचा नहीं पाता इसलिए मैं अपने प्राण बचाने के लिए नदी में कूद गया इसमें मेरी क्या गलती है तब यमराज ने कहा इसमें सारी गलती तुम्हारी है जैसे ही तुमने इन यात्रियों को अपनी नाव में बिठाया इन सबके प्राणों का भार तुम्हारे ऊपर आ गया था तुम्हारा नैतिक कर्तव्य बनता था की इनके प्राणों की रक्षा करते लेकिन इनकी प्राण रक्षा की थोड़ी सी भी कोशिश किए बिना ही तुम यह समझ कर पानी में कूद गए की अब बचना मुश्किल है अगर तुम नाव को तूफान से बचाने की कोशिश में मारे जाते तो तुम्हारा कोई दोष नहीं होता किंतु दूसरे के प्राणों का भार तुम्हारे ऊपर होने पर भी  तुमने अपने कर्तव्य को नहीं समझा और स्वयं के प्राण बचाने के चक्कर में तुमने इन सबके जीवन के साथ खिलवाड़ किया अतः इन सारे यात्रियों की अकाल मृत्यु का पाप तुम्हारे सिर पर मढा जाकरतुम्हें घोर यम यातना का दंड दिया जाता है भैया यह कहानी तो यहीं समाप्त हो गई लेकिन इस कहानी में एक संदेश छुपा हुआ है  कि हम मनुष्यों को धरती पर गौ माता के भरण पोषण का भार ठाकुर जी ने सौंपा है लेकिन आज हम अपनी स्वार्थ पूर्ति के वशीभूत होकर इस उत्तरदायित्व से उस मल्लाह की तरह ही विमुख होकर गौ माता को  मौत के मुंह में डाल रहे हैं जरा सोचिए जब हम भगवान के यहां जाएंगे और भगवान हमसे यह पूछेंगे कि मैंने जो तुम्हें गौ माता के भरण पोषण का भार तुम्हें सौंपा था तुमने तो गौ माता को जीते जी स्वयं की स्वार्थ सिद्धि के वशीभूत होकर मार दिया भाइयों इस पाप से हम बच नहीं सकते इसलिए हमारा यह नैतिक कर्तव्य बनता है की इस संसार में रहते हुए हमारे आस पड़ोस में जो भी गऊ माता भूखी प्यासी घूम रही है  उन्हें कभी भी भूख से बीमारी से मरने नहीं देना है क्योंकि भगवान के घर में जब न्याय होगा तो इसके जिम्मेदार उस मल्लाह की तरह हम ही ठहराए जाएंगे 

जय गौ माता जय गोपाल

बुधवार, 9 दिसंबर 2020

'गोसेवा' भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है

'गोसेवा' भारतीय संस्कृति का प्रमुख अंग है, गाय का महत्व 'गौ-सेवा' शब्द से ही प्रकट होता है क्योंकि सेवा के दो प्रधान कारण हैं, एक तो हम बिना उपयोग किसी की सेवा नहीं करते और दूसरा यदि बिना सेवा किए हुए किसी का उपयोग करेंगे तो वह गुनाह होगा। गाय का उपयोग तो स्वतः प्रकट है, जन्म काल से लेकर मृत्यु पर्यन्त किसी न किसी रूप में मनुष्य गाय के प्रति ऋणी रहता ही है और यह ऋण तभी चुकाया जा सकता है जब हम गो-वंश को विकसित करें, गाय की मजबूत बछड़े देने की शक्ति को बढ़ाएं, उसकी दूध देने की शक्ति में वृद्धि करें। हृष्ट-पुष्ट गायों का दूध भी स्वास्थ्यवर्धक होगा। मजबूत बैल ही हमारे खेत भली प्रकार से जोत सकते हैं। हमारी गौ-सेवा का यह अर्थ नहीं है कि जब तक गौ हमें दूध दे तभी तक हम उसका ध्यान रखें और बूढ़ी हो जाने पर उसे मरने के लिए छोड़ दें। यह तो एक निकृष्ट सेवा है। गाय को उचित समय पर उचित मात्रा में चारा-पानी देना, उसके रहने की अच्छी व्यवस्था करना, काम लेने में ज्यादती न करना, उसके सुख-दुख का ध्यान रखना और बूढ़ी हो जाने पर उसको मरने तक खाना देना, इतनी बातें गौ-सेवा में आती हैं इस प्रकार की नीति के द्वारा हम गो वंश की वृद्धि और गो-वध कतई बन्द करना चाहते हैं प्राचीन संस्कृति को कायम रखने के लिए और मनुष्यत्व की रक्षा के लिए जिस गाय ने जीवन भर मनुष्य मात्र की सेवा की उसका बुढ़ापे में वध करना किसी को मंजूर नहीं हो सकता, गाय से हमारा मतलब गाय, बैल, बछड़े, बछड़ी अर्थात् पूरे गो-वंश से है।

गुरुवार, 3 दिसंबर 2020

गौ के समान उपकारी जीव मनुष्य के लिये दूसरा कोई भी नहीं है

गौ के समान उपकारी जीव मनुष्य के लिये दूसरा कोई भी नहीं है
(परम श्रद्धेय गोऋषि स्वामी श्री दत्तशरणानंदजी महाराज)
ब्रह्म सूर्यसमं ज्योतिद्र्यौः समुद्रा समँसरः।
इन्द्र पृथिव्यै वर्षीयान् गोस्तु मात्रा न विद्यते।। (यजुर्वेद 23/48)
जिस ब्रह्मविद्या द्वारा मनुष्य परम सुख को प्राप्त करता है, उसकी सूर्य से उपमा दी जा सकती है। इसी प्रकार द्युलोक की समुद्र से तथा विस्तीर्ण पृथ्वी की इन्द्र से उपमा दी जा सकती है। किन्तु प्राणी मात्र के अनन्त उपकारों को अकेली सम्पन्न करने वाली गौ की किसी से उपमा नहीं दी जा सकती गो निरूपमा है, वास्तव में मनुष्य के लिये गौ के समान उपकारी जीव दूसरा कोई भी नहीं है।
अतएव सभी मानवों को गोमाता की सेवा करने के लिये वेद भगवान का आदेश हुआ। जो व्यक्ति सब प्रकार से अपना कल्याण चाहता हो वह वेद भगवान के आदेश का पालन करे।
 श्रुती स्मृति के प्रमाणानुसार पूज्या गोमाता साक्षात सर्वदेव विग्रह है। पूज्या गोमाता की सेवा से, स्मरण से, उनके सान्ध्यि से तथा पंचगव्य सेवन से मानव में देवत्व का अवतरण होता है। क्योंकि पूज्या गोमाता सत्व का समुद्र है। मन, वाणी तथा कर्म से गोमाता की सेवा करने वाला व्यक्ति पृथ्वी का साक्षात देवता हो जाता है। सत्व से ही देवत्व का निर्माण होता है। मानव का आहार शुद्ध ऊर्जावान एवं सत्व युक्त हो तो मानव देव कोटी प्राप्त कर सकता है। एक मात्र पूज्या गोमाता ही मानव जाति को ऐसा पवित्रतम, ऊर्जावान दिव्य आहार प्रदान कर सकती है।

मंगलवार, 27 अक्टूबर 2020

गोवंश संवर्धन और गोवंश वृद्धि में नन्दी की भूमिका

गोवंश संवर्धन और गोवंश वृद्धि के लिए सुंदर, स्वस्थ, बलिष्ठ, उत्तम नस्ल का नंदी होना आवश्यक है। 50 गो पर एक नंदी होना चाहिए। जिस नस्ल की गो हो उसी नस्ल का नंदी होना चाहिए। अर्थात् कांकरेज गो के लिए कांकरेज नस्ल का नंदी, सांचौरी नस्ल के लिए सांचौरी नस्ल का नंदी, गिर गो के लिए गिर नस्ल का नंदी होना चाहिए। कारण कि हर नस्ल की गो का आकार, वजन आदि अलग अलग होते हैं, उनके गर्भाशय आदि की साइज अलग अलग होती है। अगर छोटी नस्ल के पेट में बड़ी नस्ल का बछड़ा होगा तो जन्म के समय बड़ी समस्या होगी और गो के प्राण तक जा सकते हैं।
नंदी की बहुत अच्छी तरह से देखभाल हो। केवल सूखा चारा पर नंदी को न रखें। उसे दाना, तेल, गुड़, हरा चारा आदि पोष्टिक आहार भरपूर मात्रा में देना चाहिए तथा मुक्त विचरण करने देना चाहिए।
अगर अधिक दूध देने वाली गो का बेटा होगा तो उसकी बेटियों के भी अधिक दूध होगा। नंदी को बचपन में मां का भरपूर दूध पिलाना चाहिए। जब उस नंदी की बछड़ियो 3 वर्ष की हो जाय, तब उस नंदी को वहां से हटा देना चाहिए या ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि उनका आपस में संसर्ग न होने पाए।नंदी शिव का स्वरूप होता है, इसलिए उनके प्रति शिव का भाव रखना चाहिए। नंदी के गले मिलने से बड़े से बड़ा श्राप खत्म हो जाता है।